राजपथ - जनपथ

Posted Date : 30-Oct-2017
  • बात 45 साल पुरानी है। आईएएस ट्रेनिंग अकादमी मसूरी के डीजी रहे श्री भावे प्रशिक्षु आईएएस अफसरों को भ्रष्टाचार को लेकर सीख दिया करते थे। वे कहते थे कि रिश्वत लेना है तो जमकर लें और यह मानकर लें कि देर-सबेर यह लोगों को पता चल जाएगा। उनका कहना था कि रिश्वत लेने के बाद कोई अफसर ऐसा सोचता है कि यह किसी को पता नहीं चलेगा, तो बड़ी भूल है। जो आदमी रिश्वत देता है वह कितना भी भरोसेमंद हो, एक न एक जगह आपकी गाथा सुना ही देगा। इसके बाद भी रिश्वत लेने का साहस रखते हैं, तो उन्हें ऐसा करना चाहिए। उनकी सीख विशेषकर 73 बैच के तकरीबन सभी अफसरों को याद रही और वे पूरे कैरियर में ईमानदार बने रहे। इस बैच में मुख्यमंत्री के सलाहकार शिवराज सिंह, सत्यानंद मिश्रा और डीएस माथुर जैसे नामी-गिरामी अफसर रहे हैं। लेकिन समय के साथ-साथ अफसरों की सोच और काम के तरीकों में बदलाव आया है। मसूरी में किस तरह की सीख मिल रही है, यह तो पता नहीं है। लेकिन कई अफसर कैरियर के शुरूआत में ही ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैच के अंदाज में बैटिंग करने लग गए हैं। नए नवेले अफसर पैसा कमाने के नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। जिले के एक आला अफसर ने तो पैसा कमाने का नायाब तरीका निकाला है। वे पांच अलग-अलग विभागों में कागजों में किराए की गाड़ी दौड़ा रहे हैं, और पूरी राशि हजम कर रहे हैं। डीएमएफ के काम की स्वीकृति के एवज में उच्चाधिकारियों के कमीशन की रकम सुनकर तो मातहतों के भी पसीने छूट जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इनके कारनामों की जानकारी महानदी भवन तक नहीं पहुंचती है लेकिन अपने संपर्कों के चलते ज्यादातर मौकों पर कार्रवाई से बच भी जा रहे हैं।

    ऐसा सम्मान भी क्या सम्मान
    राज्योत्सव के मौके पर कम से कम एक सम्मान ऐसा भी है जिसे लेकर लेन-देन की चर्चा हवा में है। इसकी सच्चाई जरूरी नहीं है, लेकिन सार्वजनिक जीवन की नैतिकता यह कहती है कि जिस पर लेन-देन करके यह सम्मान हासिल करने की कोशिश का आरोप है, और जिन पर लेन-देन करके यह सम्मान देने का आरोप है, उन्हें अपने बारे में एक बार सोचना चाहिए। राज्योत्सव में दर्जन भर से अधिक सम्मान तय हो चुके हैं, और ऐसे में किसी ऐसे विवाद से घिरा हुआ सम्मान अपमान से अधिक कुछ नहीं हो सकता। यह एक अलग बात है कि सम्मान और अपमान की लोगों की परिभाषा अलग-अलग होती है। 

    सरोज पाण्डेय का शक्ति प्रदर्शन
    कल दुर्ग में भाजपा की दिग्गज नेता ने छत्तीसगढ़ी पारंपरिक पोशाक में सजी महिलाओं का एक बड़ा जलसा किया। इतना बड़ा सुआ नृत्य किसी ने देखा-सुना नहीं होगा जिसमें दस हजार से अधिक महिलाएं शामिल हुईं। राज्य की पूरी सत्ता भी मंच पर मौजूद थी। लेकिन कम से कम एक टीवी चैनल पर जीवंत प्रसारण में एक खास महिला को नृत्य करते दिखाने का दृश्य घंटे भर छाया रहा। लोगों में उत्सुकता है कि यह महिला कौन थी? और उसका वीडियो देखने से यह बात साफ है कि वह इस बात से वाकिफ थी कि कैमरा उसी पर टिका हुआ है। लेकिन इस महिला से परे फिर सरोज पांडेय की बात करें तो यह दुर्ग विधानसभा सीट, दुर्ग लोकसभा सीट, और पूरे छत्तीसगढ़ को ध्यान में रखते हुए किया गया एक बड़ा जलसा था। पिछले आधे बरस में कम से कम दो बार सरोज पांडेय ने अगले विधानसभा चुनाव को लेकर मुखिया के लिए अपनी सोच बिना अधिक शब्दों में कहे उजागर कर दी थी, और इसके तुरंत बाद उनको अपनी बात का खंडन भी करना पड़ा था। अगला विधानसभा चुनाव किस मुखिया के चेहरे पर लड़ा जाएगा, उसे लेकर सरोज पांडेय बार-बार एक संदेश देने की कोशिश करती हैं, और कल का उनका कार्यक्रम सुआ पर कम और सत्ता पर अधिक केन्द्रित रहा। 

    करोगबाग के धंधे सरीखी सीडी
    छत्तीसगढ़ के मीडिया के सामने इन दिनों दो तरह की सीडी परोसी सी गई है। अब यह बहस चल रही है कि इसमें से असली कौन सी है, और नकली कौन सी है। लेकिन सेक्स-वीडियो के जानकार विशेषज्ञों का कहना है कि कोई तीसरी सीडी भी आ सकती है। अब यह पूरा बाजार दिल्ली के करोलबाग इलाके में चलने वाले ऑटो पाटर््स के मार्केट की याद दिलाता है जहां पर हर पाटर््स के असली और नकली के बाद और घटिया नकली भी मौजूद रहते हैं। कोई उसे फस्र्ट डुप्लीकेट कहते हैं, तो कोई उसके बाद का सेकंड डुप्लीकेट भी कहते हैं। फिलहाल इस पूरे सिलसिले से उन शरीफ लोगों को राजनीति से हिकारत करने और दूर रहने का एक और तर्क मिल गया है कि राजनीति ऐसी ही कुत्ती चीज है। (अब उन्हें कौन बताए कि कुत्ती एक वफादार प्राणी होती है, और न तो वह अपनी नस्ल के दूसरे लोगों की सीडी बनाती, और न ही बांटती है।)

