राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ - अगले एक चुनाव में अफसरों को टिकट

Posted Date : 11-Nov-2017

सरकारी कामकाज में कामयाबी की कहानियों को अपनी निजी कामयाबी बताते हुए अफसरों को देख-देखकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह थक गए हैं। बताया जाता है कि उन्होंने अपने करीबी लोगों से कहा है कि ऐसे सभी प्रचारप्रेमी अफसरों से अगले राज्यसभा चुनाव के पहले इस्तीफा ले लिया जाए कि उन्हें टिकट मिलने की संभावना है। और उसके बाद जब विधानसभा चुनाव निपट जाएं, तो इन्हें म्युनिसिपल चुनावों में एक-एक वार्ड का टिकट दिया जाए ताकि वे प्रचार की अपनी हसरत पूरी कर सकें। ऐसा पता चला है कि ऐसे अफसरी-प्रचार की कतरनों की फाईलें बनाने के लिए जनसंपर्क विभाग में एक कर्मचारी को लगाया गया है। 
सीएम सरकारी अस्पताल में दादा बने
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सांसद बेटे अभिषेक सिंह की पत्नी ऐश्वर्या सिंह को राजधानी के अंबेडकर सरकारी अस्पताल में कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। जब प्रदेश के मुखिया सरकारी अस्पताल जाए तो बाकी लोगों का भरोसा भी सरकारी इलाज पर हो सकता है। वैसे तो अपने-अपने वक्त गवर्नर शेखर दत्त भी इलाज के लिए इस अस्पताल गए थे, और मौजूदा गवर्नर बलरामजी दास टंडन भी कुछ समय पहले इलाज के लिए यहां गए हैं। मुख्य सचिव विवेक ढांड भी यहां इलाज करवा चुके हैं। और अब मुख्यमंत्री-सांसद के परिवार की अगली पीढ़ी का जन्म यहां होना अस्पताल पर भरोसा बढ़ाता है। 
चेंबर चुनाव में जातिगत राजनीति 
 देश-प्रदेश में राजनीतिक चुनाव में खास तौर पर जातिगत समीकरण हावी रहता है। सवर्ण, दलित, पिछड़ा, सिंधी, गुजराती, मराठी के आधार पर अक्सर टिकट का बंटवारा होता है। वोट को लेकर भी इसी तरह की बात सामने आती है। राजनीति में यह दांव-पेंच चलता रहता है। अब यही समीकरण छत्तीसगढ़ के चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनाव में बनने लगा है। जाति के आधार पर प्रत्याशी खड़े किए जा रहे हंै। जिस वर्ग के व्यापारी ज्यादा हैं, वहां से अधिक प्रत्याशी चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। चेंबर चुनाव में इस तरह की राजनीति पहली बार देखने में आ रही है। माना जा रहा है कि चेंबर की राजनीति अब वोटों के आधार पर चलेगी, क्योंकि आगे विधानसभा चुनाव है।
सीएम के गृहनगर में परेशानियां
मुख्यमंत्री के गृहनगर कवर्धा में जाहिर है कि उनकी पसंद का जिला कलेक्टर भेजा गया। लेकिन कल के दो हादसे ऐसे रहे जिनसे मुख्यमंत्री का परेशान होना स्वाभाविक है, और जरूरी भी है। एक सफाई कर्मचारी ने अपने पालिका अध्यक्ष पर पैसे लेने और न लौटाने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की, और उसे लाकर अब राजधानी रायपुर में बुरी तरह जली हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया है। कहा जाता है कि उसने सारे अफसरों को पहले इस बारे में लिखकर दिया हुआ था। दूसरी घटना हुई है कवर्धा जिले में ही एक जनपद पंचायत में अध्यक्ष सहित 22 जनपद सदस्यों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया, उनका आरोप है कि जनपद सीईओ (सरकारी अफसर) उनकी बात नहीं सुनती हैं, और वे यह बात पहले कलेक्टर को बता चुके हैं। प्रदेश में कई कलेक्टर बस्तर से नाम कमाकर निकलते हैं, लेकिन मैदानी इलाकों में आकर उन्हें ऐसी जनता का सामना करना पड़ता है जिसके मुंह में जुबान है, और जिन इलाकों के नेता भी चुप नहीं रहते हैं। ऐसे में कवर्धा सहित कई जिले अचानक प्रशासनिक चुनौती झेल रहे हैं। एक तीसरी बात राजनीतिक है, जो कि कलेक्टर से सीधी जुड़ी हुई नहीं है, लेकिन फिर भी प्रशासन के हाल का एक संकेत जरूर है। वहां से परास्त कांग्रेस प्रत्याशी मो. अकबर ने अपने अकेले के दम पर पार्टी की एक सभा वहां रखवाई। जनाधिकार रैली नाम के इस कार्यक्रम में जैसी भारी भीड़ जुटी, उसे देखकर भाजपा तो भाजपा, खुद कांग्रेस हक्का-बक्का रह गई। अब कवर्धा न सिर्फ मुख्यमंत्री का गृहनगर है, बल्कि वह उनके सांसद बेटे अभिषेक सिंह की संसदीय सीट का हिस्सा भी है। 
साफ छुपती भी नहीं...
आज कांग्रेस की विधायक डॉ. रेणु जोगी कल किधर जाएंगी इस बारे में लोगों को अधिक असमंजस नहीं है, लेकिन फिर भी जब कभी उनके अपने पति और पुत्र की पार्टी, जोगी कांग्रेस में जाने की बात उठती है तो वे एक मंजी हुई डिप्लोमैट की तरह यह कहकर चुप हो जाती हैं कि वे कल भी कांग्रेस में थीं, और आज भी कांग्रेस में हैं। वे कल कहां रहेंगी इसके बारे में कुछ कहती नहीं है। नतीजा यह है कि कांग्रेस पार्टी ठीक से कोई कार्रवाई भी नहीं कर पा रही है, और अनदेखा भी नहीं कर पा रही है। उनके बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है- साफ छुपती भी नहीं, सामने आती भी नहीं। 
वहां अंडरग्राऊंड,  यहां ओवरग्राऊंड
बिलासपुर और रायपुर के जो लोग एक-दूसरे के शहर में आना-जाना करते हैं, वे तकलीफ भरी हँसी के साथ यह बात बांटते हैं कि बिलासपुर को अंडरग्राऊंड ने तबाह कर दिया, और रायपुर को ओवरग्राऊंड ने। बिलासपुर शहर की खुदाई उस वक्त से चल रही है जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदाई शुरू हुई थी। वहां तो हजारों बरस पुरानी एक सभ्यता का पता लगा था, बिलासपुर में खुदाई तब से चल रही है जब वहां के ताकतवर मंत्री और सरकार के अकेले नुमाइंदे अमर अग्रवाल बच्चे थे, और गड्ढे में गिर गए थे। रायपुर में ओवरग्राऊंड स्काईवॉक का काम ऐसा लंबा खिंच रहा है, और थम गया है कि लोग डर रहे हैं कि यह भी बिलासपुर न बन जाए। अखबारों की खबरें हमेशा नुकसान पहुंचाने नहीं होतीं, उनसे सबक लिया जाए, तो वे हार बचाने वाली भी हो सकती हैं।

 


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