राजपथ - जनपथ

Posted Date : 06-Dec-2017
  • 6 दिसंबर 1992, आज ही के दिन अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, और उसमें छत्तीसगढ़ से गए हुए कारसेवक भी शामिल थे। उनमें से एक, भाजपा के एक बड़े नेता लौटते हुए गिराए गए ढांचे की ईंटें लेकर लौटे थे, और रायपुर में अखबारों के दफ्तर में जाकर उन ईंटों के दर्शन भी करवाए गए थे। कुछ पत्रकारों ने ईंटों की ऐसी झांकी को डांटकर भगा दिया था, और कुछ ने बड़ी आस्था से प्रणाम किया था। ईंटें लेकर चलने वालों का अंदाज उस वक्त ऐसा था कि सरहद से दुश्मन का सिर काटकर बहादुर सिपाही घर लौटे हैं। बाद के बरसों में भाजपा की सरकार नहीं रही तो ये ईंटें दब गई थीं। अब आज बदले हुए माहौल में भाजपा के वे नेता फिर से उन ईंटों को निकाल सकते हैं कि उन्होंने किस तरह बाबरी मस्जिद की ईंट से ईंट बजा दी थी। 

    अदालत-सरकार बेअसर
    सरकार के नियम बहुत से बन जाते हैं, लेकिन अमल किसी पर होना बड़ा मुश्किल होता है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए पटाखों और आतिशबाजी पर राज्य सरकार ने रोक लगाई, और वह पूरी तरह बेअसर है। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शादी और बारात में भी कितनी जमकर आतिशबाजी हुई, यह खुद सरकार के पास तस्वीरों और वीडियो में पहुंची है। प्लास्टिक के कप-प्लेट-ग्लास-चम्मच बिकने में एक धेले की कमी नहीं आई है, और सड़कों के किनारे इसकी दुकानें ज्यों की त्यों सजी हुई हैं। हाईकोर्ट के और राज्य सरकार के हुक्म के बावजूद सड़क पर ऐसी गाडिय़ां के काफिले बारातों के आगे-पीछे दिखते हैं जिनमें दर्जनों स्पीकर बांधकर भयानक शोर किया जाता है। अब सरकार और अदालत ये दोनों अगर बेअसर हैं, तो वह दिन अधिक दूर नहीं है कि दिल्ली में खेल रहे श्रीलंकाई क्रिकेट खिलाडिय़ों की तरह इस शहर में भी लोग मास्क लगाकर घर से निकलें। 
    पदयात्रा ने बढ़ा दी दूरियां
    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत के बीच खटास बढ़ गई है। कुछ समय पहले जिला अध्यक्षों के चयन और सेक्स-सीडी मामले पर दोनों नेता भिड़ चुके हैं। हालांकि बाद में दोनों ने कई जगहों सरकार के खिलाफ अभियान में साथ आकर सब कुछ ठीक होने का संकेत भी दिया। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। सुनते हैं कि जांजगीर-चांपा और रायगढ़ जिले में पदयात्रा कार्यक्रम को लेकर भूपेश और महंत समर्थकों के बीच फिर ठन गई है। महंत का 13 दिसम्बर को जन्मदिन है। इस दिन कोरबा-जांजगीर चांपा जिले में कई जगहों पर जलसे की तैयारी है। लेकिन भूपेश ने 11 तारीख से पदयात्रा शुरू करने का फैसला ले लिया। राहुल की ताजपोशी के चलते इस कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया और अब यात्रा 12 तारीख से निकलेगी। महंत समर्थक चाहते थे कि पदयात्रा 13 तारीख के बाद निकाली जाए। लेकिन पीसीसी ने तारीख आगे बढ़ाने से मना कर दिया। यात्रा में सभी प्रमुख पदाधिकारियों को मौजूद रहने के लिए कहा जा रहा है। इससे महंत समर्थक नाराज हैं और वे इस पदयात्रा को जन्मदिन कार्यक्रम को फीका करने की कोशिशों के रूप में देख रहे हैं।
    स्काईवॉक से एक नया खतरा
    राजधानी रायपुर में बन रहे स्काईवॉक को लेकर कुछ लोगों ने एक नए किस्म की गैरतकनीकी दिक्कत का खतरा सामने रखा है। उनका कहना है कि जब सड़कों पर चल रही गाडिय़ों के दरवाजे खोल-खोलकर लोग थूकते हैं, तो धरती से बीस फीट ऊपर स्काईवॉक पर चलते हुए वे अपनी पीक कहां डालेंगे? जाहिर है कि नीचे चलने वाले लोगों पर। हो सकता है कि इससे दुपहिया वाले लोगों का हेलमेट लगाना बढ़ जाए और उनकी जान बचने लगे, लेकिन कपड़ों के ऊपर रेनकोट जैसी जैकेट इस गर्म इलाके में लोग कैसे पहनेंगे? और पीक की धार मारने वाले लोगों का हाल यह है कि अपनी ऊंचाई से अधिक ऊपर तक वे पीक की मार कर देते हैं। 

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Posted Date : 05-Dec-2017
  • शिक्षाकर्मियों का एक पखवाड़े का आंदोलन बीती रात जिस हैरतअंगेज तरीके से आधी रात को यह हड़ताल वापिस हुई, उसने सबको हक्का-बक्का कर दिया। अपने कार्यकाल के आखिरी पखवाड़े में बहुत ताकतवर और तजुर्बेकार एसीएस एमके राऊत ने इस हड़ताल को टालने की जिस तरह से कोशिश की थी, उससे मुख्यमंत्री के टेबिल पर ही बातचीत टूटने से बड़ी किरकिरी हुई थी, और सरकार इस फजीहत में आ गई थी कि मुख्यमंत्री के बाद भला और कौन यह काम कर सकते हैं? इसके बाद हड़ताल के बीच पंचायत विभाग के एसीएस बनने वाले आरपी मंडल ने भी इसे सुलझाने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं। पिछले दो दिनों में मुख्य सचिव विवेक ढांड इसे सुलझाने में या खत्म करवाने में जुटे और प्रदेश भर के कलेक्टरों से बात करके उन्होंने लगातार कोशिश की, लेकिन उससे भी बात बनी नहीं। आखिर में रायपुर के कलेक्टर ओपी चौधरी को बीच में डाला गया, और उनका विभागीय जिम्मा न होते हुए भी पिछले दो दिनों में उन्होंने हड़ताली नेताओं से जेल के भीतर और बाहर बातचीत जारी रखी और उसे किनारे पहुंचाया। इस बीच सरकार के भीतर भी तनातनी इतनी हो गई थी कि कुछ लोग बर्खास्त किए गए शिक्षाकर्मी नेताओं को वापिस लेने के खिलाफ एकदम अड़ ही गए थे। ऐसे में उनसे बातचीत कामयाब होने वाली नहीं थी। कल रात दस बजे के करीब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पूरे मामले में सीधी दखल दी और रायपुर कलेक्टर को बातचीत करके सभी शर्तें तय करने के लिए अधिकृत किया। उन्होंने यह साफ किया कि ओपी चौधरी जो समझौता करेंगे, वह सरकार पूरी तरह मानेगी। नतीजा यह निकाला कि चौधरी की कुर्सी पर बैठकर राज्य के पहले कलेक्टर रहे राऊत, और बाद में एक और कलेक्टर रहे मंडल की समझौता-क्षमता पार करके चौधरी ने इसे निपटा दिया। रात एक बजे तक मुख्यमंत्री को खबर की जाती रही, और ओपी चौधरी के साथ रायपुर के ही छात्र रहे आज के एसपी संजीव शुक्ला भी लगे रहे। चौधरी की कामयाबी के पीछे यह भी रहा कि वे गांव के एक सरकारी स्कूल से पढ़कर निकले खालिस छत्तीसगढ़ी हैं, और हड़तालियों से बातचीत में उनकी यह जमीन खासी काम आई।
    यह हड़ताल खत्म करवाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी आधी रात की बातचीत में ओपी चौधरी को एक नेता मान लिया है। 

