विचार / लेख

पाक में सत्ता की ओर बढ़ते फौजी कदम




विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी
क्या पाकिस्तान में एक बार फिर फौजी हुकूमत का दौर लौटने वाला है? पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ से बातचीत खत्म होने के फौरन बाद अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने जब पत्रकारों से बिना किसी प्रसंग यह कहा कि उनकी सरकार पाकिस्तान में राजनीतिक स्थायित्व चाहती है, तो उनका निहितार्थ क्या था? ऐसा तो नहीं कि बंद कमरे के अंदर दोनों के बीच होने वाले वार्तालाप में ख्वाजा आसिफ ने सेना के इरादों को लेकर कोई आशंका जाहिर की हो और टिलरसन ढके-छिपे शब्दों में ऐसे किसी प्रयास को अमेरिकी सरकार का समर्थन न मिलने का संदेश दे रहे थे। ऐसी ही आशंकाओं पर कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन राष्ट्रपति जरदारी द्वारा अपने राजदूत हक्कानी के जरिये अमेरिकी अधिकारियों से संपर्क साधा गया था। 
यह अलग बात है कि मेमोगेट के नाम से प्रचलित इस प्रकरण के लीक हो जाने के कारण ताकतवर पाकिस्तानी सेना के हाथों उनकी बड़ी छीछालेदर हुई और राजदूत हक्कानी को न सिर्फ अपने पद से हाथ धोना पड़ा, बल्कि वह आज तक अमेरिका में निर्वासित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। इसी बीच सेना मुख्यालय में देश के सबसे ताकतवर और कई मसलों पर निर्णायक समूह कोर कमांडरों की सात घंटे तक एक मैराथन बैठक हुई और प्रचलित परंपरा से उलट बैठक समाप्त होने के बाद सेना के जनसंपर्क निदेशालय ने कोई बयान जारी नहीं किया। आपात रूप से अचानक बुलाई गई रहस्यमयी और गोपनीय बैठक ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि सेना और नागरिक प्रशासन के बीच सब कुछ ठीक नहीं है।
पिछले कुछ दिनों से ये खबरें पाकिस्तानी मीडिया में गश्त कर ही रही थीं कि सैनिक और असैनिक नेतृत्व के बीच भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका को लेकर गहरे मतभेद हैं। एक आम जानकारी के मुताबिक, इन राष्ट्रों से रिश्ते फौज तय करती है। हालिया वक्त में पाकिस्तानी राज्य द्वारा पाले-पोसे गए जेहादी संगठनों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता घटी है। अफगानिस्तान में लंबी खिंच रही लड़ाई से अमरीका का धैर्य चुक रहा है और ट्रंप द्वारा ताजा घोषित पाक-अफगान नीति तो एक खुली चुनौती की तरह है, जिसने हक्कानी नेटवर्क जैसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर पाकिस्तान को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। 
इस घोषणा से सेना और सरकार के अंतर्विरोध और गहरे हो गए हैं। सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नून) पहले से ही सेना को कश्मीर में सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और अफगानिस्तान में लड़ रहे हक्कानी नेटवर्क व तालिबान से दूरी बनाने को कह रही थी, अब अमेरिका की धमकी के बाद उसके स्वर कुछ और मुखर हो गए हैं। ख्वाजा आसिफ ने तो अमरीका के एक थिंक टैंक के सामने बोलते हुए यहां तक कह दिया कि ये सारे संगठन उनके देश के लिए बोझ बन चुके हैं, पर इनसे निपटना अकेले पाकिस्तान के बूते का नहीं है  और इन्हें अमरीका ने ही अफगान युद्ध के दौरान बनाया था, इसलिए इन्हें समाप्त करने के लिए उसे पाकिस्तान को संसाधन देने चाहिए। उनके इस बयान से दो-तीन दिन पहले ही सेना प्रमुख जनरल बाजवा कह चुके थे कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध काफी कुछ कर चुका है और अब उसे नहीं, दुनिया को ही अधिक कुछ करना है। आसिफ और बाजवा के कथन में बुनियादी फर्क सेना और सरकार के बीच बढ़ रहे अंतर्विरोधों को ही दर्शाता है। 
