राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कांग्रेस पर मंडरा रही आशंकाएं

Posted Date : 10-Jan-2018

प्रदेश कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साए से मुक्त हुई है। राज्य बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब गैरजोगी समिति के अध्यक्ष बने हैं। इससे पहले वर्ष-03, वर्ष-08 और वर्ष-013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति की बागडोर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के हाथों में थी। खास बात यह है कि तीनों चुनाव में 5-7 सीटों के हेरफेर से पार्टी सरकार बनाने से वंचित रह गई। खुद चुनाव अभियान समिति के प्रमुख होने के बावजूद जोगी पर भीतरघात के आरोप लगे थे। इस बार जोगी के पार्टी से बाहर रहने पर समिति की कमान डॉ. चरणदास महंत को दी गई है। यह समिति कांग्रेस में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका को तो सिर्फ टिकट बंटवारे तक ही रहती है। लेकिन बाद में प्रचार की पूरी जिम्मेदारी अभियान समिति के प्रमुख संभालते हैं। कुल मिलाकर नया दायित्व पाकर महंत और उनके समर्थक गदगद हैं। पार्टी में यह भी चर्चा है कि यदि पिछले तीन चुनावों से अलग हटकर पार्टी के पक्ष में परिणाम आए तो महंत के सितारे चमक सकते हैं। कांगे्रस की राजनीति में एक भूचाल आने की आशंका भी कई लोगों को है। सेक्स-सीडी कांड से जुड़ी हुई दो-तीन धाराएं ऐसी हैं जिनमें सीबीआई भूपेश बघेल को घेर सकती है। इस मामले में आईटी एक्ट की कुछ ऐसी धाराएं हैं जिन्हें लेकर भूपेश बघेल पर भी कार्रवाई की आशंका है। और अगर सीबीआई ऐसा कुछ करती है, तो उसके तुरंत बाद राज्य की एसीबी के पास भी भूपेश बघेल और उनके परिवार के खिलाफ भिलाई-साडा की जमीन का एक मामला दर्ज है। राजनीतिक ताकतें अभी ऐसी किसी कार्रवाई के राजनीतिक-चुनावी नफे-नुकसान को तौल रही हैं, और सीबीआई या एसीबी की कार्रवाई उसे देखते हुए भी होने के आसार हैं।

दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में लगा यह स्टॉल बताता है कि आसाराम के भक्तों की भीड़ तो अभी भी उनकी किताबों और सामानों की दूकान पर लगी है। यहां से कुछ किताबें लेकर उनका एक भक्त रायपुर में इस अखबार के दफ्तर आया कि उन्हें पढ़कर देखें। जब उनसे कहा गया कि अच्छे साहित्य को उनके गुरु ने खुद ने क्यों नहीं पढ़ा? तो उन्होंने कहा कि पहले गुरु को जमानत मिल जाए, तभी तो उनसे पूछा जा सकेगा। अब साहित्य की दुनिया में किसी पर कोई रोक तो रहती नहीं, हिटलर की लिखी किताबें भी बिकती हैं, और नाथूराम गोडसे की लिखी हुई भी। इसलिए विश्व पुस्तक मेले में सभी की जगह है।  

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