    शशि कपूर की कुछ यादें...
    फिल्म अभिनेता शशि कपूर के गुजरने से देश भर में उनको जानने वाले लोगों के बीच बड़ी अच्छी यादें सामने आ रही हैं। रायपुर के बहुत से लोगों को याद है कि किस तरह एक वक्त पृथ्वीराज कपूर अपना नाटक, पठान, लेकर रायपुर आए थे और यहां की एक पुरानी टॉकीज में उसका शो हुआ था। उस नाटक में कपूर परिवार के कुछ और लोगों के साथ-साथ शशि कपूर भी थे जो कि एक बच्चे की भूमिका में थे। पुराने कुछ लोगों को याद है कि नाटक के बाद पृथ्वीराज कपूर परिवार सहित चादर लेकर गेट पर खड़े हो जाते थे, और निकलते हुए लोगों से नाटक के लिए सहयोग मांगते थे।
    छत्तीसगढ़ के एक अखबारनवीस सुनील कुमार ने कई मौकों पर दिल्ली और बंबई में शशि कपूर को इंटरव्यू किया था और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में उनकी कई फिल्में उनके साथ देखी थीं, या उनके बारे में बात की थी। वे छोटे से शहर के एक गैरअंगे्रजीभाषी नौजवान पत्रकार के साथ भी बड़ा हौसला बढ़ाने वाला दोस्ताना बर्ताव करते थे और पूरा समय देते थे। मुंबई फिल्म समारोह के दौरान 1984 में रायपुर से वहां गए हुए यहां के एक फोटोग्राफर प्रद्युम्न अग्रवाल (बालाजी) से तस्वीरें खिंचवाने के लिए जब सुनील कुमार ने शशि कपूर से अनुरोध किया, तो वे तुरंत तैयार हो गए। इसके बाद जुहू में उनके पृथ्वी थिएटर के अहाते में फोटो सेशन तय हुआ, और उन्होंने आधा-पौन घंटे तक जिस तरह फोटोग्राफर ने चाहा, उस तरह दर्जनों या सैकड़ों तस्वीरें खिंचवाईं। 
    रायपुर के नाटकों से जुड़े हुए एक रंगकर्मी सुभाष मिश्रा जब दिल्ली में पृथ्वी थिएटर में हबीब तनवीर का नाटक आगरा बाजार देखने पहुंचे थे, तब भी वहां व्हीलचेयर पर पहुंचे हुए शशि कपूर से उनकी मुलाकात हुई थी, और देर तक बात हुई थी। रायपुर के एक और रंगकर्मी मिर्जा मसूद की भी शशि कपूर से कुछ छोटी-छोटी मुलाकातें हैं। 
    गैस एजेंसी की लॉटरी खुली
    इंसान की किस्मत कब चमक जाए, यह कोई नहीं जानता। ऐसे ही सिंचाई विभाग के एक छोटे कर्मचारी की अचानक किस्मत बदल गई। हुआ यूं कि सिंचाई कर्मी ने अपनी पत्नी के नाम पर गैस एजेंसी लेने के लिए फार्म भरा था और पिछले दिनों उनके नाम की लॉटरी निकल गई। यानी रायपुर शहर में सरकारी गैस कंपनी की उन्हें एजेंसी मिल गई। एजेंसी के लिए सैकड़ों लोग कोशिश करते हैं। हर महीने लाखों रूपए की नियमित आय होने के कारण इसके लिए मारा-मारी रहती है। लेकिन गैस एजेंसी आबंटन की प्रक्रिया अब पारदर्शी हो गई है। इसमें किसी तरह की गड़बड़ी या सिफारिश की गुंजाईश नहीं रह गई है। एजेंसी के लिए सैकड़ों लोग फार्म भरते हैं, लेकिन लॉटरी के जरिए एजेंसी के लिए नाम तय होते हैं। 
    सुनते हैं कि कई प्रभावशाली लोग अब गैस एजेंसी मिलने के बाद सिंचाई कर्मी का पार्टनर बनने के लिए तैयार बैठे हैं। लेकिन उसने सभी को मना कर दिया। अब जल्द ही वीआरएस लेकर एजेंसी का काम शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। न सिर्फ सिंचाई कर्मी बल्कि दो दिन पहले यहां के एक छोटे अखबार के फोटोग्राफर की भी किस्मत संवर गई। उसके परिवार के सदस्य के नाम गैस एजेंसी का लॉटरी निकल गई। अब वे भी जल्द ही गैस एजेंसी चलाने की तैयारी कर रहे हैं। 
    सयान की सीट पर कई नजरें
    विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान 85 बरस के हो गए हैं। वे शारीरिक और मानसिक रूप से फिट भी हैं। लेकिन वे अगला चुनाव  नहीं लड़ेंगे, क्योंकि केन्द्र से लेकर कई राज्यों में भाजपा ने बुजुर्ग नेताओं को घर बिठा दिया है। पार्टी की रणनीति नए चेहरों को आगे लाने की है। दीवान बिलासपुर जिले की बेलतरा सीट से चुनकर आए हैं। बेलतरा को भाजपा का गढ़ माना जाता है। यही वजह है कि पार्टी के कई प्रभावशाली नेता दीवान का उत्तराधिकारी बनने के लिए प्रयासरत हैं। सुनते हैं कि दीवानजी अपने बड़े बेटे को अपनी जगह चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जो कि उनका राजनीतिक कामकाज भी देखते हैं। मंझले पुत्र भी चुनाव लडऩे के इच्छुक बताए जाते हैं। ऐसे में घर में ही मतभेद की स्थिति है। इस सीट पर हाऊसिंग बोर्ड अध्यक्ष भूपेन्द्र सवन्नी की भी निगाहें हैं। वे जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन में उनकी पकड़ भी है, वे प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक के एकदम करीबी माने जाते हैं। वे चुनाव लडऩे के इच्छुक हैं। इसके लिए वे क्षेत्र में लगातार मेहनत भी कर रहे हैं। पार्टी के कुछ लोगों का मानना है कि दीवान परिवार में असमंजस की स्थिति का फायदा सवन्नी को मिल सकता है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 04-Dec-2017
  • सरकार में काम कर चुके कई अफसरों ने अपनी सेवा अवधि के दौरान राज्य में अकूत धन संपत्ति बनाई है। इन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे लेकिन बाल बांका नहीं हो पाया। रिटायर होने के बाद कुछ अपने गृह राज्य में शिफ्ट हो चुके हैं या फिर होने की तैयारी कर रहे हैं। पहले उन्होंने यहां सरकार में पद पाने की कोशिश की थी। लेकिन इसमें अब तक सफलता नहीं मिल पाई। अब ये काली कमाई से जुटाई संपत्तियों को निकालने के फेर में हैं। 
    सुनते हैं कि एसीएस रहे एक अफसर अपने आलीशान मकान को बेचने के लिए प्रयासरत हैं। वीआईपी रोड स्थित उनके मकान की कीमत ढाई करोड़ रखी गई है। यहां लिफ्ट भी लगी हैं। इसी तरह एक रिटायर पुलिस अफसर भी वीआईपी रोड सहित अन्य जगहों पर स्थित अपनी जमीन को निकालने के लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि ये संपत्तियां उनके करीबी रिश्तेदारों के नाम पर हैं। इन संपत्तियों को बेचने के लिए कई लोग प्रयासरत हैं, जिसमें पुलिस विभाग के लोग भी शामिल बताए जाते हैं। भले ही ये  मकान या जमीन काली कमाई से जुटाई गई है लेकिन दाम ऊंचा चाह रहे हैं। सो, इन सौदों में दिक्कत आ रही है। लेकिन यह लिस्ट बड़ी लंबी है, और छत्तीसगढ़ के कुछ लोगों ने दूसरे लोगों के नाम पर जो बड़ी-बड़ी जमीनें ले रखी हैं, वे उनसे वापिस पा सकेंगे या नहीं इसमें भी शक है। फिर भोपाल में मौजूद इनकमटैक्स के एक बड़े अफसर ने छत्तीसगढ़ में मौजूद अपने संपर्कों से अनुरोध किया है कि ऐसी बेनामी जमीनों की जानकारी देकर सरकार की मदद करें, और इनकी कीमत के अनुपात में ईनाम भी गोपनीयता के साथ-साथ पाएं। अखबारों में कम तनख्वाह पाने वाले कई लोगों के पास ऐसी बहुत सी जानकारी है, और वे कालाधन खत्म करने के राष्ट्रीय अभियान में मदद भी कर सकते हैं, देश की भी, और अपनी खुद की भी।


    कांग्रेस में बदलाव बाकी?
    विधानसभा चुनाव में सालभर से भी कम समय बाकी है लेकिन प्रदेश कांग्रेस अभी भी बदलाव के दौर से गुजर रही है। पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने अध्यक्ष बदलने की मुहिम छेड़ दी है। रोज नए-नए फार्मूले सुझाए जा रहे हैं। एक फार्मूला फिर से पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव को अध्यक्ष और भूपेश बघेल को नेता प्रतिपक्ष की कमान देने का सुझाव दिया गया है। सुनते हैं कि पार्टी में इस फार्मूले पर गंभीरता से मंथन भी हो रहा है और पार्टी के कई नेताओं का दावा है कि इस माह के अंत तक फैसला हो सकता है। हालांकि, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू और पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा के भी अध्यक्ष की दौड़ में होने की चर्चा है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रभारी सचिव ने अनौपचारिक चर्चा में यह साफ कर दिया था कि जिन चेहरों को आजमाया जा चुका है, उन पर पार्टी दांव नहीं लगाएगी।  

    उसे बसाने, इसे बचाने की तरकीब
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में साल के हर दिन कोई न कोई धरना-प्रदर्शन चलता ही रहता है। बहुत से दिन तो ऐसे रहते हैं कि एक-एक दिन में कई-कई आंदोलन होते हैं, सड़कों को जगह-जगह बंद कर दिया जाता है, और पुलिस-प्रशासन के अफसर उस दिन केवल आंदोलन से ही जूझते हैं, अपने दफ्तरों का कोई काम नहीं कर पाते। अब स्टेडियम के किनारे जिस जगह पर पार्किंग होनी थी, वह जगह तो धरने के लिए छोटी पडऩे लगी। इसलिए अब ऐतिहासिक हिन्द स्पोर्टिंग मैदान को नया धरनास्थल बना दिया गया है। वहां एक साथ कई धरने शुरू हो गए हैं, इसलिए पूरे मैदान में गड्ढे खोदकर, बल्लियों से उसके अलग-अलग हिस्से कर दिए गए हैं, ठेलों के मेले लग गए हैं, और गंदगी भी शुरू हो गई है। एक और नतीजा यह है कि धरनास्थल से मुख्यमंत्री निवास या राजभवन आते-जाते जुलूस अब शहर की और दो किलोमीटर सड़क पर रास्ता बंद कर देंगे। लोकतंत्र में आंदोलनों की जगह जरूरी है, लेकिन साथ-साथ शहर के ढांचे में शहर के जीने और सांस लेने की जगह भी जरूरी है। जिस मैदान पर स्टेडियम बनाने की बात चल रही थी, वह अब मैदान भी नहीं रह गया, और महज धरनास्थल हो गया है। ऐसा लगता है कि कुछ सौ बरस पहले जब रायपुर जैसे शहर की कल्पना की गई होगी, तब लोकतंत्र और आंदोलनों की कल्पना नहीं रही होगी कि इसके लिए भी जगह रखनी चाहिए। 
    अब पुराने रायपुर में सांस लेने को जगह नहीं है तो यहां आंदोलन ही आंदोलन होते हैं। दूसरी तरफ पूरी सरकार नए रायपुर में बसती है, और वहां पर हजारों एकड़ इलाका खाली पड़ा है, लेकिन वहां किया गया आंदोलन किसी की नजर में तो आएगा नहीं, जंगल में मोर नाचा, किसने देखा, जैसी नौबत आ जाएगी। वरना जहां सरकार है, वहीं पर आंदोलन अगर किए जाते, तो नया रायपुर कुछ बस जाता, और पुराना रायपुर कुछ बच जाता।


