संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अक्टूबर : पुराने सामानों का दान तो अच्छा है लेकिन किफायत से जीना और अच्छा




दीवाली का मौका घर, दुकान, या दफ्तर की सफाई का भी रहता है, और जो लोग बहुत तंगदिल नहीं रहते, वे ऐसे मौके पर अपना कुछ फालतू का सामान आसपास के जरूरतमंद लोगों को बांट भी देते हैं। लोगों की यह दरियादिली उनके करीब काम करने वाले लोगों की मदद तो हो जाती है, लेकिन वह सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच जाए, ऐसा नहीं हो पाता है। ऐसा करने के कुछ अलग-अलग तरीके हैं जो कम या अधिक हद तक कारगर हैं। इनमें से एक तरीका दुनिया के कई देशों में नेकी की दीवार के नाम से चल निकला है, और शहर में लोग अपने गैरजरूरी कपड़े ले जाकर उस दीवार पर टांगने लगते हैं, और जरूरतमंद लोग वहां से ले जाने लगते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सारे लोग सामाजिक सरोकार की जिम्मेदारी को समझ सकें, और जरूरत रहने पर ही कपड़ों को वहां से ले जाएं। यह निगरानी मुमकिन भी नहीं है, और इसके बिना भी शायद कुछ लोगों को तो कपड़े या दूसरे सामान यहां से मिल जाते हैं। 
अभी कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन के शो, केबीसी पर एक ऐसे समाजसेवी को बुलाकर उससे लंबी चर्चा की गई थी जो कि देश भर में इस तरह का काम अधिक संगठित और व्यवस्थित रूप से कर रहा है। लेकिन इसके लिए किसी परमाणु तकनीक की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने स्तर पर, अपने-अपने शहर में भी ऐसा कर सकते हैं। कपड़े और दूसरे सामान इकट्ठा किए जा सकते हैं, उनमें कोई मामूली काम हो तो वह किया जा सकता है, और जरूरतमंद लोगों तक उसे पहुंचाने का भी कोई एक रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन इसी मुद्दे पर कल सोशल मीडिया में अमरीका में बसे एक भारतवंशी ने दो बातें लिखी हैं। उन्होंने लिखा कि पुराने कपड़ों को दान देना अधिक खतरनाक हो सकता है, क्योंकि ऐसे में लोग अपनी जरूरत से बहुत अधिक कपड़े खरीदते जा सकते हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने के बाद दूसरों को दे सकते हैं, और आत्मसंतुष्टि भी पा सकते हैं। इसके बजाय धरती के लिए बेहतर यह होगा कि लोग खुद ही कम कपड़े खरीदें, उनका अधिक से अधिक इस्तेमाल करें, और धरती पर सामानों का बोझ न बढ़ाएं। 
यह बात एक नया नजरिया पेश करती है कि अपने गैरजरूरी सामान दूसरों को देना तो अच्छा है, लेकिन अपने इस्तेमाल के जरूरी सामानों के बाद और अधिक सामानों को लेना, धरती और पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचाना होता है। इसलिए लोगों के मन में दान देने की संतुष्टि अपने सामानों को बढ़ाते जाने के बाद उन्हें लोगों में बांटने से आना काफी नहीं है। अपने इस्तेमाल में किफायत बरतने के बाद दूसरों की मदद सीधे करना, उन गरीबों के भी अधिक काम का होगा, और धरती को भी उससे नुकसान घटेगा। और ऐसा भी नहीं है कि संपन्न लोगों में कुछ लोग ऐसी सोच के नहीं रहते हैं। कई बरस पहले गोदरेज कंपनी के मालिकान में से एक छत्तीसगढ़ आए थे, और वे फटे-पुराने सरीखे कपड़े पहने हुए थे, और वे साल भर अलग-अलग शहरों में जाकर वहां के समाज सेवा के अच्छे काम करने वाले संगठनों को दान देने का ही काम करते थे। भारत की दो-तीन सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों को बनाने वाले अजीम प्रेमजी या नारायण मूर्ति जैसे लोग विमान में साधारण दर्जे में सफर करते हैं, और गिने-चुने सामान का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के बहुत से ऐसे खरबपति हैं जिन्होंने पिछले कई दशक महज दो जोड़ी जूतों में निकाल दिए हैं। दो सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों के मालिकों को देखें, तो एप्पल बनाने वाले, अब गुजर चुके, स्टीव जॉब्स और आज फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग एक ही रंग की टी-शर्ट, और एक ही तरह की जींस में अपने सबसे बड़े समारोहों में मंच पर दिखते आए हैं। इनके पास और किस्म के कपड़े भी बहुत सीमित हैं या थे। 
अपने अतिरिक्त सामानों को दूसरों को बांट देने की तसल्ली तो ठीक है, लेकिन अपनी जरूरतों को किफायत के साथ इस्तेमाल करना अधिक समझदारी है, और धरती का सम्मान करना भी है। अभी दुनिया में कई लोग ऐसे प्रयोग भी कर रहे हैं कि छह महीने या साल भर का वक्त वे कुल पचास सामानों के साथ गुजार रहे हैं, और एक भी दूसरा सामान इस्तेमाल नहीं करते। भारत में तो जैन धर्म से लेकर गांधी तक बहुत किस्म की सोच किफायत की जिंदगी सुझाती है, और लोगों को इस बारे में सोचना भी चाहिए। फिलहाल लोग जो सामान ले चुके हैं, और इस्तेमाल करके थक गए हैं, उनको दीवाली के मौके पर अपनी छाती से बोझ कम करना चाहिए। 




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