सेहत / फिटनेस

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  • आजकल सभी लड़कियां अट्रेक्टिव और खूबसूरत दिखना चाहती हैं. ऐसे में वो रोजाना सुंदर दिखने के लिए मेकअप का सहारा लेती हैं. लेकिन रोजाना किया गया मेकअप कई बार नुकसान भी पहुंचा सकता है.  चेहरे को खूबसूरत बनाने, सुंदर दिखने के लिए लड़कियां रोजाना ब्‍यूटी प्रोडक्‍ट का इस्तेमाल करने लगी हैं. मेकअप खूबसूरती में चार चांद लगाने में अहम भूमिका निभाता है. 

    खास मौके पर मेकअप करना आम बात है लेकिन अगर लड़कियां रोजाना मेकअप करती हैं तो उन्हें सावधान होने की जरूरत है क्योंकि रोजाना मेकअप करने से त्वचा की प्राकृतिक चमक कम हो जाती है. इसके अलावा भी रोजाना मेकअप करने से कई नुकसान भी होते हैं...

    त्वचा में बदलाव
    मेकअप से त्वचा के छिद्र बंद हो जाते हैं. इससे पसीना नहीं आता है. रोजाना मेकअप करने से और पसीना ना आने से त्वचा का प्रकार अचानक बदल सकता है. ऐसी स्थिति से बचने के लिए रोजाना मेकअप नहीं करना चाहिए.
     
    संक्रमण का खतरा
    रोजाना मेकअप का इस्तेमाल करने से चेहरे के छिद्र बंद हो जाने का खतरा रहता है. इससे संक्रमण का खतरा रहता है और कई बार इस कारण चेहरे पर मुंहासे भी निकल जाते हैं.
    आंखों में जलन
    लड़कियां आई मेकअप का भी काफी इस्तेमाल करती हैं. आई मेकअप के रोजाना इस्तेमाल से आंखें जल्द ड्राई हो जाती हैं. इससे आंखों में जलन, खुजली और भारीपन की समस्या हर वक्त रहती है. ऐसी समस्या से बचने के लिए मेकअप का इस्तेमाल रोजाना नहीं करना चाहिए.
    एलर्जी

    रोजाना मेकअप करने से कई तरह की एलर्जी भी हो सकती है. जिसके कारण चेहरा लाल भी पड़ सकता है. इससे बचने के लिए भी रोजाना मेकअप नहीं करना चाहिए.

    पलकों को नुकसान
    कई लड़कियां रोजाना काजल का इस्तेमाल करती हैं. काजल के रोजाना इस्तेमाल से उनकी पलकें कम होने लगती हैं. इसलिए काजल का रोज इस्तेमाल करना पलकों को काफी नुकसान पहुंचाता है.

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  • नई द‍िल्‍ली : जिस किसी भी में प्राण है उसके लिए पानी बेहद जरूरी है. पानी के बिना हम अपने जीवन की कल्‍पना भी नहीं कर सकते. अकसर कहा जाता है कि रोजाना आठ गिलास पानी पीना जरूरी है ताकि शरीर सही से काम कर सके. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि पानी पीने का सही समय क्‍या है? जी हां, आपने बिलकुल सही पढ़ा. जैसे समय पर भोजन करने से ही शरीर को उसका फायदा मिलता है ठीक उसी तरह अगर सही समय पर पानी न पिया जाए तो शरीर को उसका नुकसान उठाना पड़ता है. इसके बावजूद हम किसी भी वक्‍त पानी पी लेते हैं, जो कि एक बुरी आदत है. आपके शरीर को पानी का फायदा तभी मिलेगा जब आप उसे सही समय पर पिएंगे. तो ये है पानी पीने का सही समय: 

    खड़े होकर पानी पीना आपके शरीर के लिए हो सकता है खतरनाक

    सुबह उठने के बाद 
    सुबह उठकर एक से दो गिलास पानी पीना चाहिए. पानी पीने से शरीर के सारे अंदरूनी अंग फिर से एक्टिव हो जाते हैं. इसके साथ ही खाने से पहले सुबह उठकर पानी पीने से आपके शरीर की सफाई भी हो जाती है. 

    खाने से पहले 
    अगर आप खाना खाने के आधे घंटे पहले एक गिलास पानी पीएंगे तो आपका डाइजेशन अच्‍छा रहेगा. याद रख‍िए कि खाना खाने के तुरंत पहले और तुरंत बाद कभी पानी नहीं पीना चाहिए. ऐसा करने से पानी पाचन संबंधी जूस को पतला कर देता है जिससे डाइेजेशन में दिक्‍कत आती है. खाना खाने के आधे घंटे बाद पानी पीना चाहिए ताकि शरीर को भोजन के पोषक तत्‍वों को सही से सोखने का समय मिल सके. साथ ही खाना खाते समय भी पानी नहीं पीना चाहिए. अगर खाते वक्‍त आपको प्‍यास लगती है तो पानी की बजाए दही, छांछ या रायता खाएं.

    नहाने से पहले
    नहाने से आधा घंटा पहले पानी जरूर पीना चाहिए. इससे ब्‍लड प्रेशर नहीं बढ़ पाता है.

    सोने से पहले 
    सोने से एक घंटा पहले पानी पीना चाहिए ताकि रात के समय शरीर में पानी की कमी न हो पाए. 

    भूख लगने पर पानी पीना है सही 
    भूख लगाने पर हमारा शरीर उसी तरह के सिग्‍नल देता है जैसे प्‍यास लगने पर देता है. ऐसे में अगर आपको लगे कि भूख लग रही है तो सबसे पहले पानी पीजिए और 10 मिनट तक इंतजार कीजिए. अगर आपको फिर भी भूख लगती है तो कुछ खाइए, लेकिन कई बार पानी पीने के बाद इस तरह की भूख नहीं लगती. ऐसा करने से आप असमय स्‍नैक्‍स खाने से बच जाएंगे. 

    सादा पानी पीने से नहीं चलेगा काम, रखें इन बातों का ध्‍यान

    फोकस करने के लिए जरूरी है पानी
    इंसान का दिमाग 75 फीसदी पानी से बना है और पानी पीने से यह बेहतर ढंग से काम करता है. अगर काम करते वक्‍त आपको थकान महसूस हो रही है तो पानी पीजिए. या अगर आपको किसी काम पर फोकस करन है तो पानी पीना आपके लिए फायदेमंद साबित होगा. (एनडीटीवी)

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  • भारत में लगभग 61 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों यानी एनसीडी के कारण हो रही हैं. इनमें हार्ट समस्‍याएं, कैंसर और डायबिटीज शामिल हैं. इसके अलावा, इनमें से लगभग 23 प्रतिशत लोग इन रोगों के साथ-साथ समय से पहले मृत्यु के खतरे में भी जी रहे हैं. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, देश में इन गंभीर परिस्थितियों के खिलाफ काम में खास प्रगति नहीं हुई है. तेजी से शहरीकरण के कारण, भारत में गैर-संचारी रोग पैटर्न बढ़ रहा है.

    एनसीडी के बोझ के लिए जिम्मेदार चार जोखिम वाले कारक तंबाकू, दूषित आहार, शारीरिक निष्क्रियता और शराब की अत्यधिक खपत है. कुछ अन्य प्रमुख कारकों में मोटापा, रक्तचाप, रक्त शर्करा और रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि शामिल हैं. ये सभी व्यवहार जोखिम कारक हैं और जीवनशैली में बदलाव से बदले जा सकते हैं.

    आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, आधुनिक और उन्नत तकनीक निश्चित रूप से हमारे लिए जीवन आसान कर रही है. इनमें ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन भुगतान, सूचना का उपयोग, ऐसे काम जो सभी हमारे घर से आराम से किए जा सकते हैं. इनका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि हमारे स्वास्थ्य की कीमत पर प्रौद्योगिकी ने यह सब क्या किया है. हम अब शारीरिक रूप से कम सक्रिय हैं.
     
    क्‍या आप भी 6 घंटे से कम नींद लेते हैं तो खतरे में है आपकी किडनी!
     