    एक नाव के सवार...
    कई बार कुछ लोग इसलिए बच निकलते हैं कि वे किसी और के साथ एक ही नाव पर सवार होते हैं, और ताकतवर लोग बचाते किसी और को हैं, लेकिन उसके लिए बचाना पूरी नाव को पड़ता है, और इसलिए बाकी भी बच जाते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले राजस्थान में काले हिरण के शिकार का मामला अदालत में चलते-चलते इस हद तक दम तोड़ गया कि सारे गुनहगार बच निकले, और ऐसा लगा कि काला हिरण ही बाजार जाकर बंदूक खरीदकर लाया होगा, और अपने को गोली मारकर उसी ने खुदकुशी की होगी। अब कुछ उसी तरह की बात छत्तीसगढ़ के वन विभाग में लंबे समय से चले आ रहे एक मामले को लेकर है जिसमें एक बड़े नेता के बड़े ही करीबी एक बड़े अफसर को बचाने के लिए अब कोशिश हो रही है, और उससे आखिर में जाकर ऐसा साबित हो सकता है कि आरा मिलों के ल_ों ने बाजार जाकर खुद ही टेप खरीदा, और लौटकर अपनी कमर नाप ली, इसमें सरकार के पैसे ही खर्च नहीं हुए। किसी एक को बचाने के चक्कर में बाकी लोग भी बचते दिख रहे हैं, और आखिर में लकड़ी के ल_ों को ही कुसूरवार ठहराकर फांसी देना ठीक रहेगा। 