    देवेन्द्र वर्मा की पारी जारी रहेगी?
    विधानसभा के प्रमुख सचिव देवेंद्र वर्मा की सेवा अवधि अगले महीने खत्म हो रही है। विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल न चाहते हुए भी उन्हें एक-एक साल के लिए दो बार सेवावृद्धि दे चुके हैं। विधानसभा सेवा नियमों के अनुसार अध्यक्ष को अधिकतम दो साल की सेवावृद्धि ही दे सकते हैं। यानी अब सेवावृद्धि का अधिकार कैबिनेट को ही है। चूंकि इस बार मामला थोड़ा अलग है चूंकि उनके ठीक नीचे चंद्रशेखर गंगराडे प्रमोट होकर सचिव बन चुके हैं। 
    लिहाजा, वर्माजी के सेवावृद्धि की बाध्यता नहीं है। लेकिन वर्माजी ठहरे हरफनमौला, कई बार सरकार और विधानसभा अध्यक्ष तक को झंझावातों से निकाल चुके हैं। सरकार के दो प्रभावशाली मंत्रियों से उनकी निकटता जगजाहिर है। सीएम सचिवालय के वे पसंदीदा माने जाते हैं। पिछले दिनों प्रदेश दौरे पर आए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी उनके घर गए थे। तमाम राजनीतिक परिस्थितियां भी उनके अनुकूल है। ऐसे में उनके मैदान से हटने की संभावना बेहद कम है। 

    जूते-चप्पल नए नहीं थे...
    भाजपा ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के घर पर हमला किया तो अहाते में जूते-चप्पल भर दिए गए, और बाद में पुलिस कर्मचारी उनको बीनते दिखे। हैरानी की बात यह है कि किसी घर के भीतर फेंके गए जूते-चप्पलों को उठाने से लेकर किसी नेता के जलते पुतले को पानी की बोतल खरीदकर भी बुझाने तक के काम पुलिस के मत्थे पड़ते हैं। एक ही दिन पहले यही पुलिस मंत्री राजेश मूणत के बंगले के बाहर नाम की तख्ती पर पोती गई कालिख पोंछते दिख रही थी। लेकिन भूपेश के बंगले में फेंके गए एक भी जूते-चप्पल नए नहीं थे, नहीं तो किसी काम भी आ जाते। सारे के सारे जूते-चप्पल कहीं से पुराने जुटाए गए थे, शायद किसी कबाड़ी से। राजनीतिक दल अगर अपने नेताओं के अच्छे जूतों के जोड़े फेंके तो सैकड़ों गरीबों का भला भी हो सकता है।    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 29-Oct-2017

  • कांग्रेस, भाजपा और मीडिया के पेशेवर लोगों के अलावा अब इस इलाके में स्टिंग ऑपरेशन और डिजिटल फेरबदल के माहिर लोगों में यह अटकलबाजी चल रही है कि यह पूरा सीडी कांड कहां से शुरू हुआ, किसने किया, किसको फंसाया, किसने कितना भुगतान किया, और अब आगे कौन-कौन इसमें कितना भुगतेंगे। यह बहस कुछ लंबी चलेगी क्योंकि मामला रिश्वत जैसा रूखा-सूखा नहीं है, और न ही पैसों का लेन-देन का है। सेक्स और सीडी, यह नाम कुछ अधिक आकर्षक है और इस नाम से पश्चिम में एक मशहूर म्यूजिक सीडी भी बनी हुई है। फिलहाल लोगों की साजिश की अटकलें खालिस भाजपा से लेकर खालिस कांग्रेस तक, और खालिस ब्लैकमेलरों तक, सभी तरफ दौड़ रही हैं। जैसे-जैसे धुंध थोड़ी सी छंटेगी, असली गुनहगार का बेहतर अंदाज लग सकेगा। फिलहाल लोग इस बात को लेकर फिर हैरान-परेशान हैं जो कि विनोद वर्मा ने कल आधी रात रायपुर पहुंचने के बाद कही है। एक खबर के मुताबिक उन्होंने अभी तक सामने आए विवाद पर कहा है यह तो अभी तैरते हिमखंड की सतह के ऊपर की नोंक भर है, यह महज एक झलक है...। अगर यह बयान सही आया है, तो इससे कल की भाजपा और सरकार की एक बैठक में उठी यह बात फिर गंभीर हो जाएगी कि आज अगर एक मंत्री पर लगे आरोपों पर बाकी मंत्री या संगठन साथ नहीं देंगे, तो जब उनकी बारी आएगी तो वे अकेले रह जाएंगे। विनोद वर्मा के एक लाईन के ताजा बयान से फिर खलबली मची हुई है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या...।

    ब्राम्हण से वैष्णव को मछली का ऑफर
    महापौर प्रमोद दुबे इन दिनों टेंशन में हैं। वजह यह है कि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के भतीजे राजीव वोरा को मछली खाने का ऑफर दे दिया। इसके बाद से राजीव, महापौर से बेहद नाराज बताए जा रहे हैं। हुआ यूं कि कुछ दिन पहले पूर्व पार्षद आनंद कुकरेजा के यहां रात्रिभोज का कार्यक्रम था। पार्टी में महापौर सहित कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेता आए थे। खाने में वेज-नॉनवेज, दोनों का इंतजाम था। एक ही टेबल में प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल, महापौर दुबे और राजीव के साथ अन्य नेता भोजन का लुफ्त उठा रहे थे। तभी वहां कुछ लोगों ने मछली खाने की फरमाइश कर दी। वेटर जैसे ही मछली लेकर आया, तभी हास परिहास के बीच प्रमोद  दुबे ने राजीव को देने का इशारा कर दिया। राजीव ठहरे पुष्टिमार्गी वैष्णव, सो महापौर पर भड़क गए। बात यही नहीं रूकी, महापौर ने उन्हें यह कह दिया कि घर में नहीं बाहर तो सब चलता है। इसके बाद राजीव ने महापौर को जमकर खरी-खोटी सुनाई। अब पार्टी संगठन में बदलाव होना है। राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्री वोरा अपने भतीजे की खूब सुनते हैं। ऐसे में महापौर का टेंशन में आना लाजिमी है। वे यहां रायपुर पश्चिम से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए पसंद का जिला अध्यक्ष चाहते हैं। कुल मिलाकर वोराजी की मदद के बिना उनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती। ऐसे में राजीव को मनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। लेकिन राजीव  हैं कि मान नहीं रहे हैं। 
    बैजेन्द्र के कमरे की चाह
    आईएएस बैजेन्द्र कुमार एनएमडीसी के मुखिया के पद पर चले गए तो उनका बड़ा सा दफ्तर खाली हो गया है। उनके दफ्तर को देखकर मुख्य सचिव का दफ्तर भी फीका लगता था, और यह दफ्तर मुख्यमंत्री के दफ्तर की टक्कर का है। यह दरअसल मुख्यमंत्री के लिए ही बना था, लेकिन फिर वास्तु की कुछ गड़बड़ी पता लगी, और मुख्यमंत्री को मंत्रालय में दूसरे कमरे में बिठाया गया। और यह आलीशान कमरा बैजेन्द्र कुमार को मिला। इस दफ्तर में एक निजी टैरेस गार्डन भी है और आराम करने का कमरा भी है। 
    चूंकि मुख्यमंत्री इसमें नहीं बैठे और उनके लिए वह कमरा ठीक माना गया जो कि मुख्यमंत्री सचिवालय में बैजेन्द्र कुमार के लिए सोचा गया था, इसलिए उसी मंजिल पर यह अदला-बदली हो गई। और यह इंतजाम दोनों के लिए अच्छा रहा, मुख्यमंत्री उस कमरे में कामयाब रहे, और बैजेन्द्र कुमार उस दूसरे कमरे से निकलकर देश के एक सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर के मुखिया होकर गए। अब खाली हो चुके इस कमरे में बैठना तो बहुत से अफसर चाहते हैं, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अफसर ने समझा दिया है कि अब समय किसी कमरे की लालच का नहीं रह गया है, काम करने का रह गया है, भिड़कर काम करें। नतीजा यह है कि अब किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही है कि इतनी शान-शौकत की फरमाईश करें। 

