संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 नवंबर : भारतीय लोकतंत्र में सरकार का विकल्प अदालत नहीं

Posted Date : 13-Nov-2017



जम्मू में हिन्दुओं के एक सबसे बड़े तीर्थ, वैष्णो देवी में भक्तों की भीड़ को देखते हुए राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि वहां एक दिन में पचास हजार से अधिक लोगों को न जाने दिया जाए। इस तीर्थ में इससे अधिक लोगों को समाने की क्षमता नहीं है, और हादसे हो सकते हैं, इसलिए यह आदेश आया है। लेकिन यह आदेश एक दूसरे मायने में सोचने-विचारने लायक है कि हर मामले में किसी अदालत या किसी ट्रिब्यूनल के दखल देने की नौबत क्यों आनी चाहिए? बार-बार यह मुद्दा क्यों उठना चाहिए कि सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है, इसलिए अदालत कार्रवाई करे? या इसके ठीक उल्टे यह मुद्दा भी उठता है कि अदालत सरकार का काम न करे। कई केन्द्रीय मंत्री यह बात कह चुके हैं कि अदालतों को सरकार का काम नहीं करना चाहिए, यह उनके दायरे से बाहर की बात है। 
न सिर्फ केन्द्र सरकार के स्तर पर, बल्कि राज्य और स्थानीय शासन के स्तर पर भी जब बहुत से मामले सरकार नहीं सुलझाती है, तो उस पर लोगों को अदालत की दौड़ लगानी पड़ती है, और अदालतों का खासा समय सरकारी निष्क्रियता के मामलों को निपटाने में लगता है। अभी-अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक लंबी जांच के बाद रायपुर और बिलासपुर दो सबसे बड़े शहरों में लोगों के घर तक पहुंचने वाले म्युनिसिपल के पानी में बीमारी के कीटाणु होने पर आदेश दिया है। अब सवाल यह उठता है कि जिन शहरों के पास अपने को खूबसूरत बनाने के लिए हजारों करोड़ रूपए हैं, उन शहरों में पानी जैसी बुनियादी सहूलियत को अगर म्युनिसिपल पूरा नहीं करेगा, तो उसका घातक नतीजा यह निकलेगा कि हर कोई अपने घर में ट्यूबवेल खुदवाएंगे, और उसके बाद वे जितना पानी निकालने और खर्च करने की आदत डाल लेंगे वह पूरी धरती को भारी पड़ेगा। जब सार्वजनिक सुविधाओं को सरकार अपनी जिम्मेदारी से पूरा नहीं करती है, तो बहुत से मामलों में ऐसा नुकसान होता है। आज दिल्ली में छाए हुए जानलेवा प्रदूषण को देखें तो यह साफ होता है कि समय रहते दिल्ली में मेट्रो नहीं आई, बसों में महिलाओं की हिफाजत नहीं हुई, जरूरत जितनी बसें नहीं रहीं, और इन सबके चलते वहां पर लोग निजी कारों से चलने के आदी हो गए। नतीजा यह निकला कि दिल्ली में गाडिय़ों का धुआं, बाकी प्रदूषण के साथ मिलकर इतना बेकाबू हो गया है कि अभी कल अमरीका की एक एयरलाइंस ने दिल्ली की उड़ानें रद्द ही कर दी हैं।
सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, तो जनता को उसके खिलाफ अदालत तक जाकर एक बड़ी महंगी और थका देने वाली लड़ाई लडऩी पड़ती है। लोकतंत्र में अदालतें कुछ हद तक तो जनता के काम आ सकती हैं, लेकिन अदालतों से फैसला आने में बड़ा लंबा वक्त लगता है, सरकारें बदल जाती हैं, और जनता तकलीफ पाते रहती है। लोकतंत्र में सरकार का जिम्मा सरकार के पूरे करने पर ही यह तंत्र चल सकता है। अदालत अपना काम न करे, और संसद जजों के खिलाफ महाभियोग चलाती रहे, तो फिर संसद का पूरा वक्त हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ महाभियोग में निकल सकता है। आज केवल सरकार की बात नहीं है, संसद और विधानसभा भी काम करने से कतरा रही हैं, या कि वहां विपक्ष सरकार से जवाब लेने के अपने हक और जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पा रहा है, इसलिए भी सरकारी निकम्मापन जारी है। आज देश को यह समझने की जरूरत है कि संविधान में कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका नाम के तीन स्तंभ बनाकर उन पर लोकतंत्र को टिकाया है। ये एक किस्म से एक तिपाई के तीन पाये हैं, और इनमें से एक भी अगर छोटा होता है, तो पूरी तिपाई लडख़ड़ाकर गिर जाती है।
- सुनील कुमार




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