राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ - अपने ही वकीलों से धोखा

Posted Date : 10-Nov-2017

राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में नए डीजी के सुब्रमणियम के आने के बाद कामकाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। पीसीसीएफ स्तर के अफसर सुब्रमणियम की गिनती बेहद ईमानदार और काबिल अफसरों में होती है। वे मुख्यमंत्री के सचिव रह चुके हैं। खुद कई दफा उनके कामकाज की मुख्यमंत्री प्रशंसा कर चुके हैं। लेकिन चर्चा है कि परिषद में कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए सुब्रमणियम को काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। उनसे पहले डीजी की जिम्मेदारी एक प्रोफेसर संभाल रहे थे, जो अपनी धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा के चलते वहां पर लंबे समय तक काबिज रहे। 
 कहा जा रहा है कि उनके कार्यकाल में काफी अनाप-शनाप काम हुए। परिषद का मूल काम ही नहीं हो रहा था। यही नहीं, उन्होंने बिना विज्ञापन जारी किए 14 कर्मचारियों की भर्ती कर दी और निकल लिए। चर्चा है कि नए डीजी ने जब इन कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो रोकने के लिए भारी दबाव भी पडऩे लगे। बावजूद वे रूके नहीं और कार्रवाई कर दी। इसके खिलाफ कर्मचारी हाईकोर्ट चले गए। कोर्ट में परिषद की तरफ से पैरवी कर रहे सरकारी वकीलों ने डीजी और मातहत अधिकारियों को इसकी सूचना तक नहीं दी। इसके बाद न सिर्फ कार्रवाई रूक गई बल्कि  बकाया भुगतान भी करना पड़ा। सुनते हैं कि इस पूरे प्रकरण में कर्मचारियों को भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला। सरकारी वकीलों की हरकत से खफा सुब्रमणियम ने सरकार को कड़ी चिट्ठी लिखी है। अब नए सिरे से जवाब पेश करने की तैयारी हो रही है। अब इस पूरे प्रकरण को देखकर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि बाड़ ही खेत चरने लग जाए तो क्या किया जा सकता है....। 

जो नौकरी में नहीं सुधार पाए, वे अब...
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सुधार की कोशिशें बहुत ही मजेदार है। राज्य बनने के बाद पहले मुख्य सचिव अरूण कुमार के बारे में यह हकीकत मध्यप्रदेश के वक्त से हर आईएएस बच्चे-बच्चे जानते थे कि एक बार फाईल उनके कमरे में गई, तो फिर उसके निकलने की संभावना नहीं रहती। लेकिन जब राज्य बना तब उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद नौकरशाही की गौरवशाली परंपरा के अनुरूप उन्होंने भी पुनर्वास के लिए जान लड़ा दी। उस वक्त मुख्यमंत्री के सचिव रहे सुनील कुमार का जीना हराम कर दिया कि उनके लिए कुछ करवाया जाए। ऐसे में महीनों की मजबूरी के बाद मुख्यमंत्री अजीत जोगी के दस्तखत से अरूण कुमार को एक बरस का पुनर्वास मिला, और उन्हें प्रशासनिक सुधार का काम दिया। जिसने जिंदगी भर खुद प्रशासन की सबसे खराब मिसाल पेश की, वह अब सरकारी सहूलियतों और वेतन-भत्तों पर प्रशासनिक सुधार करने चला। 
आज इस वक्त राज्य में इसी तरह की एक और कोशिश हो रही है। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक राज्य प्रशासनिक सुधार आयोग बनाया है जिसके अध्यक्ष रिटायर्ड चीफ सेक्रेटरी एस.के. मिश्रा हैं। सुयोग्य मिश्रा एक अच्छे चीफ सेक्रेटरी रह चुके हैं, लेकिन उनके मातहत प्रशासन का जो हाल था, उसमें वे शायद ही कोई सुधार कर पाए, बस अपनी मेज पर आने वाले कागज जरूर वे ठीक से देख लेते थे। उनकी अगुवाई में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के साथ मिलकर आज रायपुर में प्रशासनिक सुधार के उपायों पर गंभीर विचार-मंथन रखा गया है। इसमें प्रदेश के मौजूदा और रिटायर्ड कई आईएएस अफसर शामिल होने जा रहे हैं जिनमें से कुछ आईएएस से रिटायर होने के बाद राज्य सरकार के मनोनीत कुछ पदों पर बैठे हैं, और कुछ मनोनयन के इंतजार की कतार में हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिन्होंने अपनी पूरी नौकरी में सुधार नहीं किया, वे आज कौन सा करिश्मा कर दिखाएंगे? प्रशासनिक सुधार के लिए तो आम जनता से सलाह लेनी चाहिए जिसकी पूरी जिंदगी सरकारी दफ्तरों के धक्के खाते, रिश्वत देते, हताश होकर लौटते गुजरती है, जैसे कि टीवी के एक सीरियल में मुसद्दीलाल के साथ होता है। अब अफसरों और रिटायर्ड अफसरों का हाल यह है कि वे लुटी-पिटी जनता से प्रशासनिक सुधार पर सलाह का हक भी छीन चुके हैं, और अपनी नाकामी की बुनियाद पर वे आज अपने पुनर्वास-रोजगार की इमारत खड़ी कर चुके हैं।  

