राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सौदान सिंह के दौरों के मायने

Posted Date : 02-Jan-2018

तीन दिन बस्तर में गुजारने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) सौदान सिंह से जुड़े लोगों को यह लगने लगा है कि विधानसभा चुनाव में मिशन-65 का लक्ष्य कठिन है। पहले प्रदेश के पदाधिकारियों ने बस्तर में सब-कुछ ठीक ठाक होने की रिपोर्ट दी थी। बस्तर की कुल 12 में से 4 सीटों पर ही भाजपा है। इस बार पार्टी के रणनीतिकारों ने यहां सीट दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन सौदान सिंह के साथ प्रमुख नेताओं की टीम जब वहां पहुंची तो कार्यकर्ताओं से चर्चा कर ऐसा लगने लगा कि मौजूदा हालात में सीट दोगुनी तो दूर, यथास्थिति बरकरार रही तो बड़ी बात होगी। 
कांकेर जिले की बैठक में एक महिला नेत्री ने साफ तौर पर कह दिया कि पार्टी की हालत दयनीय है। सुनते हैं कि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव है। उनकी शिकायत थी कि प्रभारी मंत्री जिले का दौरा नहीं करते हैं। एक मंत्री को लेकर यहां तक कहा गया कि उनसे मिलने के लिए कार्यकर्ताओं को कम से कम तीन घंटे इंतजार करना पड़ता है। वे कार्यकर्ताओं के बीच बैठने से ज्यादा वीडियोगेम खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। पार्टी के रणनीतिकारों की दिक्कत यह है कि चुनावी साल में किसी तरह फेरबदल का जोखिम भी नहीं लिया जा सकता। ऐसे में फिलहाल डैमेज कंट्रोल की रणनीति बनाई जा रही है। 
सौदान सिंह की साख हर उस प्रदेश में कामयाबी पाने की है जहां-जहां उन्हें संगठन ने जिम्मा दिया। छत्तीसगढ़ में भाजपा के तमाम नेता-कार्यकर्ता उनकी ताकत और पकड़ दोनों को ठीक से जानते हैं, इसलिए जब वे एक-एक इलाके में जाकर इस चुनावी वर्ष में अंदाज लगा रहे हैं, तो उन इलाकों के नेताओं का भविष्य भी इसी पर टिका हुआ है। संगठन के एक पुराने नेता ने कहा कि सरकार और संगठन दोनों ही सौदान सिंह के मातहत काम करते हैं, उनसे परे कुछ भी नहीं है। इसलिए जिन नेताओं की शिकायतें अभी सामने आई हैं, उन्हें फिक्र करने की जरूरत तो है। बस्तर के बाद वे सरगुजा में हैं, जहां कि पार्टी की हालत काफी गड़बड़ है।
गुलदस्तों की बहार का क्या करें?
कल नए साल के पहले दिन मंत्रालय में कई अफसर अपने पहले मेहमान की राह देखते रहे कि उनके लाए गुलदस्ते लेकर वे अपने से बड़े अफसरों का फेरा लगा आएं। लेकिन जैसे-जैसे मामला ऊपर पहुंच रहा था, वहां के अफसर को और ऊपर जाने की जगह ही गिनी-चुनी थीं, इसलिए सबसे ऊपर पहाड़ सरीखा बनने लगा। मंत्रालय में कुछ कंपनियों के लोग नए साल के कार्ड के गट्ठे लेकर एक-एक कमरा ढूंढते भी दिखे। 
बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को आए दिन गुलदस्ते मिलते रहते हैं। नया साल हो, दीवाली हो, या कि कोई और जन्मदिन जैसा मौका हो, जितना बड़ा ओहदा, उतने अधिक गुलदस्ते। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि लोग इतने गुलदस्तों का करते क्या होंगे? एक बड़े अफसर थे जो कि उन्हें मिले गुलदस्ते पास की अलग-अलग स्कूलों में बारी-बारी से भेज देते थे ताकि बच्चों की क्लास में उन्हें रखा जा सके। अभी मंत्रालय में एक एसीएस आर.पी. मंडल ऐसे हैं जो उन्हें मिले हुए गुलदस्ते अपने दफ्तर के छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को दे देते हैं कि घर जाकर अपने पति/पत्नी को उपहार में देना। इसके बाद भी और गुलदस्ते बचते हैं तो वे पड़ोस के किसी अफसर के मातहत कर्मचारियों को बुला लेते हैं। ऐसे मौकों पर आने वाले लोगों को खुद खड़े होकर मिठाई भी खिलाते हैं। 

गुलदस्तों से बेहतर गमछा
भाजपा के एक नेता छगन मुंदड़ा का स्वागत करने, बधाई देने का तरीका गुलदस्तों से अधिक स्थाई है। उनका घर-दफ्तर, उनकी गाड़ी भाजपा के रंगों वाले दुपट्टे/गमछे से हमेशा लैस रहते हैं। जहां किसी का स्वागत करना हो, वे एक गमछा पहना देते हैं जो कि गुलदस्ते के मुकाबले अधिक दिनों तक कायम रहता है। और इसके लिए हर बार ताजा गुलदस्ता लेने फूलवालों के पास जाना भी नहीं पड़ता। 

चूंकि बिलासपुर से परहेज है...
गुजरे साल के आखिरी दिनों में पुलिस अमले में छोटा सा फेरबदल हुआ। इसमें जी.पी. सिंह को दुर्ग और दीपांशु काबरा को रायपुर आईजी बनाया गया। हालांकि पहले काबरा को रायपुर लाने की चर्चा थी। लेकिन सेक्स-सीडी प्रकरण के चलते रायपुर आईजी को बदलने का विचार छोडऩा पड़ा। सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया जी.पी. सिंह की पोस्टिंग को लेकर हुई है। सुनते हैं कि दो जिले के एसपी ने रेंज के बाहर की पोस्टिंग मांग ली है। पहले उन्हें रेंज में ही अहम जिला देने की चर्चा चल रही थी। अब उनकी बातों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है यह फेरबदल की सूची देखकर ही साफ हो पाएगा। दीपांशु  काबरा को दुर्ग रेंज में कुल एक बरस हुआ था, और उन्हें वहां से हटाने की कोई वजह भी नहीं थी। लेकिन जी.पी. सिंह पीएचक्यू से बाहर तो निकलना चाहते थे, लेकिन बिलासपुर जाना नहीं चाहते थे क्योंकि उनके वहां आईजी रहते ही वहां के नौजवान एसपी राहुल शर्मा ने खुदकुशी कर ली थी, और उसके पीछे जी.पी. सिंह की डांट-फटकार को जिम्मेदार माना गया था। प्रदेश में ऐसे किसी बड़े अफसर की खुदकुशी वह पहला मामला था, और जी.पी. सिंह के लिए बिलासपुर अब एक अनचाही जगह हो गई है।


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