संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 दिसंबर : सुरक्षा स्वाभाविक हो जाने तक लोगों को सावधान रहना होगा

Posted Date : 06-Dec-2017



छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह सूरज निकला ही था कि शहर के बीच बाजार में एक छोटी बच्ची के साथ ज्यादती की कोशिश में पहचान के एक आदमी को पकड़ा गया, और उसे पीटकर पुलिस के हवाले कर दिया गया। बच्ची की मां ही एक सड़क किनारे होटल में पकाने वाले इस आदमी के पास बच्ची को छोड़कर गई थी।  देश भर में चारों तरफ से बलात्कार की ऐसी खबरें आती है जिनमें घर का ही कोई रिश्तेदार किसी बच्चे से सेक्स ज्यादती करते पकड़ाता है, कहीं पड़ोसी किसी नाबालिग पर बलात्कार करते मिलता है, कहीं मोहल्ले का कोई लड़का किसी बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर ले जाता है और रेप करता है। चारों तरफ बलात्कार की ऐसी खबरें हैं जिनमें बलात्कारी जान-पहचान का निकलता है। ऐसी नौबत में पुलिस और सरकार इसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते। जब तक पहले से किसी छेड़छाड़ की शिकायत न हो, जब तक पहले ऐसा जुर्म कर चुका आदमी पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज न हो, तब तक लोगों को खुद ही अपना और अपने बच्चों का ख्याल रखना है। कहने के लिए तो लोकतंत्र में हर किस्म की हिफाजत के लिए सरकार और उसकी पुलिस जवाबदेह है, लेकिन यह जवाब किसी नुकसान की भरपाई कभी नहीं कर सकता। 
पश्चिमी देशों में एक वक्त जवान लड़कियों को सावधान किया जाता था कि कुछ खाते-पीते हुए उन्हें यह सावधानी बरतनी चाहिए कि कोई उन्हें रेप-पिल नाम से बदनाम वह दवा घोलकर न पिला दे, जिसके बाद वे अपना आपा खो बैठें, और उनके साथ बलात्कार हो जाए। लेकिन भारत में इसकी भी जरूरत नहीं पड़ रही है। बहुत सी लड़कियां अपने किसी दोस्त या फेसबुक-दोस्त के साथ ऐसे चली जाती हैं, कि उसके साथ और भी दोस्त रहते हैं, और फिर सब मिलकर सामूहिक बलात्कार करते हैं। अब ऐसे मामलों में देश की आधी आबादी को पुलिस बना दिया जाए, तो ही वह बाकी आधी आबादी पर नजर रख सकती है। इसलिए समझदारी इसमें है कि लोग सावधानी सीखें, सावधानी बरतें, और खतरों से दूर रहें। 
इस देश में महिलाओं को लेकर लोगों का सोच वैसे भी बहुत सम्मान का नहीं है, और ऐसे में उनको कोई सामाजिक बचाव नहीं मिल पाता है। अभी कल ही दिल्ली की घटना दिल दहलाने वाली है जिसमें एक लड़की छेडख़ानी की शिकार बनी हुई थी, और छेडऩे वाले लड़कों ने कल उसे चाकुओं से गोदकर खुली सड़क पर मार डाला। ऐसे में पुलिस तो मौके पर जब पहुंचे, तभी कोई कार्रवाई कर सके, लेकिन आसपास के लोग भी तमाशबीन बने खड़े रहते हैं, और हिंसा को रोकने की कोशिश नहीं करते। दिनदहाड़े सड़क पर अगर समाज से कोई हिफाजत नहीं मिल सकती, तो ऐसे समाज को पुलिस की कितनी भी ताकत नहीं बचा सकती। 
सेक्स को लेकर होने वाले जुर्म का एक दूसरा सामाजिक पहलू है, जिसकी चर्चा किए बिना सेक्स-अपराध किसी तरह से कम नहीं हो सकते। इस देश में लोगों को प्रेम-संबंधों की इजाजत नहीं है, लड़के-लड़कियों की दोस्ती पर समाज की कातिल निगरानी है, खानदान की इज्जत के नाम पर प्रेमी-जोड़ों की हत्या हर हफ्ते-पखवाड़े खबरों में रहती है। ऐसे में सेक्स की जरूरत, या भावनात्मक संबंधों की जरूरत होने पर लोगों के पास सिवाय सेक्स-शोषण के, सेक्स-अपराध के, और कोई रास्ता नहीं बचता। वयस्क जरूरतों को लेकर भारत एक बड़ा पाखंडी देश है, जहां की कारोबारी राजधानी मुम्बई को डांस-बार भी बर्दाश्त नहीं है, यह एक अलग बात है कि मुंबई एशिया का सबसे बड़ा चकला बना हुआ है, जहां रोजाना लाखों बदन बेचे जाते हैं। यह पाखंड भारत के मिजाज की रग-रग में समाया हुआ है, और लोग उन तमाम बातों को अनदेखा कर देना चाहते हैं, जो कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को ठेस पहुंचाती हैं। लोग बच्चों के यौन शोषण को एक पश्चिमी बीमारी मानते हैं, लोग समलैंगिकता को जुर्म मानते हैं, लोग दूसरे धर्म की शादी को लव-जेहाद जैसे नाम देते हैं, लोग दूसरी जाति में शादी को बर्दाश्त नहीं करते, अपने खुद के गोत्र के भीतर शादी बर्दाश्त नहीं करते, और कुल मिलाकर वे वेश्यावृत्ति से लेकर परिवार के भीतर यौन-शोषण तक सबको बर्दाश्त करते हैं। ऐसी दकियानूसी समाज-व्यवस्था सेक्स-अपराधों को कम नहीं कर सकती, और ऐसा समाज चाहता है कि हर किस्म की हिफाजत पुलिस का जिम्मा रहे। पुलिस का काम है अधिकतर मामलों में अपराध हो जाने के बाद शुरू होता है, और बंद कमरों में दो लोगों के बीच होने वाले अपराध को पुलिस कभी नहीं रोक सकती। हिफाजत की हसरत रखने वाले समाज को अपने आपको पाखंड से निकालना भी पड़ेगा। 
- सुनील कुमार




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