राजपथ - जनपथ

राजपथ - जनपथ छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर कॉलम : राजपथ-जनपथ - बुरे वक्त पर अच्छी पहचान होती है

Posted Date : 09-Nov-2017

पूर्व मंत्री हेमचंद यादव गंभीर बीमारी से उबर रहे हैं। पिछले छह महीने उनके लिए काफी तकलीफदेह रहे। उन्हें रायपुर से लेकर मुंबई तक बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े। वे सरकार में 10 साल मंत्री रहे, लेकिन इलाज के लिए पैसे जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अलावा सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और अजय चंद्राकर ने उदारता पूर्वक मदद की और अभी भी सहयोग कर रहे हैं। हेमचंद सरकार में मलाईदार जल संसाधन, ग्रामीण विकास, उच्च शिक्षा, खाद्य और परिवहन मंत्रालय संभाल चुके हैं। उनके मंत्री रहते करीबियों ने जमकर मौज की, लेकिन हेमचंद खुद फक्कड़ के फक्कड़ बने रहे।  उन्होंने अपने नजदीकी मित्रों का भरपूर ख्याल रखा। मसलन, अजय चंद्राकर के चुनाव हारने के बाद उन्हें मंत्री न रहने की कमी नहीं महसूस होने दी। हेमचंद का अपने विभाग प्रमुखों को अलिखित आदेश था कि अजय के आदेशों का हर हाल में पालन किया जाए। सिंचाई ठेकों में बृजमोहन की भी सिफारिश सुनते थे। हालांकि अजय और बृजमोहन व प्रेमप्रकाश अभी भी उनका पूरा ख्याल रखते हैं। लेकिन उनके नजदीकी लोग उस नेता को याद कर रहे हैं जो कि हेमचंद के परिवहन मंत्री रहते अघोषित तौर पर विभाग चलाया करते थे। हमेशा बोरियों में भरकर माल ले जाते थे और अपना कारोबार नांदगांव से लेकर रायपुर तक फैलाया। राजधानी रायपुर में उसी काली कमाई से एक बड़ा सा अस्पताल तक खोल लिया, लेकिन हेमचंद की बीमारी की खबर पाने के बाद मिलना तो दूर एक फोन तक नहीं किया। कहते हैं कि बुरे वक्त में अपने-पराए की पहचान हो जाती है। शायद हेमचंद को हो गई है...। 

बाफना से पिटा अफसर नशे में नहीं था...
कवर्धा के बगल ही साजा विधानसभा क्षेत्र है जहां पर भाजपा विधायक लाभचंद बाफना ने पिछले चुनाव में नदियां बहाकर वोटरों को रविन्द्र चौबे तक पहुंचने से किसी तरह रोक लिया था, और इसके बाद नदी और बांध सबका खर्च निकालने के लिए उनकी तरह-तरह की चर्चा सामने आते रहती हैं। कुछ हफ्ते पहले उनके भाई ने अपने ट्रांसपोर्ट के धंधे को लेकर आरटीओ के अफसर को बुरी तरह पीटा। और उस पर नशे में होने का आरोप भी लगा दिया। जख्मी अफसर थाने में घंटों बैठे रहा, लेकिन गृहमंत्री से संबद्ध संसदीय सचिव लाभचंद बाफना के भाई पर जुर्म कायम करना पुलिस के बस का था नहीं, इसलिए कोई रिपोर्ट नहीं हुई, यह जरूरी हुआ कि उस अफसर को ही अटैच कर दिया गया। अब उस अफसर की मेडिकल जांच रिपोर्ट आ गई है, और उसमें उसका नशे में न होना पाया गया है। अब देखना है कि उस अफसर को सजा देने का और कौन सा तरीका ढूंढा जाता है, और जहां तक संसदीय सचिव के भाई का सवाल है, वह अफसरों को तो पीट सकता है, लेकिन अगले चुनाव में अगर लाभचंद के वोटर उसे वोट देने से इंकार करेंगे, तो उनमें से यह भाई कितने लोगों को पीट सकेगा? 


