राजनीति

Posted Date : 12-Nov-2017
  • अहमदाबाद, 12 नवम्बर । गुजरात में पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने कहा है कि आगामी गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हराना पटेलों की पहली प्राथमिकता है। हार्दिक का कहना है कि आरक्षण आंदोलन के दौरान सत्तारूढ़ दल द्वारा पटेल समुदाय पर किए गए अत्याचारों का बदला लेने के लिए बीजेपी को हटाना है। 
    हार्दिक ने छोटा उदयपुर में शनिवार को एक रैली को संबोधित करते हुए कहा, प्रदेश सरकार ने हमारे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई है। इसलिए अब बीजेपी के खिलाफ लड़ाई समुदाय के सम्मान की लड़ाई होगी। वह समय आ गया है जब हम बीजेपी को गुजरात से बाहर का रास्ता दिखाएं। पाटीदारों के कोटा के लिए हम लड़ाई जारी रखेंगे और इसे दो-तीन वर्षों में जीत जाएंगे।
    हार्दिक ने कहा कि पाटीदार अपने सिर कटा देंगे लेकिन बीजेपी को सपोर्ट नहीं करेंगे। हार्दिक ने स्पष्ट किया कि मैं हमेशा से कहता आया हूं कि हम एक-दो साल में आरक्षण की लड़ाई जीत जाएंगे लेकिन हमारा वर्तमान लक्ष्य बीजेपी को यह सबक सिखाना है कि वह किसी के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाएं। 
    इससे पहले 8 नवंबर को पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) के नेताओं और कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के बीच आरक्षण की मांग को लेकर मीटिंग हुई थी। देर रात शुरू हुई इस मीटिंग में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल नहीं पहुंचे थे। 
    आरक्षण की मांग पर कांग्रेस ने कहा था कि कानूनी लोगों की राय लेकर ही इस पर फैसला लेंगे। मीटिंग के बाद बाद पटेल नेताओं ने मीटिंग को संतोषजनक बताते हुए कहा कि कांग्रेस के समर्थन को लेकर अंतिम फैसला हार्दिक से बात करने के बाद ही लिया जाएगा। 
    ऐसे में हार्दिक पटेल के नए बयान से कांग्रेस की चुनावी तैयारी को झटका लगा है। बाइस साल बाद सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस की राह और कठिन होती दिख रही है। इससे पहले दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने भी कांग्रेस से जुडऩे से इंकार कर दिया था। (टाईम्स न्यूज)

     

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • बनासकाठा, 12 नवम्बर। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों मिशन गुजरात पर हैं। राहुल का उत्तरी गुजरात में दौरे का रविवार को दूसरा दिन है। दूसरे दिन राहुल गांधी ने कांग्रेस के सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं से बातचीत की और अपने ट्वीट को लेकर हमले पर सफाई दी। इस दौरान राहुल ने केन्द्र सरकार पर जीएसटी और नोटबंदी को लेकर निशाना साधा। 
    राहुल गांधी ने कांग्रेस के सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं से बातचीत करते हुए बताया कि मेरी सलाह पर तीन से चार लोगों की टीम करती है ट्वीट करती है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक विषयों पर सभी ट्वीट मेरे होते हैं।
    इस दौरान राहुल गुजरात के छह जिलों में चुनाव प्रचार करेंगे। इस दौरान वह कई जनसभाएं और रैलियां करेंगे। इससे पहले राहुल सौराष्ट्र, सेंट्रल गुजरात और दक्षिण गुजरात का चुनावी दौरा कर चुके हैं। इससे पहले शनिवार को राहुल बनासकाठा के मशहूर अंबाजी मंदिर भी गए थे। वहां उन्होंने आरती की और साथ ही वह गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर भी गए।
    राहुल ने ट्वीट करके कहा था कि पांच स्लैब के साथ, यह गब्बर सिंह टैक्स है, लेकिन एक टैक्स से यह जीएसटी है। न तो गुजरात, ना ही भारत को गब्बर सिंह टैक्स की जरूरत है। कांग्रेस ने भाजपा को स्पष्ट कहा है कि 18 प्रतिशत सीमा और साधारण टैक्स वाला एक टैक्स होना चाहिए। अमेठी से सांसद राहुल ने कहा कि गब्बर सिंह टैक्स ने गुजरात और देश के अन्य भागों में छोटे और मंझोले कारोबारियों को नुकसान पहुंचाया है। (एनडीटीवी)

     