    डॉ. अग्रवाल ने कहा, कंप्यूटर पर काम करते हुए लंबे समय तक एक डेस्क पर बैठे रहते हैं, स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया का उपयोग कर टीवी देखते हैं. ये सभी गतिविधियां गतिहीन व्यवहार को बढ़ावा देती हैं. खुली जगह की कमी के कारण, सभी आयु समूहों में शारीरिक गतिविधि का स्तर कम हो गया है.

    उन्होंने कहा कि एनसीडी को नियंत्रित करने और शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए आईएमए ने 'मूव मूव मूव' नामक एक अभियान का प्रस्ताव रखा है. नियमित व्यायाम करने के अतिरिक्त लोगों को दिनभर में अधिक बार घूमना फिरना चाहिए.

    एचसीएफआई द्वारा आयोजित किए जाने वाले आगामी परफेक्ट हेल्थ मेला में चर्चा के मुख्य विषयों में यह विषय भी शामिल रहेगा. मेला चार से आठ अक्टूबर तक नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित किया जाएगा.

    कुछ उपयोगी टिप्स:
    * जितनी बार हो सके सीढ़ियों पर चढ़ें उतरें.
    * बस स्टॉप से बाहर निकल कर बाकी रास्ते पैदल चलें.
    * ड्राइविंग के बजाए पास की दुकान तक पैदल जाएं.
    * फोन पर बात करते समय खड़े होकर घूमें फिरें.
    (आईएएनएस)

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  • रात में छह घंटे से कम सोने वाले लोगों को गंभीर गुर्दा रोग (सीकेडी) होने का अंदेशा बढ़ जाता है. नींद में बार-बार बाधा पड़ने से किडनी फेल होने का जोखिम भी बढ़ जाता है. सीकेडी वाले लोगों को अक्सर उच्च रक्तचाप, मोटापे और मधुमेह के साथ होने वाली अन्य शिकायतें भी रहती हैं. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, ऐसे व्यक्तियों में गुर्दे की कार्यप्रणाली को जांचना महत्वपूर्ण है, जिन्हें उच्च खतरे वाली एक या अधिक परेशानी है.

    सीकेडी का अर्थ है कि समय के साथ गुर्दे की कार्य प्रणाली में और भी नुकसान होते रहना, जिसमें सबसे अंतिम स्थिति है किडनी फेल हो जाना. ऐसे मरीजों को फिर डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण से गुजरना पड़ सकता है. इसके लक्षण शुरू में प्रकट नहीं होते और जब दिखते हैं, तब तक बहुत नुकसान हो चुका होता है.

    आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया, गुर्दे खून की फिल्टरिंग में मदद करते हैं. खून से कचरा और द्रव सामग्री को बाहर निकालते हैं. वह हमारे शरीर में बनने वाले अधिकांश बेकार पदार्थो को निकाल बाहर करते हैं. लेकिन जब गुर्दे का रक्त प्रवाह प्रभावित होता है, तो वे ठीक से काम नहीं कर पाते. ऐसा किसी क्षति या बीमारी के कारण हो सकता है.

    डॉ. अग्रवाल ने कहा, सीकेडी जब बढ़ जाए, तब तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट्स और कचरा शरीर से बाहर नहीं जा पाता और अंदर ही जमा होने लगता है. मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गुर्दे की असामान्य बनावट और बीमारी की पारिवारिक हिस्ट्री वाले मरीजों को अधिक जोखिम है. इसके अतिरिक्त, जो धूम्रपान करते हैं और मोटापे से ग्रस्त हैं, वे लंबे समय तक सीकेडी के निशाने पर रह सकते हैं.

    उन्होंने कहा कि सीकेडी के कुछ लक्षणों में मतली, उल्टी, भूख की कमी, थकान, कमजोरी, नींद की समस्या, मानसिक परेशानी, मांसपेशियों में जकड़न, खुजली, सीने में दर्द, सांस की तकलीफ और उच्च रक्तचाप शामिल है. हालांकि, इन लक्षणों को अन्य बीमारियों से जुड़ा होने का भ्रम हो सकता है.

    डॉ. अग्रवाल ने आगे कहा, अक्सर, सीकेडी का कोई इलाज नहीं होता. उपचार के तहत यही कोशिश की जाती है कि लक्षणों को नियंत्रण में रखा जा सके, जटिलताएं कम से कम हों और रोग की गति धीमी की जा सके. गुर्दे को गंभीर क्षति होने पर, किसी व्यक्ति को अंतत: किडनी रोग के इलाज की आवश्यकता हो सकती है. इस बिंदु पर, डॉक्टर डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की सिफारिश करते हैं.

    गुर्दे की परेशानी से बचने के लिए 8 नियम:

    -फिट और सक्रिय रहें, इससे आपके रक्तचाप को कम करने में मदद मिलती है और किडनी के स्वास्थ्य के लिए कदम उठाने में मदद मिलती है.

    -अपने ब्लड शुगर लेवल पर नियंत्रण रखें, क्योंकि डाइबिटीज के आधे रोगियों को गुर्दे की बीमारी हो सकती है.

    -रक्तचाप की निगरानी करें. यह गुर्दे की क्षति का सबसे सामान्य कारण है. अपनी जीवनशैली और आहार में परिवर्तन करने चाहिए.
    -स्वस्थ खाएं और अपना वजन जांचते रहें. इससे मधुमेह, हृदय रोग और सीकेडी से जुड़ी अन्य स्थितियों को रोकने में मदद मिल सकती है. नमक का सेवन कम करें. दिन में 5 से 6 ग्राम नमक काफी होता है.

    -प्रतिदिन 1.5 से 2 लीटर पानी पीएं. तरल पदार्थों का सेवन अधिक करने से गुर्दे को सोडियम, यूरिया और विषैले पदार्थो को शरीर से बाहर करने में मदद मिलती है.

    -धूम्रपान न करें. इसके कारण किडनी की ओर खून का दौरा कम हो जाता है. धूम्रपान करने पर किडनी में कैंसर का खतरा भी 50 प्रतिशत बढ़ जाता है.

    -अपनी मर्जी से दवाइयां खरीद कर सेवन न करें. इबूप्रोफेन जैसी कुछ दवाएं किडनी के लिए घातक साबित हो सकती हैं.
    (आईएएनएस)