    मंदिर हटाते अफसर हटा
    बस्तर में एक जगह सड़क किनारे के अवैध कब्जे हटाते हुए एक मंदिर को भी हटाया गया, और इसे लेकर वहां जनता इस कदर भड़की कि वहां के आईएएस एसडीएम राहुल वेंकट को हटाना पड़ा, और हटाकर जिले में कलेक्टर के मातहत सहायक कलेक्टर रखा गया। इसे लेकर कल आईएएस एसोसिएशन के आधा दर्जन लोग जाकर मुख्य सचिव से मिले, और कहा कि जैसे हालात में एक नौजवान अधिकारी को हटाया गया है, उससे बाकी अफसरों का मनोबल टूटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ तो सभी सार्वजनिक जगहों से धर्मस्थलों को हटाने का आदेश दिया है,  दूसरी ओर ऐसा करने पर मंदिर को बचाने की कोशिश हो रही है, और अफसर को तो हटा ही दिया गया है। नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में अवैध धर्मस्थलों का हौसला बुलंद हो गया है, और अफसर चुप बैठने की कगार पर हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय सिंह के साथ पांच और आईएएस गए थे, और इनके बीच बाद में यह चर्चा होती रही कि हो सकता है कि सीएस के कमरे में एसोसिएशन की ऐसी बैठक में टेबल के इस तरफ अजय सिंह आखिरी बार रहे हों। अगली ऐसी नौबत आने के पहले हो सकता है कि सीएस के कमरे पर तख्ती बदल जाए।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 03-Dec-2017
  • धान बोनस के मुकाबले तेंदूपत्ता बोनस दस फीसदी के आसपास हो गए हैं, लेकिन जिन आदिवासियों के पास यह पैसा जाएगा, वे किसानों के मुकाबले अधिक गरीब हैं, और छोटी सी रकम भी उनके लिए बहुत मायने रखेगी। लेकिन आज सरकार तेंदूपत्ता बोनस को जितनी बड़ी कामयाबी बता रही है, उसका इतिहास जिन लोगों को याद होगा वे इसके लिए आज भी अर्जुन सिंह को धन्यवाद देंगे। अविभाजित मध्यप्रदेश के इमरजेंसी के बाद के पहले मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एक सामंती परिवार से आने के बावजूद, और अपनी संपन्नता के बावजूद प्रदेश के सबसे गरीब लोगों के लिए चार ऐसी योजनाएं बनाईं, जो कि उनके चले जाने के बाद, कांग्रेस सरकार के चले जाने के बाद भी किसी ने बदलने की हिम्मत नहीं की। इनमें से तेंदूपत्ते का राष्ट्रीयकरण सबसे बड़ा फैसला था क्योंकि उस वक्त छत्तीसगढ़ में निजी ठेकेदार जंगलों को ठेके पर लेते थे, और फिर मजदूरी देकर तेंदूपत्ते तुड़वाते थे, और फिर उन्हें बीड़ी बनाने वालों को बेचते थे। 
    इस कारोबार में हजारों करोड़ का मुनाफा ठेकेदारों को जाता था, और इनमें छत्तीसगढ़ भाजपा के उस वक्त के सबसे बड़े नेता लखीराम अग्रवाल भी शामिल थे। अर्जुन सिंह ने एक झटके में तेंदूपत्ता का निजी कारोबार बंद किया, तो उससे आदिवासियों को इतना फायदा होने लगा कि आज करीब चालीस बरस बाद भी उस फैसले को कोई छू भी नहीं सका। इसके अलावा उन्होंने गरीबों को एकबत्ती कनेक्शन दिया, रिक्शा चालकों को रिक्शों का मालिकाना हक दिया, और जो गरीब सरकारी जमीन पर जहां बसे हुए थे, वहीं पर उन्हें मकान के लिए जमीन का पट्टा दिया। गरीबों के भले के लिए इन चार योजनाओं से बड़ी और कोई बात कोई अकेले मुख्यमंत्री नहीं कर पाए थे, और ये चारों बातें आज न सिर्फ जारी हैं, बल्कि सरकार के लिए इन सबको आगे बढ़ाना भी एक मजबूरी बनी हुई है। 
    भविष्य पढऩा, और बनाना...
    प्रशासनिक मुखिया विवेक ढांड और पुलिस प्रमुख एएन उपाध्याय भले ही ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते हैं लेकिन कई प्रशासनिक और पुलिस के अफसरों को इस पर पूरा भरोसा है। कईयों को तो ज्योतिष का पूरा ज्ञान है और उनके कम्प्यूटर में ग्रह-नक्षत्रों की पूरी जानकारी फीड है जिसे देखकर वे समय-समय पर अपने करीबियों को परामर्श भी देते हैं। 
    दुर्ग एसपी रहे 83 बैच के आईपीएस अफसर शिवशंकर लाल कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में डीजी पद से रिटायर हुए। उनकी ज्योतिष पर काफी कुछ पकड़ रही है और अब रिटायर होने के बाद भोपाल में लोगों को ज्योतिष का परामर्श देते हैं। छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर रहे स्व. वीके कपूर को भी ज्योतिष की अच्छी जानकारी थी। वे इसको लेकर अपने करीबियों को चौंकाते भी रहे हैं। सीएम के सलाहकार शिवराज सिंह, राजस्व मंडल के चेयरमैन केडीपी राव और एडीजी पवन देव को भी ज्योतिष का भरपूर ज्ञान हैं। उनसे कई लोग परामर्श भी लेते हैं। केडीपी राव का छत्तीसगढ़ में कार्यकाल सदमों से भरा हुआ रहा, लेकिन अपने ज्योतिष की जानकारी के चलते उन्हें समय रहते यह अहसास हो जाता था कि आने वाले वक्त में उनका कुछ बुरा होने वाला है। वे देश की सबसे प्रतिष्ठित ज्योतिष पत्रिकाओं में लगातार लिखते भी रहते हैं। लेकिन जाहिर है कि भविष्य का ज्ञान लोगों को बेहतर भविष्य बनाने में अधिक मदद नहीं करता।
    राहुल के निशाने पर, पर यहां करीब...
    गुजरात में अडानी समूह राहुल गांधी के निशाने पर हैं। राहुल अपनी सभाओं में मोदी सरकार पर चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं। अडानी समूह की भाजपा नेताओं से नजदीकियां जगजाहिर है। इन सबके बीच यहां के कांग्रेस नेताओं की  अडानी समूह से नजदीकियों की जमकर चर्चा है। सुनते हैं कि अडानी समूह को राज्य में दो जगह कोयला निकालने का काम मिला है। कंपनी ने कोयला परिवहन का काम कांग्रेस से जुड़े लोगों को दिया है। इनमें पार्टी के प्रभावशाली लोगों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका है। इसकी शिकायत पार्टी हाईकमान से भी की गई है। संगठन चुनाव के बाद प्रदेश कांग्रेस में काफी कुछ बदलाव होना है। अगर पार्टी इन शिकायतों को गंभीरता से लेती है, तो पद पाने के इच्छुक ऐसे नेताओं को किनारे लगाया भी जा सकता है। 
    धंधे का धंधा, सेवा की सेवा
    बहुत से बड़े कारखानेदार कभी सरकार के दबाव में, तो कभी अपनी मर्जी से समाजसेवा के कुछ काम करते हैं। वैसे तो सरकार ने यह तय कर रखा है कि उद्योग अपनी कमाई का कितना फीसदी समाजसेवा के लिए खर्च करें, लेकिन कुछ लोग खुद होकर भी उससे कहीं अधिक खर्च करते हैं। लोगों का रूझान इससे भी पता लगता है कि कौन से उद्योगपति किस तरह के काम में खर्च करना चाहते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ में दो बड़े उद्योगपति ऐसे हैं जो कि अपने मुनाफे के एक कारोबार को आगे बढ़ाकर उसमें बहुत से और लोगों को जोडऩा चाहते हैं। राजनांदगांव के आईबी ग्रुप के बहादुर अली ने डेयरी का काम शुरू किया है, और उसे बड़े पैमाने पर ले जा रहे हैं, छत्तीसगढ़ के गांव-गांव तक उनकी डेयरी का दूध पहुंचने लगा है। दूसरी तरफ राजनांदगांव से ही निकलकर रायपुर आकर काम करने वाले कमल सारडा भी डेयरी के काम को बढ़ाते चल रहे हैं, अपने ब्रांड से दूध-घी की मार्केटिंग कर रहे हैं, और अब वे दूसरे किसानों को डेयरी चालू करवाकर उनके दूध को अपने ब्रांड की मार्केटिंग से जोडऩे का काम भी करने जा रहे हैं, जैसा कि एक वक्त गुजरात के आनंद में किया गया था, और वहां अमूल ब्रांड से दुनिया की एक सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था खड़ी हुई है। यह जरूरी नहीं है कि किसी कारोबार की कामयाबी निजी मिल्कियत पर हो, अमूल ने यह साबित कर दिया है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी नहीं है कि कोई कारोबारी अपने मुनाफे के साथ-साथ दूसरों का मुनाफा भी न करवा सके, ऐसा शायद राजनांदगांव के ये दो डेयरी मालिक कर सकें। कमल सारडा आनंद डेयरी को महान बनाने वाले भारत की दुग्ध क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन की आत्मकथा पढ़कर उसकी प्रेरणा से आगे बढ़ रहे हैं।  rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 02-Dec-2017
  • प्रदेश के ताकतवर पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता डीजी बन पाएंगे अथवा नहीं, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। वैसे उनकी पदोन्नति में तकनीकी तौर पर अड़चन नहीं हैं, क्योंकि कैबिनेट ने डीजी के दो अतिरिक्त पद मंजूर कर प्रस्ताव केंद्र को भेज दिए हैं। केंद्र में गृह विभाग राजनाथ सिंह के पास है, उनकी राज्य के कई भाजपा नेताओं और एक-दो अफसरों से गहरी छनती है। ऐसे में इस बात की पूरी उम्मीद है कि डीजी के अतिरिक्त पदों को मंजूरी मिल जाएगी। केंद्र की मुहर लगने के बाद वर्ष-88 बैच के आईपीएस अफसर संजय पिल्ले के साथ ही आरके विज और मुकेश गुप्ता के डीजी बननेे का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन कुछ लोगों को समस्या मुकेश गुप्ता से है। वे नहीं चाहते कि गुप्ता डीजी बने। इसका नजारा कैबिनेट में भी देखने को मिला। जिसमें कुछ मंत्रियों ने डीजी का पद बढ़ाने के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए। 
    इससे परे गुप्ता से जुड़े उत्साही लोग उन्हें भावी डीजीपी भी मानकर चल रहे हैं। लेकिन उनके विरोधी हर हाल में उनका रास्ता रोकने के लिए तैयार बैठे हैं। सुनते हैं कि विरोधी खेमे के एक पुलिस अफसर तो आरएसएस के एक बड़े नेता से भी मिल आए। गुप्ता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा भी तैयार है और कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त आयोग के एक पदाधिकारी प्रधानमंत्री से भी मिलने की कोशिश में हैं। लेकिन जो लोग मुकेश गुप्ता को नजदीक से जानते हैं, वे मानते हैं कि गुप्ता अश्वमेघ रथ पर सवार हैं और उनका रास्ता रोक पाना नामुमकिन है। इससे पहले भी आईजी के पद पर पदोन्नति से पहले भी रोकने के लिए इसी तरह कोशिश की गई थी। तब तत्कालीन डीजीपी ने उनका सीआर तक खराब कर दिया था। बावजूद इसके वे मुकेश गुप्ता की पदोन्नति नहीं रोक पाए। अब जब सरकार की नजर में उनका सीआर उत्कृष्ट हैं, ऐसे में उनकी पदोन्नति रूक जाएगी, इसमें संदेह है। मुकेश गुप्ता के बारे में यह बात तो है कि उन्हें जानने वालों में लोग या तो उनके दोस्त हैं, या उनके दुश्मन हैं, बीच के कोई नहीं हैं। 
    चौदहवें बरस में भी दिग्विजय ?
    स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप ने शिक्षाकर्मियों की व्यवस्था के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। अब तो छत्तीसगढ़ सरकार अपने लगातार चौदह बरस पूरे होने का जश्न मना रही है, और शिक्षाकर्मी जैसे सबसे छोटे तबकों में से एक का एक बेहतर रास्ता न निकालकर अगर इस सरकार के मंत्री दिग्विजय सरकार को ही कोसने में लगी रहेंगे तो फिर यह सवाल भी उठेगा कि क्या राज्य की कामयाबी भी दिग्विजय के नाम लिखी जाए? लोकतंत्र में जहां सरकारों को पांच बरस का वक्त मिलता है, और उतने में ही उनसे काम कर दिखाने की उम्मीद की जाती है, वैसे में चौदहवें बरस में पिछले को कोसना वोटरों को निराश करने से कम कुछ नहीं है। इतने बरसों में तो छत्तीसगढ़ एक-एक शिक्षाकर्मी की नौकरी साम-दाम-दंड-भेद से खत्म भी कर सकता था, और नए शिक्षक तैनात भी कर सकता था। 
    भूत और पीपल को मिलाने की जरूरत
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर शादियों के महूरत पर ट्रैफिक जाम से जूझती है। होटलों और मैरिज-गार्डनों पर भीड़ इतनी लगती है कि सारे इंतजाम धरे रह जाते हैं, और घंटों तक ट्रैफिक फंस जाता है। दूसरी तरफ नया रायपुर एकदम सुनसान पड़ा रहता है, और अंधेरा होने के बाद वहां आने-जाने वाले लोग भी नहीं रहते हैं। किसी ने खासे पहले सलाह दी थी, और नया रायपुर में शादियों जैसे आयोजन के लिए जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े लंबी लीज पर देने की योजना भी बनी थी, लेकिन फिर उसका पता नहीं क्या हुआ। नया रायपुर के लिए जहां से रास्ता मुड़ता है, उसी मुहाने पर आधा दर्जन मैरिज गार्डन हैं, और वहां पर आना-जाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में एक पुरानी कहावत को याद करने की जरूरत है कि भूत को किराए पर पीपल दिलवा दिया जाए। भूत बेघर, और पीपल सुनसान पड़ा रहे, तो इनका मेल करवा देना चाहिए। लोग नया रायपुर के लिए मुड़कर दो-चार किलोमीटर बाद भी वहां ठीक-ठाक पार्किंग वाले मैरिज गार्डन में शादी रखना भी चाहेंगे, और जाना भी चाहेंगे। एक बार उस तरफ सिलसिला चल निकलेगा, तो धीरे-धीरे नया रायपुर बसने भी लगेगा। अभी तो शहर से 25 किलोमीटर दूर बसे मंत्रालय तक लोग मजबूरी में ही जाते हैं, और रास्ते का लगभग पूरा हिस्सा खाली और सुनसान पड़ा हुआ है। इसे लोगों को लंबी लीज पर देकर शहर की एक दिक्कत भी दूर हो सकती है, और नया रायपुर को बसने का आसार भी निकल सकता है। 
    शादी से महत्व का अंदाज
    शादियों का मौसम लोगों के बीच महत्व साबित करने, या महत्व पाने का भी रहता है। लोग बात-बात में तुलना करने बैठते हैं कि किनके घर की शादी में कितने लोग पहुंचे, और कौन-कौन लोग पहुंचे, कौन-कौन नहीं पहुंचे, और कौन-कौन बिना खाए निकल गए। ऐसे में भाजपा के नेता और सीएसआईडीसी के चेयरमेन छगन लाल मुंदड़ा के बेटे की शादी में पहुंचे लोग यह देखकर हैरान रहे कि गेट पर स्वागत करने वालों में सबसे सामने मंत्री राजेश मूणत लगातार खड़े रहे, और प्रदेश के सबसे बड़े उद्योगपति कमल सारडा भी। इसके अलावा मुख्यमंत्री सहित पूरा मंत्रिमंडल, सारे निगम-मंडल अध्यक्ष, तकरीबन तमाम बड़े अफसर, और बड़े कारोबारी, दूसरे प्रमुख लोग शादी में बड़ी देर तक बने रहे। इन तमाम लोगों की गाडिय़ों का हाल यह रहा कि जीई रोड लंबे समय तक एक तरफ की ट्रैफिक में ही बंद रहा। भाजपा या सत्ता के भीतर भी मेहमानों का ऐसा रेला कम ही देखने में आता है। 
    एक बुलेट तोड़ देती है, और दूसरी...
    बुलेट नाम का शब्द भी गजब का है। इसका इस्तेमाल भी आम जनता की जिंदगी में दो बिल्कुल अलग-अलग मामलों में होता है। एक तो पुराने वक्त से चली आ रही भारत की सबसे भारी-भरकम मोटरसाइकिल बुलेट, और दूसरी बंदूक-पिस्तौल से चलने वाली बुलेट। एक बुलेट जाकर लगती है तो लोगों के बदन को तोड़कर रख देती है। लेकिन दूसरी सड़क पर चलने वाली बुलेट एक ऐसा काम कर रही है जिसके लिए वह बनाई नहीं गई थी, वह लोगों को जोड़ रही है। 
    हुआ यह कि कुछ बरस पहले तक तो बुलेट मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी रॉयल इनफील्ड बंद होने के कगार पर थी, फिर शायद बॉलीवुड की किसी एक फिल्म में मोटरसाइकिल की शोहरत से नौजवानों के बीच यह फटफटी ऐसी चल पड़ी कि इसके लिए वेटिंग लिस्ट शुरू हो गई। इसके पहले कोई इसकी डीलरशिप चलाने के लिए नहीं मिलते थे। इसकी लोकप्रियता का हाल यह हुआ कि कुछ बरस के भीतर ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इसकी कई डीलरशिप खुल गईं, और सड़कों पर बुलेट ही बुलेट दिखने लगी। इसके साथ-साथ इसे चलाने वाले नौजवानों ने इस पर लंबे-लंबे सफर पर निकलना शुरू हो गया, नतीजा यह निकला कि हर बड़े शहर में बुलेट चलाने वालों के समूह बन गए, क्लब हो गए, और ये लोग सोशल मीडिया के मार्फत एक-दूसरे को इतना जानने और मानने लग गए कि दूसरे शहर जाने पर वहां के बुलेटप्रेमी आने वाले मेहमान बुलेटप्रेमी की खातिरदारी भी करने लगे। अब जब इनके बड़े-बड़े जत्थे एक साथ लंबे सफर पर निकलते हैं, तो कई जगहों पर रास्ते के क्लब उनकी मेजबानी भी करते हैं। रायपुर में ऐसा ही एक क्लब या समूह अपनी खातिरदारी के लिए इतना बदनाम हो गया है, कि दूर-दूर से आते-जाते मोटरसाइकिल-जत्थे पहले से खबर करके यहां रूकने लगे हैं, और सोने-खाने के मामूली इंतजाम से भी मोटरसाइकिल चलाने वाले खुश रह लेते हैं। 
    एक बुलेट लोगों को तोड़कर रख देती है, और एक बुलेट लोगों को जोड़कर रख देती है! 
    जनेऊ के पीछे का विज्ञान
    राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव में भाजपा के हिन्दू-गैरहिन्दू के आरोपों के जवाब में अपना जनेऊ निकालकर दिखा दिया। अब इसके बाद से जनेऊ के वैज्ञानिक आधार और उसके वैज्ञानिक फायदों को लेकर जानकारों और इस्तेमाल करने वालों के बीच ज्ञान के प्रचार की एक मुहिम शुरू हो गई है। एक जानकार का कहना है कि जनेऊ की वजह से बदन मल-मूत्र तेजी से खाली कर देता है। अब अगर सच में ऐसा है तो बाजार में जितने किस्म के कब्जनाशक चूर्ण बिकते हैं, उनको एक धागा अब तक बर्बाद कर चुका होता। और फिर दूसरी तरफ सुलभ शौचालय चलाने वाले लोग भी अपने शौचालय तेजी से खाली करने के लिए ऐसे धागे मुफ्त में देना शुरू कर देते। लेकिन धागे का विज्ञान इतना सरल और आसान दिखता नहीं है। और अब तो इसमें राजनीति घुस गई है, इसलिए हो सकता है कि धीरे-धीरे जनेऊ कई रंगों दिखने लगें। 
    मेडिकल कॉलेज खुले कैसे?
    छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों वाली कंपनी एसईसीएल ने कई बरस पहले तीन सौ करोड़ रूपए से अधिक देने का प्रस्ताव राज्य सरकार को दिया था कि उन पैसों से रायपुर में मेडिकल कॉलेज शुरू किया जाए। लेकिन सरकार की दिलचस्पी इसमें नहीं दिखती है, और उसने इसके लिए मना भी कर दिया था क्योंकि राज्य में अभी मौजूद मेडिकल कॉलेजों के लिए भी पढ़ाने वाले नहीं मिल रहे हैं, और वहां की सीटें रद्द होने की कगार पर हैं। यह सरकार और खुले बाजार के कारोबार के बीच की खींचतान है जिसमें सरकार को न अस्पतालों के लिए डॉक्टर मिल रहे हैं, न मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने के लिए शिक्षक मिल रहे हैं, और न ही सीएसआर के तहत मिलने वाले दान को लेने की हालत है। अब राज्य सरकार और एसईसीएल मिलकर सरगुजा के मनेन्द्रगढ़ में सरकारी अस्पताल बनाने और बढ़ाने जा रहे हैं ताकि उस इलाके में लोगों को अधिक सुविधाएं मिल सकें। 

