राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : चुनावी बरस में आदिवासी-नाराजगी?

Posted Date : 08-Jan-2018

सरकार ने चुनावी साल में भू-राजस्व कानून में संशोधन कर जोखिम मोल ले लिया। विपक्ष के नेता प्रस्तावित कानून को आदिवासी हितों के खिलाफ बताकर सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। लेकिन सत्ता पक्ष के कई नेताओं के विरोध में सुर में सुर मिलाने से सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई है। सुनते हैं कि कानून में संशोधन पर कोई खास दिक्कत नहीं होने का भरोसा था। यही वजह है कि आनन-फानन में विधेयक को विधानसभा में लाया गया और बहुमत के आधार पर पास भी हो गया। 
कानून में संशोधन के पीछे की वजह जो बताई जा रही है उसके अनुसार आदिवासी जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया जटिल होने के कारण सौ से अधिक प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं। इनमें रेल लाइन से लेकर एनीकट और सड़क निर्माण की परियोजनाएं शामिल है। चूंकि अब नए कानून में कलेक्टर की निगरानी में आदिवासी जमीन की खरीदी हो सकती है। इसलिए इसमें गड़बड़ी की गुंजाईश भी नहीं है। मुआवजा भी काफी बेहतर हो गया है। इसलिए सरकार को उम्मीद थी कि इससे जमीन देने वाले आदिवासियों को लाभ होगा बल्कि परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ सके गी। कानून में संशोधन सिर्फ सरकारी परियोजनाओं के लिए किया गया है। विपक्ष के हमलों का जवाब तो सरकार हर स्तर पर दे सकती है, लेकिन अपनों का वार भारी पड़ रहा है। एक-दो दिनों में प्रस्तावित कानून को लेकर गलतफमियों को दूर करने की कोशिश की जाएगी, यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्रस्तावित कानून को ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। चुनाव के साल में हकीकत चाहे जो हो, जनधारणा अधिक मायने रखती है। ऐसा पता लगा है कि मुख्यमंत्री ने इस मामले की आगे खुद वकालत करने से इंकार कर दिया है।

कबीरपंथी महंत धार्मिक दिखावे में फंसे
चुनावी बरस में प्रदेश कांगे्रस के भूतपूर्व अध्यक्ष चरणदास महंत को चुनाव अभियान संचालन समिति का मुखिया बनाकर पार्टी ने उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी दे दी है। और उन्होंने पहला काम यह किया कि हनुमानजी की ऐसी पूजा करवाई जिसमें उन्हें हर सीट के लिए एक-एक किस्म की मिठाई चढ़ाई गई। गनीमत यह है कि छत्तीसगढ़ में 90 ही सीटें हैं, इसलिए हनुमानजी 90 मिठाईयों से ही बच गए। अगर इससे अधिक मिठाईयां खानी पड़ती, तो सेहत के लिए नुकसानदेह होतीं। वैसे तो महंत कबीरपंथी हैं, लेकिन कबीर की खरी-खरी और खुरदुरी सोच आज के जमाने में लुभावनी-लोकप्रियता नहीं दिला सकतीं। इसलिए कबीर की बुनियादी सोच के खिलाफ जाकर भी महंत एक धार्मिक आडंबर में उलझ गए, और उन्होंने ठीक वही किया जो कि उनके नेता राहुल गांधी ने गुजरात में किया था। धर्म की मूलधारा में नहाकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश। अब धर्म के असर का जहां तक सवाल है, तो वोटरों को धार्मिक पार्टियों में बी-टीम क्यों पसंद आएगी यह भी एक बड़ा सवाल है। धर्म ही मुद्दा रहेगा तो क्या भाजपा ही अधिक धर्मालु और धार्मिक नहीं दिखेगी? फिलहाल देखना यह है कि 90 थाल मिठाई से हनुमान कितने प्रभावित होते हैं, और कांगे्रस का कितना साथ देते हैं।

नक्सलियों को खून देने वाली पुलिस
देश के एक बड़े इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने अभी ट्विटर पर यह अफसोस जाहिर किया है कि हिंदुओं के कट्टरपंथी संगठनों से अधिक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कांगे्रसी वकील मुकदमे लड़ रहे हैं। इसके जवाब में तुरंत कई लोगों ने यह लिखा कि वकालत एक पेशा है जो कि निजी राजनीतिक सोच से परे भी चलता है। 
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में कई मौकों पर मुठभेड़ के बाद घायल नक्सलियों को उन्हीं पुलिस जवानों ने अस्पताल में खून दिया, जिनके साथी पुलिसवालों को उसी मुठभेड़ में नक्सलियों ने मार भी दिया था। ऐसा कई बार हुआ है। रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार को यह इतिहास याद रखना चाहिए कि वकील अपनी निजी सोच के मुताबिक किसी का मुकदमा मुफ्त में लड़ लें, तो वह उनका अपना फैसला है, लेकिन किसी दूसरी सोच वाले को वकील न मिले, यह तो कोई बात नहीं है। ऐसे में छोटे बच्चों से बलात्कार करके उनकी हत्या करने वाले को कोई वकील ही न मिले, क्योंकि शायद ही कोई वकील बलात्कार और हत्या के हिमायती हों। लेकिन मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को भी वकील मिला ही था, और बुरे से बुरा जुर्म करने वालों के लिए भी वकील अगर नहीं जुटता है, तो सरकार और अदालत उसका इंतजाम करते हैं। देश के कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने इमरजेंसी के दौरान मुंबई में देश के सबसे कुख्यात स्मगलरों के केस भी लड़े थे, और वे कुछ दूसरे मामलों में तस्करी रोकने वाले विभाग कस्टम के वकील भी थे। 
टिकट काटना आसान, बांटना मुश्किल
सत्तारूढ़ भाजपा छत्तीसगढ़ में कई उन सीटों पर नए उम्मीदवार छांट रही है, जहां पर आज कांगे्रस के विधायक हैं, या कि भाजपा के ऐसे विधायक हैं जिनकी टिकट काटना जरूरी है। इनमें से कुछ नाम आज जिला पंचायतों में सक्रिय नेताओं के भी हैं। सरगुजा संभाग में एक जिला पंचायत में दो ऐसे नेताओं की शिनाख्त हुई है जो कि दो अलग-अलग सीटों पर भाजपा के अच्छे उम्मीदवार बन सकते हैं, लेकिन आज वहां बहुत से ऐसे गड़बड़ फैसले और आदेश हो रहे हैं कि वे दोनों ही वहां लोकप्रियता खो भी रहे हैं। एक तरफ तो भाजपा के कई ऐसे मौजूदा विधायक हैं जो कि अपने कुनबे के कुकर्मों के चलते वैसे भी हार पाने वाले हैं अगर उन्हें टिकट मिले। और दूसरी तरफ जिनकी संभावना है, उन्हें भी गलतियों और गलत कामों से बचाकर रखना एक बड़ी चुनौती है। भाजपा के एक बड़े नेता ने कहा कि टिकटें काटना तो आसान होगा, लेकिन जिनको बांटना है उन्हें संभालकर रखना अधिक मुश्किल हो रहा है।   rajpathjanpath@gmail.com


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