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Posted Date : 28-Oct-2017
  • सीडी में चेहरे अपनी महिलाओं के हों तो?

    एक सेक्स-सीडी बहुत सारे बवाल खड़े कर देती है। एक आदमी और एक औरत की ऐसी सीडी या वीडियो क्लिप सामने आ जाए जिसमें चेहरा पहचानना कुछ मुश्किल हो तो दुष्टात्माओं की बन आती है। वे ऐसी क्लिप के चेहरों या बदन के साथ तरह-तरह के नामों की अटकल लगाकर उसे फैलाना शुरू कर देते हैं। शुक्रवार की सुबह से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जो सेक्स सीडी चल निकली, उसमें आदमी का नाम तो तोहमतों में सुबह से चल ही रहा था, उसमें महिला कौन है इस बारे में दोपहर तक करीब आधा दर्जन नाम वॉट्सऐप पर इस अखबार को मिल चुके थे, और कुछ भले इंसानों ने नामों को तलाशने की दिक्कत घटाने के लिए उन नामों के फेसबुक पेज भी ढूंढकर, साथ में जोड़कर भेज दिए थे। माहौल ऐसा था कि जिसको जिस महिला से हिसाब चुकता करना था, उसने उसका नाम जोड़कर, उसकी दूसरी तस्वीरें लगाकर फैलाना शुरू कर दिया। ऐसे लोग बहुत ही ज्ञानी-विद्वानी रहे होंगे क्योंकि वीडियो में जिसका सिर्फ बदन दिख रहा है, और बाकी तस्वीरों में जिसका सिर्फ चेहरा दिख रहा है, उसका भी रिश्ता कायम करके लोगों ने अच्छा-खासा पुराना-पुराना हिसाब निपटा दिया। लोगों को यह समझ नहीं आया कि जिस रफ्तार से वे कई बेकसूर लोगों को बदनाम कर रहे हैं, उसी रफ्तार से अगर उनके घर की महिलाओं के नाम कोई फैलाए, तो क्या होगा?
    आदिवासी राज्य में संस्कृति के लिए आदिवासी नहीं!
    छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग को देखें तो लगता है कि यह किसी और राज्य का संस्कृति विभाग है। यह राज्य तो एक तिहाई आदिवासी आबादी वाला राज्य है। और जब कभी इस राज्य के बाहर यहां की संस्कृति पेश करनी होती है, तो सबसे पहले सरकार को केवल आदिवासी संस्कृति दिखती है, आदिवासी लोककला दिखती है। लेकिन जब संस्कृति विभाग के संचालक नियुक्त करने हों, तो इन 17 बरसों के दो मुख्यमंत्रियों की सरकारों के चलते एक भी आदिवासी अफसर नहीं मिल पाया है। करीब आधे से अधिक वक्त तो ब्राम्हण अफसर संचालक रहे, और बाकी का समय अनुसूचित जाति, या पिछड़े वर्ग के अधिकारियों को मिला। आदिवासी-संस्कृति-संपन्न राज्य में संस्कृति-संचालक रहे दर्जन भर अफसरों में से एक भी अफसर आदिवासी संस्कृति का न जानकार रहा न आदिवासी तबके से आया, और न किसी ने आदिवासी संस्कृति को बढ़ाने का ही काम किया। और तो और, राज्य में आदिवासी मुद्दों की राजनीति करने वाले लोगों को भी कभी इसकी कमी नहीं खली, चाहे वे अजीत जोगी हों, या फिर भाजपा के तीन दिग्गज आदिवासी मंत्री हों। 
    छोटा जुर्म, बड़ा अफसर
    राजधानी रायपुर के आईजी और एसपी को किसी प्रेस कांफे्रंस में देखें, तो मीडिया के कैमरों के सामने कब कौन बोले, और कब कौन चुप रहे, इसे पहले से तय करके आना चाहिए। आज की सबसे चर्चित सेक्स-सीडी वाली पे्रस कांफे्रंस में पुलिस ने क्या किया, क्यों किया, कैसे किया यह बताते हुए ये दोनों अलग-अलग सवालों पर कुछ अलग-अलग भी बोलते रहे, और कई बार एक साथ दोनों भी बोलते रहे। एक बहुत मामूली शिकायत पर बिजली की रफ्तार से हुई कार्रवाई में केवल अश्लील सीडी पकड़ाने के मामले की पे्रस कांफे्रंस में आईजी ने मौजूद रहकर उसका महत्व बढ़ा दिया, और सरकार की इस मामले में अधिक दिलचस्पी की चर्चा शुरू कर दी। यह कुछ वैसा ही हुआ कि मानो किसी थाने की पे्रस ब्रीफिंग में अखबार के प्रधान संपादक पहुंच जाएं, और उससे मामले में अखबार की अतिरिक्त दिलचस्पी दिखने लगे। बड़े अफसरों के छोटे मामलों से दूर रहना भी सीखना चाहिए, खासकर ऐसे मामलों से जिनमें सत्तारूढ़ लोगों के नाम जुड़े हुए हों। 
    सीडी इतनी बंटीं, कि हिसाब नहीं...
    सेक्स-सीडी पकड़ाई तो दिल्ली में, और वहां कॉपी तैयार करने वाले सीडी राईटर सेंटर ने यह कहा कि उससे हजार कॉपियां तैयार करवाई गई थीं, और उसमें से 5सौ सीडी दिल्ली में विनोद वर्मा के घर जब्त होना बताया गया। लेकिन जब यह खबर फूट ही गई, तो रायपुर में सुबह-सुबह से कांगे्रस के नेताओं ने जिस रफ्तार से और जिस बड़े पैमाने पर यह सीडी बांटना शुरू किया, तो उससे लगा कि बाकी 5सौ सीडी पहले ही रायपुर आ चुकी थी। दोपहर तक हाल यह था कि वॉट्सऐप टेक्नॉलॉजी ने कब्जा कर लिया था, और सीडी कोई लेने वाला नहीं था। वैसे भी अब कम्प्यूटरों में डीवीडी ड्राईव खत्म होते चले गए हैं, और सॉफ्टकॉपी के अलावा बाजार में और कुछ आगे नहीं बढ़ता। 
    मुसीबत में सब साथ...
    परेशानी के इस मौके पर छत्तीसगढ़ के रायपुर में मौजूद तमाम मंत्री, और प्रदेश भाजपा के सारे दिग्गज नेता एकजुट दिखे। सुबह तक सीडी में एक से अधिक लोगों के वीडियो होने की चर्चा थी, जो कि शाम तक चलती रही। इस एकजुटता को देखकर लोगों को लगा कि चुनाव तक पता नहीं और कितने किस्म की सीडी सामने आए, और ऐसे में आज से ही एकजुट होकर चलना ठीक है। भाजपा के एक नेता ने कहा कि यह तो कांगे्रस की सीडी का हाल है, अभी तो असली सीडी-पार्टी ने असली माल संभालकर रखा हुआ दिखता है, वह जब सामने आना शुरू होगा, तो उसके लिए पार्टी को तैयार रहना होगा।