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  • एली लेही
    मुझे अपने पेट में कोई भी बाहरी चीज आने का डर लगता है। यह कहना है 26 साल की सामंता का। सामंता टोकोफोबिया से जूझ रही हैं। इस फोबिया से पीडि़त महिलाओं को प्रेगनेंसी और बच्चों को जन्म देने से डर लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया में तकरीबन 14 फीसदी औरतों को यह परेशानी होती है।
    सामंता बताती हैं कि मेरे दिमाग में ये डर हमेशा बैठा रहता है। गर्भवती महिलाओं को देखकर मैं घबरा जाती हूं। यहां तक कि प्रेगनेंसी या बच्चे पैदा करने की बात सुनकर ही मुझे पसीना आने लगता है, मैं कांपने लगती हूं।
    बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था टॉमी के मुताबिक, ज्यादातर महिलाएं प्रेगनेंसी को लेकर नर्वस होती हैं, जोकि सामान्य है। लेकिन टोकोफोबिया इस सामान्य घबराहट से बिल्कुल अलग है।
    रेना ऐसी महिलाओं की मदद के लिए काम करती हैं। उन्होंने बताया, टोकोफोबिया से ग्रसित महिलाएं प्रेगनेंसी को टालने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। वो मां बनने से इतना डरती हैं कि गर्भपात तक करा लेती हैं।
    सामंता भी हर हफ्ते थेरेपी के लिए जाती हैं लेकिन उन्हें लगता है कि उनका परिवार और दोस्त अक्सर उन्हें समझ नहीं पाते। उन्होंने बताया, वे कहते हैं कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है और मैं ओवररिऐक्ट कर रही हूं।
    सामंता के पति कई साल से परिवार बढ़ाना चाहते हैं। वो बताती हैं, मैंने अपने डर को दूर करने और गर्भनिरोधक दवा न खाने की कोशिश की लेकिन अब तो मैं डर के मारे सेक्स से भी दूर रहना चाहती हूं।
    उन्होंने आगे बताया, मैंने कई बार अपने पति से छिपाकर दवा खाने की भी सोची, ताकि मैं प्रेगनेंट न हो जाऊं। मैं इसके लिए तैयार नहीं हूं कि कोई मेरे पेट में सांस ले, पांव चलाए और पेट में ही पले-बढ़े। मुझे अपने शरीर पर भरोसा नहीं है। मैं नहीं जानती कि मेरे दिमाग में ये डर कैसे आया।
    मिडवाइफ का काम करने वाली सोफी किंग बताती हैं कि पहले के मुकाबले अब उन्हें ऐसी महिलाएं ज्यादा देखने को मिलती हैं जिनके मन में प्रेगनेंसी को लेकर डर होता है।
    उन्होंने कहा कि इसकी एक वजह यह भी है कि टोकोफोबिया कहीं न कहीं एंग्जाइटी डिसऑर्डर से जुड़ा है और अब ज्यादा लोग इस डिसऑर्डर के शिकार हैं।
    33 साल की लौरा ने भी अपने इस डर से छुटकारा पाने के लिए थेरेपी की मदद ली थी। उन्होंने कहा, फिल्मों और टीवी में बच्चे के जन्म को आम तौर पर सही तरीके से पेश नहीं किया जाता है। मुझे बताया गया कि मेरी एक दोस्त को छह दिनों तक प्रसव का दर्द हुआ और उसे ऐसा लगा जैसे वो दो टुकड़ों में बंट गई है। यह सब सुनकर मेरे मन में डर बैठ गया था।
    सोफी ने बताया कि टोकोफोबिया दो तरह का होता है। एक तो वो जो उन महिलाओं को होता है जो पहले कभी प्रेगनेंट नहीं हुई हैं। दूसरे तरह का टोकोफोबिया उन औरतों में देखने को मिलता है जो पहले प्रेगनेंट होने या मां बनने के अनुभव से गुजर चुकी हैं।
    सोफी का मानना है कि इसकी वजह लड़की के साथ अतीत में हुआ किसी तरह का शोषण, मानसिक तकलीफ या बुरे अनुभव से जुड़ी हो सकती है। एलेक्सिया भी इस परेशानी का सामना कर चुकी हैं, लेकिन अब वो खुद दूसरी औरतों को इस बारे में बताती हैं। उन्होंने कहा, बच्चों के जन्म के बारे में हमें बड़ी मुश्किल से कोई सकारात्मक खबर पढऩे को मिलती है। मैं मीडिया को भी इसके लिए आगे आने को कह रही हूं।
    26 साल की बेकी का सुझाव है कि टोकोफोबिया से पीडि़त महिलाओं के लिए सपोर्ट ग्रुप्स होने चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि यह नॉर्मल है और इससे निकला जा सकता है।

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  • नई द‍िल्‍ली : तुलसी को औषध‍ि यानी कि जड़ी-बूटियों की महारानी भी कहा जाता है. तुलसी कई रोगों को दूर करने और शरीर की इम्‍यूनिटी बढ़ाने में बड़ी कारगर है. आमतौर पर यह पौधा हिंदू परिवारों में पाया जाता है और सुहागिन औरतें तो अच्‍छे वैवाहीक जीवन के लिए इसकी पूजा भी करती हैं. यही नहीं तुलसी लगाने से घर में खुशहाली आती है. हिंदू परिवारों में भले ही तुलसी का धार्मिक महत्‍व हो लेकिन यह पौधा शरीर की इम्‍यूनिटी बढ़ाने के साथ बैक्‍टीरिया और वायरल इंफेक्‍शन से लड़ता है. इसके अलावा तुलसी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए कई मायनों में गुणकारी है. आज हम आपको घर में तुलसी लगाने के ऐसे ही पांच बड़े फायदों के बारे में बताएंगे:

    तुलसी और उसकी पूजा से जुड़े 10 महत्वपूर्ण तथ्य

    दूर हो जाएगा स्‍ट्रेस 
    आयुर्वेद में कहा गया है कि अगर आप अपने घर में तुलसी लगाते हैं तो स्‍ट्रेस यानी कि तनाव घर से कोसों दूर रहता है. 

    मच्‍छर भगाने में कारगर
    तुलसी एक ऐसा पौधा है जो मसक्‍यूटो रेपलेंट यानी मच्‍छरों को दूर भगाता है. मलेरिया पर प्रकाश‍ित जर्नलों में कहा गया है कि तुलसी कीड़े-मकौड़ों और मच्‍छरों को भगाने में असरदार औषध‍ि है. यही वजह है कि आपको खासकर मॉनसून में तो तुलसी घर पर जरूर लगानी चाहिए. 

    मिलेगी स्‍वच्‍छ और ताज़ी हवा 
    बेडरूम में तुलसी लगाने से ऑक्‍सीजन सप्‍लाई बढ़ जाती है. यह वह पौधा है जो दिन के 20 घंटे ऑक्‍सीजन देने के साथ ही कार्बन मोनोऑक्‍साइड, कार्बन डायऑक्‍साइड और सल्‍फर डायऑक्‍साइड जैसी ज़हरीली गैसों को सोख लेता है.   
     
    650 tulsi
    सर्दी-जुकाम का मुकाबले करने में सेक्स हार्मोन सक्षम
    घर से आएगी अच्‍छी खुश्‍बू
    तुलसी की खुश्‍बू वातावरण को तो ताजा रखती ही है साथ ही घर को भी फ्रेश अरोमा मिलता है. यही नहीं इस पौधे में ऐसे तत्‍व हैं जो खराब मूड को अच्‍छा करने का काम करते हैं. 

    बीमारियों से छुटकारा 
    तुलसी बीमार‍ियों से भी लड़ने के लिए जानी जाती है. खांसी या बुखार में तुलसी के पत्तों को चाय में डालकर पीने से आराम मिलता है. आप गरम पानी में तुलसी और इलायची डालकर उसका काढ़ा बना सकते हैं. तुलसी का काढ़ा खून को साफ करने का काम करता है और इससे कॉलेस्‍ट्रोल लेवल भी कम होता है.

    किडनी की पथरी में असरदार
    आप तुलसी के पत्तियों की मदद से किडनी की पथरी से छुटकारा पा सकते हैं. तुलसी के पत्तों को गरम पानी में डालकर उसका सारा अर्क निकाल लीजिए. इसके बाद उसमें एक चम्‍मच शहद मिलाकर रोजाना पीने से घर पर ही कीडनी की पथरी का इलाज हो जाएगा.

    अब तो आप मानते हैं न कि तुलसी के कितने फायदे हैं. आप चाहें हिंदू हों या न हों तुलसी के इतने गुणों को ध्‍यान में रखते हुए सभी धर्मों को अपने घरों में इस पौधे को लगाना चाहिए. 

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  • नई द‍िल्‍ली : हम में से ज्‍यादातर लोगों को वजन कम करने के लिए रोज सुबह उठकर जिम जाना किसी भारी-भरकम टास्‍क से कम नहीं लगता. बढ़ते वजन की वजह से आप अपने फेवरेट कपड़े भी नहीं पहन पाते हैं. न ही आपके पास सुबह की भागमभाग में जिम जाने का टाइम और न ही एक्‍सरसाइज करने की फुर्सत. ऐसे में वजन कम करने का सबसे कारगर उपाय है जीरे का पानी. जी हां, यह कोई आम पानी नहीं बल्‍कि एक किस्‍म का जादू है. जीरे का पानी वजन तो कम करता ही है साथ ही यह पूरे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी लाभकारी है. इस पानी को बनाना भी बेहद आसान है. एक ग्‍लास पानी में दो चम्‍मच जीरा डालकर उसे 10 मिनट तक उबाल लीजिए. इसके बाद आंच से उतारकर इसे ठंडा कर पी लीजिए.

    आइए जानते हैं कि जीरे का पानी किस तरह अपना करिश्‍मा दिखाकर वजन कम करने में मदद करता है:

    पाचन तंत्र को स्‍वस्‍थ रखने में मददगार
    जीरे के पानी में एंटीऑक्‍सीडेंट, विटामिन और मिनरल होते हैं और ये डाइजेशन में लाभकारी है. यह डाइजेस्‍टिव स‍िस्‍टम यानी कि पाचन तंत्र को हेल्‍दी रखता है. इसके अलावा इसे पीने से उल्‍टी-दस्‍त, मॉर्निंग सिकनेस, गैस और कॉन्‍स्‍ट‍िपेशन से राहत मिलती है. जीरे के पानी से शरीर में ऐसे इंजाइम बनते हैं जो कार्बोहाइड्रेट, फैट और ग्‍लूकोस को तोड़कर पचाने में सहायक होते हैं. 

