विशेष रिपोर्ट

शराब कारोबार में हर तरह की धांधली-जालसाजी




6 माह में राजस्व मात्र 1 फीसदी बढ़ा
रायपुर, 9 अक्टूबर (छत्तीसगढ़)। प्रदेश में शराब कारोबार के सरकारीकरण को छह माह पूरे हो चुके हैं। लेकिन सरकारी दावों के विपरीत न तो अवैध शराब की बिक्री पर अंकुश लग पाया और न ही खपत कम हो सकी। हाल यह है कि पूरे कारोबार के सरकारीकरण करने के लिए व्यवस्था बनाने के नाम पर करोड़ों रूपए खर्च करने के बाद राजस्व पिछले साल के मुकाबले मात्र एक फीसदी ही बढ़ पाया। 
आबकारी विभाग ने सरकार के भीतर और बाहर विरोध को नजर अंदाज कर पहली बार शराब दुकानों को खुद चलाने का फैसला लिया। यह कहा गया कि प्रदेश में धीरे-धीरे शराब बंदी की जाएगी। सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए शराब कारोबार को हतोत्साहित करना जरूरी है। प्रदेश में 712 देशी-विदेशी शराब दुकानें चल रही हैं। विभाग खुद कंपनी बनाकर शराब दुकानों का संचालन कर रहा है। नई व्यवस्था को छह माह से अधिक हो चुके हैं। लेकिन यह व्यवस्था अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल होता नहीं दिख रहा है। 
सरकार ने दुकानों के संचालन के लिए प्लेसमेंट एजेंसियों के मार्फत सवा 5 हजार से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति की। दुकान खुलने-बंद करने के समय में कटौती की गई। सभी दुकानों में व्यवस्था जुटाने के नाम पर करोड़ों रूपए अलिखित खर्च हुए हैं। पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की नियत से सभी दुकानों में सीसीटीवी लगाए गए और बिल देने की बात कही गई। इन तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद अवैध शराब बिक्री तेज हो गई। खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लोक सुराज अभियान के दौरान सूरजपुर जिले के सीमावर्ती गांव में एक अवैध रूप से शराब की दुकान पकड़ी गई। यह सब सरकारी संरक्षण में हुआ और आबकारी अफसरों की इसमें सीधे संलिप्तता रही है। 
सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के अन्य सीमावर्ती इलाकों से अवैध शराब का आना शुरू हो गया है। कोचियों के जरिए घर पहुंच सेवा भी धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है। विभाग के मुताबिक शराब की खपत कम हुई है लेकिन अघोषित तौर पर खपत बढ़ी ही है। यह आरोप लग रहे हैं कि चुनिंदा कंपनियों से ज्यादा दर पर ही शराब खरीदे जा रहे हैं और कमीशन आबकारी विभाग से जुड़े लोगों तक पहुंच रहा है। इस पूरी व्यवस्था को लेकर सरकार में भी नाराजगी है। दो -तीन मंत्रियों ने कुछ समय पहले कैबिनेट की बैठक में इसको लेकर आगाह भी किया था। उन्होंने शराब का पीढिय़ों से कारोबार कर रहे लोगों की तरफ ध्यान देने के लिए कहा था, जिनके बार-शराब दुकान नई नीति के चलते बंद हो गए हैं। ये लोग कोई दूसरा काम नहीं कर पा रहे हैं। 
उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई थी कि आबकारी नीति में संशोधन सिर्फ बड़े होटल समूह के हितों को ध्यान में रखकर किया गया। उन्होंने नई नीति के चलते शराब के अवैध कारोबार में बढ़ोत्तरी की आशंका जताई थी।  उनकी यह आशंका अब सही दिख रही है। 
विभाग ने दुकानों के समय में कटौती कर दी है। रात्रि 9 बजे के बाद शराब दुकानें बंद हो जाती है। लेकिन अब नियत समय के बाद कई जगहों पर कर्मचारी ही चोरी छिपे ज्यादा कीमत पर शराब उपलब्ध करा रहे हैं। क्वॉलिटी को लेकर भी कई तरह की शिकायतें आई है। कुछ जगहों पर खुद विभाग के लोगों ने मिलावटी शराब पकड़ी थी। यह सब तब हो रहा है जब पूरी व्यवस्था आबकारी अमले के हाथों में हैं और  ठेकेदार कही नहीं है। 
दुकान में काम कर रहे कर्मचारी भी अब शोषण के शिकार हो रहे हैं। कवर्धा सहित कई जिलों में समय पर वेतन नहीं मिलने पर कर्मचारी आंदोलन की राह पर है। 
यहां प्लेसमेंट एजेंसियां नियमित वेतन नहीं दे रही है और कर्मचारियों के वेतन में कटौती भी कर रही है। इसको लेकर कवर्धा के जिला आबकारी अधिकारी ने राज्य शासन को शिकायत भी भेजी है। कुछ और जगहों से शिकायत सामने आई है। कर्मचारियों ने 10 अक्टूबर के बाद नियमित वेतन नहीं मिलने की दशा में आंदोलन की चेतावनी भी दी है। इन तमाम खर्चो के बाद भी हाल यह है कि आय में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हो पाई है। वित्त विभाग के एक उच्चाधिकारी ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि पिछले साल के मुकाबले आबकारी राजस्व में मात्र एक फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। आशंका यह भी जताई जा रही कि अगले साल चुनावी वर्ष होने के कारण अवैध शराब बिक्री में बढ़ोत्तरी होगी। बहरहाल, आबकारी कारोबार को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। 




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