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Posted Date : 01-Dec-2017
  • पिछले दिनों उद्योग भवन में एक्सपोर्ट के्रडिट गारंटी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (ईसीजीसी) की नई शाखा चालू हो गई। अब तक ईसीजीसी की नागपुर शाखा ही छत्तीसगढ़ का काम देखती थी। ईसीजीसी निर्यातकों को बाजार उपलब्ध कराने के साथ-साथ जोखिम से रक्षा की जिम्मेदारी भी निभाती है। प्रदेश में विशेषकर हस्तशिल्प और वनौषधि के  क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं।  ऐसे में ईसीजीसी के खुलने से निर्यात को मदद मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के इस महत्वपूर्ण संस्था के उद्घाटन कार्यक्रम में दिलचस्प नजारे देखने को मिले। 

    उद्घाटन कार्यक्रम एक निजी होटल में  हुआ। इसके लिए ईसीजीसी की सीएमडी सुश्री गीता मुरलीधर आई थीं।   कार्यक्रम स्थल हॉल को फूलों से सजाया गया था। मंच पर उद्योग मंत्री अमर अग्रवाल, सीएसआईडीसी के चेयरमैन छगन लाल मूंदड़ा सहित अन्य अतिथियों के नाम की प्लेट लगी हुई थी। लेकिन इनमें से कोई नहीं आए। सिर्फ मुख्य सचिव विवेक ढांड ही मौजूद थे। कार्यक्रम में मात्र 17 लोग ही थे। इनमें मीडिया कर्मी भी शामिल थे। फूलों से सजे मंच पर मात्र दो अतिथि सुश्री गीता मुरलीधर और विवेक ढांड बैठे थे। हाल यह है कि उद्योग व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अक्सर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, सरकार के मंत्री-अफसर निर्यात की संभावनाओं को टटोलने के नाम पर हर साल विदेश यात्राएं करते हैं। ऐसे में इतने महत्वपूर्ण संस्था की शाखा के उद्घाटन मौके पर लोगों की गैरमौजूदगी से दोनों अतिथि भी असहज महसूस करते दिखे। सीएमडी गीता मुरलीधर ने तो साज-सज्जा पर चुटकी लेते हुए शादी के कार्यक्रम से तुलना कर दी।  

    वरिष्ठता का झगड़ा निपटा
    राज्य के भावी मुख्य सचिवों वाली एक बैच के अफसरों के बीच वरिष्ठता का झगड़ा खत्म हुआ। वर्ष 1987 बैच के तीन आईएएस, चित्तरंजन कुमार खेतान, राजेंद्र प्रसाद मंडल, और बीवीआर सुब्रमण्यम अब तक छत्तीसगढ़ की वरिष्ठता सूची में कुछ अलग तरह से दिख रहे थे। 
    वर्ष 2014 की वरिष्ठता सूची में सुब्रमण्यम सबसे ऊपर आ गए थे, और इसके खिलाफ खेतान ने शासन को लिखा था। उनका तर्क सही था कि वे तीनों एक ही बैच के तो हैं, लेकिन खेतान और मंडल मप्र-छत्तीसगढ़ काडर के थे, और सुब्रमण्यम दूसरे राज्य से होते हुए बाद में छत्तीसगढ़ पहुंचे थे। ऐसे में भारत सरकार के नियमों के मुताबिक उन्हें इस दूसरे राज्य में अपने बैच के बाकी लोगों से नीचे जगह मिलनी थी। लेकिन किसी तरह सुब्रमण्यम का नाम इन दोनों से ऊपर चढ़ गया था। इस कॉलम में कई दिन पहले इस बारे में लिखा गया था कि इस वरिष्ठता क्रम के खिलाफ खेतान ने शासन से अपील की थी। 
    लेकिन पहली वरिष्ठता सूची मुख्यमंत्री के दस्तखत से मंजूर हो गई थी, इसलिए इस वरिष्ठता को बदलने में फिर उनकी मंजूरी लगी, और अब राज्य शासन की वेबसाईट पर भी वरिष्ठता बदल दी गई है। इस पूरी मशक्कत में मंडल चुपचाप बैठे रहे और खेतान को मेहनत करते देखते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि अगर यह मेहनत कामयाब हुई, तो वे अपने-आप सुब्रमण्यम से ऊपर आ जाएंगे।

    कांग्रेस अध्यक्ष और शहर अध्यक्ष
    इस माह कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की ताजपोशी तय है। टीम राहुल को लेकर पार्टी हल्कों में कयास लगाए जा रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भी घोषणा संभावित है। पार्टी के कई लोग मानते हैं कि भूपेश बघेल को ही दोबारा प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी। इन सबके बीच एक चर्चा यह भी है कि भूपेश भले ही अध्यक्ष बन जाए, लेकिन राजधानी का जिलाध्यक्ष उनकी अपनी पसंद का नहीं होगा। 
    सुनते हैं कि भूपेश ने महापौर प्रमोद दुबे की सिफारिश पर कारोबारी गिरीश दुबे  का नाम शहर अध्यक्ष के लिए फाइनल कराया था। लेकिन अब इसमें पेंच आ गया है। पार्टी के कई बड़े नेता मौजूदा अध्यक्ष विकास उपाध्याय को बदलने के पक्ष में नहीं है। विकास को सबसे ज्यादा सक्रिय जिला अध्यक्ष माना जाता है। शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब विकास ने सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन नहीं किया। इससे परे उनकी दिल्ली दरबार में भी अच्छी पकड़ बताई जाती है। टीम राहुल की एक सदस्य से उनकी अच्छी छनती है। कहा जाता है कि जब गिरीश का नाम फाइनल होने की खबर उड़ी, तो विकास ने अपने संपर्को को टटोला और फिर यथास्थिति बनवाने में कामयाब रहे। यानी जिलाध्यक्षों की सूची जारी होगी तो शहर अध्यक्ष का नाम भूपेश को चौंका सकता है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 30-Nov-2017
  • अपर मुख्य सचिव एमके राउत गुरूवार को रिटायर हो गए। वे पड़ोसी राज्य ओडिशा के हैं, और राज्य बनने के पहले वे मप्र काडर के थे, लेकिन कुल मिलाकर उनके करियर का ज्यादा हिस्सा छत्तीसगढ़ में गुजरा। वे रायपुर और बिलासपुर के कलेक्टर भी रहे। वे राजनेताओं के पसंदीदा रहे हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश मेें दिग्विजय सिंह और राज्य बनने के बाद वे अजीत जोगी के करीब रहे। उन्हें डॉ. रमन सिंह का भी भरोसा हासिल रहा। उन्होंने पंचायत विभाग में सबसे ज्यादा समय तक काम किया। उनकी विभागीय मंत्रियों से गहरी छनती रही है। राउत को पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर का अघोषित राजनीतिक सलाहकार भी मानते हैं। राउत के रिटायर होने पर विभाग की तरफ से विदाई पार्टी का आयोजन किया गया। खास बात यह है कि पुराने का अभिनंदन और विदाई के साथ-साथ नए प्रमुख के स्वागत की परम्परा रही है। लेकिन मंडल का कार्ड में नाम भी नहीं था।
    सुनते हैं कि ऐसा जानबूझकर किया गया क्योंकि राउत की मंडल से नहीं बनती है। मुख्यमंत्री और सरकार के सभी मंत्रियों के अलावा प्रमुख अफसरों को इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया। इस भव्य आयोजन में प्रधानमंत्री सड़क विभाग का अमला जुटा रहा और इसकी जिम्मेदारी उस चीफ इंजीनियर को दी गई, जिस पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे हैं। इसकी तत्कालीन मंत्री ननकी राम कंवर से लेकर सत्यनारायण शर्मा तक ने शिकायत की थी। इस दावत से जुड़े हुए कई किस्म के घोषित-अघोषित खर्चों की आज सरकारी अमले में जमकर चर्चा रही। 
    इसी तरह कुछ दिन पहले रिटायर होने के बाद गणेश शंकर मिश्रा के विदाई जलसे की भी जमकर चर्चा रही। इस आयोजन में भी सिंचाई विभाग के कुछ दागी अफसरों ने अहम भूमिका निभाई थी। इससे परे इसी राज्य में कई अफसर ऐसे रहे जिन्होंने विदाई-अभिनंदन समारोह से सिर्फ इसीलिए परहेज किया क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार के पैसे का खूब इस्तेमाल होता है।