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • भोपाल, 12 नवम्बर। भाजपा के कार्यकर्ता तुर्रा गांव के आदिवासी लालमन सिंह के घर से वह सामान उठा ले गए हैं जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रात्रि विश्राम के लिए फाइव स्टार सुविधा देने के लिए लाया गया था। मुख्यमंत्री पांच नवम्बर की रात यहां रुके थे। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का आरोप है कि मुख्यमंत्री रविवार व सोमवार की रात चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र के तुर्रा गांव पहुंचे थे, और जिस लालमन के घर ठहरे थे उन लालमन का नया घर बन रहा था पर उसमें खिड़की, दरवाजे नहीं लगे थे और टायलेट भी नहीं बन पाया था। मुख्यमंत्री के रुकने के लिए यह मकान चिन्हित किए जाने के बाद यहां सोफा, पलंग, गद्दा, प्लाईवुड के खिड़की व दरवाजे लगाकर व्यवस्था बनाई गई थी। इसे अब भाजपा नेता व कार्यकर्ता उठा ले गए हैं।
    उधर लालमन के भतीजे छत्रपाल सिंह उर्फ छोटू ने बताया कि सोमवार को मुख्यमंत्री चौहान के सुबह 9 बजे घर से निकलने के तीन घंटे बाद भाजपा के कार्यकर्ता तुर्रा में उनके बड़े पिताजी के घर आए और सारा सामान उठा ले गए। उनके द्वारा सीएम के लिए बनाए गए अस्थायी शौचालय में लगाए गए टाइल्स और फर्नीचर भी उठा ले जाए गए हैं।  (डेलीहंट)

     

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • पटना, 12 नवम्बर। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव नई मुसीबत में घिरते नजर आ रहे हैं। यह नई परेशानी है उनके घर में पले 10 मोर। कानूनन मोर को घर में कोई नहीं पाल सकता और लालू प्रसाद यादव के सरकारी घर में 10 मोर पले हैं। 
    मोर राष्ट्रीय पक्षी है। यह पक्षी वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट-1972 के तहत शेड्यूल-1 में हैं। कानूनन जिसके पास भी यह पक्षी होता है उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे व्यक्ति को सात साल तक की सजा या 25 हजार रुपये जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकता है। 
    सूत्रों की मानें तो पटना स्थित लालू के सरकारी आवास सर्कुलर रोड में एक मोर और मोरनी कुछ साल पहले लाए गए थे। विवाद बढऩे पर लालू ने कहा था कि मोर और मोरनी को कुछ ही महीने बाद ही छोड़ा गया था, लेकिन ये मोर वापस आ गए। उसके बाद 8 पक्षियों का जन्म हुआ जो अब तीन या चार महीने के हैं। वे खुद यहां रह रहे हैं। ये मोर परिसर में लगे पेड़ों पर सोते हैं। 
    भारतीय पक्षी संरक्षण नेटवर्क के राज्य कॉर्डिनेटर अरविंद मिश्रा ने बताया कि अगर लालू प्रसाद यादव मोर-मोरनी के जोड़े को गैरकानूनी ढंग से लाए थे तो उनका परिवार मुसीबत में पड़ सकता है। मोरों की तस्करी अपराध है। 
    वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों की मानें तो चिडिय़ाघरों में जो मोर रखे जाते हैं उनके लिए भी स्टेट चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन की अनुमति जरूरी है। हैरानी की बात यह है कि बिहार के चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन भरत ज्योति को याद नहीं है कि लालू प्रसाद यादव के परिवार ने मोरों को पालने की अनुमित ली थी या नहीं।  (टाईम्स न्यूज)

     

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • कुलदीप मिश्र

    अहमदाबाद, 11 नवम्बर। अहमदाबाद से करीब 60 किलोमीटर दूर है वीरमगाम। यहीं हार्दिक पटेल का घर है, जहां उनके माता-पिता भरतभाई पटेल और उषाबेन रहते हैं। शाम के धुंधलके में जब हम वहां पहुंचे तो उनके घर की दीवार पर अगरबत्ती जल रही थी। पता चला कि हार्दिक के माता-पिता भोजन कर रहे हैं। कुछ देर में भरतभाई पटेल आकर हमें भीतर ले गए। उषाबेन दूसरे कमरे में जमीन पर बैठकर खाना खा रही थीं। भरतभाई ने हमें एक-एक करके स्टील के गिलास थमाए और फिर उनमें लोटे से पानी उड़ेला।