    पहला विशुद्ध जोगीमुक्त सीडी कांड
    सेक्स-सीडी को लेकर कांगे्रस और भाजपा के बीच अलग-अलग किस्म के तनाव चल रहे हैं, और अलग-अलग खतरे हैं। लेकिन इसके बीच भी चुटकियां लेने वाले लोग शांत नहीं बैठ सकते। एक जानकार ने कहा- 'यह छत्तीसगढ़ का ऐसा पहला सीडी कांड है जिसमें जोगी परिवार कहीं से भी जुड़ा हुआ नहीं है।' बात सही भी है क्योंकि दिलीप सिंह जूदेव की सीडी से लेकर बलीराम कश्यप से विधायक खरीदने की सीडी तक, और अंतागढ़ में विधायक-प्रत्याशी बेचने तक की सीडी से, हर एक से जोगी परिवार का नाम जुड़े ही रहा। यह चर्चा चल ही रही थी कि एक जानकार ने नहले पे दहला जड़ा, और कहा- इन लोगों को न विधायक खरीदना आता है, न बेचना आता है। खरीदने जाते हैं तो पकड़ा जाते हैं, और बेचने जाते हैं, तो भी पकड़ा जाते हैं। 

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Posted Date : 27-Oct-2017
  • बातचीत की रिकॉर्डिंग...
    छत्तीसगढ़ में आईएएस अफसरों के बीच एक नई दिक्कत आ खड़ी हुई है। कुछ अफसर दूसरे अफसरों से बात करते हुए सारी बातचीत रिकॉर्ड करने लगे हैं। ऐसा सामान्य शिष्टाचार के तो खिलाफ है, लेकिन ऐसा कोई कानून नहीं है कि आप अपनी खुद की बातचीत को रिकॉर्ड न कर सकें। नतीजा यह है कि अब लोगों को फोन पर या अपने कमरे में सावधानी से बात करना जरूरी हो गया है। और यह बात महज आईएएस तक जाकर रूक जाए ऐसा कोई कानून तो है नहीं, यह बात मंत्रियों और दूसरे नेताओं तक भी जाएगी, और दूसरे बड़े-छोटे अफसरों को भी इसका खतरा रहेगा। कुछ ईमानदार और सावधान अफसरों का यह मानना है कि अगर ऐसा होता भी है, तो उसमें बुराई क्या है, लोग गलत काम की बात करने के पहले खुद ही सौ बार सोचेंगे। राज्य के मुख्य सचिव रह चुके एक अफसर ने गलत कामों की बातों से बचने का एक अलग रास्ता निकाला हुआ था, वे अपने कमरे में हमेशा ही एक-दो लोगों को बिठाकर रखते थे, और फिर आने-जाने वाले लोगों को किसी न किसी की मौजूदगी में ही बात करनी होती थी। ऐसे में गलत बातों की सिफारिश वैसे भी खत्म हो जाती थी। दबाव और सिफारिश से बचने के लोगों के अपने-अपने तरीके रहते हैं। 