    मुखिया बनने क्या-क्या न करें
    सरकार के कुछ सबसे ऊंचे ओहदों पर जब अफसरों के नामों में से कोई एक नाम छांटना होता है, तो बड़ी दिलजली होती है। कई बार ऐसा भी होता है कि सबसे सीनियर बैठे रह जाते हैं, और उनसे नीचे के अफसर को विभाग का मुखिया बना दिया जाता है। ऐसे में अपने मातहत के तहत काम न करना पड़े, इसलिए विभाग के ढांचे से परे की कुछ कुर्सियां रखी जाती हैं ताकि अफसरों को वहां बिठाकर वरिष्ठता का टकराव टाला जाए। ऐसे कई मौकों पर छत्तीसगढ़ में लगातार एक बात सामने आई है कि सबसे ऊपर के तीन-चार अफसरों में से मुखिया बनने के लिए जो लोग अपनी हसरत को कुछ अधिक उजागर कर देते हैं, वे लोग मौका खो बैठते हैं। आमतौर पर प्रशासन या किसी विभाग के मुखिया को चुनने का काम मुख्यमंत्री तक पहुंचता ही है। और ऐसे में जो अफसर एक लॉबिंग करने के अंदाज में पहले से लग जाते हैं, मुख्यमंत्री के करीबी दायरे तक बार-बार दौड़ लगाते हैं, वे लोग मौका खो भी बैठते हैं। दूसरी तरफ कई अफसर वक्त आने पर महज अपनी काबिलीयत और अपनी साख के चलते मुखिया बना दिए जाते हैं। लेकिन हर अफसर को जो एक जरूरी बात याद रखनी चाहिए, वह यह है कि अपने मातहत लोगों को साथ लेकर चलने की काबिलीयत की बड़ी अहमियत होती है, इसके बिना मुखिया बनने का मौका शायद ही किसी को मिलता हो। जिन लोगों की पसंद और नापसंद इतनी तगड़ी होती है कि उनके मुखिया बनने पर पूरा विभाग ही दो फांक हो जाए, या कि सारे मातहत बागी हो जाएं, तो उन लोगों को मौका नहीं मिलता। छत्तीसगढ़ के वन विभाग में कुछ समय पहले ही एक मुखिया बनाकर हटाना पड़ गया था क्योंकि एक भी मातहत साथ में काम करने को तैयार नहीं थे। आने वाले दिनों में ऐसी कई दूसरी कुर्सियों पर फैसले होने हैं, और लोग इस बात को याद रख सकते हैं। 
    अस्पताल फिर उसी ढर्रे पर
    प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अंबेडकर अस्पताल में कुछ महीने पहले ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत से पूरा स्वास्थ्य विभाग हिल सा गया। गोरखपुर की तर्ज पर यहां भी ऑक्सीजन कांड की गूंज राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी। आनन-फानन में स्वास्थ्य सचिव व आयुक्त ने अस्पताल पहुंच मोर्चा संभाला था। मामले की जांच के लिए डॉक्टरों की कमेटी भी बनाई गई थी। इसके बाद अस्पताल की सकारात्मक छवि बनाने अफसरों ने सभी विभागों से डॉक्टरों के नए और अच्छे केसों की विज्ञप्ति जारी करवाई। कुछ दिन तक तो यह सिलसिला चलता रहा। लेकिन मामला ठंडा पड़ते ही अफसरों ने फिर से अस्पताल को उसके हाल में छोड़ दिया। अब फिर इससे रोजाना इतनी गड़बडिय़ों की खबरें निकलती हैं, कि जनता उन्हें पढ़कर यह सोचती है कि क्या सरकार अनपढ़ है?

    करोड़ों बरस की कुदरत, कुछ सौ बरस में तबाह
    सरहद के पार से धान का आना यह बताता है कि छत्तीसगढ़ में धान का दाम अच्छा मिल रहा है। इसी तरह सरहद के पार से हाथियों का आना यह बताता है कि छत्तीसगढ़ में जंगल अभी बाकी हैं, और जंगलों के तालाबों में पानी भी है। इस चक्कर में हाथी यहां आ तो जा रहे हैं, लेकिन उन्हें जंगल और गांव की सरहद का पता नहीं है। इसलिए जंगलों के मुहानों पर बसे हुए गांव के लोग और वहां के खेत हाथियों के पैरों तले रौंदे जा रहे हैं। दिक्कत यह है कि हाथियों के नाम पर अफसर तो खा-खाकर हाथी हुए जा रहे हैं, और हाथियों को समझ नहीं आ रहा कि वे जाएं तो कहां जाएं। कोई उनकी जिंदगी को इंसानों के लिए आतंक कर रहे हैं, तो कोई उन्हें मारने के लिए बिजली के तार बिछा रहे हैं। इंसानों और जानवरों का सहअस्तित्व तब तक मुमकिन नहीं है जब तक कि इंसान और कुदरत का सहअस्तित्व ठीक न हो पाए। कुदरत तो इंसान के करोड़ों बरस पहले की है, इंसानों ने पिछले कुछ सौ बरसों में ही उसे इस कदर तबाह कर दिया है कि जिस लक्ष्मी के पीछे हिन्दुस्तानी भागते हैं, उसके वाहन को जिंदा रहने की जगह नहीं मिल रही है।
    एक बड़ी शादी की चर्चा
    दो दिनों से छत्तीसगढ़ में दो ऐसे प्रमुख लोगों की शादी की चर्चा है, कि लोग उनका नाम लेते भी हिचक रहे हैं। यह अफवाह है तो भी इतनी बात कहने का हौसला लोगों का हो नहीं रहा है, और अगर यह सच है, तो लोग धमाके का इंतजार कर रहे हैं। 
    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 29-Nov-2017
  • इस महीने प्रदेश के कई छोटे-बड़े नेताओं का जन्मदिन था। शहर के प्रमुख चौक-चौराहे अभी भी इन नेताओं की बधाईयों के पोस्टर-होर्डिंग्स से अटे पड़े हैं। इनमें से कई होर्डिंग्स राज्यमंत्री दर्जा हासिल एक बोर्ड के पदाधिकारी के भी हैं, जिसे लगवाने खुद पदाधिकारी को पैसे खर्च करने पड़े। पदाधिकारी को ज्यादातर भाजपा नेता और कार्यकर्ता नापसंद करते हैं। उनकी नापसंदगी का आलम यह है कि कुछ महीने पहले सरकार के एक मंत्री को अपने परिवार के एक सदस्य के विवाह समारोह का न्योता देने पहुंचे तो आमंत्रण स्वीकारना तो दूर, पदाधिकारी पर मंत्रीजी ने ऐसा कटाक्ष किया कि उन्हें उल्टे पांव लौटना पड़ा। 