    यह एक बेहद सामान्य घर है। छोटे से ड्रॉइंगरूम में सरदार वल्लभ भाई पटेल की दो तस्वीरें और एक मूर्ति है। कमरे में हार्दिक को मिले कुछ सम्मान प्रतीक चिह्न रखे हैं, जिनमें से एक पर उनकी तस्वीर है।
    भरतभाई का कहना है कि यह घर उन्होंने ढाई लाख रुपये में बनवाया है। वह बताते हैं कि यहां से 6-7 किलोमीटर दूर चंद्रनगर में उनका पैतृक गांव है, जहां वह किसानी किया करते थे। उनके पिता की 80 बीघा की जमीन है, जिस पर वह कपास, जीरा और ग्वार उगाया करते थे।
    हार्दिक पटेल ने भाजपा के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले प्रदेश के 18 फीसदी पाटीदार समुदाय को पाटीदार अनामत आंदोलन समिति यानी पास के बैनर तले लाकर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। लेकिन उनके पिता लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे थे।
    भरतभाई पटेल बताते हैं, मैं भाजपा में पहले से था। मेरे पास उस दौर में जीप हुआ करती थी। मेरी जीप से भाजपा का प्रचार हुआ करता था। मैं गाड़ी चलाया करता था और आनंदीबेन मेरे बाजू में बैठा करती थीं। कई साल तक आनंदीबेन ने मुझे राखी भेजी। वह मेरे घर में खाना भी खाकर गई हैं। इसलिए आंदोलन में हार्दिक ने जब भी उनका नाम लिया तो उन्हें हमेशा फोई (बुआ) कहा।
    51 साल के भरतभाई आठवीं कक्षा तक पढ़े हैं, लेकिन राजनीतिक सवालों का जवाब भी बखूबी देते हैं। उषाबेन हिंदी समझ लेती हैं, लेकिन गुजराती में ही बोलती हैं।
    उषाबेन से पूछा कि हार्दिक की जुबान इतनी आक्रामक कैसे है कि वह कई बार हिंसा के पक्ष में भी बोलने लगते हैं। उषाबेन बोलीं, मेरा बेटा सच बोलता है और सच बोलने वालों की भाषा लोगों को उग्र ही लगती है।
    भरतभाई इस बात को स्वीकार नहीं करते कि उनका बेटा राजनीति कर रहा है। वह कहते हैं, यह आंदोलन है, राजनीतिक नहीं। उसकी तो उम्र ही नहीं है राजनीति करने की। वह तो समाज के लोगों का काम कर रहा है और हमें उस पर गर्व है।
    भरतभाई कहते हैं कि हार्दिक को कई बड़े नेताओं ने राज्यसभा टिकट के प्रस्ताव दिए। अगर उन्हें राजनीति करनी होती तो वह चले जाते। वह कहते हैं, हम किसी ने नहीं डरते। मेरा बच्चा भी किसी से नहीं डरता है। हमने कोई गलत काम नहीं किया।

