राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम- राजपथ-जनपथ : बार्सिलोना में लोग छत्तीसगढ़ी बोलने लगेंगे

Posted Date : 07-Nov-2017

करीब साल भर पहले आवास पर्यावरण मंत्री के साथ नया रायपुर के सीईओ रजत कुमार, संजय शुक्ला, सलिल श्रीवास्तव सहित बहुत से अफसर पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत के साथ स्मार्ट सिटी की मिसाल देखने स्पेन के शहर बार्सिलोना गए थे। इसे स्पेन शहर का दूसरा सबसे घना म्युनिसिपल कहा गया है, और छोटे से दायरे में 16 लाख की आबादी रहती है। यह शहर स्पेन के कैटालोनिया प्रांत में पड़ता है जिसने कि अभी-अभी अपने-आपको स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया है, और स्पेन में इस अलगाव को मानने से इंकार करते हुए इसे अपना हिस्सा मानना जारी रखा है। लेकिन आज इस चर्चा का मकसद स्पेन के इतिहास, वर्तमान, और भविष्य की चर्चा नहीं है, छत्तीसगढ़ के शहरों की चर्चा है जिन्हें कि स्मार्ट बनाने के लिए यहां के मंत्री और अफसर दुनिया भर घूम रहे हैं। 
उस वक्त नया रायपुर के प्रभारी मंत्री अपने अफसरों के साथ बार्सिलोना हो आए, और अब नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल अपने कई अफसरों के साथ उसी शहर को देखने जा रहे हैं। उनकी टीम में उनके अपने शहर बिलासपुर के म्युनिसिपल कमिश्नर सौमिल चौबे, रायपुर के म्युनिसिपल कमिश्नर रजत बंसल, के अलावा नया रायपुर के नए सीईओ मुकेश बंसल भी शामिल हैं। हो सकता है कि इस जिज्ञासु टीम के पहुंचने के पहले कैटालोनिया एक नया राष्ट्र बन जाए, और यह टीम एक नया देश घूमना बता सके, लेकिन उस वक्त की टीम, और इस बार की टीम के दौरों के बीच बिलासपुर और रायपुर के बहुत से घूरों से कचरा भी नहीं उठा है, और बार्सिलोना में साल भर पहले का कचरा उठाने का कोई तजुर्बा स्पेनिश लोग बांट भी नहीं पाएंगे। इस दौरान डॉलर का रेट जरूर बदला होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ के शहरों में कचरे का हाल तो जरा भी नहीं बदला है। और जहां तक नया रायपुर का सवाल है, तो वहां तो कचरा पैदा करने वाली आबादी है नहीं, और इसलिए कचरा भी नहीं है। अब पिछले तजुर्बे से इस बार के तजुर्बे तक क्या फर्क पड़ेगा, यह अंदाज लगाना हमारे लिए तो आसान नहीं है। छत्तीसगढ़ की सरकारी टीमें अपने साथ यहां का घूरा भी ले जातीं, तो कचरा कुछ घट सकता था। एक-दो टीम और चली जाएं तो बार्सिलोना में लोग छत्तीसगढ़ी बोलने लगेंगे। और वहां के होटल के कारोबारी कहने लगेंगे- छत्तिसगढिय़ा सबले बढिय़ा।

बैस के सितारे गर्दिश में
पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस के सितारे गर्दिश में हैं। वे भाजपा के चुनिंदा सांसदों में है जो सबसे ज्यादा बार चुनाव जीते हैं। अटल सरकार में मंत्री रहे बैस को तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई। पार्टी के कुछ नेता इसके लिए बैस को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। वे पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में मोदी विरोधी खेमा यानी सुषमा स्वराज के नजदीकी रहे हैं। सुनते हैं कि पहली बार उनके लिए ठीक से लाबिंग नहीं हो पाई थी। सुषमाजी अपने लिए विदेश मंत्रालय चाह रही थी और उन्हें इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। 
पार्टी सुषमाजी को विदेश के बजाय मानव संसाधन मंत्रालय देना चाह रही थी। ऐसे खींचतान के बीच वे अपने नजदीकी बैस और राजीव प्रताप रूडी के लिए ठीक से प्रयास नहीं कर पाई। दोनों को जगह नहीं मिल पाई। इसके बाद भी रूडी तो पार्टी लाईन में चलते रहे लेकिन बैस थोड़े भटक गए। चर्चा है कि उन्होंने कोल ब्लॉक आबंटन-घोटाले से जुड़े 4 सवाल पूछ लिए। इसके बाद केन्द्रीय नेतृत्व की  भौंहें तन गई। बाकी काम राज्य संगठन ने पूरा कर दिया। संगठन के प्रमुख पदाधिकारी ने हाईकमान को बताया कि कैसे विधानसभा चुनाव के वक्त बैसजी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी करते हैं। छत्तीसगढ़ अकेले गुजराती विधायक, और भाजपा के तेज-तर्रार नेता देवजी पटेल रमेश बैस के इलाके से, उनकी जाति के अधिक वोट वाले इलाके से बैस की 'वजह से' नहीं जीतते, बल्कि उनके 'बावजूद' जीतते हैं।
यह भी बताया गया कि बैस सिर्फ अपने परिवार और दूरदराज के रिश्तेदारों के लिए ही पद चाहते रहे हैं। बस फिर क्या था, उन्हें मंत्री बनाना तो दूर कोर ग्रुप से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि बैसजी को आगामी टिकट के भी लाले पडेंग़े। क्योंकि इसी तरह के तौर-तरीकों के चलते अहमदाबाद के लगातार आठ बार के सांसद हिरेन पाठक की एक झटके में टिकट काट दी गई थी। उनकी टिकट के लिए पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज आखिरी तक कोशिश करते रहे लेकिन उन्हें टिकट दिला पाना संभव नहीं हो पाया।

