आजकल

Posted Date : 11-Dec-2017
  • अभी चार दिन पहले ब्रिटिश मीडिया पर एक ऐसी रिपोर्ट आई जो कि पश्चिम के उदार और आधुनिक मूल्यों के पैमानों पर भी कुछ सनसनीखेज मानी गई। वहां पर एक कामयाब पेशेवर वित्तीय सलाहकार महिला ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया कि अपने पति के गुजर जाने के बाद उसने अब तक सौ से अधिक ऐसे शादीशुदा मर्दों से संबंध बनाए जो कि अपनी निजी जिंदगी से नाखुश थे। उसका कहना है कि इन लोगों के साथ अच्छा वक्त गुजार कर उसने इनकी शादीशुदा जिंदगी को बचाने में मदद भी की है क्योंकि बहुत से लोग शादी के बाद के बरसों में धीरे-धीरे एक-दूसरे में दिलचस्पी खो बैठते हैं, और उनकी शारीरिक और मानसिक जरूरतें एक-दूसरे से पूरी नहीं होती। ऐसे में अगर ऐसे जोड़ों में से कोई एक भी बाहर से कुछ खुशी पाकर घर लौटते हैं, तो उनकी शादी के बच जाने की संभावना बढ़ जाती है। 
    पिछले बरसों में कई बार मैंने इस मुद्दे पर लिखा और आसपास के लोगों की खूब गालियां भी खाई हैं। करीबी लोगों ने रूबरू मुझे कहा कि मैं लोगों को बदचलनी की ओर धकेल रहा हूं। उनका यह कहना सही था कि विवाहेत्तर संबंधों को बुरा न कहना उन्हें भला कहने जैसा होता है, और उससे हो सकता है कि बहुत से लोगों की दिलचस्पी ऐसे रिश्तों में बढ़ चले क्योंकि मेरा लिखा होने अपराधबोध से अग्रिममुक्ति दिला देता है। 
    उनकी यह तोहमत कुछ हद तक सही है, और इसे तोहमत मानने की वजह मेरी अपनी सोच नहीं है, बल्कि शादीशुदा जोड़ों की आपसी, और उनसे समाज की ये उम्मीदें हैं कि शादी में वफादारी एक अनिवार्य और स्वाभाविक बात है। उम्मीदें तो उम्मीदें होती हैं, हर बार उनका हकीकत से कुछ वास्ता जरूरी नहीं होता, इसलिए वफादारी को अनिवार्य मानने वाली उम्मीद बेबुनियाद सी होती है। और इसके लिए दो बातों को समझना जरूरी है कि शादीशुदा जोड़ों के भीतर आपसी रिश्ते वक्त के साथ-साथ कैसे बदलते हैं, और दूसरा यह कि इंसान का अपना मिजाज कैसा होता है। 
    दुनिया के किसी भी हिस्से में, खासकर शहरी हिस्से में, शादी का मामला उसके दोनों भागीदारों की एक वक्त की पसंद, सोच, और उम्मीदों की बुनियाद पर बना हुआ रहता है। वक्त के साथ-साथ इन तीनों में एक ऐसा फेरबदल आ सकता है कि आज का जोड़ीदार कल बोझ लगने लगे, और परसों उससे परे कुछ और दिखने लगे। शादी और वफादारी, इन दोनों को अनिवार्य रूप से जोडऩे की बात इंसान के बुनियादी मिजाज