कारोबार

  • जोसफ बर्नाड
    नई दिल्ली, 23 जुलाई। आरबीआई अब मार्केट में छोटे नोटों की सप्लाई बढ़ाएगा। मार्केट में अब 50, 100 और 500 रुपये के नोटों की सप्लाई बढ़ेगी। अगस्त अंत तक 200 रुपये के नए नोट भी मार्केट में आ सकते हैं। बैंकिग सूत्रों का कहना है कि छोटे नोटों की संख्या बढ़ाने का मतलब 2000 रुपये के नोट को बाहर का रास्ता दिखाने की शुरुआत हो सकती है। एसबीआई अपने एटीएम रीकैलिब्रेट कर रहा है, ताकि 500 रुपये के नोटों को ज्यादा जगह मिले।
    वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 11 अप्रैल को नोटों की छपाई के लिए प्रॉडक्शन प्लानिंग की बैठक हुई थी। बैठक में रिजर्व बैंक ने 2000 के सौ करोड़ नोट छापने का प्रस्ताव रखा था, मगर वित्त मंत्रालय ने 2000 के नोट छापने का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया था। हालांकि बाकी छोटे नोट छापने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार छोटे नोटों की सप्लाइ बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसके 2 फायदे हैं। एक, जाली मुद्रा की साजिश पर लगाम लगेगी। दूसरा, सरकार चाहती है कि लोग कैश की जगह कार्ड से पेमेंट ज्यादा करें। बड़े नोट की कमी होने से लोगों को बड़ी राशि का कैश से पेमेंट करने में दिक्कत आएगी। ऐसे में वे ऑनलाइन या कार्ड से पेमेंट करेंगे। इससे कैशलेस इकॉनमी को बढ़ावा मिलेगा।
    पिछले कुछ हफ्तों से एटीएम में 2000 रुपये के नोट की कमी देखी जा रही है। सूत्रों के अनुसार आरबीआई ने पिछले कुछ हफ्तों से बैंकों को 2 हजार रुपये के नोटों की कम आपूर्ति की है। इस कारण बैंक अब एटीएम में भी 2000 के नोट को कम भर रहे हैं। ऐसे में लग रहा है कि एटीएम से 2000 रुपये के नोट की जगह खत्म की जा रही है। इसके अलावा यह भी आशंका जताई जा रही है कि पिछले साल नवंबर में नोटबंदी के ऐलान के तुरंत बाद आरबीआई ने 2000 रुपये के नोट छापने शुरू किए थे और हो सकता है कि अब इनकी सप्लाइ ऐसे लेवल पर पहुंच गई हो, जिससे आरबीआई असहज महसूस कर रहा हो। यह कम वैल्यू के नोट ज्यादा प्रिंट करने की सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा होगा। आरबीआई जल्द 200 रुपये के नोट जारी कर सकता है। 
    रेवेन्यू सेक्रेटरी हसमुख अढिया का कहना है कि हम चाहते हैं कि भारत जल्द से जल्द कैशलेस इकॉनमी बने। सरकार जो भी कदम उठा रही है, उसके पीछे इकॉनमी ग्रोथ में तेजी, ब्लैक मनी पर अंकुश और वित्तीय घाटे को एक निश्चित दायरे में रखना लक्ष्य है। ऐसा तभी हो पाएगा, जब लोग कैश की जगह ऑनलाइन पेमेंट करेंगे। इससे टैक्स चोरी कम होगी।
    एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, देश में लोग अब छोटी करंसी का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। बड़े नोटों के इस्तेमाल में कमी आने का सबसे ज्यादा फायदा 100 रुपये के नोट के यूज में दिखा है। नोटबंदी लागू होने से पहले 100 रुपये के नोट का इस्तेमाल कुल करंसी में 9.6 फीसदी था, जो बढ़कर 20.3 फीसदी हो गया है। डिमोनेटाइजेशन एंड कैश एफिशंसी नामक रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल इस्तेमाल किए जा रहे कुल नोट में 500 और 100 रुपये की हिस्सेदारी 86.3फीसदी थी, जो फिलहाल 72.4 फीसदी रह गई है। एसबीआई के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर नीरज व्यास ने कहा, च्अभी हमें आरबीआई से हाई वैल्यू करंसी में 500 रुपये के नोट मिल रहे हैं। दो हजार रुपये के नोट हमारे काउंटर्स पर रीसर्कुलेशन के जरिए आ रहे हैं। एसबीआई के देश में लगभग 58,000 एटीएम हैं। एसबीआई ने अपने कुछ एटीएम में 2000 रुपये के नोटों के करंसी कैसेट्स को 500 रुपये के नोटों के लिए रीकैलिब्रेट भी किया है ताकि एटीएम में ज्यादा कैश रखा जा सके। इस मामले में कॉमेंट के लिए आरबीआई को भेजी गए ईमेल का जवाब नहीं मिला। (नवभारत टाईम्स)

