राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सरकार में रहते कमाया, अब...

Posted Date : 04-Dec-2017

सरकार में काम कर चुके कई अफसरों ने अपनी सेवा अवधि के दौरान राज्य में अकूत धन संपत्ति बनाई है। इन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे लेकिन बाल बांका नहीं हो पाया। रिटायर होने के बाद कुछ अपने गृह राज्य में शिफ्ट हो चुके हैं या फिर होने की तैयारी कर रहे हैं। पहले उन्होंने यहां सरकार में पद पाने की कोशिश की थी। लेकिन इसमें अब तक सफलता नहीं मिल पाई। अब ये काली कमाई से जुटाई संपत्तियों को निकालने के फेर में हैं। 
सुनते हैं कि एसीएस रहे एक अफसर अपने आलीशान मकान को बेचने के लिए प्रयासरत हैं। वीआईपी रोड स्थित उनके मकान की कीमत ढाई करोड़ रखी गई है। यहां लिफ्ट भी लगी हैं। इसी तरह एक रिटायर पुलिस अफसर भी वीआईपी रोड सहित अन्य जगहों पर स्थित अपनी जमीन को निकालने के लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि ये संपत्तियां उनके करीबी रिश्तेदारों के नाम पर हैं। इन संपत्तियों को बेचने के लिए कई लोग प्रयासरत हैं, जिसमें पुलिस विभाग के लोग भी शामिल बताए जाते हैं। भले ही ये  मकान या जमीन काली कमाई से जुटाई गई है लेकिन दाम ऊंचा चाह रहे हैं। सो, इन सौदों में दिक्कत आ रही है। लेकिन यह लिस्ट बड़ी लंबी है, और छत्तीसगढ़ के कुछ लोगों ने दूसरे लोगों के नाम पर जो बड़ी-बड़ी जमीनें ले रखी हैं, वे उनसे वापिस पा सकेंगे या नहीं इसमें भी शक है। फिर भोपाल में मौजूद इनकमटैक्स के एक बड़े अफसर ने छत्तीसगढ़ में मौजूद अपने संपर्कों से अनुरोध किया है कि ऐसी बेनामी जमीनों की जानकारी देकर सरकार की मदद करें, और इनकी कीमत के अनुपात में ईनाम भी गोपनीयता के साथ-साथ पाएं। अखबारों में कम तनख्वाह पाने वाले कई लोगों के पास ऐसी बहुत सी जानकारी है, और वे कालाधन खत्म करने के राष्ट्रीय अभियान में मदद भी कर सकते हैं, देश की भी, और अपनी खुद की भी।


कांग्रेस में बदलाव बाकी?
विधानसभा चुनाव में सालभर से भी कम समय बाकी है लेकिन प्रदेश कांग्रेस अभी भी बदलाव के दौर से गुजर रही है। पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने अध्यक्ष बदलने की मुहिम छेड़ दी है। रोज नए-नए फार्मूले सुझाए जा रहे हैं। एक फार्मूला फिर से पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव को अध्यक्ष और भूपेश बघेल को नेता प्रतिपक्ष की कमान देने का सुझाव दिया गया है। सुनते हैं कि पार्टी में इस फार्मूले पर गंभीरता से मंथन भी हो रहा है और पार्टी के कई नेताओं का दावा है कि इस माह के अंत तक फैसला हो सकता है। हालांकि, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू और पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा के भी अध्यक्ष की दौड़ में होने की चर्चा है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रभारी सचिव ने अनौपचारिक चर्चा में यह साफ कर दिया था कि जिन चेहरों को आजमाया जा चुका है, उन पर पार्टी दांव नहीं लगाएगी।  