से मेल नहीं खाती। समय के साथ-साथ लोगों को नए लोग मिलते हैं, उनकी अपनी पसंद बदलती है, अपना मिजाज बदलता है, और अपनी जरूरत भी बदलती है। और ऐसा ही कुछ उनके जोड़ीदार के साथ भी होते चलता है। इन दोनों के किसी भी वक्त के ऐसे फेरबदल एक साथ देखने पर उनके रास्ते काफी कुछ अलग भी होते दिख सकते हैं। ऐसे में कुछ पल के लिए, या कि कुछ बरसों के लिए शादीशुदा जोड़ीदार एक-दूसरे से परे भी एक ऐसी खुशी पाने की चाह रख सकते हैं, पा सकते हैं, जो कि शादी की वफादारी वाली परिभाषा के साथ मेल न खाए। 
    लेकिन होता यह है कि जब लोग अपने जोड़ीदार से परे ऐसी खुशी पाकर लौटते हैं, तो वे घर के भीतर का तनाव झेलने के लिए कुछ अधिक दूर तक लैस होकर भी आते हैं। इसके साथ-साथ उनके भीतर का एक अपराधबोध भी होता है जो कि उन्हें घर के भीतर कुछ अधिक समझौते करने, कुछ अधिक बर्दाश्त करने का हौसला देता है। अगर ऐसे जोड़ों में इस तरह की खुशी पाने की गुंजाइश बाहर न निकले, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से लोग भीतर के तनाव को झेल नहीं पाएं। 
    इस बात को पहले अपने इस कॉलम में कुछ मौकों पर मैं लिख भी चुका हूं, और अब यह ब्रिटिश महिला मानो बरसों बाद उसी बात को एक और अधिक मजबूत मिसाल के साथ सामने रख रही है, अपनी खुद की गुजरी बातों को बताते हुए, बिना किसी अफसोस के साथ, और एक बिल्कुल ही आम इंसान की तरह अपनी कमजोरियों और खूबियों को मानते हुए, बताते हुए। 
    चाहे प्रेम-संबंध हो, चाहे विवाह-संबंध, लोगों से वफादारी की उम्मीद इसलिए भी सही नहीं लगती कि वह उम्मीद आने वाले उन दिनों को लेकर है जिनका कि अभी उन्हें एहसास भी न हो, वह उन लोगों को लेकर है जिनसे कि वे अभी तक मिले भी नहीं हैं, वह उम्मीद दिल-दिमाग की ऐसी हालत को लेकर है जो कि अभी तक आई नहीं है, और जब ऐसे नए लोग मिलते हैं, ऐसी नई नौबतें आती हैं, ऐसी नई शारीरिकऔर मानसिक जरूरत सिर चढ़कर बोलती है, तो पहले के सारे वायदे और सारी कसमें धरी रह जाती हैं, और इंसान एकदम इंसान की तरह बर्ताव करने लगते हैं, बजाय प्रेमी या प्रेमिका के, पति या पत्नी के। यह बात याद रखने की जरूरत है कि इंसानों के बीच रिश्ते तो इंसान के इतिहास में बड़े ताजा हैं, रिश्तों की इस सामाजिकता से परे इंसान की अपनी इंसानी जरूरतें तो बहुत ही पुरानी हैं। रिश्तों से लाखों बरस अधिक पुरानी जरूरतें, भला रिश्ते कैसे इन जरूरतों को दबा सकते हैं?
