राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम- राजपथ-जनपथ : पुनिया को सीडी की खबर थी...

Posted Date : 06-Nov-2017

सेक्स-सीडी कांड से कांग्रेस पल्ला जरूर झाड़ रही है, लेकिन पार्टी के अंदरखाने में यह चर्चा है कि कुछ राष्ट्रीय नेताओं को इसकी भनक पहले से थी। सुनते हैं कि करीब चार माह पहले तत्कालीन प्रदेश प्रभारी के समक्ष यह मामला आया था। लेकिन वे बिना जांच पड़ताल के किसी नेता के निजी मामले को उजागर करने के खिलाफ थे। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। चर्चा यह है कि उनके बदलने के बाद कुछ लोगों ने नए प्रभारी को भी इससे अवगत कराया। वे भी इसे उजागर करने के तौर तरीके से सहमत नहीं रहे हैं, लेकिन मामले का पर्दाफाश होने के बाद उन्होंने मदद जरूर की। चर्चा है कि सुबह 4 बजे उन्हें पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई। वे तुरंत बिना समय गंवाए दो वकील गाजियाबाद थाने भेजे, साथ ही अपने समर्थकों को भी पत्रकार की गिरफ्तारी के खिलाफ आगे किया। देखते ही देखते सौ-डेढ़ सौ लोग वहां पहुंच गए। लेकिन केंद्र और राज्य के नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने यह पार्टी लाइन तय की, कि सीडी कांड को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाएगा।

सावधानी में ही समझदारी
नए-नए मोबाइल फोन बदलने का शौक रखने वाले लोगों को कुछ सावधानी भी बरतनी चाहिए। उसमें कहां कौन सी फोटो या मैसेज बिना डिलीट किए बच गए हैं इसका ध्यान कई लोग नहीं रख पाते। ऐसे में लोग रायपुर का एक चर्चित किस्सा बताते हैं कि किस तरह एक प्रमुख व्यक्ति नए फोन में सिम लगाकर, पुराना हैंडसेट घर छोड़कर चले गए, और जब बीवी ने उसमें अपना सिम लगाया, तो पति के अलग-अलग लोगों से आए गए मैसेज देखे, और फिर किस तरह दो महिलाओं में बंगले के बाहर कुश्ती की नौबत आई। तबसे अब तक फोन के फीचर भी बहुत बढ़ गए हैं, और अब तो हैंडसेट और मैसेंजर सर्विस ऐसी हो गई हैं कि उन्हें किसी दूसरे फोन या कम्प्यूटर पर भी देखा जा सकता है। इसलिए सावधानी में ही समझदारी है।

योगीराज किस तरफ जाएंगे?
कवर्धा राजघराने के मुखिया पूर्व विधायक योगीराज सिंह कांग्रेस से बाहर हैं। पिछले दिनों वे प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से मिलने गए, तो काफी सुर्खियां बटोरी। यह कहा जाने लगा कि वे फिर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। जबकि जोगी कांग्रेस से जुड़े लोग अपना बताकर कवर्धा से प्रत्याशी के रूप में प्रचारित कर रहे थे। लेकिन दो दिन बाद वे मुख्यमंत्री से मिलने पहुंच गए। अब लोग पूछ रहे हैं कि  आखिर वे किसके साथ हैं? कांग्रेस में उनका भविष्य नहीं हैं। वजह यह है कि पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर को वहां से दोबारा टिकट मिलना तय है। वे मामूली वोटों से हारे थे। मौजूदा विधायक की टिकट काट भाजपा भी अपने साथ जोडऩे का जोखिम नहीं उठा सकती है। अब चूंकि वे दोनों जगह हो आए हैं इसलिए जनता कांग्रेस भी उन्हें प्रत्याशी बनाएगी, इसमें संदेह है। 


रविशंकर पहले स्वागत विहार आएं
देश के एक स्वघोषित अतिरिक्त सम्मान वाले श्रीश्री रविशंकर ने अभी अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए मुस्लिम और हिन्दू समुदायों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की है। लेकिन दोनों ही तबकों ने उनकी दखल खारिज कर दी है, क्योंकि सबको मालूम है कि जो अपने कार्यक्रम के लिए यमुना के तट को बर्बाद करके जा सकता है, और फिर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का जुर्माना पटाने से मना कर सकता है, वह अयोध्या में क्या करके निकलेगा। इस बीच छत्तीसगढ़ में लोगों का यह सोचना है कि उनकी मध्यस्थता की इतनी ही ताकत और हसरत है तो वे रायपुर के स्वागत विहार में आकर वहां अपने भक्तों द्वारा लोगों को लूटने के मामले में मध्यस्थता करके दिखा दें। यहां पर रविशंकर के नाम की दुकान चलाने वाले लोगों ने ही स्वागत विहार में सैकड़ों लोगों को सैकड़ों करोड़ का चूना लगाया है, और सरकारी जमीन पर भी कब्जा किया है। रविशंकर को यहां आना चाहिए, और सरकार, अपने भूमाफिया भक्तों, और लुटे हुए लोगों के बीच मध्यस्थता करनी चाहिए, और ऐसा करने के बाद हो सकता है कि उनकी इतनी साख बन जाए कि लोग उन्हें अयोध्या में भी मंजूर कर लें। स्वागत विहार के लुटे हुए लोगों को भी चाहिए कि रविशंकर को खबर भेजें कि उनके नाम पर की गई धोखाधड़ी और जालसाजी को निपटाने के लिए पहले रायपुर आएं।


फिर प्रेतनी-बाधा?
दामाद को बचाने के लिए करोड़ों रूपए खर्च करके प्रेतनी-बाधा खत्म करवाने वाले ससुर अब फिर परेशान हैं क्योंकि फिर प्रेतनी-बाधा की खबरें आ रही हैं, और हर कुछ बरस में वे कब तक यह खर्च करते रहेंगे? 


अति किसी भी काम की बुरी
अफसरों के आत्मप्रचार को देख-देखकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह बड़े खफा हैं। अभी एक बड़े अफसर पर उन्होंने एक मेहरबानी की, और इसका नतीजा यह निकला कि कई दिनों तक वह अफसर अखबारों में मुख्यमंत्री से अधिक जगह पाते रहा, और हकीकत मुख्यमंत्री को अच्छी तरह मालूम थी। जानकार लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री और उनके आसपास के लोग यह जानते हैं कि इस तरह का प्रचार किन मकसदों से किया जाता है। और राज्य के भीतर तो ऐसा मकसद इस प्रचार से गड़बड़ा ही गया है, पद्मश्री की तैयारी में भी इससे गड़बड़ी हो सकती है। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि किसी भी काम में अति नुकसानदेह होती है। सार्वजनिक जीवन में प्रचार की जरूरत और उसका हक नेताओं को ही रहना चाहिए, न कि अफसरों को।


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