    एंटीऑक्‍सीडेंट से भरपूर 
    जीरे में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्‍सीडेंट होते हैं, जो शरीर में इकट्ठा हो रहे जहरीली पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है. इससे शरीर के अंदरुनी अंग बेहतर तरीके से काम करते हैं. जीरे को थोड़े से पानी में रात भर भिगोकर रख लीजिए अगली सुबह इस पानी को पीने से लीवर में बाइल प्रोडक्‍शन बढ़ता है, जिससे आपको एसिडिटी और गैस से राहत मिलती है. बाइल एक ऐसा तरल पदार्थ है जिसका निर्माण लीवर करता है. यह फैट को पचाने का काम करता है. 

    क्‍या है ब्रेकफास्‍ट, लंच और डिनर करने का सही समय?

    बढ़ाए इम्‍यूनिटी
    जीरे का पानी आयरन का बहुत अच्‍छा स्रोत है. आयरन की मौजूदगी में ही इम्‍यून सिस्‍टम सही से काम करता है. यही नहीं इस पानी में भरपूर मात्रा में विटामिन A और विटामिन C मौजूद रहते हैं और इन दोनें में ही एंटीऑक्‍सीडेंट प्रॉपर्टीज़ होती हैं. जीरे के पानी को रोजाना पीने से इम्‍यूनिटी लेवल बढ़ता है और कई बीमारियों भी कोसों दूर रहती हैं. सबसे जरूरी यह वजन को बढ़ने नहीं देता है. 

    आएगी अच्‍छी नींद
    मोटापे की वजह से नींद न आना आम बात है. अगर आपको नींद नहीं आती है तो जीरे का पानी आपकी मदद कर सकता है. जीरे का पानी रोज पीने से आपको अच्‍छी नींद आएगी. 

    शरीर की सफाई
    जीरे के पानी में फाइबर भी पाया जाता है जो कि शरीर से टॉक्‍सिक यानी कि बेकार की चीजों को बाहर निकलने में सहायक है. जीरे के पानी से शरीर की सफाई होती है. यह आपके शरीर को हाइड्रेट रखता है जिससे आप तरोताजा महसूस  करते हैं. इससे आपका वजन भी कम होता है.

    तो क्‍या अब आप जीरे का पानी पीने के लिए तैयार हैं? कम से कम कोश‍िश करके तो देख‍िए.

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  • हम अपनी हेल्थ का ध्यान रखने के लिये न जाने क्या-क्या जतन करते हैं। कई तरीके के नट्स खाते हैं, कई तरीके के तेल खाते हैं ताकि हमारा दिमाग सुचारू रूप से चल सके। इसके लिये कई लोग ऑलिव ऑयल, एवोकाडो और नट्स भी खाते हैं। क्या आप जानते हैं कि हमारे इन चीजों के खाने से ब्रेन की फंक्शनिंग कैसे वैरी करने लगती है या कैसे इफैक्ट होती है।
    इस पर इलिनॉइस यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने अपनी एक रिपोर्ट पेश की है कि जिसमें उन्होंने बताया कि इन तत्वों में वो न्यूट्रिएंट्स मौजूद होते हैं जो हमारे जनरल इंटेलिजेंस को प्रभावित करते हैं। हमारे ब्रेन के आर्गनाइजेशन को ये न्यूट्रियेंट्स ड्राइव करते हैं।
    रिसर्चर्स ने बताया कि ये न्यूट्रिएंट्स मोनो अनसैचुरेटेड फैटी एसिड्स होते हैं जो हमारे दिमाग को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर ये कैसे हमारे दिमाग को कंट्रोल करते हैं।
    अध्ययन में इन्होंने पाया कि जो लोग भूमध्यीय आहार खाते हैं उनमें मौजूद मूफा उनके ब्रेन को कंट्रोल करता है।
    इस रिसर्च के लिये अरबाना के कार्ले फाउंनडेशन हॉस्पिटल में 99 लोगों पर रिसर्च की गई। उनके ब्लड सेंपल्स में पाये गये न्यूट्रियेंट्स की तुलना की गई। जिसमें पता चला कि फैटी एसिड्स दो तरह के होते हैं, एक सैचुरेटेड फैटी एसिड और एक मूफा।
    इस रिसर्च में उन्होंने पाया कि जिनके ब्लड लेवल में मूफा की मात्रा ज्यादा होती है उनमें जनरल इंटेलीजेंस भी ज्यादा होती है। ऐसे लोगों का स्माल वर्ल्ड प्रोपेंसिटी भी अच्छा होता है।
    रिसर्चर्स ने बताया कि हमारी जनरल इंटेलिजेंस ब्रेन के डोरसल अटैन्शन नेटवर्क से जुड़ी होती है। यह हमारे ब्रेन में एक तरह का नेटवर्क होता है जो कि हमारे डेली प्रॉब्लम साल्विंग में मदद करता है और अटैन्शन सिग्नल जनरेट करता है। इसकी फंक्शनिंग अगर अच्छे से होगी तो वो हमारे जनरल इंटेलिजेंस को इंप्रूव करेगा जिसका पता हम स्माल वर्ल्ड प्रोपेंसिटी के मेजरमेंट से लगा सकते हैं। मतलब कि हमारे शरीर में यह नेटवर्क कितना अच्छे से फैला हुआ है।

     

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  • मेकअप और कंसीलर आंखों के काले घेरे को भले ही कुछ देर के लिए छिपा लें, लेकिन इस समस्या को जड़ से हल करने की जरूरत है. विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित देखभाल से काले घेरों से छुटकारा पाया जा सकता है. 'स्टेमजेन थेरेप्यूटिक्स' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रभु मिश्रा और कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल (गाजियाबाद) के त्वचा विज्ञान सलाहकार भावुक मित्तल ने आंखों के काले घेरे से छुटकारा पाने के ये आसान उपाय बताए हैं:

    * अपने शरीर व त्वचा में नमी बनाए रखें. रोजाना खूब पानी पिएं. इसकी शरुआत 6.8 गिलास पानी पीकर कर सकते हैं, जिससे शरीर से हानिकारक पदार्थ बाहर निकल जाते हैं.

    * जंक फूड के बजाय स्वास्थ्यपरक संतुलित आहार का सेवन करें. भरपूर मात्रा में मौसमी फल, सब्जियां और सलाद का सेवन करें. विटामिन 'सी' युक्त खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू, कीवी आदि का सेवन करें जो आपकी आंखों के काले घेरे कम करने में काफी सहायक साबित हो सकते हैं.

    * आजकल के युवा देर रात तक पढ़ाई करते हैं या अल सुबह तक पार्टी करते हैं. पर्याप्त नींद न ले पाने के कारण आंखों के आसपास काले घरे पड़ जाते हैं, इसलिए कम से कम 6 से आठ घंटे की नींद जरूर लें.
     
    इन होममेड चीजों से डार्क सर्कल को कहें Bye-Bye
     
    * शराब का सेवन और धूम्रपान करना बंद कर दें, यह त्वचा के लिए हानकिारक होता है, स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं.

    * काले घेरों से बचने के लिए आंखों का मेकअप हटाने के बाद उस जगह पर बादाम तेल, विटामिन 'ई' युक्त क्रीम या सिरम से मसाज करें. घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं.

    * जेनेटिक तौर पर या एलर्जी से भी काले घेरे हो सकते हैं, एलर्जी की जांच कराएं. स्कीन लाइटनिंग क्रीम लगाएं.

    * रेटिनॉयड कोलेजन के उत्पादन को बढ़ा सकते है. नियमित रूप से रेटिनोल क्रीम का इस्तेमाल करने से काले घेरे कम हो सकते हैं.