    जिस तरह कि इंसान के भीतर हिंसा करने वाला एक पहलू होता है जिसे कि इंसान हैवान कहकर अपने बाकी हिस्से को उस तोहमत से बचा ले जाते हैं, ठीक उसी तरह  इंसान के भीतर रिश्तों की नैतिकताओं और उनके बंधनों से मुक्त एक ऐसा पहलू होता है जिसे कि सामाजिकता और निजी वफादारी छू भी नहीं पाते, और जो इंसान के हाड़-मांस, दांत और नाखूनों की तरह का अधिक पुराना, अधिक प्राकृतिक पहलू होता है। 
    आधुनिक समाज ने अपने ढांचे को अधिक मजबूत बनाने के लिए शादी के साथ वफादारी की उम्मीदें और कसमें जोडऩे का काम किया। उसने एक बार शादी के बाद, उस शादी के कायम रहने तक शादी के दोनों भागीदारों को परिवार नाम की एक बड़ी घड़ी के पुर्जों की तरह हिलने-डुलने की एक बड़ी सीमित आजादी दी, लेकिन उससे परे कुछ नहीं। भारत के हिन्दू समाज में तो शादी को सात जन्मों का रिश्ता कहा गया, हालांकि अगला जन्म भी किसी का देखा हुआ नहीं है। ऐसे अनदेखे छह और जन्मों की भी वफादारी का पैमाना सामने रखते हुए यह भी नहीं देखा गया कि शादी के बाद एक जन्म में ही कितने उतार-चढ़ाव आते हैं, और दोनों भागीदार उन्हें भी हर बार झेल नहीं पाते हैं। शादी नाम की व्यवस्था लोगों को कई मायनों में एक मशीन के पुर्जों की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रख देती है, और यह व्यवस्था यह ध्यान रखती कि असल जिंदगी में ये दोनों पुर्जे तो दुनिया के और बहुत से पुर्जों के साथ संपर्क में आते हैं, और अपने आपमें भी इन दो पुर्जों के बीच कई किस्म की रगड़ाहट होती है। 
    आज दुनिया के किसी भी समाज में शादी से परे के संबंधों को अच्छी निगाह से देखा नहीं जाता, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन्हें हकीकत भी नहीं माना जाता। ऐसा मान लिया जाता है कि शादी नाम की संस्था लोगों को इंसान से मशीनी पुर्जा बनाने की ताकत रखती है, और बना भी देती है। लेकिन यह बात सच और हकीकत से कोसों दूर की बात है।

    - सुनील कुमार

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Posted Date : 22-Nov-2017

Posted Date : 13-Nov-2017
  • इन दिनों कोई भी शहरी, शिक्षित, संपन्न, सक्रिय शायद ही ऐसे हों जो कि सोशल मीडिया पर न हों। नतीजा यह है कि लोगों का सामाजिक दायरा जमीनी दायरे से हटकर एक ऐसा आभासी (वर्चुअल) दायरा बन गया है जिसमें वे अपनी पसंद के लोगों के साथ वॉट्सऐप पर बातें शेयर करते हैं, बहुत से समूहों में रहकर बिना खुद कुछ लिखे उस समूह के लोगों की पोस्ट पढ़ते हैं, और इसी तरह फेसबुक पर वे अपनी पसंद के दायरे के साथ रहते हैं। नतीजा यह होता है कि एक नापसंदी पड़ोसी के पड़ोस में रहने जैसा जमीनी तजुर्बा आजकल बहुत से लोगों को अपनी इस आभासी दुनिया में नहीं हो पाता। इस सोशल मीडिया पर उन्हें पल भर में अनसोशल और एंटीसोशल हो जाने की सहूलियत रहती है, वे जब चाहें किसी को अनफॉलो करके उसके पोस्ट देखना बंद कर सकते हैं, उसे अनफ्रेंड करके यह भी बंद कर सकते हैं कि वे लोग उसकी पोस्ट देख सकें, या उस पर टिप्पणी कर सकें। 
