विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां : लोकजीवन का एक मादक पक्ष-सल्फी

Posted Date : 06-Dec-2017



बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

इतिहास के पन्ने उलटते हुए यह महसूस हुआ कि बस्तरिया जीवन की व्याख्या सल्फी की चर्चा के बिना अधूरी ही रहेगी। सल्फी का वृक्ष किसी व्यक्ति के लिये उसकी सम्पत्ति है। कई बार इसकी तुलना कामधेनु से की जाती है। सल्फी का रस किसी परिवार के लिये अच्छी और नियमित आमदनी का जरिया बन जाता है। अतीत से ले कर वर्तमान तक अनेकों कहानियाँ संज्ञान में आयीं जहाँ सम्पत्ति में सल्फी के पेड़ के बटवारे को ले कर परिवारों में विवाद हुआ और कई बार इसके लिये भाई ने भाई की या पुत्र ने पिता की ही हत्या कर दी। सल्फी के पेड़ से सम्बन्धित विवाद के लिये मुकदमे राजाओं की कचहरियों में भी थे, अंग्रेजों के कोर्ट में भी और आज की अदालतों में भी। कथनाशय यह है कि सल्फी का वृक्ष सम्पत्ति तो है ही एक संस्कृति का अटूट हिस्सा भी है। सल्फी पामटेल ग्रुप का एक उभयलिंगी पेड़ है। सुन्दरता, अपने पत्तों की हरीतिमा और आकार-प्रकार में सल्फी का पेड़ आकर्षक होता है।
बस्तर में माटी भी देवता है और वृक्ष भी। सल्फी के पेड़ के प्रति सम्मान रखने और उसकी पूजा किये जाने का एक महत्वपूर्ण कारण तो यह समझ में आता है इसके रहने से पेड़ के मालिक को बिना कुछ किये एक निश्चित राशि मिलती रहती है। इसके अलावा यह वृक्ष सामाजिक प्रतिष्ठा का कारक भी है; जिसके घर या बाड़ी में सल्फी का पेड़ रहता है, वह गाँव का सम्मानित व्यक्ति कहलाता है। सल्फी का रस निकालने से पहले जलकामिनी देवी का आह्वान किया जाता है। सल्फी का रस निकालने के लिये पेड़ के अग्रभाग को जिसे 'कलीÓ कहते हैं को काट दिया जाता है। यह भी नियम ही है कि जिस व्यक्ति ने कली काटी है पेड़ से रस भी वही व्यक्ति निकालेगा। रस को एकत्रित करने के लिये रस्सी के सहारे नीचे एक घड़ा बाँध दिया जाता है जिसमें कली से बूंद-बूंद टपक कर रस संग्रहित होता रहता है। इस रस को निकालने के लिये पेड़ पर चढऩे की सुविधा हेतु बाँस बाँधा जाता है। बाँस इस लिये कि इसके तने में जो गठान होती है वह स्वाभाविक रूप से रस निकालने के लिये उपर चढऩे वाले के लिये किसी सीढ़ी की तरह सहायक होती है।
सब कुछ सुनियोजित और करीने से चाहे रस निकालना हो अथवा उसे परोसना। सल्फी का रस सुबह-सुबह निकाला जाता है। सल्फी से गाँव के किस व्यक्ति को प्रेम नहीं; लोग सल्फी पीने पेड़ के पास स्वत: पहुँचते हैं। सल्फी पीने के लिये चाखना भी तैयार किया जाता है जो प्राय: नमक, मिर्च और अदरक की सूखी चटनी से बना होता है। सल्फी का रंग दूध की तरह सफेद होता है, थोड़ा पतला भी जैसे किसी ने दूध में पानी मिला दिया हो। पीने पर सल्फी थोड़ा खट्टापन लिये हुए मीठी सी होती है। इसकी तुलना बीयर से इसीलिये की जाती है चूंकि हल्का सा नशा इसके रस में समाहित होता है। ताजा रस का सेवन किसी भी तरह से नुकसानदेय नहीं है अपितु यह गरिष्ट होता है और इसे पीने पर भूख भी नहीं लगती। सल्फी का रस ठंडी तासीर का होता है अत: इसे गर्मियों में इसका सेवन अधिक किया जाता है। इसे पीने से गर्मी अधिक नहीं लगती, लू से मुकाबला किया जा सकता है तथापि यह रस शरीर में आलस्य बढ़ाता है। जैसे जैसे दिन चढ़ता है तथा रस में फरमंटेशन की प्रक्रिया जोर पकडऩे लगती है सल्फी का रस कडुवा होने लगता है साथ ही अधिक नशीला भी। सल्फी का पेड़ उत्तर तथा मध्य बस्तर क्षेत्र की थाती है तथा यह अब संरक्षण की दरकार भी करने लगा है।




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