    हार्दिक पटेल का मुख्य मुद्दा पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग है। कांग्रेस से उनकी बातचीत चल रही है कि अगर वे सत्ता में आए तो पाटीदारों को आरक्षण किस फॉर्मूले के तहत देंगे। आरक्षण की मांग से उनके पिता भी सहमत हैं, लेकिन भाजपा से उनकी नाराजगी की बड़ी वजह कुछ और है।
    वह कहते हैं, भाजपा हमारी दुश्मन नहीं है। कांग्रेस हमारा भाई नहीं है। लेकिन हमारे 14 पाटीदार नौजवानों को किसी ने तो मारा। अगर नियम ऐसे हैं कि आरक्षण नहीं दे सकते तो न दें। लेकिन जिन्होंने हमारे बच्चों को मारा, आज तक क्यों उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई?
    चुनाव पर इसके असर के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, हम लोगों को बोलेंगे कि भाजपा को वोट मत दो। लेकिन यह नहीं बोलेंगे कि कांग्रेस को दो। उषाबेन बताती हैं कि हार्दिक पढ़ाई में औसत थे। भरतभाई कहते हैं, सौ में पचास टका था। लेकिन जिसे आज के दौर में लीडरशिप कहा जाता है, उसकी झलक कम उम्र से ही हार्दिक के व्यक्तित्व में दिखती थी।
    हार्दिक पटेल सरदार पटेल ग्रुप (एसपीजी) से जुड़े थे, जिसके मुखिया लालजी भाई पटेल हैं। तभी से वह ब्लड डोनेशन और ऐसे दूसरे कार्यक्रम करवाया करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने अपना अलग संगठन बना लिया।
    पाटीदार समाज खेती और व्यापार के लिए ज्यादा जाना जाता है। सूरत में कपड़े और हीरे के काम में भी काफी पाटीदार रहे हैं। सौराष्ट्र के ज्यादातर पाटीदार खेती करते हैं। लेकिन अलग-अलग कारणों से कपड़े और हीरे के काम में मंदी आई और बढ़ती बेरोजगारी से पाटीदार समाज के भीतर एक गुस्सा पनपा।
    भरतभाई बताते हैं कि इसके बाद हार्दिक इतने गांवों में घूमे कि तीन महीने तक घर नहीं आए। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर नौजवानों को जोड़ा और फिर एक दिन उन्होंने एसपीजी के साथ मिलकर पाटीदार समाज की एक रैली जीएमडीसी ग्राउंड में की। इसी रैली में उमड़ी भारी भीड़ ने उन्हें रातोंरात सितारा बना दिया।
    गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार आरके मिश्रा मानते हैं कि हार्दिक की लोकप्रियता जैसी है, वैसी स्थिति के लिए गुजरात भाजपा भी बहुत जिम्मेदार है।
    क्या लोकप्रियता के दम पर आगे बढ़ रहे हैं हार्दिक पटेल?
    वह कहते हैं, पाटीदारों में जो नौजवान वर्ग है, वह काफी तादाद में हार्दिक के साथ है। भाजपा सरकार के साथ जब भी उनका आमना-सामना हुआ है, भाजपा की ताकत ने उनसे मात खाई है।
    हार्दिक के पिता का कहना है कि उनकी भाजपा से कोई वैचारिक लड़ाई नहीं है। लेकिन यह सवाल कई बार हार्दिक के आलोचकों की ओर से उछलता रहा है कि उनके पास सिर्फ पाटीदारों को आरक्षण का अस्थायी सा लगने वाला मुद्दा है और वह बिना ठोस वैचारिक आधार के सिर्फ लोकप्रियता के दम पर आगे बढ़ रहे हैं।
    लेकिन आरके मिश्रा इसे अलग तरह से देखते हैं। वह कहते हैं, यह क्यों मानकर चला जाए कि हर आदमी की वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं और हर आदमी किसी लंबी यात्रा पर निकल पड़ा है। एक नाराजगी है और नाराजगी अपने आप नेता का निर्माण करती है। यह नाराजगी ओबीसी और दलितों में भी है और तीनों समुदायों में युवा नेता खड़े हो रहे हैं। ये वोट बैंक आपस में लड़ भी नहीं रहे हैं। बल्कि साथ में चल रहे हैं। ये तीनों नेता जानते हैं कि अगर ये भाजपा के साथ गए तो इनकी राजनीति खत्म हो जाएगी।
    आरके मिश्रा मानते हैं कि यह कोशिश भी की जा रही है कि पाटीदारों के दो पारंपरिक हिस्सों कड़ुवा और लेउवा को आपस में भिड़ा दिया जाए।