    इसके नफे और नुकसान दोनों हैं। घर के पड़ोस में रहने वाले पड़ोसी को जाकर पल भर में यह नहीं कहा जा सकता कि आज से तू मेरा पड़ोसी नहीं। लेकिन यह बात सोशल मीडिया पर हो सकती है। पड़ोसी के लिए अपने घर के सामने का रास्ता बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा हो सकता है। और ऐसे हो सकने ने लोगों की सोच को बड़ी दूर तक बदलकर रख दिया है। असल जिंदगी की सोच जिस तरह शुरूआती दिनों में आभासी जिंदगी को बदल देती है, उस पर असल डालती है, उसी तरह अब आभासी जिंदगी के पल भर के फैसले असल जिंदगी को भी उसी तरह देखना चाहते हैं। ऐसा हो नहीं पाता, और इससे लोग एक बिल्कुल नई किस्म की दुविधा में जीते हैं, एक ऐसी दुविधा जो कि अभी कुछ बरस पहले तक लोगों को परेशान करने के लिए मौजूद नहीं थी। 
    असल जिंदगी में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी पीढिय़ां एक ही घर में गिने-चुने पड़ोसियों के साथ उसी इलाके में गुजर जाती हैं, लेकिन आभासी जिंदगी में, सोशल मीडिया पर लोग आए दिन नए लोगों से मिल सकते हैं, मिलते हैं। ऐसे में लोगों के पास पीढिय़ों से एक ही घर में रहते हुए भी हर दिन नए मुहल्ले का तजुर्बा पाने का एक नया मौका आया है, और इसके बारे में चौकन्ना होकर कुछ सोचने की जरूरत भी रहती है। ऐसी संभावना जमीनी जिंदगी में नहीं रहती, लेकिन सोशल मीडिया की एक अभौतिक दुनिया में ऐसा जरूर रहता है। 
    अब अगर देखें कि जहां पर पल-पल में दोस्त बनाने या दोस्ती छोडऩे की गुंजाइश है, जहां पर दोस्ती के बिना भी सिर्फ कुछ दायरों की एक झलक रोज पाने की सहूलियत है, वहां पर लोग अपने वक्त का, अपनी भावनाओं का बेहतर इस्तेमाल कैसे करें? जैसे लोग असल जिंदगी में चौकन्ने रहते हैं, उसी तरह बहुत से लोग हैं जो कि सोशल मीडिया को अपने परिचित दायरे के संपर्क का एक जरिया बनाकर रखते हैं, और उससे परे या बाहर कम ही जाते हैं। इनका नफा या नुकसान भी सीमित रहता है। ये एक किस्म से उस जहाज की तरह होते हैं जो कि एक बंदरगाह पर बंधा हुआ है, और वहां पर लंगर के साथ वह बड़ा महफूज भी है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहाज बंदरगाहों पर डेरे के लिए नहीं बने होते, वे बेचैन समंदर के तूफानों को झेलने के लिए बने होते हैं, और सात समंदर पार करने के लिए भी। इसलिए उस जहाज की जिंदगी भी भला क्या जिंदगी है जिसने अधिक वक्त बंदरगाह पर ही गुजार दिया हो? 
    इसलिए जो लोग जिंदा लोगों की तरह रहते हैं, सोचते हैं, और कुछ करने का हौसला रखते हैं, उन्हें अपने कम्फर्ट-जोन से बाहर निकलने की जहमत भी उठानी होती है। भरोसेमंद यारों के मखमली दायरे तक तो सब अच्छा रहता है, लेकिन इसके बाहर निकलने पर ही कुछ किया जा सकता है, और ऐसा करते हुए कुछ हो भी सकता है, और ऐसा होना जरूरी नहीं है कि हर बार खुशनुमा ही हो। जो लोग सोशल मीडिया पर वैचारिक या किसी और किस्म की बहस में उलझते हैं, उन्हें कुछ तो समझदार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, और कुछ प्रतिक्रियाएं ऐसी भी मिलती हैं जैसी कि फुटपाथ पर आते-जाते लोगों की रहती हैं, तकरीबन बेचेहरा, तकरीबन गुमनाम सरीखी, और तकरीबन गैरजिम्मेदार भी। ऐसे में बहुत से लोग कुछ कोशिशों के बाद ही दुस्साहस छोड़कर एक किस्म से घर बैठ जाते हैं कि असल जिंदगी के झगड़े क्या कुछ कम हैं कि सोशल मीडिया पर और पंगा लिया जाए?