उसे बसाने, इसे बचाने की तरकीब
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में साल के हर दिन कोई न कोई धरना-प्रदर्शन चलता ही रहता है। बहुत से दिन तो ऐसे रहते हैं कि एक-एक दिन में कई-कई आंदोलन होते हैं, सड़कों को जगह-जगह बंद कर दिया जाता है, और पुलिस-प्रशासन के अफसर उस दिन केवल आंदोलन से ही जूझते हैं, अपने दफ्तरों का कोई काम नहीं कर पाते। अब स्टेडियम के किनारे जिस जगह पर पार्किंग होनी थी, वह जगह तो धरने के लिए छोटी पडऩे लगी। इसलिए अब ऐतिहासिक हिन्द स्पोर्टिंग मैदान को नया धरनास्थल बना दिया गया है। वहां एक साथ कई धरने शुरू हो गए हैं, इसलिए पूरे मैदान में गड्ढे खोदकर, बल्लियों से उसके अलग-अलग हिस्से कर दिए गए हैं, ठेलों के मेले लग गए हैं, और गंदगी भी शुरू हो गई है। एक और नतीजा यह है कि धरनास्थल से मुख्यमंत्री निवास या राजभवन आते-जाते जुलूस अब शहर की और दो किलोमीटर सड़क पर रास्ता बंद कर देंगे। लोकतंत्र में आंदोलनों की जगह जरूरी है, लेकिन साथ-साथ शहर के ढांचे में शहर के जीने और सांस लेने की जगह भी जरूरी है। जिस मैदान पर स्टेडियम बनाने की बात चल रही थी, वह अब मैदान भी नहीं रह गया, और महज धरनास्थल हो गया है। ऐसा लगता है कि कुछ सौ बरस पहले जब रायपुर जैसे शहर की कल्पना की गई होगी, तब लोकतंत्र और आंदोलनों की कल्पना नहीं रही होगी कि इसके लिए भी जगह रखनी चाहिए। 
अब पुराने रायपुर में सांस लेने को जगह नहीं है तो यहां आंदोलन ही आंदोलन होते हैं। दूसरी तरफ पूरी सरकार नए रायपुर में बसती है, और वहां पर हजारों एकड़ इलाका खाली पड़ा है, लेकिन वहां किया गया आंदोलन किसी की नजर में तो आएगा नहीं, जंगल में मोर नाचा, किसने देखा, जैसी नौबत आ जाएगी। वरना जहां सरकार है, वहीं पर आंदोलन अगर किए जाते, तो नया रायपुर कुछ बस जाता, और पुराना रायपुर कुछ बच जाता।


एक नाव के सवार...
कई बार कुछ लोग इसलिए बच निकलते हैं कि वे किसी और के साथ एक ही नाव पर सवार होते हैं, और ताकतवर लोग बचाते किसी और को हैं, लेकिन उसके लिए बचाना पूरी नाव को पड़ता है, और इसलिए बाकी भी बच जाते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले राजस्थान में काले हिरण के शिकार का मामला अदालत में चलते-चलते इस हद तक दम तोड़ गया कि सारे गुनहगार बच निकले, और ऐसा लगा कि काला हिरण ही बाजार जाकर बंदूक खरीदकर लाया होगा, और अपने को गोली मारकर उसी ने खुदकुशी की होगी। अब कुछ उसी तरह की बात छत्तीसगढ़ के वन विभाग में लंबे समय से चले आ रहे एक मामले को लेकर है जिसमें एक बड़े नेता के बड़े ही करीबी एक बड़े अफसर को बचाने के लिए अब कोशिश हो रही है, और उससे आखिर में जाकर ऐसा साबित हो सकता है कि आरा मिलों के ल_ों ने बाजार जाकर खुद ही टेप खरीदा, और लौटकर अपनी कमर नाप ली, इसमें सरकार के पैसे ही खर्च नहीं हुए। किसी एक को बचाने के चक्कर में बाकी लोग भी बचते दिख रहे हैं, और आखिर में लकड़ी के ल_ों को ही कुसूरवार ठहराकर फांसी देना ठीक रहेगा। 


मंदिर हटाते अफसर हटा
बस्तर में एक जगह सड़क किनारे के अवैध कब्जे हटाते हुए एक मंदिर को भी हटाया गया, और इसे लेकर वहां जनता इस कदर भड़की कि वहां के आईएएस एसडीएम राहुल वेंकट को हटाना पड़ा, और हटाकर जिले में कलेक्टर के मातहत सहायक कलेक्टर रखा गया। इसे लेकर कल आईएएस एसोसिएशन के आधा दर्जन लोग जाकर मुख्य सचिव से मिले, और कहा कि जैसे हालात में एक नौजवान अधिकारी को हटाया गया है, उससे बाकी अफसरों का मनोबल टूटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ तो सभी सार्वजनिक जगहों से धर्मस्थलों को हटाने का आदेश दिया है,  दूसरी ओर ऐसा करने पर मंदिर को बचाने की कोशिश हो रही है, और अफसर को तो हटा ही दिया गया है। नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में अवैध धर्मस्थलों का हौसला बुलंद हो गया है, और अफसर चुप बैठने की कगार पर हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय सिंह के साथ पांच और आईएएस गए थे, और इनके बीच बाद में यह चर्चा होती रही कि हो सकता है कि सीएस के कमरे में एसोसिएशन की ऐसी बैठक में टेबल के इस तरफ अजय सिंह आखिरी बार रहे हों। अगली ऐसी नौबत आने के पहले हो सकता है कि सीएस के कमरे पर तख्ती बदल जाए।   rajpathjanpath@gmail.com


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