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  • अमनदीप सिंह

    नई दिल्ली. जिसे आप चिकन मोमोज या फिर मटन मोमोज समझकर खा रहे हैं कहीं उसमें कुत्ते का मीट तो नहीं है? जी हां, दिल्ली कैंट में मोमोज की दुकानों को बंद करा दिया गया है। कैंट बोर्ड के सीईओ का कहना है कि कंप्लेंट आ रही थी कि मोमोज वाले कुत्ते का मीट मिलाकर मोमोज बेच रहे थे। यह एक हैरान करने वाली खबर है। इसपर हमने दिल्ली के कई रेस्ट्रॉन्ट और बूचड़खानों के मालिकों से बात की और जाना कि क्या ऐसा करना संभव है?

    एक रेस्तरां ओनर ने बताया कि कुछ टाइम पहले ऐसा ही एक मामला गुड़गांव में भी सामने आया था। पॉश इलाकों से पालतू कुत्ते गायब हो रहे थे। ऐसे में स्थानीय लोगों को शक है कि अवैध बूचड़खानों के बंद होने के कारण इन कुत्तों को शिकार बनाया जा रहा है और मोमोज, बिरयानी और कबाब में कुत्तों के मीट का इस्तेमाल किया जा रहा है। ओनर का कहना है कि ऐसा दिल्ली में भी हो सकता है। रोड साइड स्टॉल लगाने वाले मोमोज वाले ऐसा कर सकते हैं। ये वैसे भी अवैध रूप से चल रहे हैं। 20 रुपये में 8 पीस (चिकन) मोमोज के मिलते हैं। इसमें वो चिकन के पंजों के अलावा सोया का इस्तेमाल करते हैं। मुर्गा मंडियों में पंजों का रेट काफी सस्ता होता है। ऐसे में चिकन के नाम पर इनका यूज होता है। कुत्ते का मीट आम नहीं बिकता। न ही कोई दिल्ली में कोई बेच सकता है। ऐसे में यह काम छुपकर किया जाता होगा। कुत्ते के मीट को पकड़ पाना काफी मुश्किल होता है। उन्होंने कहा कि इसकी जांच होनी चाहिए।

    वहीं एक बूचड़खाने के मालिक ने बताया कि मोमोज वाले मंडियों से ही पूरा माल उठाते हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली में औसतन 70 हजार से ज्यादा मुर्गे दिल्ली में रोजाना काटे जाते हैं। इसमें बढ़िया क्वॉलिटी से लेकर बचा हुआ मांस सब बिक जाता है। बचे हुए मांस की कीमत काफी कम होती है। जिसका इस्तेमाल मोमोज या फिर कबाब में मिक्स करने के लिए किया जाता है। कुत्ते का मीट मिक्स करना कोई मुश्किल काम नहीं है। उन्होंने बताया कि कई बार विदेशी इंडिया में आकर कुत्ते के मीट की डिमांड करते हैं। इसको पूरा करने के लिए कुछ लोग आवारा कुत्तों का शिकार करते हैं। लेकिन दिल्ली में ऐसा होना काफी कठिन है। उन्होंने बताया कि लोगों से मिल रही शिकायतों को फूड अथॉरिटी को गंभीरता से लेना चाहिए। बार-बार कुत्ते का मीट का इस्तेमाल की शिकायतें मिल रही हैँ। इसके पीछे कौन लोग हैं इसका पता लगाना जरूरी है। उन्होंने बताया कि कुत्ते का मांस ज्यादा दिन तक फ्रेश रहता है।

    जानकारी के मुताबिक एशियाई देशों में मांस के अवैध कारोबार के लिए एक अनुमान है कि हर साल 20 लाख कुत्तों को मारा जा रहा है। वियतनाम में एक कुत्ता करीब 60 डॉलर में बिकता है। यहां कुत्ते का मांस बहुत खाया जाता है। पिछले कुछ सालों से पूरे एशिया में कुत्ते के मांस का अवैध कारोबार बढ़ कर करोड़ों डॉलर तक जा पहुंचा है। (नवभारत टाइम्स)

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  • नई दिल्ली. कंपनियों को पिछले साल के रेवन्यू के आधार पर रैकिंग देने वाले फॉर्चून ग्लोबल 500 की लिस्ट में इस बार एशियाई कंपनियों का कब्जा है। एशिया महाद्वीप से इस लिस्ट में 197 कंपनियां हैं। एशिया ने उत्तर अमेरिका (145), यूरोप (143) को पीछे छोड़ दिया है। अगर बाकी दुनिया की बात करें तो वहां से सिर्फ 15 कंपनियां ही इस लिस्ट में जगह बना पाई हैं।