    लेकिन कुछ ऐसे दुस्साहसी भी होते हैं जो कि आए दिन दोस्ती का दायरा अनजाने लोगों तक बढ़ाते हैं, असहमत लोगों के साथ बातचीत जारी रखते हैं, बंधे-बंधाए दायरे में छंटाई कुछ उसी तरह करते हैं जिस तरह की एक माली पौधों के कुछ पत्तों को, कुछ डालियों को काटकर नए पत्तों के लिए रास्ता साफ करते हैं। यह बात तय है कि सात समंदर से अरबों गुना बड़े इस सोशल मीडिया पर अगर माली की तरह छंटाई नहीं की गई, तो नए दोस्तों, नई बातों के लिए रास्ता ही नहीं निकलता। ऐसे में यह भी होता है कि पुराने दोस्तों, या कि दायरे के आम लोगों की उन्हीं बातों से सोच पर एक किस्म से काई जमते चलती है, और सोशल मीडिया उनके लिए दोस्तों और परिवार की तस्वीरों के बढ़ते हुए एलबम जितना होकर रह जाता है। ऐसे लोगों के लिए मुझे कुछ नहीं कहना है।
    लेकिन सोशल मीडिया पर जो लोग सामाजिक और राजनीतिक रूप से जिंदा लोग हैं, और जो दुनिया को कल भी जिंदा रखने के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर पसंदीदा दोस्तों और चहेते लोगों के दायरे से बाहर निकलकर कुछ ऐसे लोगों को भी जोडऩा चाहिए जो कि नए हों, जो कि अलग हों, और जो कि असहमत भी होते हों। कम से कम कुछ अरसे तक ऐसे नए-नए लोगों को आजमाते जाना चाहिए कि वे आपकी इस आभासी दुनिया में कुछ जोड़ रहे हैं, कि आपका सुख-चैन महज तोड़ रहे हैं। और फिर इनके बारे में फैसला लेने की सहूलियत तो आभासी दुनिया में रहती ही है। लोगों को हर दिन कुछ नए लोगों से जुडऩा चाहिए, और हर दिन कुछ पुरानी डालियों की कटौती करनी चाहिए। यह काम बहुत से लोगों के लिए बहुत आसान भी नहीं होगा क्योंकि जब लोग अनजानी पगडंडियों पर चलते हैं, तो उन्हें सपाट, जानी-पहचानी सड़क की तरह की सहूलियत नहीं होती। लेकिन लोग दुनिया में आगे बढ़ पाते हैं नई पगडंडियों से ही, सैलानियों के लिए बनी किताबों को लेकर सफर करने वाले पर्यटक कभी खोज का इतिहास नहीं रच पाते। 
    आभासी दुनिया में लोगों को अपने दायरे में लगातार फेरबदल करना इसलिए भी जरूरी है कि धीरे-धीरे लोग अपने पसंदीदा दायरे के उसी तरह आदी हो जाते हैं जिस तरह कि अपने पसंदीदा गाने को बार-बार सुनने के आदी हो जाते हैं। ऐसे में नए गायक, नए संगीत, नए देश की नई विधा को जानने-समझने का काम तकलीफदेह लगने लगता है। लेकिन जिन लोगों ने नई-नई चीजों को जानने की कोशिश नहीं की, उन लोगों को नई मंजिल भी नहीं मिलती। वे बंदरगाह पर लंगर से बंधे हुए जहाज की तरह रह जाते हैं, सुरक्षित तो रहते हैं, लेकिन दुनिया नहीं देख पाते।
    - सुनील कुमार

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Posted Date : 24-Oct-2017
  • सुनील कुमार
    मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए इन दिनों ट्विटर पर एक दिलचस्प झगड़ा चल रहा है। लंबे समय तक एनडीटीवी पर काम करने वाली, और उसकी सबसे दिग्गज टीवी जर्नलिस्टों में से एक बरखा दत्त एनडीटीवी पर टूट पड़ी हैं। और महज अपने निकल जाने के बाद के एनडीटीवी पर नहीं, बल्कि अपने वहां रहने के वक्त की बातों को लेकर भी। दूसरी तरफ अभी एनडीटीवी में काम कर रहीं कुछ दूसरी महिला जर्नलिस्ट ऐसी हैं जो कि बरखा दत्त के सितारा दर्जे के सामने कभी उभर नहीं पाई थीं, और उनमें से कुछ ने अभी एनडीटीवी की तरफ से मोर्चा सम्हाला है। कुछ लोग चटखारे लेकर इस झगड़े को देख रहे हैं क्योंकि भारत में एनडीटीवी के विरोधियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि इसे और गहरी मुसीबत में देखने की हसरत रखता है, और वह बरखा दत्त को री-ट्वीट करने में लगा हुआ है। 
