संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 जनवरी : क्रिकेट की दीवानगी में खुदकुशी..., दूसरे खेलों की लकीर लंबी की जाए

Posted Date : 10-Jan-2018



मध्यप्रदेश में 63 बरस के एक बुजुर्ग ने दक्षिण अफ्रीका में विराट कोहली के कम रनों पर आऊट हो जाने पर सदमे में आकर आग लगाकर आत्महत्या कर ली। मौत के पहले के अपने बयान में उन्होंने कहा कि वे विराट कोहली की नाकामी से परेशान थे।  यह मामला भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी का एक सुबूत है। देश के किसी भी और खेल को लेकर न तो तारीफ और न ही गालियों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है, जैसा कि क्रिकेट के साथ होता है। लेकिन सदमे में आकर कोई इस हद तक जाए, यह रोज-रोज की बात नहीं है, और इसलिए यह तकलीफदेह भी है। 
क्रिकेट के दिग्गज खिलाडिय़ों से उनके प्रशंसक यह उम्मीद करते हैं कि वे मशीन की तरह लगातार काम करें, और लगातार कामयाबी पाएं। ऐसा होता नहीं है। लोगों को याद होगा कि जब भारतीय टीम विदेश से खराब खेलकर लौटती है तो कई बार खिलाडिय़ों के लिए लोग गालियां लिखते हैं, विरोध में नारे लगाते हैं, और एक बार महेन्द्र सिंह धोनी के घर पर निराश प्रशंसकों ने पथराव भी किया था। यह सिलसिला हिन्दुस्तानियों में क्रिकेट के लिए एक बड़ी दीवानगी भी बताता है, और लोगों में यह नासमझी भी बताता है कि वे अपने चहेते खिलाडिय़ों से लगातार अच्छा प्रदर्शन ही चाहते हैं। 
भारत में क्रिकेट की ऐसी दीवानगी से दूसरे खेलों का खासा नुकसान हुआ है। एक वक्त इस देश का राष्ट्रीय खेल कहा जाने वाला हॉकी, क्रिकेट जैसे वटवृक्ष के साये में दबते चले गया, और देश भर में उसे खेलने वाले भी कम हो गए, उसे चाहने वाले भी कम हो गए। फिर कारोबार ने क्रिकेट को टेस्ट मैच से लेकर वनडे की तरफ बढ़ाया, टी-20 की तरफ बढ़ाया, और फिर आईपीएल जैसे खालिस कारोबार से उसे जोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि हॉकी के खिलाडिय़ों को जूते नसीब नहीं होते, और क्रिकेट के सितारे सैकड़ों करोड़ रूपयों में खेलते हैं। क्रिकेट का पूरा कारोबार सरकार और सुप्रीम कोर्ट के काबू से भी बाहर हो गया, और अपने आपमें एक संविधान की तरह बनकर रह गया। ऐसे में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने देश के किसी भी नियम-कानून को मानने से इंकार करते हुए अपने आपको हजारों करोड़ का एक कारोबार बनाकर रखा, और मजे की बात यह है कि इसमें कांग्रेस, भाजपा, और एनसीपी जैसे किसी भी पार्टी के नेता को कोई ऐतराज नहीं रहा, बल्कि कानून को चुनौती देने में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सर्वदलीय सहमति हासिल रही। 
क्रिकेट के साये से निकलकर देश के दूसरे खेलों को बढ़ाने की जरूरत है। आज बैडमिंटन और टेनिस जैसे कुछ खेलों में खिलाडिय़ों ने दुनिया में अव्वल आकर भी दिखाया है। कुश्ती सहित कुछ दूसरे खेलों में ओलंपिक में थोड़ी सी जगह बनी है। लेकिन आज पूरे देश में बाकी खेलों को बढ़ावा देने के लिए सरकारों को खेल के मैदानों, और खेल की सहूलियतों को बढ़ाना होगा। जब तक दूसरे खेलों को सरकारी सहारा नहीं मिलेगा, बाजार उन्हें कहीं टिकने नहीं देगा। लोकप्रियता में जो नंबर-1 हैं, उन्हीं को टीवी पर जगह मिलती है, स्टेडियम मानो उन्हीं के लिए रहते हैं, उन्हें ही सारे प्रायोजक मिलते हैं, और उसी के खिलाड़ी अरबपति बनते रहते हैं। क्रिकेट के लिए दीवानगी में एक खुदकुशी को लेकर हमने बात आगे बढ़ाकर यहां तक पहुंचाई है, लेकिन खुदकुशी से परे देश के खेलों पर एक व्यापक नजर डालने की जरूरत है क्योंकि सवा अरब से अधिक आबादी के इस देश में तकरीबन 90 फीसदी, या उससे भी अधिक ध्यान एक अकेले क्रिकेट पर दिया जाता है, जो कि ओलंपिक में भी शामिल नहीं है। दुनिया के दूसरे देश क्रिकेट के बिना भी ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करते हैं, और ओलंपिक के बाहर भी। भारत को क्रिकेट की दीवानगी से छुटकारा पाने की जरूरत है, तभी बाकी खेलों के लिए जगह निकल पाएगी। ठीक उसी तरह जैसे कि अभी हिन्दी दिवस पर लोहिया की कही एक पुरानी बात सामने आई कि जब तक अंग्रेजी को हटाया नहीं जाएगा, भारत की हिन्दी या दूसरी भाषाएं जगह नहीं बना पाएंगी। भारत के खेलों में क्रिकेट का हाल कुछ वैसा ही है, इसलिए दूसरे खेलों की लकीर लंबी करने की जरूरत है। 
- सुनील कुमार




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