    आईपीएस के बनाए गु्रप को जूनियरों ने भी छोड़ दिया
    आज का वक्त ऐसा हो गया है कि लोग त्यौहारों के समय आने वाले वॉट्सऐप संदेशों को खोलकर ही नहीं देखते। बिना खोले पता रहता है कि उनमें क्या-क्या रहेगा। और लोग शुभकामना संदेश पाने के बजाय सनसनीखेज बातों के लिए वॉट्सऐप गु्रप में अधिक रहते है। ऐसे में बिलासपुर एसपी मयंक श्रीवास्तव ने त्यौहारों की शुभकामनाओं के लिए एक गु्रप बनाया उस पर सैकड़ों लोगों को जोड़ दिया। जैसे-जैसे लोगों को समझ आया कि यह तो त्यौहारों की शुभकामना के लिए बना हुआ गु्रप है, लोग इस रफ्तार से गु्रप को छोड़ते रहे, और फोन के स्क्रीन पर लोगों का गु्रप छोडऩा इस रफ्तार से दिखता रहा कि जैसे कोई बारिश हो रही हो (देखें तस्वीर)। हाल यह हो गया कि गु्रप बनाने वाले मयंक श्रीवास्तव के ढेर सारे जूनियर अफसरों ने भी इसे तुरंत छोड़ दिया। आज के वक्त में लोग इंफर्मेंशन-ओवरलोड से थके हुए रहते हैं, ऐसे में एक और गु्रप को कौन झेल सकते हैं? 
    लेकिन आज सुबह से प्रदेश में एक सेक्स सीडी की चर्चा शुरू हुई, और उसके बाद कुछ तस्वीरें और कुछ वीडियो वॉट्सऐप गु्रप पर फैलना शुरू हुए तो जिन लोगों ने थककर सारे गु्रप छोड़ दिए थे, वे लोग दूसरों से पूछते दिखे कि इन तस्वीरों और वीडियो के लिए वे कौन से गु्रप में अपना नाम जुड़वाएं?
    सबसे लंबे वक्त से कायम...
    कुछ अफसरों को देखकर यह हैरानी होती है कि क्या वे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरफ सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड बनाते रहेंगे, या कि उसे कब का तोड़ भी चुके हैं। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल मेकाहारा में डॉ. विवेक चौधरी कब से अधीक्षक बने हुए हैं, इसे अब लोग भूल चले हैं। किसी को साल भी याद नहीं है, और यह भी याद नहीं है कि उनके पहले कौन अधीक्षक था। दूसरी तरफ दिन में बारह घंटे कम पडऩे वाले इस काम को करने वाले डॉ. विवेक चौधरी प्रदेश के सबसे बड़े कैंसर विशेषज्ञ भी हैं, और कैंसर मरीज इतने हैं कि उनके इलाज के लिए सरकारी और निजी सारे अस्पताल भी कम पड़ रहे हैं। मेकाहारा का कैंसर ओपीडी देखें तो लगता है कि नर्क के भीतर लंबी-लंबी कतारें लगी हुई हैं। इन मरीजों को मरने के बाद पता नहीं स्वर्ग मिले या नर्क, जीते जी इलाज के लिए उन्हें नर्क झेलना ही पड़ता है। 
    अब ऐसी कतारों से जूझने की जिम्मेदारी जिस डॉक्टर पर है, वह अस्पताल का इंतजामअली भी है, और डॉक्टरी छोड़कर मैनेजमेंट करते बैठा है। अब या तो राज्य सरकार डॉ. चौधरी को सुपरमैन मानती है कि वे दिन में अड़तालीस घंटे काम कर लेंगे, या फिर कैंसर विशेषज्ञ से मैनेजमेंट का काम करवाकर सरकार मरीजों को निजी अस्पतालों की तरफ धकेल रही है। यही हाल बहुत से और डॉक्टरों का है जो कि गैरडॉक्टरी वाली सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए हैं, और जिन्हें मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और मरीज देखे बरसों गुजर गए हैं। 