    * खीरा, टमाटर, आलू के इस्तेमाल से बी काले घेरों से छुटकारा पाया जा सकता है. आप एक छोटा चम्मच इनका रस निकाल कर आंखों के आसपास लगा लें और 10 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें. इसे रोजाना दिन में कम से दो बार लगाएं.

    * कोल्ड टी बैग से भी काले घरों से छुटकारा पाया जा सकता है. पानी में एक ग्रीन टी बैग डुबा दें और फिर कुछ समय के लिए इसे फ्रिज में रख दें और अब इसे आंखों के ऊपर रखें.

    * अगर कोई उपाय आपके लिए कारगर नहीं साबित हो रहा है तो फिर लेजर ट्रीटमेंट लें. यह आंखों के आसपास के काले घेरों, झुर्रियों को कम करता है.
    (आईएएनएस)

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  • दुनिया में ज्यादातर लोगों की मौत हार्ट अटैक से होती है। र्ट अटैक आने पर अस्पताल पहुंचते तक कई बार कुछ लोग जान गंवा देते हैं। कुछ मरीजों को तो हार्ट अटैक के बारे में पता ही नहीं चलता लेकिन अगर थोड़ी इहितयात बरती जाएं तो इससे होने वाली मौतों से बचा जा सकता है।

    आपको बता दें कि हार्ट अटैक के लक्षण 1 महीने पहले दिखने लग जाते हैं। अब आपका स्मार्ट फोन बता सकेगा कि आपके हार्ट की कंडीशन कैसी है। आप यह सुनकर चौंक गये होंगे कि कैसे स्मार्टफोन हार्ट के हेल्थ तो बतायेगा। यह कोई मजाक नहीं बल्कि सच है। ये बातें कॉलटेक यूनिवर्सिटी के रिसर्च इंजीनियर्स डेरेक रिंडरनेट, निएमा पालेवान, पेमेन तवालली ने की है।
    इन रिसर्चर्स ने बताया कि स्मार्टफोन का कैमरा सिर्फ एक से दो मिनट तक ऐसे होल्ड करना है, जिससे गले तक की पिक कैप्चर हो। उन्होंने बताया कि हार्ट अटैक की जांच करने के लिये पहले अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग करते थे जो कि स्कैनिंग में 45 मिनट का टाइम लेता था। लेकिन आपके स्मार्ट फोन से ये काम सिर्फ 2 मिनट में हो जायेगा।
    रिसर्चर्स ने बताया कि नॉर्मल हेल्दी मानव शरीर में एलवीईएफ का रेंज 50 से 70 प्रतिशत होता है और कम हेल्दी हार्ट वालों में ये रेंज काफी कम होती है।  एलवीईएफ हमारे शरीर में हर हार्ट पंपिग के दौरान कितना ब्लड सर्कुलेट हुआ यह बताता है। यह हार्ट कितना हेल्दी है यह बताता है।
    रिसर्चर्स ने इस अध्ययन के लिये 72 लोगों के शरीर में एलवीईएफ का मेजरमेंट किया, जिसमें 20 से 92 साल के लोग शामिल थे। इनका इकोकार्डियोग्राफी के जरिये अल्ट्रासाउंड स्कैन और एमआरआई स्कैन भी किया, जिसकी रिपोर्ट्स को स्मार्टफोन  के द्वारा ली गई पिक के बाद आई रिपोर्ट से मैच किया।  
    इकोकार्डियोग्राफी से आई रिपोर्ट में ± 20.0 प्रतिशत एरर की दर से रिजल्ट शो हुआ और स्मार्टफोन से ली गई पिक की रिपोर्ट में ± 19.1प्रतिशत का एरर पाया गया। जिससे यह साबित हो गया कि अगर आप अल्ट्रासाउंड करवाने के  लिये नहीं जा सकते हैं तो आपका स्मार्ट फोन भी आपके हार्ट हेल्थ को बता सकता है।

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  • हिचकियां आचानक से शुरू होती है और लंबे वक्त तक लोगों के लिए परेशानी बनी रहती है. कई बार गले में कुछ फंस जाने या मौसम में होने वाले बदलाव के कारण हिचकी शुरू हो जाती है. इन हिचकियों से निजात पाने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे काफी असरदार साबित हो सकते हैं...

    काली मिर्च 
    अगर काफी लंबे समय से हिचकी से परेशान हैं तो काली मिर्च हिचकी रोकने में आपकी काफी मदद कर सकती है. हिचकी को रोकने के लिए तीन चार काली मिर्च के दाने और थोड़ी सी चीनी को मुंह में रख लें. इसे थोड़ी देर के लिए मुंह में रखें. इससे हिचकी थोड़ी देर में ही रुक जाएगी. 

    नींबू 
    नींबू हिचकी रोकने में काफी काम आ सकता है और ये घर में आसानी से मिल भी जाता है. कई बार देखा गया है कि एल्कोहॉल के सेवन से हिचकी शुरू हो जाती है. इसे रोकने के लिए नींबू का एक चौथाई टुकड़ा मुंह में डालें. इससे थोड़े समय बाद ही हिचकी बंद हो जाएगी.
     शहद 
    हिचकी रोकने के लिए शहद भी काफी काम की चीज है. हिचकियां जब शुरू होती है और रुकने का नाम भी न ले तो 1-2 चम्मच शदह खा लेना चाहिए. इससे तुंरत ही हिचकी आनी बंद हो जाती है.

    चॉकलेट पाउडर
    चॉकलेट तो हर किसी को पंसद है लेकिन चॉकलेट पाउडर हिचकी को रोकने में काफी असरदार साबित होती है. हिचकी के दौरान चॉकलेट पाउडर खाने से हिचकी रुक सकती है. अगर चॉकलेट पाउडर ना मिले तो कोई भी कैंडी खा सकते हो. ऐसा इसलिए कि इससे ध्यान भटके में मदद मिलेगी और हिचकी रुक जाएगी.

    चीनी
    हिचकियां रोकने के लिए चीनी भी काफी काम आ सकती है. जब भी हिचकी शुरू हो तो तुरंत एक चम्मच चीनी का सेवन करें. इससे थोड़ी देर में हिचकी आना बंद हो जाएगी.

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  • अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 1.6 प्रतिशत से 12.2 प्रतिशत तक बच्चों में एडीएचडी की समस्या पाई जाती है. अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर अथवा ध्यान की कमी और अत्यधिक सक्रियता की बीमारी को एडीएचडी कहा जाता है. एडीएचडी की समस्या ऐसे परिवारों में अधिक बिगड़ सकती है जहां घर में तनाव का वातावरण रहता है और जहां पढ़ाई पर अधिक जोर देने की प्रवृत्ति रहती है.

    इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के मुताबिक, एडीएचडी की समस्या ज्यादातर प्री-स्कूल या केजी कक्षाओं के बच्चों में होती है. कुछ बच्चों में, किशोरावस्था की शुरुआत में स्थिति खराब हो सकती है. यह वयस्कों में भी हो सकता है.

    आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि एडीएचडी वाले बच्चे बेहद सक्रिय और कुछ अन्य व्यवहारगत समस्याएं प्रदर्शित कर सकते हैं. उनकी देखभाल करना और उन्हें कुछ सिखाना मुश्किल हो जाता है. वे स्कूल में भी जल्दी फिट नहीं हो पाते हैं और कोई न कोई शरारत करते रहते हैं. यदि इस कंडीशन को शुरू में ही काबू न किया जाए तो यह जीवन में बाद में समस्याएं पैदा कर सकती हैं.

    उन्होंने कहा कि यद्यपि, एडीएचडी का कोई इलाज नहीं है, परंतु उपचार के लक्षणों को कम करने और ऐसे बच्चों की कार्यप्रणाली में सुधार के उपाय किए जा सकते हैं. कुछ उपचार विकल्पों में दवाएं, मनोचिकित्सा, शिक्षा या प्रशिक्षण या इनका मिश्रण शामिल है. एडीएचडी के लक्षणों को अक्सर तीन श्रेणियों में बांटा जाता है : ध्यान न देना, जरूरत से अधिक सक्रियता और असंतोष. चीनी, टीवी देखने, गरीबी या फूड एलर्जी से एडीएचडी नहीं होता.
    डॉ. अग्रवाल ने बताया कि शिक्षा, समर्थन और रचनात्मकता से ऐसे बच्चों में इस स्थिति का प्रबंधन करने में काफी मदद मिल सकती है. यद्यपि एडीएचडी वाले बच्चों के साथ ठीक से रह पाना एक चुनौती है, लेकिन समय को प्राथमिकता देने और हर चीज टाइम टेबल के हिसाब से करने पर मदद मिल सकती है. माता-पिता को यह याद रखना चाहिए कि एडीएचडी से आपके बच्चे की बुद्धि या क्षमता का पता नहीं चल पाता है. बच्चे की शक्तियों का पता लगाएं और बेहतर परिणामों के लिए उन शक्तियों पर ध्यान दें.

