विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियाँ : सलवा जुडुम का भी एक स्मारक है

Posted Date : 13-Nov-2017



बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

जब हम कुटरू में प्रविष्ट हुए उस समय उत्सव सा प्रतीत हो रहा था। मैदान में टैंट लगा हुआ था, मंच पर बैकड्रॉप था - जन समस्या निवारण शिविर, लाउडस्पीकर पर गीत चल रहा था और वातावरण में चहल-पहल थी। सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों की भारी मात्रा में उपस्थिति मेरे सामने प्रश्नवाचक चिन्ह उपस्थित कर रही थी। अधिक तहकीकात नहीं करनी पड़ी चूंकि स्वरूप से ही यह एक प्रशासनिक कार्यक्रम लग रहा था। यहाँ जन-समस्या के निवारण की जैसी भी कोशिश हो किंतु प्रायोजन था कि कुछ नक्सली सार्वजनिक रूप से आत्मसमर्पण के लिये यहाँ आने वाले थे। इसी रास्ते एक कोने में बड़े से सफेद रंग एक स्मारक पर मेरी निगाह ठहर गयी। नक्सल स्मारकों अथवा अन्य प्रचलित मृतक स्मारकों से इसकी बनावट भिन्न थी। विशाल स्तम्भ जिसमें छ: समानाकार फलक देखे जा सकते हैं और जिनके शीर्ष को पिरामिड का आकार दिया गया है, इसे एक वृत्ताकार चबूतरे पर निर्मित किया गया है। इस स्तम्भ पर सलवा जुडुम शहीद स्मारक लिखा हुआ है तथा निर्माण तिथि 4 जून 2005 अंकित है। यह स्मारक थोड़ा अलग इस लिये है क्योंकि व्यक्ति नहीं समूह के लिये अथवा एक पूरी घटना की स्मृति में इसका निर्माण हुआ है। इस तरह का सलवा जुडुम शहीद स्मारक मेरी निरंतर यात्राओं में अब तक दूसरा मेरी निगाह से नहीं गुजरा। अन्यथा तो सलवा जुडुम की विभीषिका के हृदयविदारक अवशेष कोण्टा के निकट एर्राबोर में देखने को मिलते हैं जहाँ कतारबद्ध शहीद हुए एसपीओ के स्मृति स्मारक लगाये गये हैं। ये स्मारक वर्दी पहने और हथियार थामे सिपाही की प्रतिकृति है और सड़क के किनारे दूर तर इस तरह खड़े हैं मानों अपनी कहानी स्वयं सुनाना चाहते हैं।
भांति भांति के स्मृति स्तम्भों से अटा पड़ा है बस्तर। कुछ तो परम्परागत हैं किंतु अब ऐसे बहुत से स्मृति स्मारक निर्मित किये जा रहे हैं जिन्हें युद्ध स्मृतियाँ कहना अधिक उचित होगा। सफेद रंग का यह सलवा जुडुम शहीद स्मारक भी इसी कडी में आता है जिसमें महत्व की बात मुझे रंग भी लगती है। जहाँ माओवादी शाहीद स्मारक लाल रंग के होते हैं उसके परोक्ष में इस स्मारक को सफेद रंग दिया गया है। यह सोच समझ कर किया गया है अथवा अनायास यह तो ज्ञात नहीं हो सका लेकिन आप चाहें तो रंगों से दिये जाने वाले संकेतों की भाषा स्पष्ट समझी जा सकती है। गहन माओवाद प्रभावित गावों के प्रवेश करते ही कतिपय स्थानों पर लाल रंग के स्मारक दिखाई पडने लगते हैं जो बहुधा कई स्तरीय होते हैं और हर स्तर पर चौकोर आकृति तथा शीर्ष गुम्बदाकार बनाया जाता है, जिसपर वाम प्रतीक चिन्ह लगा दिये जाते हैं। आने वाला समय स्वयं यहाँ घटित घटनाओं की विभिषिका को इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से महसूस कर सकेगा। 




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