    इन सबके बीच, पूर्व महापौर सुनील सोनी के मंगलवार को 54वें जन्मदिन की बधाईयों की पार्टी हल्कों में जमकर चर्चा रही। सुनते हैं कि इतनी बधाईयों की खुद सुनील सोनी ने कल्पना नहीं की थी, क्योंकि वे किसी सरकारी पद पर नहीं है। आमतौर पर सोनी परिवार के लोगों और नजदीकी मित्रों के साथ जन्मदिन मनाना पसंद करते हैं। लेकिन इस बार सुबह से ही उनके शैलेंद्र नगर निवास में बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। इसमें पार्टी नेता से लेकर हर तबके लोग थे। खास बात यह है कि रायपुर उत्तर विधानसभा क्षेत्र सुनील सोनी के जन्मदिन की बधाईयों के बैनर-पोस्टर, होर्डिंग्स से अटा पड़ा रहा। 
    सोनी दो बार महापौर और एक बार आरडीए अध्यक्ष रह चुके हैं। वे रायपुर उत्तर विधानसभा टिकट के दावेदार रहे हैं। कहते हंै कि सुनील सोनी की जीत की संभावना ज्यादा होते हुए भी पार्टी ने उनकी जगह जाति समीकरण को ध्यान में रखकर श्रीचंद सुंदरानी को टिकट दी थी। अब चेंबर चुनाव में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप के चलते सुंदरानी की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई है। सिंधी समाज के कई प्रमुख नेता उनसे नाराज बताए जाते हैं। इनमें से कई तो सुनील सोनी के जन्मदिन के स्वागत में काफी सक्रिय रहे। विधानसभा चुनाव में साल भर से कम समय रह गए हैं। ऐसे में सुनील सोनी के जन्मदिन की बधाई देने के लिए उमड़ी भीड़ से सुंदरानी टेंशन में बताए जाते हैं। 
    खबरों से हटते ही नहीं अफसर...
    छत्तीसगढ़ में आईएएस अफसर खबरों में बने रहने के शौकीन हैं। सोशल मीडिया पर सरकार की नजरों में आपत्तिजनक समझी जाने वाली बातें पोस्ट करने पर कुछ अफसरों को नोटिस भी जारी हुए हैं, फिर भी लोग अपना प्रचार, या अपनी सोच का प्रचार करते हुए दिखते ही हैं। कभी-कभी यह भी होता है कि किसी एक अफसर की टांग खींचने के लिए उसकी पोस्ट को लेकर दूसरे अफसर भी अभियान चलाने लगते हैं, कुछ दूसरे लोगों को सामने रखकर। सरगुजा इलाके के बलरामपुर जिले में कलेक्टर अवनीश शरण ने कुछ महीने पहले देश भर के मीडिया में अपनी पोस्ट के बाद शोहरत पाई थी जब उन्होंने अपनी बेटी को सरकारी स्कूल में दाखिल कराया था। वैसे तो उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने सभी अफसरों को यह हुक्म दिया है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएं, लेकिन उस हुक्म पर अमल न होना था, न हुआ। ऐसे में अवनीश शरण अपनी पोस्ट से देश के बहुत से बड़े अखबारों में छा गए। अब उनकी ताजा पोस्ट ने एक बार फिर कुछ लोगों को यह मौका दिया है कि वे इस शोहरत का हिसाब चुकता कर सकें। अवनीश ने कलेक्टर की कुर्सी पर बैठी अपनी बेटी की फोटो अपने फेसबुक पेज पर डाली है। कुछ लोग इस पर यह सवाल खड़े कर रहे हैं कि क्या कलेक्टर की कुर्सी पर बच्चों को ऐसा बैठाना ठीक है? बहुत से लोग इसे पसंद करते हुए लिख रहे हैं कि यह भविष्य की आईएएस है, और कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि देश के संविधान दिवस के दिन ऐसा करना संविधान का मजाक उड़ाना है। यह तो लोगों के अलग-अलग नजरिए हुए, अब यह सही है, या नहीं, यह तो सरकार के नजरिए पर रहता है जो कि 44 डिग्री गर्मी में भी कोट न पहनने को नियम तोडऩा मानती है, अगर ऐसी गलती वह अफसर करे जो कि प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहा है। सरकारी दफ्तर और बच्चों को लेकर अब तक सरकार की कोई घोषित नीति तो है नहीं, यही विवाद अगर आगे बढ़े तो हो सकता है कि सरकार कोई व्यवस्था कायम करे। 
    शिक्षाकर्मी और जोगी, तब और अब
    शिक्षाकर्मियों की हड़ताल को समर्थन देने के लिए विरोधी दलों में होड़ मची हुई है। पौने दो लाख शिक्षाकर्मियों का समर्थन पाने के लिए भूपेश बघेल धरनास्थल तक हो आए। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तो एक कदम आगे जाकर ऐलान कर दिया है कि सीएम बनने के बाद सबसे पहले शिक्षाकर्मियों के संविलियन पर हस्ताक्षर करेंगे। लेकिन सरकार उनके ही फार्मूले पर अमल कर रही है।
    जोगी सरकार के कार्यकाल में शिक्षाकर्मियों की हड़ताल लंबी चली थी। तब कैबिनेट में सभी मंत्रियों ने एकसुर में उनसे सख्ती से निपटने की वकालत की थी। तब के वित्तमंत्री डॉ. रामचंद सिंहदेव ने सुझाव दिया था कि हड़ताली शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त कर उनकी जगह शिक्षक की योग्यताधारी बेरोजगारों को तुरंत रखा जाए। इसके बाद शिक्षाकर्मियों को धरनास्थल से पीट-पीटकर खदेड़ दिया गया था। सरकार की सख्ती के चलते हड़ताल खत्म भी हो गई थी। कुछ इसी तरह के विचार पिछले दिनों कैबिनेट में रमन सरकार के मंत्रियों के भी रहे हैं। सरकार अब जोगी फार्मूले पर अमल करते हुए शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त कर उनकी जगह नई नियुक्तियां कर रही है। हालांकि अब तक सख्ती नहीं बरती गई है। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि शिक्षाकर्मियों की हड़ताल से निपटने जोगी फार्मूला ही कारगर है। 

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Posted Date : 28-Nov-2017
  • कांग्रेस में पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा और राजेन्द्र तिवारी की जुगलबंदी हर जगह नजर आ रही है। दोनों की भूपेश बघेल से पटरी नहीं बैठती है। तिवारीजी के साथ तो कई बार विवाद भी हो चुका है। दोनों नेता आज-कल किसी भी कार्यक्रम में साथ-साथ जाते हैं। भूपेश बघेल का भिलाई में पदयात्रा का समापन हो या फिर डॉ. चरणदास महंत का कोरबा में कार्यक्रम, दोनों एक साथ ही पहुंचे। सुनते हैं कि दोनों ने मिलकर पार्टी का एक टीवी चैनल से चल रहा विवाद खत्म कराया। सेक्स-सीडी कांड के चलते पार्टी ने एक टीवी चैनल का बायकॉट कर रखा था। पार्टी के मीडिया विभाग को चैनल से दूरी बनाए रखने के आदेश दिए गए थे। चैनल के किसी भी कार्यक्रम में पार्टी का पक्ष रखने के लिए कोई मौजूद नहीं रहता था।

    चर्चा है कि टीवी चैनल के प्रबंधन ने सत्यनारायण शर्मा से संपर्क किया और अपने तर्क रखे। इसके बाद सत्यनारायण शर्मा ने राजेन्द्र तिवारी से बात की। तिवारीजी तुरंत सक्रिय हो गए और प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से चर्चा की। पुनिया के हस्तक्षेप के बाद बायकॉट खत्म हो गया। ये अलग बात है कि इस टीवी चैनल में आज-कल ये दोनों ही नजर आते हैं। बाकी प्रवक्ताओं ने अघोषित तौर पर बायकॉट जारी रखा है। वैसे राजेंद्र तिवारी का मीडिया से पे्रम विद्याचरण शुक्ल के जमाने से लगातार जारी है, और उनका यह मानना रहता है कि उनसे बेहतर प्रवक्ता और कोई हो नहीं सकते।

    एक मेहमान ऐसा भी...

    राजधानी रायपुर में पिछले दिनों एक पार्टी हुई तो उसमें पहुंचे मेहमानों को यह देखकर कुछ हैरानी हुई कि उनके बीच एक ट्रांसजेंडर मेहमान भी था। वह आदमियों के कपड़ों में था लेकिन चाल-ढाल और बालों से उसके ट्रांसजेंडर होने का पता भी चल रहा था। मेजबान ने अपने पहचान वालों की लिस्ट बनाते हुए इससे पहचान रहने पर इसे भी न्यौता दिया था। आमतौर पर शादी की बड़ी पार्टियों में कुछ ट्रांसजेंडर मजदूर जरूर दिख जाते हैं क्योंकि वे आदमियों या औरतों के मुकाबले बहुत अधिक मेहनत से काम करने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन मेहमानों में ट्रांसजेंडर को बुलाने का रिवाज यहां पर दिखता नहीं है। ऐसे में इस पार्टी में न केवल एक ट्रांसजेंडर को बुलाया गया, बल्कि यह भी साफ कर दिया गया था कि उसे अपनी मर्जी के कपड़े पहनकर आना है, न कि कोई बनावटी-दिखावटी कपड़ों में। मेहमान को दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह न बुलाकर, पूरे सम्मान से और खुले दिल से बुलाने में एक बड़ा दिल भी लगता है।

    बहुत अधिक भले होने के नुकसान

    अभी रायपुर शहर में एक बुलेट राईडर को पुलिस ने रोका, और उसकी खासी जांच की। मोटर साइकिल चलाने वाले को हैरानी हुई कि उसने हेलमेट भी लगाया हुआ था, नंबर प्लेट भी सही थी, साइलेंसर भी सही था, और कागजात भी पूरे थे, और रफ्तार भी बड़ी कम थी। वह बाईक पर अकेला भी था, न कि तीन लोग चल रहे थे कि पुलिस जांच करे। जांच-पड़ताल के बाद पुलिस से पूछा कि सब कुछ सही रहने पर भी उसकी जांच क्यों की गई? तो पता लगा कि उसका सब कुछ इतना अधिक सही था कि पुलिस को लगा कि वह बाहर कहीं से आया हुआ है। सारी जांच के बावजूद आसानी से नहीं छोड़ा गया, और बड़े साहब के सामने पेश किया गया, वहां से जाने मिला। मतलब यह कि किसी शहर की स्थानीय संस्कृति के खिलाफ जाकर बहुत अच्छा रहना भी अच्छी बात नहीं होती है।

    गांव ओडिशा जाना चाहता है और...