    एडीएचडी वाले बच्चों का प्रबंधन करने के उपाय :
    - रूटीन सेट करें : स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करें, ताकि हर कोई जान ले कि किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है.

    - पुरस्कार और इनाम : अच्छे काम पर प्रशंसा या पुरस्कार देने से सकारात्मक व्यवहार को मजबूत किया जा सकता है. अच्छे व्यवहार को बढ़ाने के लिए आप अंक या स्टार सिस्टम का उपयोग करने की कोशिश कर सकते हैं.

    - चेतावनी के संकेतों पर ध्यान दें : यदि ऐसा दिखे कि बच्चा आपा खो रहा है, तो उस पर ध्यान दें और उसे किसी अन्य गतिविधि में व्यस्त कर दें.

    - मित्रों को आमंत्रित करें : इससे बच्चे को मिलने-जुलने में आसानी होगी. लेकिन यह सुनिश्चित करें कि बच्चा स्वयं पर नियंत्रण न खोए.

    - नींद में सुधार करें : अपने बच्चे को अच्छी नींद सोने दें. सोने के समय उसे किसी रोमांचक गतिविधि में न उलझने दें.

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  • अजवाइन जिसे कैरम बीज या बिशप की घास के रूप में भी जाना जाता है. ये रसोईघर के मसालों में बहुत आम है. भारत में इसका खूब इस्तेमाल होता है. इतना ही नहीं, गर्भधारण के बाद महिलाओं को अजवाइन का पानी देने का एक प्रचलन रहा है क्योंकि यह माना जाता है कि इस पानी से सूजन में कमी आती है.
    नामक एक आवश्यक तेल होता है जो एंटीसेप्टिक होता है और इसमें एंटी इंफ्लेमेट्री गुण होते हैं. जो कि वजन कम करने में मदद करता है. आज हम आपको बता रहे हैं कैसे आप अजवाइन के सेवन से आसानी से वजन कम कर सकते हैं.
    अगर वजन कम करना है तो अजवाइन के पानी को उबाल कर पियें. यह वजन घटाने के लिए सबसे आसान उपाय है. इस पानी को तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगता है. इस पेय को बनाने के लिए, पैन में ताजा अजवाइन के दो चम्मच लें और इसे भूने. अब आप पैन में आधा लीटर पानी उबालें. भुना हुए अजवाइन के बीज को पानी में डाल दें. इसे कुछ और मिनटों के लिए उबाल लें. आप देखेंगे कि कुछ ही मिनटों में पानी का रंग भूरे रंग में बदलता है अब गैस से पानी को उतार लें और इसे ठंडा करें और फिर इसे पी लें.
    वजन घटाने में अजवाइन पानी का प्रभाव बढाने के लिए आप उसमें शहद भी जोड़ सकते हैं. एक गिलास पानी (250 मिलीलीटर) में 25 ग्राम अजवाइन बीजों को रात में भिगोएं. अगली सुबह, पानी के गिलास में शहद के एक चम्मच को मिलाएं. हर दिन एक गिलास खाली पेट पानी पीने से आपका वजन तीन महीने में कम हो सकता है.
    अजवाइन और सौंफ़ के बीज का पानी मिक्स करके पीने से भी फायदा होता है. इसके लिए भुने हुए अजवाइन का आधा चम्मच और भुनी हुई सौंफ के बीज के एक चम्मच को 4 कप पानी में मिला लें और इसे उबाल लें. जब तक आप रंग में कोई बदलाव नहीं देखते तब तक इस को मिश्रण उबालें. बाद में इसे गैस से हटा दें और इसे ठंडा कर दें. फिर आप इसे पियें.
    अगर आप अक्सर अजवाइन के बीज को रात में भिगोना भूल जाते हैं या सुबह-सुबह पीने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता है तो आप घर पर इस पाउडर बना सकते हैं. इसको बनाने के लिए अजवाइन, मेथी और निजेला बीज (काजूली) बराबर मात्रा में लें और उन्हें अलग से भुने.इन सभी तीनों को एक साथ मिला लें और इसे पिसकर एक मिश्रण तैयार कर लें. एक एयरटाइट कंटेनर में मिश्रण को स्टोर करें और सोने से पहले हर दिन गरम पानी के साथ एक चम्मच पाउडर खाएं.
    एक और आसान तरीका है कि आप अपने दैनिक दिनचर्या में अजवाइन को शामिल कर सकते हैं. 250 ग्राम अजवाइन बीज और सूखी भुनाएं. इसको ठंडा होने पर इसे एक एयरटाइट कंटेनर में संग्रहीत कर लें. सुबह में अपने नाश्ते से कम से कम आधे घंटे पहले एक चम्मच खायें. यदि आप कैरम के बीज के स्वाद को पसंद करते हैं तो आप इसे दिन के दूसरे समय पर भी ले सकते हैं, लेकिन भोजन से पहले ही लें. (एबीपी न्यूज़)

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  • नई दिल्ली। आत्महत्या का विचार किसी इंसान के अंदर तब आता है जब वह जिंदगी से निराश हो जाता है। जिसके कारण कई हो सकते हैं कि आप जिंदा होते हुए भी मरे के समान रहते हैं। लेकिन इस आर्टिकल के जरिये हम आपको एक ऐसी बात बताने जा रहे हैं जिससे आप सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या सच में आत्महत्या ही सारी मुश्किलों से निजात पाने का तरीका है।
    खुदकुशी की रोकथाम के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन एएएसआरए के निदेशक जॉनसन थोमस ने कहा कि आत्महत्या के विचार आने पर किसी करीबी के साथ बात को साझा करें।
    थोमस ने कहा कि अगर आपको खुदकुशी के विचार आ रहे हैं तो आपको किसी करीबी से बात साझा करनी चाहिए। जिस पर आप आंख मूंद कर यकीन कर सकें या फिर हेल्पलाइन या पेशेवर परामर्शदाता या मनोचिकित्सक से बात करनी चाहिए।
    उन्होंने कहा कि परिवार और दोस्तों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे आसपास हैं और वे उनसे प्यार करते हैं तथा समझते हैं। थोमस ने कहा कि परिवार और दोस्तों की सहानुभूति और फिक्र एक प्रियजन की खुदकुशी रोक सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक हर साल 800,000 लोग खुदकुशी करते हैं। इसके मुताबिक हर 40 सेकंड एक व्यक्ति अपनी जान देता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक भारत उन देशों में शामिल है जहां खुदकुशी की दर सबसे ज्यादा है।

    इस स्टोरी को पढ़ने के बाद आपको भी यकीन आ जायेगा कि चाहे दुख कैसा भी हो अगर आप दृढ़ निश्चय कर उससे लड़ने की हिम्मत जुटायेंगे तो खुदकुशी जैसा खयाल जहन में कभी नहीं आयेगा। यह स्टोरी है अंकुर बिंदल की। 
    वह महज 21 साल का था और इंजीनियरिंग के विषय पढ़ना उसके लिए मुश्किल था। इसके बाद नौकरी तलाशना और मुश्किल हो गया था। इस बीच उसकी प्रेमिका उसे छोड़कर चली गई। उस वक्त अंकुर बिंदल को एक ही समाधान दिख रहा था कि वह अपनी जिंदगी खत्म कर ले।
    अब कामयाब आईटी पेशेवर बन चुके अंकुर ने विश्व खुदकुशी रोकथाम दिवस पर बताया कि उसने इसके खिलाफ फैसला किया क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि पढ़ाई पूरी करने की उनकी मेहनत बेकार हो जाए और उन्होंने जीने का फैसला किया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह सब किसी से साझा करना चाहता था लेकिन आसपास कोई नहीं था। जिस व्यक्ति से मैं प्यार करता था वो मुझे छोड़ गया। उसने कभी पलट कर नहीं देखा। सारे दोस्त डिग्री पूरी करने या नौकरी करने में व्यस्त थे।’ 
    अंकुर ने 2009 की मंदी के दौरान नौकरी के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने कहा कि उनकी एक सोच थी कि अगर अभी जीवन खत्म करते हैं तो बीटेक की पढ़ाई पूरी करने में उन्होंने जो मेहनत की है वो बेकार चली जाएगी। आज अंकुर एक कामयाब आईटी इंजीनियर हैं।