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Posted Date : 26-Oct-2017
  • गांधी की बेइज्जती का इतना बड़ा सम्मान!
    प्रदेश का आबकारी विभाग भी मजेदार है। एक समय यहां पर गांधी का नाम लेकर महानता पाने की हसरत रखने वाले सचिव थे, और उन्होंने गांधी को शराबबंदी के लिए ब्रांड एम्बेसडर बना लिया था। बाद में हंगामा हुआ, और गांधी को इस ड्यूटी से छुट्टी मिली। राज्य के मुख्य सचिव से होते हुए उसी गांधीवादी सचिव के सामने यह मामला पहुंचा कि किस तरह दुर्ग के एक आबकारी अफसर ने अपने वॉट्सऐप ग्रुप में ढेरों अफसरों और दारू के धंधे वालों के बीच गांधी का मखौल उड़ाते हुए पोस्ट किए। इस मामले में नए-नए आईएएस बने एक अफसर ने जांच की, और शिकायत को सही पाया। लेकिन सरकार में जिन तरीकों से ऐसी पुख्ता शिकायतें दबाई जाती हैं, उन्हीं तरीकों से गांधी का अपमान भी दबा दिया गया, और सचिव गांधीवादी भी बने रहे। अब हाल यह है कि दुर्ग का वही आबकारी अफसर राजधानी रायपुर में लाकर सबसे कमाऊ जगह पर बिठा दिया गया है, और वह जमकर अवैध अहाते भी चलवा रहा है, और अलग-अलग ब्रांड की मनमानी बिक्री भी करवा रहा है। जिला कलेक्ट्रेट के आबकारी दफ्तर के बगल में बैठे गांधी सब देख रहे हैं, और सोच रहे हैं कि उनके अपमान पर और किस-किस को ईनाम मिलेगा। खैर, यह विभाग ऐसा है कि गांधी की इज्जत करते हुए या गांधी का मखौल उड़ाते हुए जमकर कमाई की जा सकती है, और गांधी कुछ भी नहीं कर सकते। 
    मान-मनौव्वल
    दिग्गज नेता अजीत जोगी की नई पार्टी को अस्तित्व में आए सालभर से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अब तक चुनाव चिन्ह तय नहीं हो पाया है।  चुनाव चिन्ह विधानसभा चुनाव के 6 माह पहले ही मिल पाएगा, लेकिन इसकी प्रतीक्षा किए बिना नेताजी ने ताबड़तोड़ 11 प्रत्याशियों की अधिकृत घोषणा कर दी। इससे पहले तक कोई भी पार्टी प्रदेश में इतनी जल्दी प्रत्याशी की घोषणा नहीं करती थी। सुनते हैं कि 25 की सूची जारी करने की तैयारी थी। लेकिन कोर ग्रुप के सदस्य जल्द प्रत्याशी घोषित करने के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि इससे खर्च बढ़ जाएगा और टिकट की आस में संगठन मजबूत करने में लगे नेता खिसक जाएंगे।  उनकी आशंका अब सही साबित हो रही है। टिकट की घोषणा को माहभर नहीं हुए, एक प्रत्याशी ने खर्च मांग लिया। बात एक पदाधिकारी तक पहुंची। प्रत्याशी साफ तौर पर कह दिया कि यदि उन्हें खर्च नहीं मिलता तो वे नाम वापस ले लेंगे। पार्टी के रणनीतिकार टेंशन में है कि प्रत्याशी के मैदान से हटने से गलत मैसेज जाएगा। सो, मान मनौव्वल का दौर चल रहा है। 
    चंद्राकर की तारीफ का राज ?
    मेकाहारा की बदहाली के बावजूद अस्पताल के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर की जमकर तारीफ की, और अभी एक-दो और कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में अजय चंद्राकर ने अफसरों को, मीडिया को, जमकर फटकारा। अब लोग हैरान हैं कि प्रदेश के लाखों मरीजों की बदहाली के बावजूद एक डॉक्टर मुख्यमंत्री किस वजह से इस मंत्री की तारीफ का कोई मौका नहीं छोड़ रहे, चाहे वह सरकारी कार्यक्रम रहे, चाहे वह पार्टी का कार्यक्रम रहे। 
    तोहफा
    प्रदेश के एक सबसे बड़े उद्योगपति ने दीवाली पर कुछ लोगों को एक तोहफा भेजा। बक्से का आकार और वजन ऐसा था कि बहुत सारे लोग बड़े खुश हुए कि एक-दो शाम का इंतजाम दिख रहा है। दफ्तर में बक्सा खोलना ठीक नहीं लगा इसलिए घर पहुंचकर यह सोचते हुए तोहफा खोला कि किस ब्रांड की बोतल होगी? जैसा कि दीवाली के तोहफों के साथ होता है, तोहफा खुलते समय घरवाली भी साथ खड़ी थी। खुलते ही साहब का चेहरा लटक गया, भीतर एक की जगह तीन बोतलें थीं, लेकिन तीनों में घी भरा हुआ था। साहब का चेहरा लटका, और घरवाली का खिल गया। दीवाली पर यही ज्यादा जरूरी भी था कि लक्ष्मी की पूजा के मौके पर गृहलक्ष्मी की मर्जी का सामान पहुंचे। साहब की बोतल दो शाम में खत्म हो जाती, अब ये बोतलें तीन महीने तक रोटी पर चुपड़कर तोहफा भेजने वाले की याद दिलाती रहेंगी। 
    रायपुर से अगला उम्मीदवार ?
    छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने और देश के सबसे वरिष्ठ लोकसभा सदस्यों में से एक रमेश बैस को लेकर लोगों के मन में यह आम धारणा है कि अगला चुनाव उनके लिए नहीं रहेगा। इतनी वरिष्ठता के बावजूद अगर उन्हें मोदी सरकार में जगह नहीं मिली, अमित शाह के संगठन में भी कोई जगह नहीं मिली, तो फिर यह तय सा माना जा रहा है कि उन्हें टिकट भी नहीं मिलेगी। वैसे टिकट मिलने पर भी उनके जीतने की संभावना पर लोगों को बड़ा संदेह है। पिछले कई चुनावों में कांग्रेस पार्टी की नालायकी और निकम्मेपन की वजह से रमेश बैस तकरीबन घर बैठे सांसद बनते रहे, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों में से कौन-कौन उम्मीदवार होंगे, इसे लेकर दोनों पार्टियों में अभी से अटकलें जारी हैं, हालांकि अभी विधानसभा चुनाव को भी साल भर बाकी है। 
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Posted Date : 25-Oct-2017
  • छोटे बार मालिकों का पेट नहीं है?
    आधा साल गुजर जाने के बाद यह साफ हो चुका है कि सरकार की आबकारी पॉलिसी फायदे की नहीं रही। करोड़ों के अलिखित और अघोषित प्रशासनिक खर्चों के बाद भी राजस्व में बहुत ही मामूली वृद्धि हुई। कोचियाबंदी के दावों के विपरीत न सिर्फ सीमावर्ती जिलों बल्कि राजधानी रायपुर में भी अवैध शराब की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है। सरकारी दुकानों पर सभी तरह की मिलावट और नकली शराब का धंधा पकड़ में आ चुका है। आबकारी कारोबार के सरकारी करण के फैसले से न सिर्फ पार्टी बल्कि सरकार में भी अंतर्विरोध रहा है। एक ताकतवर मंत्री ने इसको लेकर पहले ही चेता दिया था। विरोध इस बात को लेकर भी रहा है कि शराब का पीढिय़ों से व्यावसाय कर रहे लोग बेरोजगार हो गए। 