    अगर देशों की बात करें तो अमेरिका अभी भी सबसे ज्यादा कंपनियों के साथ पहले नंबर पर है। यूएस की 132 कंपनियों ने इस लिस्ट में जगह बनाई है वहीं चीन 109 कंपनियों के साथ जल्द ही अमेरिका को टक्कर देने को तैयार है। 51 कंपनियों के साथ एशियाई देश जापान तीसरे नंबर पर है। अन्य एशियाई देशों की बात करें तो जापान के बाद दक्षिण कोरिया की 15 कंपनियां इस लिस्ट में हैं और भारत की 7 कंपनियां फॉर्चून ग्लोबल 500 में हैं।

    टॉप 10

    भारत की 7 कंपनियों में से केवल एक कंपनी इंडियन ऑइल ही टॉप 200 में जगह बना पाई है। फॉर्चून ग्लोबल 500 में अन्य भारतीय कंपनियां हैं- रिलायंस इंडस्ट्रीज (203), स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (217), टाटा मोटर्स (247), राजेश एक्सपोर्ट्स (295), भारत पेट्रोलियम (360) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (384)।

    वॉलमार्ट सबसे ज्यादा रेवन्यू (4,85,873 डॉलर) के साथ पहले नंबर पर है। अगले तीन पोजिशन्स पर चीनी कंपनियों- स्टेट ग्रिड, सिनोपेक और चाइना पेट्रोलियम का कब्जा है। फॉर्चून ग्लोबल 500 लिस्ट में भले ही चीन का दबदबा सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों के कारण है लेकिन अब चीन की प्राइवेट कंपनियां भी इस लिस्ट में जगह बना पाने में कामयाब हो रही हैं। (टाइम्स न्यूज नेटवर्क)

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  • नई दिल्ली, 21 जुलाई। आजकल की भागती दौड़ती जिंदगी में लोग समय कम होने के कारण सोशल मीडिया के माध्यम से न्यूज से रुबरु होते हैं। जिसमें ज्यादातर लोग फेसबुक के माध्यम से खबरों को पढ़ते हैं। ऐसे में ये खबर फेसबुक यूजर्स को थोड़ा परेशान कर सकती है। क्योंकि बड़े मीडिया संस्था की खबरों को पढऩे के लिए आपको पैसे देने पड़ सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के इसके लिए फेसबुक न्यूज सब्सक्रिप्शन सर्विस शुरू कर सकता है। 
    फेसबुक के सोशल न्यूज पार्टनरशिप के हेड कैम्पबेल ब्राउन ने बताया कि यह फीचर अक्टूबर 2017 तक शुरू किया जा सकता है। ब्राउन ने बताया कि अक्टूबर से फेसुबक न्यूज फीड में दिखने वाले खबरों की संख्या 10 करने वाला है। इसके बाद फेसबुक न्यूज के लिए यूजर्स को पब्लिशर्स के होमपेज पर भेजेगा जहां उसे सब्सक्रिप्शन लेना होगा।
    मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार फेसबुक पर फ्री में पढ़े जाने वाले आर्टिकल की लिमिट सेट करने के लिए फेसबुक जल्द ही टेस्टिंग करने वाला है। इससे फेसबुक एक तय लिमिट के बाद न्यूज पढऩे वालों से ज्यादा खबरें पढऩे के लिए पैसे चार्ज करेगा।
    द स्ट्रीट अखबार के अनुसार फेसबुक एक पे वॉल पर काम कर रहा है, जिसकी मदद से जिनके साथ फेसबुक का एग्रीमेंट होगा वही पोस्ट कर पाएगा। यह सर्विस दो साल पहले गूगल के एएमपी को टक्कर देने के लिए शुरू की गई थी। गूगल एएमपी चुनिंदा मीडिया समूहों की खबरों को मोबाइल वेब ब्राउजिंग के लिए ऑप्टिमाइज करता है।
    इस समय फेसबुक न्यूज का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। ऐसे में मीडिया संस्थान और पब्लिशर्स हाउस ने फेसबुक से शिकायत की है कि उन्हें फेसबुक पर खबरों को शेयर करने से उन्हें नुकान झेलना पड़ रहा है। हालांकि फेसबुक की तरफ से इसको लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। (टेलीग्राफ)

