संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 जनवरी : सजा चाहे कम हो, तेज और पुख्ता हो तो ही जुर्म घटेंगे...

Posted Date : 11-Jan-2018



पाकिस्तान के पंजाब में एक बच्ची से बलात्कार के बाद उसे कत्ल करके कूड़े में फेंक दिया गया था। इसके बाद वहां कई जगहों पर तनाव इतना बढ़ा है कि नाराज प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ में दो लोगों की मौत भी हो गई है। बाकी पाकिस्तान में भी लोग इस पर भड़क उठे हैं, लाहौर हाईकोर्ट ने खुद होकर इस पर पंजाब सरकार से रिपोर्ट मांगी है, और पंजाब के सीएम ने कहा है कि वे खुद इस मामले की निगरानी करेंगे, और चैन से नहीं बैठेंगे। 
इस खबर में से अगर पाकिस्तान और लाहौर को हटा दिया जाए, तो यह खबर बिल्कुल हिन्दुस्तान की लगती है। कुछ बरस पहले दिल्ली में निर्भया के नाम से मीडिया में प्रचलित नाम वाली एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और भयानक हिंसा के बाद हिन्दुस्तान हिल गया था, सुप्रीम कोर्ट ने एक नया कानून बनाने के लिए एक कमेटी बनाई थी, और निर्भया-फंड नाम से लड़कियों और महिलाओं की हिफाजत के लिए देश में सैकड़ों करोड़ रूपए इक_े किए गए थे, लेकिन इतने बरस गुजर जाने पर भी आज देश में बलात्कारों में कहीं कमी होते नहीं दिखती है। अभी कुछ मिनट पहले ही यह खबर आई है कि जिस अमरीका ने पाकिस्तान को सुरक्षित न मानकर अपने नागरिकों को वहां जाने के पहले सावधान रहने की चेतावनी दी है, उसी अमरीका ने कुछ मिनटों के भीतर ही भारत को लेकर अपनी महिलाओं को सावधान रहने को कहा है कि वहां महिलाओं के साथ जितने हिंसक जुर्म होते हैं, उसे देखते हुए महिलाएं सावधान रहकर ही वहां जाएं। यह नौबत शर्मनाक है, इसलिए कि कड़े कानून, जनता के विचलित होने, सरकार के चौकन्ने होने के बाद भी आज हालात शायद जरा भी नहीं बदले हैं। 
हमारा मानना है कि बलात्कार एक ऐसा निजी जुर्म है जिसे पुलिस बहुत अधिक हद तक रोक भी नहीं सकती है, और इसके हो जाने के बाद ही पुलिस का काम शुरू होता है। लेकिन जब काम शुरू होता है वहां से लेकर अदालत के फैसले तक का सिलसिला बलात्कार की शिकार लड़की या महिला के लिए बलात्कार के और कई दौर लेकर आता है। उत्तर भारत में कई जगहों पर रेप की रिपोर्ट करने गई महिला से पुलिस थाने में ही पुलिस ने बलात्कार किया। वकील, मीडिया, अदालत, इन सबका बर्ताव ऐसा रहता है कि बलात्कार की शिकायत लेकर कोई लड़की पुलिस तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाती। कल ही मध्यप्रदेश में सिवनी में एक लड़की ने आत्महत्या की है जो कि लगातार छेडख़ानी से थकी हुई थी। ऐसी बहुत सी घटनाएं छत्तीसगढ़ में भी हुई हैं, और बाकी देश में भी। आज इस पूरे देश को यह सोचना है कि निर्भया के नाम पर राजनीति और सामाजिक आंदोलन, कानून और फंड, इन सबके आ जाने के बाद भी इस देश में यह किस दर्जे की बेशर्मी है कि यहां पर छेडख़ानी के बाद बलात्कार या आत्महत्या तक पहुंचते हुए लड़की को देखता हुआ समाज बेफिक्र रहता है, बेशर्म रहता है। सरकार के भीतर करीब से देखें, तो बलात्कार जुर्म का महज एक आंकड़ा मान लिया जाता है। 
आज पाकिस्तान के पंजाब में जो हो रहा है, उसमें हो सकता है कि टीवी न्यूज-एंकर ने एक नाटकीयता के लिए इस खबर के दौरान अपनी बेटी को बिठाया हो, और यह भी हो सकता है कि डरी-सहमी एक मां के मन ने समाज के खतरे को घटाने के लिए, लोगों को झकझोरने के लिए ईमानदारी से भी ऐसा किया हो। इन दोनों में से जो भी बात हो, यह तो तय है कि आज बच्चियों के मां-बाप इस सरहद के दोनों तरफ के देशों में दहशत में जीते हैं, और यह समझ नहीं पाते हैं कि वे लड़कियों को कितना बाहर जाने दें, कितने दूर जाने दें, कितने आगे बढऩे दें कि उन पर खतरा भी न हो, और वे आगे भी बढ़ें। इन दोनों ही देशों में, खासकर भारत में जिसे कि हम अधिक करीब से देख रहे हैं, अदालतों से बलात्कारियों को सजा दिलवाने का सिलसिला मजबूत और तेज करना होगा, वरना समाज में आज सजा की दहशत कम रह गई है। भारत की सरकारें सजा को अधिक कड़ा करके उसे अधिक असरदार होना मान लेती हैं, यह सजा चाहे कम रहे, लेकिन गुनहगार को सजा दिलवाने का काम पुख्ता और तेज हो, तो ही जुर्म घट सकेंगे। 
- सुनील कुमार




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