संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 अक्टूबर : सभी तरह के धार्मिक प्रदूषण कड़ाई से रोकने की जरूरत..




दिल्ली के राजधानी क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पटाखों की बिक्री पर कुछ तरह की रोक लगी है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग उबल पड़े हैं कि हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों पर ही अदालती वार होता है, और दूसरे धर्मों पर की परंपराओं पर कुछ नहीं होता। जब धार्मिक मामला आता है, तो लोग देखादेखी पर तेजी से उतर आते हैं, और इसमें न तो कुछ गलत है, न ही अस्वाभाविक। क्योंकि जब हवा में धर्मान्धता रहती है और साम्प्रदायिक तनाव रहता है तो लोग बात-बात में धर्म पर उतर आते हैं। लेकिन इस पहलू से परे भी इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत है कि दीवाली पर पटाखे, मस्जिदों से अजान के लाउडस्पीकर, किसी भी धर्म के जुलूसों से सड़कों पर ट्रैफिक जाम और मरीजों की मौत, नदियों और तालाबों में प्रदूषण, देश भर में ध्वनि प्रदूषण, इन सबके बारे में सोचना ही होगा। या तो एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म भी अधिक प्रदूषण की जिद पर अड़ जाए, और धर्मों की अलग-अलग सामूहिक ताकतों की दहशत में जीने वाले नेता कोई भी कार्रवाई करने से कतराएं, या फिर देश की बड़ी अदालतें और ग्रीन ट्रिब्यूनल कड़ाई से देश को प्रदूषण से बचाएं, यह सोचने की बात है। 
चुनाव लडऩे वाली राजनीतिक पार्टियों की सरकारें कड़ी कार्रवाई का हौसला नहीं कर पाती हैं। और उनके मातहत काम करने वाले अफसर भी कुछ नहीं कर पाते, तब अदालतों को दखल देना पड़ता है। और अदालतों तक जनहित याचिका लेकर दौड़ लगाने वाले लोगों को देखें, तो उन्हें भी खासे सामाजिक दबाव और तनाव का सामना करना पड़ता है। बहुत से मामलों में उन्हें धमकियां मिलती हैं, और सोशल मीडिया पर लोग गालियां देते हैं। उनका एक किस्म से अघोषित सामाजिक बहिष्कार भी होने लगता है, और सरकारें भी उन्हें नापसंद करती हैं क्योंकि वे राजनीतिक असुविधा खड़ी करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सड़कों पर जुलूस से लेकर लाउडस्पीकर तक, और प्रतिमाओं के विसर्जन से लेकर दूसरे तरह के धार्मिक-प्रदूषण तक, अदालतों की दखल ही कोई फर्क ला पाई है, अदालतों से परे यह देश सुधार के लायक नहीं दिखता है। 
आज देश में वैसे ही इतना बुरा प्रदूषण है कि दूसरे धर्म के मुकाबले अपने धर्म के अधिकार पर आमादा लोग पटाखे फोड़कर इस गलतफहमी में रहते हैं कि वे अपने धर्म का कोई भला कर रहे हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि वे सबसे पहले तो अपने ही मोहल्लों और इलाकों में हवा को इतना जहरीला कर देते हैं कि उनके बच्चे सबसे पहले इस प्रदूषण का शिकार होते हैं। लेकिन जब जनता की सोच का ध्रुवीकरण राजनीतिक, जातिगत, और धार्मिक आधार पर कर दिया जाता है, तो लोग आत्मघाती होकर भी प्रदूषण फैलाकर उसे अपनी जीत मानते हैं। हमारा मानना है कि सरकारों में हौसला हो न हो, अदालतों को बहुत कड़ाई से अपने फैसले लागू करवाना चाहिए, और जहां पर अदालती फैसले लागू नहीं हो पाते हैं, वहां पर समाज के जागरूक संगठनों को कार्रवाई करनी चाहिए, और एक तरफ तो उन्हें जनजागरण का काम करना चाहिए, दूसरी तरफ अदालती विकल्प की कोशिश भी नहीं छोडऩी चाहिए। 
छत्तीसगढ़ में अभी चार दिन पहले ही राज्य सरकार ने धरती पर बढ़ते प्लास्टिक के प्रदूषण को रोकने के लिए एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। लेकिन जैसा कि किसी भी फैसले के साथ होता है, उसके अमल से उसकी कामयाबी होती है, उसके शब्दों से नहीं। देश के कई राज्यों में प्लास्टिक पर लगाई गई ऐसी रोक भ्रष्टाचार के चलते तबाह हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में ऐसी दुर्गति न हो, इसकी भी कोशिश करनी चाहिए। साथ-साथ पटाखों जैसे प्रदूषण, या किसी भी धर्म से जुड़े हुए किसी भी रीति-रिवाज के प्रदूषण को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। प्रदूषण के मामले में धर्म का जिक्र हमें बार-बार इसलिए करना पड़ रहा है कि धर्म के नाम पर किया गया कोई भी जुर्म धर्मान्धता के हथियार के साथ खड़ा होता है, इसलिए उस पर अधिक कड़ी कार्रवाई ही असरदार होती है। 




Related Post

Comments