    हालांकि वीरमगाम से थोड़ी ही दूरी पर पटेलों में हार्दिक को लेकर राय बंटी हुई मिली। एक दुकान के सामने बैठे सुनील पटेल ने कहा, वो 14 लोगों की बात होती है, जिनकी पाटीदार आंदोलन में मौत हो गई। लेकिन उनकी मय्यत में कोई नहीं गया। यहां हार्दिक जब घूमते थे तो कोई उन्हें नहीं पूछता था। अब वो फॉर्चुनर गाड़ी में घूमते हैं। विकास सिर्फ उनका हुआ है।
    कल्लूभाई शांतिलाल पटेल ने कहा कि हार्दिक ने पार्टी बदल ली है। उन्हें पहले भाजपा से काम कराना था, काम नहीं हुआ तो वह कांग्रेस के दरवाजे पर चले गए हैं। वह आरक्षण की बात करते हैं, लेकिन आरक्षण मिलने ही वाला नहीं है।
    एक अन्य व्यक्ति ने कहा, हार्दिक पटेल मेरी जाति के नहीं है। लेकिन संविधान में सबको अपना हक मांगने की इजाजत है। इसमें कोई गलत बात नहीं है।
    भरतभाई के घर के ड्रॉइंगरूम में दीवार के एक हिस्से में शायद बाद में मरम्मत कराई गई है। उसमें अलग से की गई पुताई का रंग बाकी दीवार से गाढ़ा दिखता है। भरतभाई आज भी मानते हैं कि उन्होंने अतीत में भाजपा के लिए काम करके गलती नहीं की। वे नाराज हैं, क्योंकि भाजपा ने कुछ काम गलत किए हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • अहमदाबाद, 10 नवम्बर। हार्दिक पटेल के नेतृत्व वाली पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) की अपने समुदाय के लिए की गई आरक्षण की मांग को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने गुरुवार रात हुई बैठक में उन्हें तीन विकल्प दिए। इसके बाद संगठन के सदस्यों ने कहा कि वे अपने नेताओं और कानून विशेषज्ञों से विचार-विमर्श कर इस पर निर्णय लेंगे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने गुरुवार को हुई बैठक में पीएएएस के सदस्यों को इन विकल्पों की जानकारी दी। रात साढ़े 11 बजे शुरू हुई यह बैठक देर रात दो बजे तक चली। पीएएएस के संयोजक दिनेश बांभणिया ने बैठक के बाद कहा, हमें कांग्रेस पार्टी ने इसके तीन विकल्प दिए हैं कि कैसे हमारे समुदाय को शिक्षण संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया जा सकता है। बहरहाल, उन्होंने इन तीन विकल्पों पर विस्तृत जानकारी नहीं दी।
    बांभणिया ने कहा, हार्दिक, समुदाय के सामाजिक नेताओं, कानून विशेषज्ञों के साथ इस पर विचार करने से पहले इन विकल्पों को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। विचार के बाद इन्हें समुदाय के सामने रखा जाएगा। अगर समुदाय इन्हें स्वीकार कर लेता है, तो हम इस बारे में कांग्रेस पार्टी को सूचित कर देंगे। पीएएएस के संयोजक ने कहा कि बैठक बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। उन्होंने कहा, हमने आर्थिक रूप से पिछड़ी श्रेणी के तहत कांग्रेस का आरक्षण प्रस्ताव खारिज कर दिया है क्योंकि वह असंवैधानिक था। सिब्बल ने बैठक के बाद कहा, कांग्रेस और पीएएएस सदस्यों के बीच आज हुई बैठक से उम्मीद जगी है कि हम आगे एक साथ काम कर सकते हैं।
    कांग्रेस नेता ने कहा, हमने सभी पहलुओं पर चर्चा की और सब कुछ (पाटीदार समुदाय को आरक्षण प्रदान करने के लिए) संविधान के तहत करेंगे। उन्होंने कहा कि वह अगले दो-तीन दिन में फिर मुलाकात करेंगे। सिब्बल ने कहा, मुझे लगता है कि अगले दो से तीन दिन में मामला पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा। पीएएएस के सदस्यों ने गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता में आने की स्थिति में पाटीदार समुदाय को आरक्षण देने की रूपरेखा पर चर्चा करने के लिए सिब्बल से मुलाकात की थी। मुलाकात रात नौ बजे होनी थी लेकिन सिब्बल देर से पहुंचे थे। (भाषा)