मेहनती और निकम्मों का फर्क
सरकार कई बार ईमानदार नीयत से भी संवैधानिक संस्थाओं में लोगों को नियुक्त करती है, और वे अपने मिजाज के मुताबिक काम अच्छा करते हैं, और नहीं भी करते हैं। अब जैसे बिलासपुर के उपभोक्ता फोरम में एक वक्त दो-दो महीने बाद की पेशी दी जा रही थी, तीन-तीन बरस  फैसले नहीं हो रहे थे, हजार के करीब मामले कतार में खड़े थे। वहां कुर्सियों पर लोग बदले, नए किस्म के दिल-दिमाग आए, तो काम रफ्तार से चल निकला और निपटारा होने लगा, लोगों को इंसाफ मिलने लगा। राजधानी रायपुर में कई ऐसे आयोग हैं जिनकी कुर्सियों पर बैठे लोग यह तय कर लेते हैं कि उन्हें कोई काम नहीं करना है। और वे इसके लिए बड़े ही मौलिक तरीके भी ढूंढ लेते हैं, कभी वे बाकी सदस्य नहीं बनने देते, कभी वे कर्मचारियों की कुर्सी खाली रखवाते हैं ताकि उस बहाने से काम न करें। इसलिए राज्य सरकार को लोगों पर मेहरबानी करने की नीयत से उनकी नियुक्ति के बजाय ऐसे ईमानदार और मेहनती लोगों को ही संवैधानिक कुर्सियों पर बिठाना चाहिए जो इतना काम करें, ऐसा काम करें, कि फिर चाहे उससे राज्य सरकार को दिक्कत होने की नौबत आए, तो आए। सरकार की ताकत को यह भी समझना चाहिए कि अगर उसकी गलतियों को पकड़कर सही राह दिखाने वाले संवैधानिक आयोग सारे वक्त अच्छी तरह काम करेंगे, तो सरकार उतनी बुरी हो भी नहीं सकेगी कि वह अगला चुनाव हार जाए।

मरीन ड्राइव पर बोफोर्स तोप लगी 
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तालाब के किनारे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट ने बीस लाख से अधिक की लागत से मोर रायपुर का लोगो खड़ा किया है ताकि उसके सामने खड़े होकर लोग तस्वीर खिंचवा सकें, और सेल्फी ले सकें। लेकिन पहले इसकी लागत सामने नहीं आई थी। अब जब 20 लाख से अधिक की लागत सामने आई है, तो लोग इसे बोफोर्स तोप मानकर इसके सामने तस्वीर ले रहे हैं। जिन नए लोगों को, यानी पिछले 20 बरस में होश संभालने वाले लोगों को यह याद नहीं होगा कि बोफोर्स का इस लोगो से क्या लेना-देना है, उन्हें बता देना ठीक होगा कि एक वक्त जब राजीव गांधी की सरकार में बोफोर्स तोप खरीदी में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था, तो बरसों तक बोफोर्स शब्द भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बन गया था। उस वक्त छत्तीसगढ़ के गांव के एक किसान ने शहर आकर कलेक्टर से शिकायत की थी, तो कहा था- हमर गांव पंचायत में बोफोर्स हो गे हे साहब...।
एक लोगो की इतनी बड़ी, 20 लाख 60 हजार की लागत ने उसे तोप बना दिया है। अब खोजी लोग पता लगा सकते हैं कि इस बोफोर्स में किसको-किसको क्या मिला है? और यह पता लगाना तो आसान है कि इसकी लागत कितनी होगी क्योंकि यह तो खुले में खड़ा ढांचा है।   rajpathjanpath@gmail.com


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