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  • अक्सर हमने देखा है कि कुछ लोग अनिद्रा का शिकार हो जाते हैं। जिसका कारण मूलतः स्ट्रेस को बताया जाता है। अनिद्रा कई तरीके के रोगों को जन्म देती है जिनमें नाम शामिल है मोटापा और स्ट्रेस। स्ट्रेस और अनिद्रा दोनों ही एक दूसरे को जन्म देने के लिये जिम्मेदार हैं। कई बार नींद के लिये हम ऐसे स्लिपिंग पिल्स का भी उपयोग करने लग जाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है।
    यह रिसर्च उन लोगों के लिए एक अच्छी खबर लेकर आई है, जिनकी तनाव के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पाया कि गन्ने और अन्य प्राकृतिक उत्पादों में पाए जाने वाला एक सक्रिय तत्व तनाव को खत्म कर नींद बढ़ा देता है।
    जापान के एक स्लीप इंस्टीट्यूट के शोध में पाया गया कि वर्तमान में उपलब्ध नींद की गोलियां तनाव पर कोई असर नहीं करतीं और उनके काफी दुष्प्रभाव भी होते हैं। महेश कौशिक और जापान के त्सुकूबा विश्वविद्यालय के योशिहिरो उरादे के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पाया कि ऑक्टाकोसोनॉल तनाव को कम कर देता है और नींद को वापस सामान्य स्तर पर ले आता है।
    यह यौगिक पदार्थ विभिन्न दैनिक खाद्य पदार्थों, जैसे कि गन्ना, चावल की भूसी, गेहूं के बीज का तेल, मधुमक्खी मोम आदि में प्रचुर मात्रा में मौजूद है। पत्रिका 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित शोध के मुताबिक, खून के प्लाज्मा में कोर्टिकोस्टेरोन का स्तर बढ़ने से मानव में तनाव बढ़ता है।
    शोधकर्ताओं ने पाया कि ऑक्टाकोसैनल एक यौगिक पदार्थ है, जो गन्ने के रस में पाया जाता है। यह तनाव के कारण अनिंद्रा के उपचार के लिए उपयोगी हो सकता है।

    इस अध्ययन के लिये शोधकर्ताओं ने एक चूहे पर एक्सपेरीमेंट किया। वह चूहा स्ट्रेस की वजह से अनिद्रा का शिकार था।  ऑक्टाकोसैनल की मात्रा जैसे ही उसके शरीर में गई वह स्ट्रेस फ्री होकर सो गया। इस रिसर्च के आधार पर पता चला कि ऑक्टाकोसैनल कितना उपयोगी है हमारी नींद को बचाने के लिये। 

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  • नई दिल्ली : पके हुए केले के ढ़ेरो फायदों के बारे में आपको पता होगा और हो सकता है कि आप नियम से एक केला खाते भी हो. या फिर बनाना शेक पीते हों या स्मूदी. पका हुआ केला जहां चाव से खाया जाता है वहीं कच्चे केले का इस्तेमाल सिर्फ सब्जी और कोफ्ता बनाने में ही किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि आमतौर पर लोगों को इसके फायदों के बारे में पता ही नहीं होता.
    कच्चा केला पोटैशियम का खजाना होता है जो इम्यून सिस्टम को तो मजबूत बनाता है ही साथ ही ये शरीर को दिनभर एक्टि‍व भी बनाए रखता है. इसमें मौजूद विटामिन बी6, विटामिन सी कोशिकाओं को पोषण देने का काम करता है. कच्चे केले में सेहतमंद स्टार्च होता है और साथ ही एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी. ऐसे में नियमित रूप से एक कच्चा केला खाना बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है.
    कच्चा केला खाने के फायदे:

    1. वजन घटाने में मददगार
    वजन घटाने की कोशि‍श करने वालों को हर रोज एक केला खाने की सलाह दी जाती है. इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर्स पाए जाते हैं जो अनावश्यक फैट सेल्स और अशुद्धियों को साफ करने में मददगार होते हैं.

    2. कब्ज की समस्या में राहत
    कच्चे केले में फाइबर और हेल्दी स्टार्च होते हैं. जोकि आंतों में किसी भी तरह की अशुद्ध‍ि को जमने नहीं देते. ऐसे में अगर आपको अक्सर कब्ज की समस्या रहती है तो कच्चा केला खाना आपके लिए बहुत फायदेमंद रहेगा.

    3. भूख को शांत करने में
    कच्चे केले में मौजूद फाइबर्स और दूसरे कई पोषक तत्व भूख को नियंत्रित करने का काम करते हैं. कच्चा केला खाने से समय-समय पर भूख नहीं लगती है और हम जंक फूड और दूसरी अनहेल्दी चीजें खाने से बच जाते हैं.

    4. मधुमेह को कंट्रोल करने में मददगार
    अगर आपको मधुमेह की शिकायत है और ये अपने शुरुआती रूप में है तो अभी से कच्चा केला खाना शुरू कर दें. ये डायबिटीज कंट्रोल करने की अचूक औषधि है.

    5. पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मददगार
    कच्चे केले के नियमित सेवन से पाचन क्रिया बेहतर होती है. कच्चा केला खाने से पाचक रसों का स्त्रावण बेहतर तरीके से होता है.

    इसके अलावा कच्चा केला कई तरह के कैंसर से बचाव में भी सहायक है. कच्चे केले में मौजूद कैल्शियम हड्ड‍ियों को मजबूत बनाने में सहायक है और साथ ही ये मूड स्व‍िंग की समस्या में भी फायदेमंद है.(आजतक)

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  • ब्राजील के बाद भारत दुनिया में सबसे ज्यादा गन्ना उत्पादन करता है। गन्ने से बने चीनी और गुड़ के अलावा इसके जूस का भी खूब सेवन किया जाता है। गन्ने का जूस स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभकारी होता है। इसमें भारी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो हमारे पाचन तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तथा संक्रमण से भी बचने में सहायता करते हैं। गन्ने के जूस में आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और कई तरह के इलेक्ट्रोलाइट्स पाए जाते हैं जो शरीर के डिहाइड्रेशन के लिए बेहद जरूरी हैं। यह शरीर में प्रोटीन लेवल को बढ़ाने का काम करता है, साथ ही साथ बुखार, संक्रमण आदि से लड़ने में हमारी मदद भी करता है।
    गन्ने का जूस कई तरह की अन्य गंभीर बीमारियों में भी काफी लाभकारी है। आज हम आपको इसके कई सारे लाभ के बारे में बताने जा रहे हैं। गन्ने का जूस डाइयूटेरिक यानी कि मूत्रवर्धक होता है। यह शरीर में मूत्र संबंधी क्षेत्रों में संक्रमण होने से बचाता है। इसके अलावा किडनी में पथरी होने से भी बचाव करता है। किडनी के ठीक तरह से काम करने में भी गन्ने का जूस काफी सहायक होता है। गन्ने का जूस एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधि है। यह हमारे लीवर को शक्ति प्रदान करता है।
    पीलिया रोग के उन्मूलन में गन्ने के जूस का सेवन वरदान की तरह काम करता है। पीलिया में लीवर के ठीक तरह से काम न करने की वजह से शरीर के द्रवों में बिलरुबिन की अधिकता हो जाती है। इस वजह से हमारे शरीर की त्वचा पीली हो जाती है। ऐसे में गन्ने का जूस शरीर में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है जिससे पीलिया से उबरने में मदद मिलती है। गन्ने के जूसे का ग्लाइकेमिक इंडेक्स काफी कम होता है, इसलिए यह डायबिटीज को रोगियों के लिए बेहतरीन औषधि है। इसमें भारी मात्रा में खनिज तत्व पाए जाते हैं जिसकी वजह से यह दांतों की हर तरह की समस्या के लिए एक कारगर उपाय होता है। अगर आपकी सांसों से बदबू आती है तो आपको गन्ने के जूस का सेवन करना चाहिए। इससे बदबू से जल्द ही राहत मिल जाएगी। (जनसत्ता)

