विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियाँ : महापाषाण युग के गुमनाम साक्ष्य

Posted Date : 14-Nov-2017



बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

अरनपुर (दंतेवाड़ा) से कुछ पहले एक स्थान पर विशालकाय प्रस्तराकृतियों ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। बड़े बड़े प्रस्तरखण्ड कई तो एक सामान्य मानवाकार के दुगुने और ये निश्चित ही मृतक स्मृति स्मारक थे, महापाषाण युग के बस्तर में सांस लेते हुए साक्ष्य। इतने विशाल और भव्य कि उनपर से आँख़ें न हटें और इतने उपेक्षित कि इस स्थान पर पहुँचने के लिये झाडिय़ाँ हटा हटा कर भीतर पहुँचना पड़ा। महापाषाण सभ्यता की पहचान है कि वहाँ मृतकों को अथवा उनके अवशेषों को पत्थर की बड़ी बड़ी शिलाओं को खड़ा कर के उनके मध्य अकेले अथवा सामूहिक रूप से दफनाया जाता था। महापाषाण शब्द मेगालिथ शब्द का हिन्दी रूपांतर है; यूनानी भाषा में मेगास का अर्थ है 'विशालÓ और लिथोज का अर्थ है 'पाषाणÓ। दक्षिण बस्तर विशेष रूप से दंतेवाड़ा जिले में पुरातात्विक महत्व के मडिय़ा मृतक स्तम्भों की बहुत अच्छी संख्या है गमावाड़ा आदि स्थानों पर उन्हें घेर कर संरक्षित करने का प्रयास भी किया गया है। इससब के बाद भी मुझे लगता कि जो श्रेष्ठतम है अभी उस तक पहुँचा भी नहीं जा सका है। 
दक्षिण बस्तर में समाधियों के आकार-प्रकार के अनेक तौर दिखाई पड़ते हैं अपितु किताबों में आम-जनमानस की समाधियों के जितने भी प्रकार उल्लेखित हैं लगभग सभी को इन क्षेत्रों में देखा-पहचाना जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैं -कैर्न समाधियाँ जिसमें पत्थरों को गोल चक्र में बिछा कर इस घेराव के अंदर गड्ढा खोद कर उसमें शव रख मिट्टी से ढंक दिया जाता था। तत्पश्चात उपर से पत्थर भर दिये जाते थे। डोलमेन समाधियाँ आयताकार मेज आकृति की समाधियाँ होती हैं अर्थात इसमें भूमि शिला खण्ड रख कर उसपर शव तथा अन्य सामग्रियाँ रखते हैं। इसके बाद चारों तरफ सपाट शिलाओं को खड़ा कर दिया जाता है। इसके पश्चात समाधि को उपर से एकाधिक शिलाओं द्वारा ढंक दिया जाता है। छत्र शिला  अर्थात चार प्रस्तर खण्डों को खड़ा गाड़ कर उसके उपर एक गोलाकार प्रस्तर खण्ड रखा जाता है इससे यह मृतक स्मारक किसी छत्र की तरह दिखाई देता है। फन शिला के निर्माण के लिये एक खोदे हुए गड्ढे में शव और अन्य सामग्री रख कर मिट्टी से ढ़कने के उपरांत उसके उपर गोलाकार पत्थर रख दिया जाता है। यह गोलाकार पत्थर सर्प के फन के समान दिखाई पड़ता है। च्च्गुफा समाधियाँज्ज् वस्तुत: पहाड़ों की चट्टानों को आयताकार अथवा वर्गाकार काट कर निर्मित की जाती हैं। मेनहीर प्रकार में मृतक की अंतिम क्रिया के पश्चात उस स्थल पर एक खड़ा पत्थर लगा दिया जाता है। चूंकि इस क्षेत्र में मृतक स्मृति स्मारकों के विविध प्रकार हैं तथा सभी ऐतिहासिक महत्व के हैं इसलिये दक्षिण बस्तर में पर्यटन को विकसित करने के दृष्टिगत भी इनकों संरक्षित करने एवं प्रचारित करने की आवश्यकता है। 
अरनपुर के निकट मुझे आदर्श महापाषाण समाधियाँ दृष्टिगोचर हुई है। वृहदाकार होने के कारण महापाषाण शब्द के अर्थ में भी वे समाहित होती हैं। ये सभी मेनहीर प्रकार की समाधियाँ हैं जिनका आकार डेढ़ मीटर से पाँच मीटर तक हैं। यहाँ बहुत अधिक मात्रा में त्रिभुजाकार पत्थर भी मेनहीरों के तौर पर लगाये गये हैं, क्या इनका कोई विशिष्ठ अर्थ है यह अभी शोध का विषय है। 




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