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 10 नवम्बर। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी दिल्ली की जानलेवा धुंध से परेशान हैं। अस्थमा की पेशेंट सोनिया गांधी को दिल्ली की हवा में सांस लेने में परेशानी हो रही है। कांग्रेस पार्टी में इस बात की चर्चा है कि जल्द ही सोनिया गांधी गोवा जाने वाली हैं। खबरों के मुताबिक अगले एक से दो दिनों में सोनिया गांधी स्वास्थ्य लाभ के लिए गोवा जा सकती हैं। दिल्ली में धुंध के खतरनाक स्तर पर पहुंच जाने की वजह से यहां सांस के मरीजों को काफी परेशानी हो रही है। पिछले साल भी नवंबर में सोनिया गांधी दिल्ली के मौसम से बचने के लिए गोवा चली गईं थी। 
    दिल्ली में हवा की गुणवत्ता का सूचकांक 451 तक जा पहुंचा है, जबकि इसका अधिकतम स्तर 500 है। इस हवा में सांस लेने का मतलब है करीब 50 सिगरेट रोज पीने जितना धुआं आपके शरीर में चला जाता है। बीमार लोगों के अलावा स्वस्थ व्यक्तियों के लिए भी यह हवा हानिकारक है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, यह स्वास्थ्य की आपात स्थिति है, क्योंकि शहर व्यावहारिक रूप से गैस चैंबर में बदल गया है। 
    आईएमए के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि धुंध एक जटिल मिश्रण है और इसमें विभिन्न प्रदूषक तत्व जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड और धूल कण मिले होते हैं। यह मिश्रण जब सूर्य के प्रकाश से मिलता है तो एक तरह से ओजोन जैसी परत बन जाती है। यह बच्चों और बड़ों के लिए एक खतरनाक स्थिति है। फेफड़े के विकारों और श्वास संबंधी समस्याओं वाले लोग इस स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
    कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए तारीख के ऐलान में हो रही देरी को भी इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे पहले माना जा रहा था कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक होगी और अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए चुनाव शेड्यूल की घोषणा कर दी जाएगी। लेकिन इस बारे में कांग्रेस की ओर से कोई तारीख ना जारी करने की वजह से पार्टी पर नजर रखने वाले लोग अलग-अलग आकलन कर रहे थे।
    कांग्रेस के गलियारों में राहुल गांधी को जल्द पार्टी की कमान देने की चर्चा चल रही है। ताकि विधानसभा चुनाव में इसका फायदा कांग्रेस को मिल सके। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी बीमारी की वजह से राजनीतिक रूप से उतनी सक्रिय नहीं रह पा रही हैं। जितनी की पार्टी को इस वक्त जरूरत है। इसलिए राहुल गांधी को पूरी तौर पर जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया अंदरखाने में चल रही है। 
    कांग्रेस सोनिया गांधी के लिए गोवा छुट्टियां बिताने का पसंदीदा स्थान रहा है। पिछले साल मध्य नवंबर में दिल्ली की धुंध से बचने के लिए गोवा में वक्त गुजारने के बाद नया साल मनाने भी सोनिया गांधी गोवा पहुंची थीं। इस बार उनके साथ उनकी बेटी प्रियंका गांधी भी मौजूद थीं। यही नहीं इस साल सितबंर में भी सोनिया गांधी ने अपने कुछ पल गोवा के एक रिजॉर्ट पर बिताये थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक दक्षिण गोवा के मोबोर तट  पर सोनिया गांधी स्वास्थ्य लाभ लेने पहुंची थीं।  (जनसत्ता)