पिछले अनुभव बताते हैं कि गंभीर मतभेद होने पर पाकिस्तानी राजनीतिक नेतृत्व को ही पीछे हटना पड़ता है। मेमोगेट जैसा ही एक वाकया चंद महीने पहले हुआ था, जब प्रधानमंत्री आवास पर हुई एक सुरक्षा बैठक में विदेश मंत्रालय के नौकरशाहों और कुछ मंत्रियों ने साफ कर दिया था कि जेहादियों को समर्थन देने की नीति के कारण पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग पड़ता जा रहा है, इसलिए फौज को अपनी नीति में बदलाव लाना पड़ेगा। 
बैठक में मौजूद सैन्य अधिकारी तो कुछ नहीं बोल सके, पर दो दिन बाद डॉन  अखबार में बैठक की कार्यवाही के विवरण छपते ही फौज ने पलटवार किया और झुक कर न सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय ने पूरी खबर को निराधार ठहराया, बल्कि नवाज शरीफ को सुलह की कीमत के रूप एक मंत्री और कई अफसरों की बलि भी चढ़ानी पड़ी। इस बार हालात कुछ बदले हुए हैं। न सिर्फ अमरीका, बल्कि ब्रिक्स में मौजूद चीन और रूस ने भी आतंकी संगठनों के नाम लेकर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। 
ये वे संगठन हैं, जिन्हें पाकिस्तानी फौज ने बड़े जतन से पाला-पोसा है और जिन्हें वह अपना स्ट्रेटिजिक पार्टनर मानती है। उनके खिलाफ कार्रवाई से किस हद तक सेना गुरेज करेगी, यह सेनाध्यक्ष के उस बयान से ही स्पष्ट हो गया, जिसमें उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने बहुत कर लिया और अब विश्व को पाकिस्तान से 'डू-मोरÓ करने के लिए नहीं कहना चाहिए, बल्कि खुद ही 'डू-मोरÓ करना चाहिए। पर इसके बाद भी आज बदले अंतरराष्ट्रीय हालात में सेना कुछ हद तक रक्षात्मक है और अपने बेबाक बयान के बावजूद विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ की नौकरी बरकरार है। 
पाकिस्तानी अखबारों और चैनलों की मानें, तो सेना सरकारी रुख से बेहद नाराज है और कोर कमांडरों की सात घंटे की बैठक से छनकर आने वाली खबरें भी इसी तरफ इशारा कर रही हैं। पूरी संभावना है कि विदेश मंत्रियों की बैठक में यह तथ्य अमेरिका की जानकारी में लाया भी गया हो और इसीलिए अमेरिकी विदेश मंत्री द्वारा प्रेस ब्रीफिंग मे प्रच्छन्न रूप से पाक फौज को कोई दुस्साहसिक कदम न उठाने की चेतावनी दी गई। इस चेतावनी का क्या असर पड़ेगा, इसे अभी देखना है।  सेना के पास तीन विकल्प हैं- वह नवाज शरीफ की बलि ले ही चुकी है, अत: अगले साल होने वाले आम चुनाव की प्रतीक्षा करे और इमरान खान जैसी किसी अपनी निर्मिति को प्रधानमंत्री बनाकर परदे के पीछे से सत्ता संचालन करे। दूसरा, नवाज के नामित खाकान अब्बासी को हटाकर राष्ट्रीय सरकार के नाम पर किसी कठपुतली को प्रधानमंत्री बनाकर अपना एजेंडा चलाए या तीसरा, खुद ही सत्ता पर काबिज होकर आतंकी गिरोहों का बचाव करे। इनमें से कुछ भी हो सकता है। 
अंदरूनी हालात ऐसे हैं कि यदि सेना तीसरा विकल्प चुनना चाहे, तो उसे बड़े प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। केवल अमेरिका और चीन का सम्मिलित प्रयास ही उसे इस दुस्साहस से रोक सकता है और एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय दबाव ही उसे जेहादी संगठनों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए मजबूर कर पाएगा। http://www.livehindustan.com/blog/l

 




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