मीडिया को दुश्मन समझते कलेक्टर
बिलासपुर कलेक्टर पी. दयानंद की कल वहां के मीडिया के लोगों से झड़प हो गई। कलेक्टर के जनदर्शन से एक फोटोग्राफर को उन्होंने अपने गनमैन से बाहर निकलवा दिया, तो मीडिया स्थानीय मंत्री अमर अग्रवाल तक पहुंचा। मीडिया के साथ ऐसा सुलूक करने वाले वे अकेले कलेक्टर नहीं हैं। प्रदेश में कई और कलेक्टर ऐसे हैं जो कि मीडिया को हिकारत से देखते हैं, और उनसे बात करना जरूरी नहीं समझते। इस प्रदेश में सुनील कुमार और विवेक ढांड जैसे कलेक्टर रहे, जो कि मुख्य सचिव बनने तक लगातार मीडिया से अच्छे संबंधों के लिए जाने जाते रहे, और यह संबंध उनकी खुद की जानकारी का एक बहुत ही संपन्न श्रोत रहा। उन्हें मीडिया से अपने जिले, या अपने विभाग से लेकर, अपने पूरे प्रदेश-प्रशासन तक की जानकारी मिलती रही। और ये दोनों ही मुख्य सचिव बनने के बाद भी अपने व्यस्त समय में से रोजाना कुछ समय मीडिया के लिए निकालते रहे, और उससे उनका अपना कामकाज अच्छा चलता रहा। इन दोनों की शुरूआत छत्तीसगढ़ के ऐसे जिलों से हुई जो कि उस वक्त केवल जिले थे। आज तो यह प्रदेश छोटा हो गया है, जिले और छोटे-छोटे हो गए हैं, उस समय एसडीएम जितनी जगह प्रशासन करते थे, आज कलेक्टरों को बस उतना ही इलाका मिलता है, लेकिन फिर भी उनके तेवर जिलों में रहते हुए मुख्य सचिवों से भी ऊपर हो गए हैं। कई जिले हो गए हैं जहां कलेक्टर मीडिया के लोगों से बात करना पसंद नहीं करते। राज्य सरकार को कलेक्टरों के ऐसे तेवर से कितना नुकसान हो रहा है यह बात सत्तारूढ़ पार्टी के लोग लगातार सत्ता में कुछ जगहों पर बताते आए हैं, और पता नहीं उसका असर पहले होता है, या कि विधानसभा के चुनाव पहले होते हैं। हैरानी यह है कि रमन सिंह से लेकर अमन सिंह तक मीडिया से अच्छे संबंध रखने में भरोसा रखते हैं, और ऐसे संबंध रखते भी हैं। वे वीडियो कांफ्रेंस से लेकर कलेक्टर कांफ्रेंस तक मीडिया से बर्ताव के बारे में कह भी चुके हैं, लेकिन जिला कलेक्टरी की कुर्सी कई लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। एक केन्द्रीय मंत्री के निजी सहायक ने अभी एक कलेक्टर के बारे में कहा कि उनके दरबार में नेताओं के अलावा बाकी सबकी बात सुनी जाती है। 

आईएफएस की ऑपरेशन घरवापिसी
राज्य में जितने आईएएस अफसर नए-नए सचिव बने हैं, और जिस तरह कुछ विशेष सचिवों को भी विभागों का स्वतंत्र जिम्मा दिया गया है, उसके हिसाब से राज्य में विभाग कम पडऩे वाले हैं। इसी महीने किसी समय दो और सचिव स्तर के अफसर, मनिंदर कौर द्विवेदी और गौरव द्विवेदी भी सात साल राज्य के बाहर रहकर अब लौट रहे हैं, और उन्हें भी कोई न कोई विभाग या उस स्तर का जिम्मा दिया जाएगा। ऐसे में इसका सबसे पहला शिकार आईएफएस अफसर होंगे जो कि इस प्रदेश में शुरू से ही बड़ी जिम्मेदारी के सचिव बने हुए हैं, और मंत्रालय के बाहर भी जिनके पास बड़े महत्वपूर्ण ओहदे चले आ रहे हैं। वन विभाग में अभी कुछ हफ्ते पहले तक बैठने को कमरे नहीं बचे थे, लेकिन अब ऐसे परदेशियों के लिए विभाग का नया महलनुमा दफ्तर तैयार है जिसमें सभी को जगह मिल सकती है। पूरे देश में छत्तीसगढ़ जितना महत्व आईएफएस अधिकारियों को और कहीं नहीं मिला। और यह भी बड़ा अजीब विरोधाभास रहा कि राज्य के जंगलों में लंबे समय से नक्सलियों का राज रहा, और जंगल अफसर मंत्रालय संभालते रहे। 
मुख्य सचिव विवेक ढांढ की पहली पसंद आईएफएस बताए जाते थे, और उनके कार्यकाल के अंत के पहले ही यह ऑपरेशन घरवापिसी तय मानी जा रही है। हालांकि खुद विवेक ढांढ मुख्य सचिव की कुर्सी से उठकर किस दिन रेरा प्रमुख की कुर्सी पर बैठ जाएंगे, या मुख्य सूचना आयुक्त बन जाएंगे, इसकी अटकल लगते-लगते अब बुरी तरह थक चुकी है।   rajpathjanpath@gmail.com


Related Post

Comments