संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 अक्टूबर : बड़ी-बड़ी कामयाबियों के बीच छोटी-छोटी दिक्कतों का अंबार




छत्तीसगढ़ में सरकार एक-एक फैसले पर हजार-हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है, और कहीं किसानों को धान-बोनस दिया जा रहा है, तो कहीं गरीबों को स्मार्ट फोन देने के लिए हजार करोड़ से अधिक इस बरस के बजट में रखा गया है। यहां के शहरों को देखें तो उन पर बड़ी रकम खर्च हो रही है, और लोग अगर दस बरस बाद राजधानी रायपुर आ रहे हैं तो वे इसकी शक्ल को पहचान नहीं पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं होता जिसमें कहीं न कहीं बीमार को या लाश को खाट पर, कुर्सी पर, या ठेले पर लेकर जाते हुए लोग न दिखते हों। और अगर ऐसी एक तस्वीर सामने आती है, तो शायद उसके पीछे दर्जन भर ऐसे मामले और रहते होंगे जिनके आसपास कोई कैमरा न रहता हो। कमोबेश यही हाल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों का है, और उन सरकारी दफ्तरों का है जहां पर गरीबों का काम अधिक पड़ता है। ऐसी जगहों पर जब लोगों के काम नहीं होते हैं, तो उसी का नतीजा होता है कि लोग मुख्यमंत्री के जनदर्शन में पहुंचते हैं, और उनसे नीचे अब कलेक्टरों के जनदर्शन में भी सैकड़ों लोग पहुंचने लगे हैं। 
एक तरफ तो मुख्यमंत्री या कलेक्टर अपने ऐसे जनदर्शन की भीड़ को, उसमें आने वाली समस्याओं के समाधान को एक बड़ी कामयाबी मान सकते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ यह भीड़ सबसे पहले तो इस बात का सुबूत है कि सरकार की नियमित व्यवस्था काम नहीं कर रही है, और इसीलिए लोग पूरे प्रदेश से चलकर मुख्यमंत्री निवास पहुंचते हैं, या कि पूरे जिले से चलकर कलेक्टर से मिलने आते हैं। यहां पहुंचे हुए लोगों की भीड़ उन निराश लोगों में से एक फीसदी से अधिक नहीं हो सकती जो कि सरकारी दफ्तरों के, अस्पतालों के, चक्कर काट काटकर थक चुके हैं। इसके साथ-साथ अगर पुलिस के पास पहुंचने वाली शिकायतों को देखें, तो उनमें से हर दिन कोई न कोई एक ऐसी आत्महत्या, या आत्महत्या की कोशिश की खबर आती है जिसमें कहीं कोई लड़की छेडख़ानी की शिकार है, और उसकी शिकायत पर गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। बहुत सी शिकायतें ऐसी भी रहती हैं जिसमें कोई लड़की या महिला बलात्कार की शिकायत के बाद पुलिस कार्रवाई का इंतजार करते-करते मरने की धमकी-चेतावनी देती है, तब जाकर कोई कार्रवाई होती है। हर हफ्ते शायद ऐसी खबर आती है कि सरकार की कार्रवाई के इंतजार में थक चुके आम नागरिक या सरकारी कर्मचारी ने इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी है। 
हम दो बातों को जोड़कर एक साथ आज यहां इसलिए लिख रहे हैं कि एक तरफ तो सरकार जनसुविधाओं पर बहुत बड़ा खर्च कर रही है, और जनकल्याण के लिए लोगों को सीधे फायदा भी दे रही है। और दूसरी तरफ सरकरार के इस विशाल ढांचे, और विशाल खर्च के बावजूद सबसे कमजोर तबके के लोग किसी कार्रवाई या किसी इंसाफ के लिए भटकते रहते हैं। इससे एक बात खुलकर दिखती है कि सरकार का अपना ढांचा जवाबदेही से परे है, सरकार में काम करते लोग संवेदनाशून्य से हैं। और दिक्कत यह है कि बड़ी-बड़ी कामयाबी की खबरों के बीच बहुत छोटी-छोटी, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में नाकामयाबी की खबरें दब जाती हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग एक किस्म से आत्मसंतुष्ट भी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितना कुछ किया है, और इस करने के मुकाबले न की गई, या कि न की जा सकीं चीजें कितनी छोटी-छोटी हैं। ये चीजें छोटी जरूर हैं, लेकिन संख्या में बहुत बड़ी हैं। 
हमारा यह भी मानना है कि सरकारी कामकाज में बेहतरी को लेकर कई बार इस्तेमाल होने वाला शब्द, प्रशासनिक-सुधार, यह एक कारगर शब्द तो हो सकता है, अगर इसे अच्छी नीयत और पक्के इरादे के साथ लागू किया जाए। लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव यह है कि राज्य में मुख्य सचिव रह चुके लोगों को प्रशासनिक सुधार का काम दिया जाता है, और अगर उनमें प्रशासनिक सुधार की क्षमता होती, तो राज्य के प्रशासनिक मुखिया रहते हुए इसे करने का पूरा मौका उनके पास था, और वे उसे नहीं कर पाए, या कि वह करना उनकी क्षमता और दिलचस्पी से परे का था। ऐसे चुक चुके लोगों को ऐसी जिम्मेदारी देने का मतलब उनके लिए किसी पुनर्वास का इंतजाम तो हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह के प्रशासनिक सुधार की संभावनाओं को खत्म कर देता है। सरकार को अगर सचमुच ही प्रशासनिक सुधार करना है तो उसे सरकार के बाहर के लोगों से राय मांगनी होगी, और जब तकलीफ पाकर भुक्तभोगी बने हुए लोग कोई सुझाव देंगे, तो उसे सुनने, उनमें से सही सुझावों को मानने, और उन पर ताकत से अमल करवाने से ही कुछ अच्छा हो सकता है। सरकार का विशाल ढांचा, विशाल बजट, उसकी बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं ये अगर जनता की बहुत ही नियमित, बहुत ही उजागर, छोटी-छोटी दिक्कतों को दूर करने के बारे में कुछ नहीं कर पाते, तो यह जनता को निराश करने वाली नौबत ही रहती है। 




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