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  • बेंगलूरु। प्रमुख आईटी सेवा कंपनी इन्फोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने अपने दूसरे कार्यकाल के बाद 2014 में इस सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी को छोड़ने के निर्णय को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल करार दिया है। उसी दौरान उन्होंने कंपनी की कमान गैर-संस्थापक प्रबंधन एवं बोर्ड को सौंप दी थी। अपनी सेवानिवृत्ति के दो साल बाद जून 2013 में मूर्ति ने दोबारा इस सॉफ्टवेयर निर्यातक कंपनी की कमान संभाली थी क्योंकि तत्कालीन सीईओ एवं सह-संस्थापक एसडी शिबुलाल उनकी दृष्टि इन्फोसिस 3.0 को लागू करने और अनिश्चितता के माहौल में वृद्धि के लिए संघर्ष कर रही थी ।
    मूर्ति ने अपने बेटे रोहन मूर्ति की मदद से कंपनी को पुनर्गठित किया जो उनके कार्यकारी सहायक के तौर पर कंपनी से जुड़े थे। इसके तहत मूर्ति ने लागत में कटौती, उत्पादकता बढ़ाने और ग्राहकों के साथ संबंध को पुनर्जीवित करने पर ध्यान केंद्रित किया था। करीब एक साल तक चले इस अभियान के दौरान वी बालकृष्णन एवं अशोक वेमुरी सहित ऐसे आठ शीर्ष अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया जो शीर्ष पद के लिए शिबुलाल का उत्तराधिकारी बन सकते थे।
    मूर्ति ने बाहर से किसी सीईओ को नियुक्त कर उनके हाथों में इन्फोसिस की कमान सौंपने के लिए भी तैयार हो गए। इसी क्रम में सैप के पूर्व बोर्ड सदस्य विशाल सिक्का को नियुक्त कर कंपनी के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी गई। उसके बाद मूर्ति और उनके बेटे रोहन ने इन्फोसिस के सात सह-संस्थापकों में से अंतिम दो सह-संस्थापकों एस गोपालकृष्णन और वाइस चेयरमैन शिबुलाल के साथ कंपनी से बाहर होने का निर्णय लिया।
    मूर्ति ने सीएनबीसी टीवी18 समाचार चैनल से बातचीत में कहा, 'आप जानते हैं कि 2014 में हमारे कई सह-संस्थापक साथियों ने मुझसे इन्फोसिस को न छोडऩे और कुछ साल और बरकरार रहने के लिए कहा था। सामान्य तौर पर मैं काफी भावुक व्यक्ति हूं और हमारे अधिकतर निर्णय आदर्शवाद पर आधारित हैं लेकिन मुझे संभवत: अपने साथियों को सुनना चाहिए था।' उस समय मूर्ति ने जोर देकर कहा था कि वह कंपनी में अपनी भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने 1981 में अपनी भूमिका शुरू की थी और इन्फोसिस को सॉफ्टवेयर निर्यात करने वाली भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी के तौर पर स्थापित कर दिया। मूर्ति ने इस बाबत जानकारी के लिए भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया।
    जब कंपनी की कमान सिक्का को सौंपी जा रही थी तो इन्फोसिस ने देखा कि उसका चेयरमैन केवी कामथ ने एशियाई विकास बैंक से जुड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया और जून 2015 में आर शेषशायी को नियुक्त किया गया। इस प्रकार कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी गैर-संस्थापक सदस्यों वाले बोर्ड और प्रबंधन को दी गई। लेकिन सबकुछ सही नहीं रहा। पिछले साल से ही मूर्ति कंपनी प्रशासन संबंधी मुद्दों पर चिंता जताने लगे। 
    कंपनी के पूर्व सीएफओ राजीव बंसल और महाधिवक्ता डेविड केनेडी को कंपनी छोड़ने छोडऩे के लिए दिए गए भारीभड़कम पैकेज को लेकर मूर्ति ने चिंता जताई और उन्होंने कंपनी प्रशाशन में चूक को लेकर वर्तमान बोर्ड के चेयरमैन शेषशायी के इस्तीफे की मांग भी कर दी। हालांकि शेषशायी ने कहा कि बोर्ड सभी शेयरधारकों का ट्रस्टी है और कंपनी ने मूर्ति के आग्रह पर इन्फोसिस मेंं उनके पूर्व साथी डीएन प्रहलाद को बोर्ड में शामिल कर लिया। इसके अलावा एक अन्य बोर्ड सदस्य रवि वेंकटेशन को सह-चेयरमैन के तौर पर पदोन्नति दी गई। साथ ही कंपनी ने अपनी नीतियों में भी बदलाव करते हुए कहा कि वह खुलासा संबंधी सभी प्रावधानों का अनुपालन करेगी और कहीं अधिक पारदर्शी बनेगी। हालिया सालाना आम बैठक में इन्फोसिस के शेयरधारकों ने कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए सिक्का के नजरिये का समर्थन किया लेकिन मूर्ति की चिंताओंं पर भी गौर करने के लिए कहा। मूर्ति के शब्दों में कहें तो आंधी अभी थमी नहीं है। (बिजनेस स्टैंडर्ड)

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