संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 दिसंबर : छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी ही कामयाबी से सबक की जरूरत

Posted Date : 04-Dec-2017



छत्तीसगढ़ में इन दिनों तेंदूपत्ता बोनस बंट रहा है। लाखों लोगों को सैकड़ों करोड़ रूपए बंटेंगे, और यह सबसे गरीब तबके को सीधे-सीधे मिलने वाला एक ऐसा मेहनताना है जो कि किसी किस्म का दान नहीं है, और इससे लोकतंत्र के भीतर एक बहुत बड़ा प्राकृतिक न्याय भी पूरा हो रहा है कि जंगलों में बसे हुए लोग जंगल की उपज की पूरी कमाई पर हकदार हों। तेंदूपत्ता वनवासियों की कमाई का एक छोटा सही, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी तरह जंगल में होने वाली दूसरी छोटी-छोटी चीजों से भी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को साल भर कुछ न कुछ कमाई होती है। राज्य में इसके लिए बने हुए लघु वनोपज संघ ने एक कारोबारी की तरह इस काम में महारथ हासिल कर ली है, और छत्तीसगढ़ का तेंदूपत्ता देश में बड़े अच्छे दामों पर बिकने लगा है। हैरानी की बात यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा उन नक्सल इलाकों में से आता है जहां पर बहुत से दूसरे कारोबार नहीं हो पा रहे हैं। 
आज इस मामले पर यहां चर्चा की जरूरत दो और मुद्दों को जोड़कर जरूरी लग रही है। एक तो लघु वनोपज का मामला है ही, दूसरी तरफ दो और मामले हैं जो कि सीधे-सीधे जनता की भलाई से जुड़े हुए हैं, और गरीबों का फायदा होने के साथ-साथ राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को भी सरकार के इन जनकल्याणकारी कार्यक्रमों का फायदा होता है। छत्तीसगढ़ में धान की खरीदी को लेकर सरकार ने एक खूबी हासिल कर ली है, और पूरे प्रदेश में गांव-गांव तक बिखरी हुई मंडियों में किसान की पूरी उपज सरकार सही दामों पर खरीद लेती है जो कि छोटी बात नहीं है। इससे राज्य की साख इतनी अच्छी हुई है कि अड़ोस-पड़ोस के राज्यों से भी वहां के किसान अपना धान तस्करी से छत्तीसगढ़ में लाते हैं, और यहां के किसानों के खेतों के कागजात जुटाकर उन्हें बेचते हैं। तीसरा मुद्दा जो इसी संदर्भ में चर्चा के लायक है वह है राज्य में पीडीएस की सफलता का। प्रदेश की तकरीबन आधी आबादी इतनी गरीब है कि वह सरकार के रियायती अनाज और चना या दूसरे किस्म के कुछ और सामानों की वजह से पेट भर खा पाती है। हालांकि छत्तीसगढ़ में नागरिक आपूर्ति निगम का एक घोटाला राज्य सरकार की ही एजेंसी ने पकड़ा, और उसे अदालत तक लेकर गई, लेकिन वह धान की मिलिंग और चांवल से जुडा हुआ मामला था, उसका गांव-गांव तक बिखरी हुई राशन दुकानों से लेना-देना नहीं था, और राशन दुकानों से लोगों को अनाज ठीक मिलना एक बहुत बड़ी कामयाबी है जिसकी तारीफ सुप्रीम कोर्ट से लेकर यूपीए सरकार तक, और भाजपा-आरएसएस के सबसे कट्टर आलोचक वामपंथी अर्थशास्त्रियों तक, सभी जगह से हुई है। 
सरकार की इन तीन बड़ी कामयाबियों से सत्तारूढ़ भाजपा के वोटों की रीढ़ की हड्डी तो बनती है, लेकिन यह कामयाबी राज्य सरकार के सामने एक अलग किस्म की चुनौती भी खड़ी करती है, और उसी पर बात के लिए आज हमने यह मुद्दा उठाया है। एक राज्य सरकार जब लगातार, बरस-दर-बरस, करीब डेढ़ दशक तक, जब लगातार इन तीन मुद्दों पर कामयाबी पा सकती है, इनके अलावा जब वह लगातार बिजली दे सकती है, और बिजली का विस्तार भी कर सकती है, तब सवाल यह उठता है कि कुछ दूसरी सरकारी सेवाओं में सरकार लगातार नाकामयाब क्यों बनी हुई है? क्यों सरकार प्रायमरी स्कूलों को नहीं सुधार पा रही है, क्यों सरकारी अस्पतालों का हाल बेहतर नहीं हो पा रहा है, क्यों शहरों के म्युनिसिपल अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं? सरकार का एक हिस्सा जब अच्छा काम करता है, तो वह काम दूसरे मंत्रियों, और दूसरे अफसरों के लिए एक चुनौती भी होना चाहिए। ऐसे में राज्य सरकार को गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि जिन क्षेत्रों में, जिन विभागों में वह कमजोर है, उन्हें किन तरीकों से बेहतर बनाया जा सकता है? यह राज्य एक तरफ तो अपनी अच्छी अर्थव्यवस्था की वजह से, एक बड़े अच्छे आर्थिक और वित्तीय अनुशासन की वजह से देश में सबसे सफल राज्यों में से एक है। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि बेहतर दिमाग, बेहतर योजना, और बेहतर मुखिया ढूंढकर बाकी के कमजोर विभागों को भी ठीक किया जाए। राज्य सरकार को अपनी खुद की कुछ दायरों की कामयाबी से सबक लेना चाहिए, और बाकी दायरों का काम सुधारना चाहिए। 
- सुनील कुमार




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