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • एबीपी ओपिनियन पोल
    नई दिल्ली, 10 नवम्बर। गुजरात देश का वह राज्य है जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति की एबीसीडी सीखी। तेरह साल तक सूबे की कमान संभालने वाले नरेंद्र दामोदर दास मोदी पर 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने अपना प्यार इस कदर उड़ेला कि वह गुजरात से दिल्ली के 7 आरसीआर तक पहुंच गये। इस जीत के साथ ही बीजेपी को एक ऐसा हथियार मिला जिसकी काट विपक्ष अभी तक नहीं ढूंढ पाया है। मोदी लहर नामक इस हथियार के सहारे बीजेपी अब कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने लगी।
    साल 2014 के इस जीत के साथ ही मोदी ने गुजरात को भारत की राजनीति का केंद्र बना दिया। इस विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी ने गुजराती अस्मिता को मुद्दा बनाया। अप्रत्यक्ष रूप से पीएम खुद गुजराती अस्मिता के प्रतीक बन गये। ऐसे में जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में पहली बार विधानसभा चुनाव होने हैं तो लाजमी है कि देश की निगाहें इस चुनावी दंगल पर टिकी रहेंगी। यह दंगल और ज्यादा दिलचस्प हो गया जब गुजरात के तीन नौजवान हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ने इंट्री मारी। इन तीनों ने बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में ऐसी सेंधमारी की कि इसकी शिकन बीजेपी के शीर्ष नेताओं के चेहरे पर साफ दिखने लगी। अब ओपिनियन पोल भी कुछ इसी तरह की कहानी कह रही है।
    गुजरात में पिछले 22 साल से बीजेपी सत्ता की सवारी कर रही है। अब बीजेपी और कांग्रेस चुनावी समर में हर हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस जहां वापसी के लिए बेताब है तो बीजेपी सत्ता को बरकरार रखना चाहती है। यह चुनाव कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद मायने रखता है। जहां गुजरात चुनाव के बाद राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं, वहीं पीएम मोदी के लिए साख का सवाल है। नौ दिसंबर और 14 दिसंबर को मतदान होंगे और नतीजे 18 दिसंबर को आएंगे। चुनाव परिणाम से पहले जनता के मूड को भांपने के लिए एबीपी न्यूज-लोकनीति-सीएसडीएस ने ओपिनियन पोल किया है। आपको बता दें कि एबीपी न्यूज -लोकनीति-सीएसडीएस ने अगस्त में भी सर्वे किया था। अब दोनों में काफी परिवर्तन दिख रहा है। कांग्रेस को फायदा तो है लेकिन सत्ता से दूर दिख रही है।
    अगस्त से तुलना करते हुए अक्टूबर के आंकड़े
    सौराष्ट्र- कच्छ (54 सीट)
    वोट शेयर
    बीजेपी को 42 फीसदी (-23) मतलब अगस्त में बीजेपी का वोट शेयर 65 फीसदी था अब 42 फीसदी रह गया
    कांग्रेस को 42फीसदी (+16) मतलब अगस्त में कांग्रेस का वोट शेयर 26 फीसदी था अब 42 फीसदी हो गया
    सौराष्ट्र के ओपिनियन पोल के मायने
    सौराष्ट्र क्षेत्र में पाटीदार सबसे ज्यादा है। पाटीदारों की नाराजगी का फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। साल 1995 से पाटीदार बीजेपी के वोटबैंक माने जाते थे। आरक्षण ना मिलने से नाराज पाटीदारों को बीजेपी मना नहीं पाई। हार्दिक पटेल के झुकाव से पाटीदार कांग्रेस की तरफ आए।
    उत्तर गुजरात (53 सीट)
    बीजेपी को 44 फीसदी (-15) अगस्त में बीजेपी का वोट शेयर 59 था अब 44 फीसदी रह गया।
    कांग्रेस को 49 फीसदी (+16) अगस्त में कांग्रेस का वोट शेयर 33 था अब 49 फीसदी हो गया।
    उत्तर गुजरात के ओपिनियन पोल के मायने- उत्तर गुजरात में ग्रामीण इलाके ज्यादा हैं। ग्रामीण किसान बीजेपी सरकार के काम से खुश नहीं हैं। महंगाई बढऩे से किसान बीजेपी से नाराज हैं। उत्तर गुजरात के वोटर बदलाव के मूड में हैं। पाटीदारों की नाराजगी का खामियाज यहां भी बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है।
    मध्य गुजरात (40 सीट)
    बीजेपी- 54 फीसदी (-2) अगस्त में बीजेपी का वोट शेयर 56 था अब 54 फीसदी रह गया।
    कांग्रेस 38फीसदी (+8) अगस्त में कांग्रेस का वोट शेयर 30 था अब 38 फीसदी हो गया
    मध्य गुजरात के ओपिनियन पोल के मायने
    अहमदाबाद, गांधीनगर, वडोदरा जैसे शहर मध्य गुजरात में हैं। शहरी वोटर अब भी बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े हैं। मध्य गुजरात में कोली वोटरों का प्रभाव ज्यादा है। नाराज पाटीदारों के विकल्प में बीजेपी कोली वोटरों को साधने में कामयाब होती दिख रही है।
    दक्षिण गुजरात (35 सीट)
    बीजेपी - 51 फीसदी (-3) अगस्त में बीजेपी का वोट शेयर 54 था अब 51 फीसदी रह गया
    कांग्रेस- 33फीसदी (+6) अगस्त में कांग्रेस का वोट शेयर 27 था अब 33 फीसदी हो गया
    पूरे गुजरात की बात करें तो बीजेपी को अगस्त में 59 फीसदी अब बीजेपी को अब 47 फीसदी। अर्थात करीब 12 फीसदी का नुकसान। कांग्रेस को अगस्त में 29 फीसदी अब 41 फीसदी वोट। अर्थात करीब 12 फीसदी का फायदा
