संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 जनवरी : कुछ ओपरा विनफ्रे के बारे में कुछ हिंदुस्तान के बारे में भी...

Posted Date : 09-Jan-2018



अमरीका में वहां के टीवी इतिहास की एक सबसे मशहूर शख्सियत रहीं ओपरा विनफ्रे ने अभी एक फिल्म समारोह में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता का एक शानदार भाषण दिया, और यह इशारा किया कि वे 2020 में राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे की सोच सकती हैं। उनकी शोहरत का हाल यह है कि वे अपने कार्यक्रम में किसी एक किताब की चर्चा करती थीं कि उन्हें वह किताब क्यों पसंद आई, और उसके बाद रात-दिन उस किताब के प्रकाशक उसकी लाखों कापियां छापने में जुट जाते थे क्योंकि दसियों लाख अमरीकियों के लिए ओपरा का कहा एक शब्द   खूबी के सर्टिफिकेट जैसा होता है। ऐसी ओपरा की शक्ल में अगला चुनाव अमरीका की पहली अश्वेत महिला उम्मीदवार देख सकता है।
दरअसल मौजूदा रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता गिरते-गिरते मिट्टी में मिल गई है, और शायद वे अमरीकी राष्ट्रपतियों के इतिहास में लोकप्रियता को सबसे तेजी से खोने वाले बन चुके हैं। ऐसे में अगले चुनाव में ऐसा कोई आसार नहीं दिखता है कि उनकी पार्टी उन्हें उम्मीदवार बनाए, या कि जनता उन्हें चुने, इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि अमरीका के अगले चुनाव में कोई भी ट्रंप-विरोधी अधिक संभावनाएं रख सकते हैं। लेकिन भारत के लोगों के लिए यह देखना एक दिलचस्पी की बात हो सकती है कि वहां इस तरह के राष्ट्रपति-प्रत्याशी बनते हैं जो कि पहले कभी राजनीति में शायद न भी रहे हों, पहले कभी सरकार का जिनका कोई तजुर्बा न रहा हो। ट्रंप ने तो अपने कारोबार के अलावा, और महिलाओं से बदसलूकी के अलावा जिंदगी में और कुछ किया भी नहीं था कि उन्हें अमरीका चलाने के लायक काबिल मान लिया जाए। इसी तरह कुछ और भी उम्मीदवार पहले रहे हैं। लेकिन ओपरा विनफे्र एक ऐसी अश्वेत महिला उम्मीदवार हो सकती हैं जिनकी अमरीका के लिए बहुत से जलते-सुलगते मुद्दों पर राय समय-समय पर सामने आती रही हो। उनके बारे में अमरीकी जनता अधिक जानती है, उनकी सोच, उनकी जुबान, उनका बर्ताव, उनका चाल-चलन, यह सब अमरीकी जनता की नजरों में बरसों से है।
भारत के लोगों के लिए लोकतंत्र का यह अमरीकी संस्करण भी देखने और समझने लायक होता है कि किस तरह वहां की दोनों बड़ी पार्टियों के भीतर चुनाव के एक बरस से और पहले पार्टी का प्रत्याशी बनने का मुकाबला चलता है, खुला मुकाबला चलता है, पार्टी के भीतर खुली गुटबाजी होती है, एक ही पार्टी के दो नेता एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खुलकर कहते हैं, दूसरे को नाकाबिल और अपने को काबिल साबित करते हैं। इसके बाद जब पार्टी के भीतर उसके रजिस्टर्ड वोटरों के बीच जिसे बहुमत मिल जाता है, वे उस पार्टी के उम्मीदवार चुने जाते हैं। हिंदुस्तान के लोकतंत्र में कोई ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते कि एक पार्टी के भीतर भी देश के मुखिया का चुनाव लडऩे के लिए, या कि बनने के लिए इस तरह का सार्वजनिक मुकाबला हो। ऐसा इस वजह से भी होता है कि अमरीका में राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली है और वहां पर सांसद सरकार का मुखिया नहीं चुनते, जनता खुद चुनती है। हम यह नहीं कह रहे कि वहां की कोई बात हिंदुस्तान में अमल के लायक है, लेकिन इन दोनों देशों की व्यवस्थाओं में जो फर्क है, वह खासा दिलचस्प है, और राजनीति या शासन प्रणाली में दिलचस्पी रखने वाले लोग इसका अध्ययन कर सकते हैं।
जहां तक राजनीति से परे के लोगों के राजनीति में आने की बात है, तो अभी-अभी दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए अपनी पार्टी से लोगों को भेजने में बहुत से गैरराजनीतिक लोगों से संपर्क किया था। आम आदमी पार्टी ने रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर रघुराम राजन से भी संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने अमरीकी विश्वविद्यालय में पढ़ाना अपने लिए बेहतर समझा, और राज्यसभा में जाने का न्यौता मंजूर नहीं किया। इसके बाद भी आम आदमी पार्टी ने अभी राज्यसभा के लिए जो नाम तय किए हैं, वे भी गैरराजनीतिक हैं, और लोगों ने यह सवाल उठाए हैं कि क्या अपने को आम आदमी की पार्टी कहने वाली आप की सोच मेरिटोके्रसी की है? 
दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था एक-दूसरे को देखकर बहुत कुछ सीखने की होती है, और अमरीका की तरह अगर लोग सीधे शासन-प्रमुख बनने के लिए भारत में उम्मीदवार न भी बन सकें, संसद और विधानसभाओं में गैरराजनीतिक विशेषज्ञ लोगों को लाने की संभावना के बारे में जरूर सोचना चाहिए। एक नया खून भारत के संसदीय बदन की सेहत को बेहतर बना सकता है।
- सुनील कुमार




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