    अभी भी प्रदेश में सैकड़ों बार खुलने नहीं दिए जा रहे जो कि अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खुल सकते हैं। आबकारी मंत्री इस पर अड़े हुए हैं कि सरकार केवल सितारा होटलों को बार खोलने देगी, और बाकी कोई भी बार नहीं खुलने दिए जाएंगे। सुनते हैं कि कुछ माह पहले इसको लेकर कैबिनेट में जमकर खटपट हुई थी। विभागीय मंत्री यह प्रस्ताव लेकर आ गए कि थ्री-स्टार और ऊपर का दर्जा प्राप्त होटलों को बार चलाने की अनुमति दे दी जाए। लेकिन अन्य मंत्री इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि छोटे बार मालिकों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन विभागीय मंत्री इससे सहमत नहीं थे। वे बड़े होटलों को लेकर अड़े रहे। वाद विवाद के बीच उन्होंने कह दिया कि बड़े होटलों ने करोड़ों रूपए निवेश कर रखा है और होटल चलाना मुश्किल हो गया। उनके इस तर्क पर तीन मंत्रियों ने कड़ा ऐतराज जताया। एक मंत्री ने यहां तक कह दिया कि क्या कैबिनेट बड़े व्यावसायियों के लाभ-हानि पर चर्चा के लिए बैठी है? विभागीय मंत्री ने तुरंत अपनी बात से पलटे और आग्रह किया कि पर्यटन पर भी बुरा असर पड़ रहा है, इसलिए स्टार होटलों को बार चलाने की अनुमति दी जाए। अब बार का धंधा ठंडा होने से सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक भी बड़े उदास हैं जिन्हें राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए, और बाकी बातों के लिए भी बार से सहयोग मिलता था। अब दारूवाला जब कमा नहीं रहा, तो देगा क्या? 
    सिंचाई के भ्रष्टाचार का अंत नहीं
    बिलासपुर संभाग में एक बड़े सिंचाई ठेके में अनियमितता मेें विभाग के सीई समेत कई अफसर नप गए। पहले विभाग ने ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच का जमकर विरोध किया था। सुनते हैं कि भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने की विभागीय कोशिश पर सीएम ने भी नाराजगी जताई थी। जांच अंतिम चरण में हैं और विभागीय विरोध को लेकर यह खबर छनकर आई है कि सीई, विभाग प्रमुख के बेहद करीबी माने जाते हैं। पोस्टिंग को लेकर भी मंत्री और विभाग प्रमुख के बीच जमकर खींचतान हुई थी। आखिरकार मंत्री को झुकना पड़ा और विभाग प्रमुख की पसंद पर मुहर लगानी पड़ी। अब चूंकि सीई खुद भ्रष्टाचार में फंस चुके हैं तो बात बढ़ सकती है। अब बात निकलेगी, तो  दूर तलक जा सकती है। विभाग के लोग यह उड़ा रहे हैं कि पुलिस अफसर के करीबी को ठेका नहीं मिला, तो जांच खड़ी कर दी गई। अब सच चाहे जो भी हो, मामला बढ़ सकता है। 
    दो और दो हमेशा चार नहीं होते
    राजधानी रायपुर में कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों की बैठक हुई, तो शाम में आधा दर्जन कलेक्टरों को मुख्यमंत्री ने चर्चा करने अलग से बुलाया। इसके पहले दिन की बैठक में मुख्यमंत्री ने सात कलेक्टरों के काम को औसत से खराब कहा था, तो तुरंत लोगों ने दो और दो जोड़कर चार बना लिया और मान लिया कि यही कलेक्टर खराब काम वाले हैं जिन्हें अलग से सीएम हाऊस बुलाया गया है। वहां के एक जानकार उच्चाधिकारी के अनुसार इस बुलावे का उनके कामकाज से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन उनके जिलों में चल रहे कुछ आंदोलनों को लेकर उन कलेक्टरों से चर्चा करनी थी, और मुख्यमंत्री उन जिलों पर अलग से कुछ मेहनत करना चाहते थे, जहां पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा का बुरा हाल था। ऐसे जिलों पर खास सरकारी मेहनत करने के लिए, और कुछ जिलों के आंदोलनों को शांत करने के लिए इन्हें बुलाया गया था। सीएम ने कलेक्टरों को कोई यह विकल्प दिया है कि वे उनसे फोन करके अपने जिले का मूल्यांकन पूछना चाहें, तो पूछ लें। 
    राहत और सांसत दोनों जारी
    दागी आईएएस और आईपीएस अफसरों पर गाज गिर चुकी है। लेकिन इस श्रेणी में सूचीबद्ध आईएफएस अफसरों का अब तक बाल बांका नहीं हुआ। सुनते हैं कि छानबीन समिति ने 6 अफसरों को इस श्रेणी में रखा था और सभी को वीआरएस देने का प्रस्ताव केन्द्र को भेजा था। चर्चा है कि केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी उक्त सूची पर मुहर लगाकर फाईल पीएमओ को भेज दी है। कहा जा रहा है कि देश भर के करीब सौ से अधिक अफसरों को वीआरएस देने की तैयारी थी। लेकिन अब मामला उलझ गया है। बताते हैं कि वीआरएस पा चुके कुछ अफसरों ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में केन्द्र सरकार को जवाब तलब किया गया है। केन्द्र अब कानूनी उलझन से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। ऐसे में फिलहाल राज्य के वन अफसर को राहत की सांस ले सकते हैं, लेकिन बीस-पचास का नाम लेकर सरकार ने काफी लोग एक-दूसरे को डराने का काम भी कर रहे हैं। कुछ छोटे कर्मचारियों और मंझले अफसरों को बीस-पचास में निपटाया गया है, और आगे यह खतरा बहुतों पर कायम भी है। बीस बरस की नौकरी या पचास बरस की उम्र के बाद जिन लोगों को नौकरी से बर्खास्त करने की चर्चा है, उसमें जंगल दफ्तर सहित कई विभागों के लोग हैं। 
    कोयले की जांच महंगी पड़ी
    छत्तीसगढ़ के आईपीएस अफसर अमित कुमार सीबीआई में रहते हुए कोयला घोटाले की जांच में ऐसे बुरे फंसे हैं कि वे अपने राज्य आकर आईजी के प्रमोशन का मजा भी नहीं ले पा रहे हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने चार बरस से उन सारे अफसरों को सीबीआई से कार्यमुक्त करने पर रोक लगा दी है जो कि कोयला घोटाले की जांच कर रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि अलग-अलग राज्यों के करीब 40 ऐसे अफसर हैं जो कि केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पूरी हो जाने के बाद भी लौट नहीं पा रहे हैं। उनके साथ एक दिक्कत यह भी है कि राज्य का प्रमोशन केन्द्र में अमल में आने में दो साल या ज्यादा लग जाते हैं, इसलिए भी अमित कुमार जैसे लोग सीबीआई में तनख्वाह के अलावा राज्य के अपने प्रमोशन का फायदा नहीं पा रहे। अब सीबीआई ने अदालत में यह अर्जी दी हुई है कि ऐसे लोगों को मुक्त करने की इजाजत दी जाए, और अमित कुमार उम्मीद से हैं। वकीलों का अंदाज है कि हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट महीने भर में इसकी इजाजत दे दे।
    कैसा भी पुरस्कार/सम्मान, ये कतार में...
    छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव के मौके पर राज्य स्तर के बहुत से सम्मान या पुरस्कार दिए जाते हैं, और इसके लिए कई नामों के पैनल बनाकर जूरी के सामने रखा जाता है। इसमें कुछ लोग कई अलग-अलग किस्म के सम्मानों के लिए अपना नाम जुड़वाने में कामयाब हो जाते हैं। एक ऐसे रिटायर्ड प्राध्यापक का नाम दो या अधिक पुरस्कारों के लिए लिस्ट में दिखा जिसमें से एक पुरस्कार महज अस्पताल और धर्मशालाओं जैसे समाजसेवा के काम के लिए था। जब इस पुरस्कार के लिए नाम तय करने को जूरी बैठी, तो उसे यह समझ ही नहीं आया कि यह नाम यहां क्या कर रहा है, जिसने विश्वविद्यालय से परे कभी कोई काम नहीं किया है, और दौड़ में है अस्पताल और धर्मशाला से जनता की सेवा करने के सम्मान के लिए!

