संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 नवंबर : मुख्य न्यायाधीश तुरंत ही इस मामले से अलग हों...

Posted Date : 12-Nov-2017



सुप्रीम कोर्ट में एक मामला चल रहा है जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों को गलत तरीके से इजाजत देने पर हाईकोर्ट से रिटायर एक ऐसे जज को भी गिरफ्तार किया गया है जो कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी जज रह चुके हैं। इस मामले की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर देश के एक विख्यात वकील प्रशांत भूषण ने यह आरोप लगाया कि वे इसमें जरूरत से अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं जबकि इस मामले के तार उनसे भी जुड़े हुए हैं। प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के दफ्तर और मुख्य न्यायाधीश के आदेशों का हवाला देते हुए यह सामने रखा कि दीपक मिश्रा किस तरह इस मामले की सुनवाई में जज बने रहना चाहते हैं, और उन्होंने इसके लिए बनाई बेंच में अपने साथ सबसे जूनियर जजों को रखा है। 
प्रशांत भूषण और उनके पिता, देश के एक भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण पहले भी सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ ऐसी लड़ाई लड़ चुके हैं, और वे जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे से डरते नहीं। पिता-पुत्र को सुप्रीम कोर्ट ने कई बार मानहानि का नोटिस भी दिया, लेकिन उन्होंने सजा की परवाह नहीं की, और वे अपने आरोपों पर डटे रहे। यह तो पुरानी बात हो गई कि उन्होंने आधा दर्जन जजों के भ्रष्ट होने का दावा किया था, अभी ताजा मामला यह है कि मुख्य न्यायाधीश एक ऐसे मामले में जाहिर तौर पर जरूरत से अधिक दिलचस्पी लेते दिख रहे हैं जिनमें पीछे कहीं उनका नाम भी जुड़ा हुआ दिखता है। आमतौर पर न्यायपालिका में कोई भी जज ऐसे मामले से अपने को तुरंत ही अलग कर लेते हैं जिनसे उनका दूर का भी कोई रिश्ता रहा हो, या दिखता हो, या कि ऐसा आरोप लगता हो। बहुत से जज वकालत के पेशे से आए हुए रहते हैं, और उनकी अदालत में जब ऐसे मामले लगते हैं जिनमें वे किसी एक पक्ष के वकील रह चुके हों। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश ऐसे में मुख्य न्यायाधीश अगर इस मामले से पहले किसी भी स्तर पर जुड़े हुए रहे हैं, तो उन्हें तुरंत ही खुद होकर अपने आपको इससे अलग कर लेना था। लेकिन प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के भीतर काम के बंटवारे को लेकर, सुनवाई के लिए जजों की बेंच बनवाने को लेकर जिस तरह मुख्य न्यायाधीश की नाजायज दिलचस्पी की बात कही है, अगर वह सच है, तब तो जज के खिलाफ महाभियोग का मामला भी बनता है, और अगर वह सच नहीं भी है, तो भी ऐसे आरोप लगने के बाद मुख्य न्यायाधीश का इस मामले की सुनवाई में जबर्दस्ती बने रहना ठीक नहीं है, इससे न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास खत्म होगा। प्रशांत भूषण पहले भी बहुत सारे मामलों में भ्रष्टाचार साबित किए हुए एक गंभीर वकील हैं, और उनके आरोपों के जो विवरण सामने आए हैं, वे पहली नजर में गंभीर लगते हैं। मुख्य न्यायाधीश को तुरंत ही इस मामले से अपने को अलग करना चाहिए। 
- सुनील कुमार




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