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  • नई दिल्ली : आमतौर पर 30 से 35 साल तक हड्डियों की डेंसिटी बढ़ती हैं. इस समय तक जो लोग हेल्दी डायट लेते हैं उनकी बोन हेल्थ बेहतर रहती है और बढ़ती उम्र में हड्डियों से संबंधित समस्याएं कम होती हैं. चलिए जानते हैं कौन सी हैबिट्स इंप्रूव करके आप हडि्डयों को मजबूत बना सकते हैं.
    मिल्क और मिल्क प्रोडक्ट को डायट में शामिल करें. इससे कैल्शियम की कमी पूरी होती है. दिन में कम से कम दो बार दूध पीएं. मिल्क रिलेटिड सप्लीमेंट्स लेने से बचें. दही, लस्सी, दूध, पनीर और व्हाइट एग जैसी चीजों का सेवन कर सकते हैं.ग्रीन वेजिटेबल्स का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें.जंक फूड को डायट से कम करें. कम से कम 6 दिन हेल्दी डायट लें.डिनर सोने से कम से कम 2 घंटे पहले करें.कम से कम एक घंटे की फीजिकल एक्टिविटी जरूर करें. फीजिकल एक्टिविटी आउटडोर होनी चाहिए.आजकल के युवा जिम करके और सप्लीमेंट्स लेकर बॉडी तो बना लेते हैं लेकिन उनकी बोन्स वीक हो जाती है. कम से कम हिप्स की बोन्स तो वीक होती ही हैं. इन सबसे दूर रहें. स्टेरॉयड जैसे सप्लीमेंट्स बिल्कुल एवॉइड करें.सुबह के समय धूप में बैठे. सुबह 7 बजे से 11 बजे के बीच शरीर पर जो धूप पड़ती है उससे विटामिन डी बनता है. आधा घंटा सन एक्सपोजर लेने से फायदा होता है. इसमें 40 पर्सेंट बॉडी एक्सपोज होना चाहिए.
    हडि्डया कमजोर होने के कारण-
    लोगों का धूप के संपर्क में ना आना.आउटडोर एक्टिविटी कम करना.हेल्दी फूड के बजाय जंकफूड ज्यादा खाना.डायबिटीज, किडनी प्रॉब्लम और फैमिली हिस्ट्री की वजह से भी हड्डियां कमजोर होती हैं. (एबीपी न्यूज़)


    नोट: ये एक्सपर्ट के दावे पर हैं. आप किसी भी सुझाव पर अमल या इलाज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें.

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  • नई दिल्ली, 8 September : भले ही आप जिम जाकर कितने भी फिट होने की कोशिश करें, लेकिन योग करने से जो एनर्जी आपको मिलती है. उससे आपका दिमाग भी तेजी से काम करने लगता है. एक नए रिसर्च में यह बात सामने आई है.  क्या कहती है रिसर्च- रिसर्च के मुताबिक, हठयोग करने से आप अपने जीवन में बहुत से बड़े बदलाव देख सकते हैं. कनाडा के ओंटारियो की वॉटरलू यूनिवसिर्टी के एसोसिएट प्रोफेसर पिटर हाल ने ही में बताया है कि हठयोग 25 मिनट करने से दिमाग तेजी से काम करने लगता है.  क्या कहते हैं एक्सपर्ट- प्रोफेसर पिटर के अनुसार वैस्टर्न कंट्रीज में सबसे ज्यादा लोग हठयोग ही करते हैं. जिससे वे लोग खुद को बहुत फिट महसूस करते हैं. पिटर कहते हैं कि हठयोग के फायदे लेने के लिए कम से कम रोज 25 मिनट इसको जरुर करना चाहिए. हठयोग और मेडिटेशन दोनों करने से दिमाग तो तेजी से चलने लगता ही, साथ ही में आपकी लाइफ स्टाइल में भी तेजी से बदलाव आता है. जो लोग लाइफ में किसी गोल को लेकर आगे बढ़ रहे हैं उनमें पॉजिटिविटी एनर्जी हठयोग करने से आती है. साथ ही गोल तक पहुंचने की उनकी क्षमता तेज हो जाती है.  हठयोग के फायदे- हठयोग में आसन, प्राणायाम और ध्यान तीनों को ही किया जाता है जिससे बॉडी तो फिट होती ही है साथ में मेडिटेशन करने से दिमाग को आराम भी मिलता है. हठयोग आपके इमोशन को भी कंट्रोल करने का काम करता है. रोज हठयोग करने से आप बीमारियों से मुक्त भी हो सकते हैं. हठयोग करने से बैक बोन लचीली बनती है. हठयोग आपके हार्ट से लेकर सांसों और ब्लड सर्कुलेशन को तेज करता है. बॉडी का प्यूरीफिकेशन करता है, जिससे शारीरिक परेशानियां दूर होती है. (एबीपी न्यूज़)

    नोट: ये रिसर्च के दावे पर हैं. आप किसी भी सुझाव पर अमल या इलाज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें.

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  • ब्रेड, चिप्स और आलू को ज्यादा पकाने से बचिए। फूड वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे कैंसर होने का खतरा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्टार्च वाला खाना जब बहुत ज्यादा तापमान पर और ज्यादा देर तक सेंका, भुना, तला या ग्रिल किया जाता है तो उसमें एक्रिलामाइड नाम का रसायन पैदा होता है।
    एक्रिलामाइड अलग अलग तरह के खाने में मौजूद होता है। और ये खाना बनाते समय स्वाभाविक रूप से पैदा होता है। यह उन भोजन में सबसे अधिक पाया जाता है जिनमें शर्करा अधिक होता है और जो 120 डिग्री सेल्सियस तक पकाए जाते हैं। जैसे कि चिप्स, ब्रेड, सुबह नाश्ते की दालें, बिस्किट, क्रैक्स, केक और कॉफी।
    दरअसल जब ब्रेड को हम टोस्ट करने के लिए ग्रिल करते हैं तो उसमें ज्यादा मात्रा में एक्रिलामाइड बनते हैं। टोस्ट का रंग जितना गहरा होगा उसमें उतनी अधिक मात्रा में एक्रिलामाइड बनेंगे। ब्रेड जब भूरा होने लगता है तो उसमें मौजूद शर्करा, एमीनो एसिड और पानी मिलकर रंग और एक्रिलामाइड बनाते हैं। और इसी से सुगंध भी पैदा होती है।
    फूड स्टैंडर्स एजेंसी (एफएसए) ने खाना बनाने से जुड़े निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करने और खाने को भूरा होने तक भुनने या पकाने से बचने की सलाह दी है। हालांकि कैंसर रिसर्च से जुड़ी प्रवक्ता का कहना है कि गहरे लाल भुने खानों से कैंसर होने की पुष्टि अभी इंसानों में नहीं हुई है।
    टोस्ट के पांच शेड में से सबसे कम सिंके हुए टोस्ट में कम एक्रिलामाइड होता है। जानवरों के साथ किए गए शोध बताते हैं कि यह रसायन डीनए के लिए विषैला होता है और इससे कैंसर पैदा करता है। हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है पर वैज्ञानिकों ने इसे इंसानों के लिए भी हानिकारक माना है।
    एक्रिलामाइड से कैंसर का खतरा होने के साथ साथ, तंत्रिका और प्रजनन तंत्र पर भी हानिकारक असर हो सकता है। एफएसए ने ये भी चेतावनी दी है कि आलू को फ्रिज में ना रखें। क्योंकि कम तापमान में रहने से इसमें मौजूद शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। फिर जब इसे पकाया जाता है तब उसमें हानिकारक एक्रिलामाइड पैदा होते हैं। (बीबीसी)

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