     

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Posted Date : 24-Oct-2017
  • कार्यकारी का फार्मूला
    कांग्रेस में भूपेश बघेल के दोबारा अध्यक्ष बनने की चर्चा से विरोधी टेंशन में है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के उस बयान से पार्टी में उठा-पटक तेज हो गई है, जिसमें उन्होंने बघेल को दोबारा अध्यक्ष बनाए जाने की बात कही थी। सुनते हैं कि भूपेश के दो प्रमुख विरोधी नेताओं ने एक नया फार्मूला दिया है, जिसमें अध्यक्ष के अलावा दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाए ताकि पार्टी में मनभेद-मतभेद की स्थिति न रहे। यह तर्क दिया गया कि भूपेश विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में चुनाव संचालन के लिए ऐसे अनुभवी व्यक्ति की जरूरत है, जिसके नाम पर सभी सहमत हो। अध्यक्ष पद के लिए मोतीलाल वोरा का नाम आगे किया गया है। वे टीम-राहुल का हिस्सा नहीं रहेंगे, यह करीब तय माना जा रहा है। सो, वे प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहेंगे। राजधानी रायपुर में पार्टी दफ्तर के बाहर गांधी चौक पर बापूजी विराजमान हंै और अंदर बाबूजी, यह कोशिश चल रही है। अब निगाहें राहुल पर टिकी हैं कि भूपेश विरोधियों के प्रस्ताव को कितना तव्वजो देते हैं। जो लोग मोतीलाल वोरा की उम्र को लेकर यह सोचते हैं कि मेहनत करने में वे कमजोर पड़ेंगे, उनको शायद यह मालूम नहीं है कि वोराजी के दफ्तर और घर पर दोनों जगह दो-दो स्टेनो टायपिस्ट रहते हैं, जो बारी-बारी से उनका डिक्टेशन लेते हैं, और बारी-बारी से अंग्रेजी और हिन्दी टायपिंग करते हैं। वे इस उम्र में भी रोज इतनी चि_ियों पर दस्तखत करते हैं जितने कि किसी मुख्यमंत्री के भी दस्तखत रोज नहीं होते होंगे। 
    इधर सीएम उतर रहे थे, उधर उनके 
    लिए कमोड दौड़ रहा था...

    दुर्ग जिले में अभी हुए एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की हिफाजत का इंतजाम ऐसा था कि उधर उनका हेलीकॉप्टर उतर रहा था, और इधर मंच के पीछे सुरक्षा निर्देशों के तहत टॉयलेट बनाने के लिए लोग कमोड और पाईप लेकर दौड़ रहे थे। जरूरत पडऩे पर सीएम को शौचालय के लिए किसी नई जगह पर न जाना पड़े इसलिए पुलिस मुख्यालय ने ऐसे कड़े निर्देश जिला पुलिस को दे रखे हैं कि मंच के ठीक पीछे एक ग्रीन रूम बनाकर उसमें जरूरत के लिए शौचालय का इंतजाम अनिवार्य रूप से रखा जाए। लेकिन गायत्री परिवार के विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में सुरक्षा का भयानक नजारा देखने मिला। जिनको चौकन्ना रहकर जांच करनी थी, वे पुलिस अफसर या तो शामियानेतले बैठकर सो रहे थे, या फिर वे मोबाइल पर बात करने में मस्त थे। इंटेलिजेंस के एडीजी अशोक जुनेजा अगर अपने निर्देशों को देखें तो उसमें लापरवाही कैसे-कैसे बरती जा सकती है, इसका एक नजारा उन्हें सीएम के इस कार्यक्रम में देखने मिल सकता है। एक तरफ तो मुख्यमंत्री पर इतना खतरा केन्द्र सरकार भी मानती है कि उनकी सुरक्षा के निर्देश सीधे दिल्ली से आते हैं, दूसरी तरफ कई बड़े अपराधों वाले दुर्ग जिले में ऐसी भयानक लापरवाही मीडिया के कैमरों में दर्ज भी हुई है। 
    लोग जानते हैं कि क्या और क्यों है...
    प्रदेश के कई कलेक्टरों के बीच कामयाबी और शोहरत के लिए जिस तरह की देखादेखी और तनातनी का मुकाबला चल रहा है, उसमें मीडिया और सोशल मीडिया के मजे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कुछ दिनों पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से यह कहा था- लोग पहले पेपर उठाते थे तो सबसे पहले संपादकीय पढ़ा करते थे। संपादकीय से समझ में आ जाता था कि पेपर की कीमत, वजन, और संपादक कितना मजबूत है। अब संपादकीय सबसे आखिर में लोग देखते हैं, यह पेपर का अवमूल्यन है। लोग जानते हैं कि संपादक क्या लिखेगा, और क्यों लिखेगा।  उसी तरह आज सोशल मीडिया पर तैरते पन्ने देखकर तजुर्बेकार और जानकार लोग भांप लेते हैं कि कौन से अफसर अपनी तारीफ में, और किसकी बुराई का प्रचार करवा रहे हैं, किस प्रचार के पीछे कौन है। और जब ऐसी नीयत झलकती रहती है, तो उसकी विश्वसनीयता शून्य के भी नीचे चली जाती है, कारगिल पर जमी बर्फ की तरह माइनस में।
    बाफना का कल, आज, और कल?
    संसदीय सचिव लाभचंद बाफना के भाई पर यह आरोप लगा कि अपनी ट्रकों को बचाने के लिए उसने आरटीओ अफसरों को पीटा। अब ऐसे पिटे हुए अफसर थाने पहुंचे, तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की क्योंकि लाभचंद बाफना गृह मंत्रालय से जुड़े हुए संसदीय सचिव हैं, और सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक भी हैं। आरटीओ के जिस अफसर ने पिटने के बाद उफ् कर दी, उस अफसर को अटैच कर दिया गया। यह सब देखकर राजधानी में भाजपा के कुछ नेता यह याद दिला रहे हैं कि संसदीय सचिव बनने की पिछली शाम जब लाभचंद बाफना का नाम किसी तरह जुड़ ही नहीं पाया था, तब लाभचंद ने फोन करके किसके बारे में किसी जुबान में क्या-क्या कहा था, और अगली सुबह जब शपथ लेने की लिस्ट में नाम जुड़ गया, तो जाकर उन्हीं के पांव कैसे छू लिए थे। खैर, गाली देना या पांव छूना तो भाजपा के भीतर की बात है, बड़ी बात यह है कि सरकारी ड्यूटी के अफसर को पीटकर भी कोई नेता-भाई किस तरह बच सकता है, और इससे प्रदेश के बाकी लाखों अफसर-कर्मचारियों को क्या संदेश जाएगा? लेकिन लोगों को अच्छी तरह याद है कि रमन सरकार बनने के कुछ हफ्तों के भीतर ही राजधानी में मंत्रालय के ठीक सामने शास्त्री चौक पर किस मंत्री के भाई ने किस ट्रैफिक सिपाही को पीटा था, और फिर वह सिपाही कहां जाकर गिरा था। लेकिन इस बार लोग कुछ अधिक हैरान इसलिए हैं कि जिस दुर्ग जिले में बाफना के भाई ने आरटीओ के अफसर को पीटा है, वहां के एसपी एक कड़क अफसर माने जाते हैं, और उनकी सीबीआई में रवानगी किसी भी दिन हो सकती है, इसलिए बाफना पर ऐसे अहसान की कोई जरूरत भी नहीं थी।                    rajpathjanpath@gmail.com

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