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कैंसर के इलाज वाली बायोकॉन, मायलन की दवा को यूएसएफडीए की मंजूरी

Posted Date : 04-Dec-2017



मुंबई, 4 दिसंबर। अमरीकी दवा कंपनी मायलन और बेंगलुरु की कंपनी बायोकॉन की लगभग एक दशक पुरानी साझेदारी के सामने आ रही दिक्कतें अब दूर होती नजर आ रही हैं। अमरीकी एफडीए ने शुक्रवार रात उनकी बायोसिमिलर दवा ट्रैस्टिजमाब को मार्केटिंग अप्रूवल दे दिया, जिससे उसकी लॉन्चिंग को लेकर चल रही कयासबाजी बंद हो गई। ओगिवरी ब्रांड नेम वाली यह दवा ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्विस दवा कंपनी रोश की ब्लॉकबस्टर दवा का वर्जन है।
बायोसिमिलर दवाएं बहुत ही जटिल बायोलॉजिक दवाओं की कॉपी होती हैं। बायोसिमिलर दवाओं का असर इनोवेटर वर्जन जैसा ही होता है। दुनियाभर में हर साल 3.16 अरब डॉलर की सेल्स वाली ट्रैस्टिजमाब की बिक्री 2020 तक 10 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। एनालिस्टों का कहना है कि अमरीकी एफडीए के अप्रूवल से मायलन की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी, क्योंकि उसके पास अमरीका में यह दवा बेचने के एक्सक्लूसिव राइट्स हैं जबकि बायोकॉन की कॉम्प्लेक्स दवाओं के बाजार में पैर जमाने का सपना सच होने जैसा होगा।
बायोकॉन मायलन की बायोसिमिलर दवा को मंजूरी अमरीकी एफडीए के ओंकोलॉजी ड्रग्स एडवाइजरी कमेटी की ओरिजनल प्रॉडक्ट के बायोसिमिलर के हक में 16-0 मतों से फैसला आने के चार महीने बाद मिली है। बायोकॉन ने अपना प्रपोज्ड बायोसिमिलर अमरीका दवा कंपनी के साथ मिलकर तैयार किया था। एफडीए कमिश्नर स्कॉट गॉटलिब ने कहा, एफडीए बड़ी संख्या में बायोसिमिलर दवाओं को मंजूरी दे रहा है जिससे कॉम्पिटिशन को बढ़ावा मिले और हेल्थकेयर की लागत में कमी आए। हम हमारे लिए बड़ी बात है क्योंकि कैंसर जैसी बिमारियों की दवा बहुत महंगी पड़ती हैं।
एनालिस्टों ने बताया कि इंडियन मार्केट ने कंपनी की दवा को मंजूरी मिलने का अनुमान महीनों पहले लगा लिया था। उन्होंने कहा कि अब कंपनी के शेयरों में तेज उछाल आ सकता है। बायोकॉन की एमडी किरण मजूमदार शॉ ने कहा, हमारे बायोसिमिलर ट्रैस्टिजमाब को मिला अमरीकी एफडीए का अप्रूवल असल में हमारे लिए सबसे बड़ा पल है, जिसने हमें ग्लोबल बायोसिमिलर प्लेयर्स की कतार में ला खड़ा किया है। इससे कैंसर के सस्ते इलाज वाले बायोलॉजिक के डिवेलपमेंट पर फोकस करने की हमारी प्रतिबद्धता को मजबूत बनाता है। यह ऐसी एडवांस्ड थेरेपी डिवेलप करने की हमारी यात्रा का अहम मील का पत्थर है जो दुनिया के करोड़ों अरबों मरीजों को फायदा दिला सकती है। (इकॉनॉमिक टाईम्स)




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