विशेष रिपोर्ट

धार्मिक-खेतों का धान ही नहीं लिया गया था, अब बोनस भी नहीं!




छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 11 अक्टूबर। धान खरीदी के लिए प्रदेश के धार्मिक संस्थाओं का भी पंजीयन होगा। बताया गया कि सरकार ने पहले इस पर रोक लगा दी थी। इस वजह से धार्मिक संस्थाओं द्वारा उत्पादित धान को प्राथमिक सहकारी समितियां नहीं खरीद रही थी और बोनस भी नहीं मिल पा रहा था। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हस्तक्षेप के बाद नियमों में  संशोधन किया जा रहा है। 
प्रदेश की मंदिरों-मठों और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के पास सैकड़ों एकड़ जमीन है। इन जमीनों पर खेती होती है और इसकी आमदनी से संस्थाएं चल रही है। पिछले साल खाद्य विभाग ने एक आदेश जारी कर संस्थाओं का पंजीयन नहीं करने से आदेश दिए थे। बताया गया कि यह आदेश विलंब से निकला तब तक ज्यादातर संस्थाओं का पंजीयन हो चुका था। कुछ संस्थाओं का पंजीयन नहीं हो पाया और ऐसी संस्थाओं के धान की खरीदी भी सोसायटियों ने नहीं की। लेकिन इस बार किसी भी संस्थाओं का पंजीयन नहीं हो पा रहा है। 
बताया गया कि दूधाधारी मठ के प्रमुख पूर्व विधायक महंत रामसुन्दर दास की अध्यक्षता में प्रदेश के मंदिर-मठों और अन्य संस्थाओं के प्रमुखों की बैठक हुई। नए आदेश के चलते संस्थाओं को हो रही दिक्कतों पर चर्चा हुई और महंत रामसुन्दर दास के नेतृत्व में उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने संस्था प्रमुखों की दिक्कतों पर गंभीरता दिखाई और मुख्य सचिव विवेक ढांड से इसको लेकर चर्चा की। इसके बाद आदेश में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है। पूर्व विधायक महंत रामसुन्दर दास ने 'छत्तीसगढ़' से चर्चा में कहा कि मंदिर-मठों और इनसे जुड़ी अन्य संस्थाओं की प्रदेश में सैकड़ों एकड़ जमीन है।
उन्होंने बताया कि सभी संस्थाओं का सोसायटियों में पंजीयन होता रहा है और संस्थाओं द्वारा उपार्जित धान की खरीद समर्थन मूल्य पर की जाती रही है। मंदिर-मठ और अन्य संस्थाएं खुद भी खेती करती है और किसानों को रेग पर भी खेती के लिए जमीन उपलब्ध कराती रही है। किसान और संस्था के बीच आपसी सहमति से धान समितियों को बेच दी जाती रही है और अनुबंधित धान के मूल्य के बराबर राशि उन्हें दी जाती रही है। 
तीन साल पहले बोनस भी दिया गया था, लेकिन पिछले साल कई संस्थाएं अपना धान पंजीयन नहीं होने के कारण सोसायटियों को नहीं बेच पाई। इससे किसानों और संस्थाओं, दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ा।
उन्होंने कहा कि जमीन से ही संस्थाओं का खर्च निकलता है। लेकिन नए नियम से किसानों और संस्थाओं दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव ने इस मामले में हस्तक्षेप कर पंजीयन के लिए तत्काल कदम उठाने का आश्वासन दिया है। विभाग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक जल्द ही आदेश जारी किया जा रहा है, जिससे संस्थाएं भी पूर्व की भांति पंजीयन करा पाएंगे और उनका धान सोसायटियों में खरीदा जा सकेगा। 

 




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