    इस पर कल जब मैंने यह ट्वीट किया कि इन दोनों खेमों सहित बाकी लोगों को भी यह सीखना चाहिए कि अपने भूतकाल के साथ कैसे जिया जाए, भूतपूर्व मालिक के साथ, भूतपूर्व कर्मचारी के साथ, भूतपूर्व सहयोगियों के साथ, तो इस ट्वीट पर एक बहुत ही दिलचस्प इंसान की तरफ से तारीफ का एक शब्द पोस्ट हुआ जिसका कि इस झगड़े से, या कि राजनीति से कोई लेना-देना नहीं दिखता है। विराट कोहली ने इस ट्वीट के जवाब में तारीफ का एक शब्द लिखा, और वह शब्द शायद बरखा और उसकी भूतपूर्व सहयोगियों के लिए नसीहत का एक अधिक भारी-भरकम ट्वीट था, मेरे ट्वीट के मुकाबले। 
    दिक्कत यह है कि लोग अपने भूत के साथ जीने का शऊर नहीं रखते। भूतपूर्व पति-पत्नी या भूतपूर्व प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे से हिसाब चुकता करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। मध्यप्रदेश में बहुत पहले एक बड़ा दिलचस्प मामला था जब एक चर्चित आदमी ने अपनी बीवी को तलाक दे दिया था, और उसके बाद उस महिला की किसी और से दोस्ती हुई, और उस दोस्ती को बर्दाश्त न करते हुए वह भूतपूर्व पति उस दोस्त या प्रेमी का वर्तमान दुश्मन बन बैठा, और अपनी ताकत का बड़ा इस्तेमाल उसे बर्बाद करने में लगाने लगा। भारत की राजनीति में हम रोज ही देखते हैं कि कल तक के हमप्याला-हमनिवाला लोग पार्टी बदलते ही एक-दूसरे के खिलाफ ऊंचे दर्जे का जहर उगलने लगते हैं, और खून के प्यासे हो जाते हैं। 
    यह पूरा सिलसिला लोगों का अपना ओछापन बताता है कि वे किस घटिया दर्जे के लोग हैं। अगर भूत को जगाने की कोशिश की जाए, तो बहुत करीबी रहे हुए लोग आत्मघाती अंदाज में एक-दूसरे का भारी नुकसान कर सकते हैं, और अपना खुद का भी। लेकिन यह मामूली बात उनकी मोटी समझ में नहीं बैठ पाती कि ऐसा करते हुए वे अपनी खुद की साख पूरी तरह खत्म कर बैठते हैं। आसपास के और लोग समझ जाते हैं कि इनसे संबंध रखने का मतलब कुछ बरस बाद जाकर खुद भी अपनी ऐसी-तैसी करवाना है, इसलिए बाजार में ऐसे लोगों की साख गटर की गहराईयों तक पहुंची हुई रहती है। 
    भारत की राजनीति में एक इंसान ऐसा भी दिखता है जिसने रिश्ता खत्म होने के बाद कभी मुंह भी नहीं खोला। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके रक्षा राज्यमंत्री रहे अरूण सिंह राजीव-सरकार से अलग होने के बाद जाकर पहाड़ में बस गए, और उनके बारे में बाद में किसी ने देखा-सुना भी नहीं। उन्होंने कभी भी अपनी जुबान राजीव-सरकार या उसके विवादास्पद बोफोर्स सौदे सहित किसी भी बारे में नहीं खोली। भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत ही कम देखने में आया है। दूसरी तरफ जो नेहरू के वफादार निजी सहायक होने का दंभ रखते रहा, वह ओ.एम. मथाई अपनी आत्मकथा में नेहरू की बेटी के बारे में अश्लील इशारों के साथ बेबुनियाद गंदी बातों को लिखकर अपनी किताब बेचता रहा। 