    दक्षिण गुजरात आदिवासी बहुल इलाका है। आदिवासी वोटर बीजेपी सरकार के काम से खुश हैं। आदिवासी कांग्रेस का वोटबैंक माने जाते रहे हैं। पारंपरिक वोटबैंक में कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई है। पटेलों, ओबीसी और दलितों पर फोकस से आदिवासी छिटक गए।
    कैसे हुआ सर्वे?
    यह सर्वे 26 अक्टूबर से 1 नवंबर के बीच गुजरात के 50 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया है। ओपिनियन पोल में 200 पोलिंग बूथ के 3757 लोगों की राय ली गई है।
    ये ओपिनियन पोल के नतीजे हैं। अभी मतदान में करीब एक महीने हैं। अब दोनों ही बड़े सियासी दल इस सियासी संग्राम में पूरी ताकत झोंक देंगे। दोनों के लिए ही गुजरात विजय कई मायने में बेहद अहम है।
    गुजरात पीएम नरेंद्र मोदी का गृह प्रदेश है। वे इस सूबे के 13 साल तक लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे। गुजरात के विकास मॉडल के सहारे ही वो देश की सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं। इसलिए यहां के चुनाव नतीजे सीधे तौर पर उनके सियासी कद का इम्तिहान है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से लगातार जीत रहे मोदी के सामने ये सिलसिला बरकरार रखने की चुनौती है। अगर वो चुनाव जीतते हैं तो उनका और उनकी सरकार का इकबाल बुलंद होगा। जनता में उनकी पैठ और गहरी होगी। उनके विकास के मॉडल पर मुहर लगेगी। हारते हैं तो उनकी राह मुश्किल होगी, क्योंकि सरकार नोटबंदी और जीएसटी को लेकर बैकफुट पर है।
    पहली बात ये है कि अब 2019 के चुनाव में डेढ़ साल से भी कम वक्त रह गया है। गुजरात बीजेपी का गढ है इसलिए इसे 2019 का सेमीफाइनल और मोदी लहर का टेस्ट माना जा रहा है। अब तक मोदी लहर दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार और पंजाब छोड़कर हर राज्य में दिखा है। अगर गुजरात के नतीजे भी उनकी उम्मीदों के एन मुताबिक आते हैं तो मोदी के लिए इससे बड़ी खुशखबरी नहीं हो सकती।
    दूसरा सवाल कि मोदी के बगैर गुजरात में बीजेपी की हैसियत क्या है। विधानसभा के बीते चार विधानसभा चुनाव में ये पहला चुनाव है, जो मोदी के नेतृत्व में नहीं लड़ा जा रहा है। अब सीएम की कुर्सी पर विजय रुपाणी हैं। मोदी ने अपने नेतृत्व में तीनों चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाई और बड़ी जीत दिलाई। अगर मोदी बतौर पीएम गुजरात में फ्लॉप होते हैं ये कहा जाएगा कि उनके विकास का मॉडल नकली साबित हुआ है।
    नोटबंदी और जीएसटी पर एक कारोबारी राज्य का फैसला क्या रहता है? नोटबंदी के बाद बीजेपी यूपी का चुनाव जीत चुकी है। लेकिन जीएसटी लागू किए जाने के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव है। खासकर इसे लेकर व्यापारियों और कारोबारियों में खासी नाराजगी पाई जाती है। दूसरी तरफ हाल के दिनों में नोटबंदी को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। इसलिए इस चुनाव में बीजेपी हारती है तो ये कहा जाएगा कि ये हार नोटबंदी और जीएसटी की वजह से हुई है।
    राहुल गांधी के लिए ये बहुत बड़ा मायने रखता है। राहुल गांधी को पार्टी की कमान देने की चर्चा है। ऐसे में अगर वो यहां कांग्रेस की जीत दर्ज करा देते हैं तो पार्टी में एक नई उर्जा और उत्साह का संचार होगा। लगातार चुनाव हारने के कारण मायूस कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अपने नए नेतृत्व के प्रति भरोसा बढ़ेगा।
    राहुल गांधी के लिए गुजरात जीतना इसलिए भी जरूर है क्योंकि पार्टी के अंदर से भी उनके नेतृत्व को लेकर आवाजें उठती रही हैं। गुजरात में मोदी की होम पिच पर उन्हें मात दे राहुल उन आवाजों को चुप करा सकते हैं। उनकी लीडरशिप पर संदेह है वो चुप होंगे और पार्टी के अंदर उनकी चुनाव हराने वाली छवि भी खत्म होगी।
    राहुल के लिए ये चुनाव इसलिए भी एक मौका बताया रहा है क्योंकि वो एक ऐसे राज्य के चुनाव मैदान में जहां बीजेपी काफी दिनों से सत्ता में है और सरकार विरोधी लहरें भी मुखर हैं। पटेलों की नाराजगी जगजाहिर है। अगर ऐसे मौके को राहुल गंवा देते हैं तो उनके नेतृत्व क्षमता पर गहरे सवाल खड़े हो जाएंगे। मुमकिन है कि कुछ ऐसी आवाजें सुनाई पड़े जो राहुल के लिए सहज नहीं हो।
    गुजरात में अगर राहुल स्थानीय युवा नेताओं को अपने पाले में कर बीजेपी को मात देते हैं तो फिर उनपर दूसरे क्षेत्रीय पार्टियों और नेताओं का भी भरोसा बढ़ेगा। राहुल गांधी के नेतृत्व में एक नये गठजोड़ की संभावनाएं बनेगी जहां युवा नेतृत्व 2019 के लिए चुनौती के तौर पर खड़े होते दिखेगा।
    इसी चुनावी दंगल में जनता का मूड भांपने के लिए एबीपी न्यूज (लोकनीति)सीएसडीएस ने अगस्त में भी सर्वे किया था। अब अक्टूबर में फिर सर्वे हुआ। दोनों सर्वे में काफी परिवर्तन दिख रहा है। कांग्रेस को फायदा तो है लेकिन सत्ता से दूर दिख रही है। (एबीपी न्यूज)

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