राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : दुर्ग एसपी की कुर्सी में कुछ खास है

Posted Date : 12-Jan-2018

आखिरकार सरकार ने रायपुर एसपी बने अमरेश मिश्रा को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की अनुमति देने से मना कर दिया। वे केंद्रीय मंत्री एसएस अहलूवालिया के पीएस बनने वाले थे। उनकी सीबीेआई में भी पोस्टिंग हो गई थी, लेकिन उन्हें रिलीव नहीं किया गया। अमरेश की गिनती काबिल पुलिस अफसरों में होती है। वे 5 साल आईबी में रह चुके हैं। इन सबसे परे वे अपनी ऊंची पहुंच के लिए भी जाने जाते हैं। सुनते हैं कि रायपुर पोस्टिंग से पहले उन्हें सीएम हाउस तलब किया गया था। वे अकेले पुलिस अफसर हैं जिन्हें आदेश निकलने से कई दिन पहले नई पोस्टिंग की जानकारी दे दी गई थी। उनसे यह भी कहा गया कि वे रिलीव होने के लिए जोर न दें। इतना मान-सम्मान किसी जूनियर अफसर को नहीं मिलता। ऐसे में खुशी-खुशी प्रदेश में ही काम करने के लिए तैयार हो गए। दुर्ग में रहे एसपी को इतना महत्व मिलने का यह दूसरा मौका है। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब देश में जगह-जगह दंगे हुए, तो भोपाल के दंगों के बीच उस वक्त दुर्ग के एसपी सुरेंद्र सिंह को भोपाल ले जाकर वहां का एसपी बनाया गया था। बाद में वे मध्यप्रदेश के डीजीपी भी बने। और उन्हें ट्रेन से भोपाल पहुंचने का भी वक्त नहीं दिया गया था, भोपाल से सरकारी विमान रायपुर आया था, और उन्हें ले जाकर दंगाग्रस्त भोपाल का चार्ज दिया गया था। दुर्ग में ही एडिशनल एसपी रहे ऋषि शुक्ला अभी मध्यप्रदेश के डीजीपी हैं।

सरकार शब्द इस तरह शुरू हुआ...

नया रायपुर में प्रदेश भर की सरकार के सभी विभागों के मुखिया बैठते हैं, और उनका लंबा-चौड़ा तजुर्बा रहता है। उनके बीच भी जब कोई फाईल इस अंदाज में चलती है कि लगता है कि वह फाईल न होकर धोबी का गधा है, न घर का न घाट का, तो वे लोग भी सरकारी कामकाज के तरीके और रफ्तार को कोसने लगते हैं। ऐसे ही एक आला अफसर ने अपने मातहत को तंज कसते हुए सुनाया- जानते हो कि सरकार नाम कैसे पड़ा? जो सरक-सरककर चलने की मशीन हो, उसे सरकार कहते हैं। इसलिए तुम जिस रफ्तार से काम कर रहे हो, वह ईमानदारी से सरकारी रफ्तार है। मातहत के पास इसका कोई जवाब तो था नहीं।

काला रंग नकारात्मक क्यों?
दुनिया के कुछ अधिक विकसित और अधिक सभ्य लोकतंत्रों में अब किसी विरोध प्रदर्शन के लिए काले रंग के इस्तेमाल के खिलाफ एक सोच विकसित हो रही है। लोगों का मानना है कि दुनिया में काले रंग वाले अधिकतर लोग अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों के रहते हैं, और उनकी गरीबी अधिक रहती है। इसलिए गोरी, संपन्न, और विकसित नस्लों के बीच काले रंग को विरोध का रंग मान लिया जाता है। ऐसे में काले झंडे, काला फीता, काले कपड़े, और काले रंगों को लेकर तरह-तरह के नारे, जैसे काला कानून, बुरी नजर वाले का मुंह काला, वगैरह-वगैरह। अब काले रंगों वाले दलित, आदिवासी, अफ्रीकी, और ऐसे दूसरे देशों, नस्लों, और जातियों के लोग एक नई जागरूकता लेकर सामने आ रहे हैं कि उनका इस्तेमाल किसी चीज को नकारात्मक बताने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में दुनिया को विरोध और नकारात्मक बातों के लिए नया रंग ढूंढना बड़ा मुश्किल होगा। (  rajpathjanpath@gmail.com)


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