    दरअसल इंसान आमतौर पर ऐसा ही ओछा और घटिया होता है, और गिने-चुने लोग ही ऐसे ओछेपन से ऊपर उबर पाते हैं कि वे अपने भूतकाल को सचमुच ही भूत बने रहने दें। आमतौर पर लोग भूतकाल से कुश्ती लड़ते हुए अपना वर्तमान बर्बाद कर बैठते हैं, और अपना भविष्य भी। 
    लोगों को याद होगा कि जब इमरजेंसी के वक्त बाबू जगजीवन राम इंदिरा गांधी से अलग हो रहे थे, या अलग हो चुके थे, तब इंदिरा के तानाशाह बेटे संजय की पत्नी मेनका ने अपनी नई-नई पत्रिका, सूर्या, में जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उसकी महिला मित्र सुषमा की बंद कमरे की अंतरंग तस्वीरों को छापने का एक ऐसा काम किया था जो कि भारतीय पत्रकारिता में न उसके पहले हुआ, न उसके बाद। वह पूरा का पूरा अंक महज इन्हीं सेक्स-तस्वीरों से भरा हुआ था, और उन तस्वीरों का न तो कोई सार्वजनिक महत्व था, न ही सुरेश राम किसी तरह की सार्वजनिक जिंदगी में था। बाबू जगजीवन राम से हिसाब चुकता करने के लिए, या कि उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए, नेहरू की बेटी इंदिरा की बहू ने ऐसा घटिया काम किया था, और जाहिर है कि यह इंदिरा की सहमति से किया गया होगा। जगजीवन राम से लंबे संबंधों का कोई महत्व नहीं रह गया, और नेहरू का कुनबा भारत के इतिहास की सबसे बुरी पीत-पत्रकारिता पर उतर आया। 
    लेकिन भूत भगाए नहीं भागते हैं। अभी मेनका के सांसद बेटे वरूण गांधी की उसी किस्म की कई तस्वीरों का सैलाब दिल्ली में आया हुआ है क्योंकि वे भाजपा की मौजूदा रीति-नीति से कुछ तिरछे-तिरछे चल रहे हैं, और ऐसी अफवाहें भी हैं कि वे भाजपा छोड़ सकते हैं। ऐसे में उनकी बताई जा रही ऐसी सेक्स-तस्वीरों का बाजार में आना, सूर्या पत्रिका के उस अंक की याद तो दिलाता ही है। यह अपने भूतकाल के साथ जीने की क्षमता में कमी की एक और मिसाल है कि अगर कोई सांसद पार्टी का भूतपूर्व बनते दिख रहा है, तो उसे इस तरह से निपटाया जाए, या कि रोका जाए। 
    राजनीति तो है ही घटिया, लेकिन इंसानों को ऐसे घटियापे से उबरने की कोशिश करनी चाहिए। अच्छे दिनों के रिश्तों की जानकारी को बुरे दिनों के हिसाब चुकता करने के लिए इस्तेमाल करने का कोई अंत नहीं हो सकता। यह सिलसिला सबको जलाकर रख देता है, और आत्मघाती आतंकियों का यह अंदाज भले इंसानों का कभी नहीं हो सकता। इसलिए लोगों को अपने अतीत के साथ वर्तमान व्यतीत करना आना चाहिए। 
    अभी मुंबई में देश की एक सबसे बड़ी विज्ञापन एजेंसी में कल्पनाशील काम करने वाले एक बड़े कामयाब और नामी-गिरामी नौजवान ने काम छोड़ा। इसके बाद इस विज्ञापन एजेंसी ने मुंबई की सड़कों के किनारे कम से कम एक बड़े महंगे होर्डिंग पर उसके लिए बिदाई संदेश टांगकर यह लिखा- राजीव राव, जहां कहीं जाओगे, हमारा प्यार तुम्हारा पीछा करता रहेगा, तुम्हारी कमी खलती रहेगी, जहां भी रहो, कामयाब रहो-ओजिल्वी (विज्ञापन एजेंसी)।

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