ऐसे आदर्श वाला कॉलेज कैसा होगा?
दुर्ग के एक बड़े नामी-गिरामी कॉलेज के इश्तहारों में एक मृतक की फोटो छप रही है, क्योंकि वह कॉलेज के संचालक का बेटा है। अब उसकी हत्या का जो मुकदमा चल रहा है, उसमें हत्यारे की बीवी का वह लंबा-चौड़ा बयान पुलिस और अदालत में दर्ज है कि मृतक किस तरह अपनी इस कर्मचारी रह चुकी महिला का सेक्स-शोषण करना चाहता था, इसके लिए लगातार उस पर दबाव बनाया हुआ था। संचालक अपने बेटे की स्मृति में विज्ञापनों में या कॉलेज में उसकी तस्वीरों का जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल करें, लेकिन लोग इस बात पर हैरान हैं कि कर्मचारी के सेक्स-शोषण और जबरिया देह संबंध बनाने के कानूनी बयान के बाद भी ऐसे व्यक्ति की तस्वीरें वाले इश्तहारों से कॉलेज की किस तरह की साख बनेगी? 

जहां चाहे जा सकते हैं दुर्ग एसपी
दुर्ग एसपी अमरेश मिश्रा की सीबीआई में पोस्टिंग तय है, लेकिन गृह विभाग ने अब तक एनओसी नहीं दी है। सुनते हैं कि सरकार और मिश्रा, दोनों को ही इसकी हड़बड़ी नहीं है। अमरेश का अब तक का कैरियर बेहतर रहा है और वे आईबी में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर काम कर चुके हैं। वे प्रशासनिक और राजनीतिक पकड़ के मामले में भी भारी पड़ते हैं। पुलिस महकमे में यह माना जाता है कि दुर्ग के आईजी दीपांशु काबरा के अधिकार क्षेत्र में बाकी जिले तो आते हैं, दुर्ग जिला नहीं आता। अमरेश मिश्रा को डीजीपी ए.एन. उपाध्याय की सीधी पसंद भी माना जाता है, और इसीलिए उनके खिलाफ दुर्ग जिले से उठने वाली बहुत सी शिकायतों का कोई असर कहीं नहीं होता। यह बात दुर्ग में जगजाहिर है कि किस तरह उन्होंने अपने दफ्तर में आई भाजपा की एक वकील के साथ कैसा सुलूक किया, और उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा। संघ से लेकर कांग्रेस और भाजपा के कई बड़े नेताओं से उनके संपर्क रहे हैं। ऐसे में वे जब चाहे, जहां जाना चाहते हैं वे जा सकते हैं। 


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