    राजधानी से लगे गरियाबंद जिले के एक गांव में किडनी की बीमारी से परेशान होकर बिना इलाज जीने के बजाय ओडिशा में शामिल होने की अपील की है। गांव के लोगों ने अर्जी दी है कि छत्तीसगढ़ सरकार की दिलचस्पी उनके इलाज में नहीं है, इसलिए उनके गांव को ओडिशा में शामिल कर दिया जाए। इस गांव को यह भी दिक्कत है कि वहां पंचायत द्वारा चलाई गई मजदूरी की योजनाओं का भुगतान भी महीनों बाद उन्हें नहीं हुआ है। पचास से अधिक लोग किडनी से मारे गए हैं, उन्हें अंतिम संस्कार के लिए सरकार की घोषित रकम भी नहीं मिली है। इस पर एक टीवी चैनल पर हुई बहस में यह बात सामने आई कि ओडिशा सीमा से लगे हुए इस गांव में स्वास्थ्य और पंचायत दोनों विभागों के कामकाज न होने के जिम्मेदार आईएएस अफसर भी ओडिशा के ही हैं!   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 27-Nov-2017
  • मुख्यमंत्री का काम आसान नहीं रहता है। दूर से देखते लोगों को सुख ही सुख दिखता है, लेकिन मुख्यमंत्री को रोज ही जितने तरह के दबाव और तनाव झेलने पड़ते हैं, उनके चलते किसी की भी नींद हराम हो जाना अधिक मुश्किल बात नहीं है। अब अभी मुख्यमंत्री के नाम से एक ऐसी चेतावनी भेजी गई है जिसमें एक शादी करवाने को कहा गया है, और अगर यह शादी नहीं हुई तो चेतावनी देने वाले ने 31 जनवरी 2018 से मुख्यमंत्री निवास के सामने बेमुद्दत हड़ताल की बात भी की है। अब यह शादी का मामला एक ऐसे सरकारी अधिकारी का है जिस पर यह आरोप लगाया गया है कि वह प्रदेश के कई जिलों में अपनी जाति की लड़कियों से शादी की बात करता है, उनके परिवारों से बात करता है, और सभी को पूरा आश्वासन देकर धोखा दे रहा है। इस शिकायत में कहा गया है कि एक जनपद पंचायत के इस सीईओ ने अब तक इतने अधिक लोगों को धोखा दिया है कि अब मुख्यमंत्री अपनी ताकत उपयोग करके इस अफसर की शादी करा दें ताकि वह औरों को धोखा न दे सके।
     दुर्ग जिले से भेजी गई इस शिकायत में इस अधिकारी के नाम सहित बताया गया है कि वह कहां-कहां पर अपनी जाति की लड़कियों को देखने और झांसा देने का काम कर चुका है। मुख्यमंत्री को यह सुझाया गया है कि वे अपने अफसरों से दबाव डलवाकर इस सीईओ की शादी करवाएं, वरना भूख हड़ताल झेलने के लिए तैयार रहें। उन्हें याद दिलाया गया है कि वे मुख्यमंत्री हैं, और उनकी इतनी ताकत रहती है कि वे जो चाहे वह करवा सकते हैं। 
    निकल जाना बेहतर
    सरकार के सचिव स्तर के एक अफसर  ने खुद होकर एक ऐसे पद पर जाने की इच्छा जताई, जिसे लूप लाइन माना जाता है। अफसर पहले बेहतर पद पर थे। काफी प्रयास के बाद अफसर की इच्छा पूरी भी हो गई। सुनते हंै कि अफसर के विभाग का बजट भी काफी बड़ा था। लेकिन खर्च करने का पॉवर न होने का उन्हें काफी मलाल रहा। विभाग में एक-दो बड़ी योजनाएं चल रही हंै। एक योजना में खाने-पीने का बिल ही करोड़ों में चला जाता है। हाल यह है कि कैटरर्स को भुगतान तो नियमित हो जाता है, लेकिन अफसर को चाय-पानी तक नहीं पूछते थे। कभी-कभार बिल भुगतान में थोड़ा बहुत विलंब होने पर भरी बैठकों में विभाग प्रमुख से डांट सहनी पड़ती थी। वे इस बात से ज्यादा दुखी रहे कि सारा काम करने के बावजूद उनके हाथ कुछ नहीं आता है और  विभाग प्रमुख के पसंदीदा लोग मजे कर रहे हैं। सो, उन्होंने चुपचाप निकल जाना बेहतर समझा। 
    पूजा के बगल में जूते!
    कई बार अपने बेतुके बयानों से पार्टी की फजीहत करा चुके श्रम व खेल मंत्री भइयालाल राजवाड़े हमेशा चर्चा में रहे हंै। मई 2015 को रायपुर में 45 डिग्री की गर्मी में काले सूट-बूट में शपथ लेने ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। मंत्री बनने के बाद प्राय: राजवाड़े सूट-बूट में नजर आते हैं। विदेश यात्रा से लौटने के बाद तो ब्रैडमेन नाम से चर्चित कैप में नजर आते हैं। इधर भी कुछ ऐसा ही हुआ, मंत्रीजी रविवार को सरगुजा में नई लेदरी में हसदेव नदी पर पुल का भूमिपूजन करने पहुंचे। भूमिपूजन के दौरान मंत्रीजी के सूट-बूट में सिलवटें ना पड़ जाएं इसलिए उनके अकेले के लिए कुर्सी की व्यवस्था की गई। पूजा स्थल पर मंत्रीजी जूतों के साथ कुर्सी पर बैठकर पूजा करते रहे। उनके जूते पूजा से महज डेढ़ फीट दूर थे, जबकि संसदीय सचिव चंपा देवी पावले और विधायक श्याम बिहारी जायसवाल जमीन पर बैठे पूजा करते नजर आए। जब  कुदाल चलाने का समय आया तो मंत्रीजी कुर्सी से उठे और  जूता पहने हुए ही कुदाल चलाकर भूमिपूजन और निर्माण कार्य शुरू किया। 
    सोशल मीडिया में जूते पहनकर पूजा करते मंत्रीजी की तस्वीर सामने आते ही हिन्दू सेना के सुरेन्द्र सिंह छोटू ने आपत्ति दर्ज करने हुए कहा कि हिन्दू संस्कारों का ख्याल रखा जाना था, उनका ये कृत्य हिन्दुओं की धार्मित मान्यताओं का सीधा मजाक है। वहीं कांग्रेस के उपाध्यक्ष गुलाब कमरो का कहना है भाजपा हिंदुओं के नाम पर वोट लेती है पर मंत्रीजी हिंदुओं के संस्कार भी भूल गए। 
    भूमिपूजन खत्म करके जैसे ही मंत्री मंच पर पहुंचे, अधिकारियों को ना देख मंच पर ही माइक पकड़ खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी। दरअसल सेतु निर्माण के इस आयोजन में कई अधिकारियों के अलावा एसडीएम, तहसीलदार भीमौके पर मौजूद नहीं थे। बस फिर क्या था मंत्रीजी ने मंच से ही माइक पर अपने गुस्से का इजहार करना शुरू कर दिया और बोले इनके बाप का राज है क्या, अधिकारियों को प्रोटोकॉल का भी ध्यान नहीं रहता, वे इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से करेंगे। मंत्रीजी ने अपने निज सहायक से कलेक्टर को फोन करने को कहा। वहीं कलेक्टर ने भी फोन नहीं उठाया, जिसके बाद वहां उपस्थित लोगों की प्रतिक्रिया देखने लायक थी। कुछ अपना मुंह छिपाते नजर आए तो कई मुंह पर हाथ रखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाए।
    रविवार को ही भइयालाल राजवाड़े अपने  विधानसभा क्षेत्र के ग्राम गढ़तर पहुंचे। तय कार्यक्रम से 2 घंटे लेट पहुंचे मंत्री को सुनने ग्रामीण नहीं पहुंचे। इससे मंत्रीजी भड़क गए और सचिव, पटवारी को जमकर फटकार लगाई। वहीं ग्रामीणों का कहना था कि क्या ग्रामीणों के पास कोई काम नहीं होता? सिर्फ भाषण सुनने जाने से कोई मतलब नहीं है।
    विरासत में मिलीं सैकड़ों फाईलें
    सिंचाई सचिव सोनमणि बोरा विभाग हित में कड़े फैसले लेने में देरी नहीं करते। पिछले दिनों दो इंजीनियरों को उन्होंने सिर्फ  इसीलिए निपटाया कि  वे समय पर काम नहीं कर रहे थे और जानकारी भी पूरी नहीं रखते थे। उन्होंने एक झटके में विवादित 14 करोड़ के सर्वेश्वर एनीकट के टेन्डर को निरस्त कर दिया। जबकि इसमें अनियमितता की गंभीर शिकायत के बावजूद उनके  पूर्ववर्ती फाइल दबाकर बैठे थे।सुनते हैं कि बोरा के पहले करीब साढ़े तीन सौ फाइलें दबाकर रखी गईं थीं। इस वजह से कई महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय नहीं हो पा रहा था। कई फाइलें इंजीनियरों की जांच-पड़ताल से जुड़ी थी। पहले यह उम्मीद की जा रही थी कि ये लोग प्रकरण के निराकरण के लिए उनके पास आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फाइलों का अंबार लग गया था। सिंचाई सचिव का पद संभालने के बाद शुरू के 15 दिन तक बोरा को ऐसी रोकी गईं फाइलें निपटाने में ही पूरा वक्त लग गया। अब जाकर निर्माण और अन्य गतिविधियों में तेजी लाने में जुटे हैं। 
    पीएन सिंह जो कहे वही सही...
    राज्य विद्युत नियामक आयोग में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। कुछ समय पहले तक वन मैन आर्मी रहे पीएन सिंह को अब हर चीज का जवाब देना पड़ रहा है। सिंह अभियंता संघ के अध्यक्ष रहे हैं। उद्योगपति से लेकर राजनेताओं तक उनकी स्वभाविक जान-पहचान हैं। बिजली की दर तय करने में उनकी अहम भूमिका रहती है। आयोग के अध्यक्ष नारायण सिंह को ज्यादा लेना-देना नहीं होता है। उनके लिए पीएन सिंह जो कहे वही सही।  लेकिन आयोग में सदस्य के रूप में अरूण कुमार शर्मा के आने के बाद आयोग में पीएन सिंह का एकाधिकार एक तरह से खत्म हो गया है। शर्मा एनटीपीसी के ईडी के पद से रिटायर होकर आए हैं और लोकल भी हैं।
    कुछ समय पहले बिजली की दरों में विसंगति को लेकर किसान जब आयोग के दफ्तर का घेराव करने पहुंचे तो सचिव पीएन सिंह ने मिलने से मना कर दिया। ऐसे में शर्मा खुद बाहर निकले और किसान नेताओं के साथ अपने कक्ष में ले जाकर उनकी समस्याओं को लेकर लंबी चर्चा की। किसान उनसे चर्चा कर संतुष्ट होकर लौटे। बिजली सब स्टेशन के निर्माण की अनुमति मामले में ऐसा पेंच लगाया कि पीएन सिंह को जवाब देने में पसीना छूट गया। इसी तरह बिजली की दरों को लेकर भी वे सख्त रहे हैं। वे शांत और मिलनसार स्वभाव के हैं, लेकिन सवाल इतने पैने होते हैं कि जवाब देना आसान नहीं होता है। ऐसे में पीएन सिंह को दिक्कत होना स्वाभाविक है।   rajpathjanpath@gmail.com

     

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Posted Date : 26-Nov-2017
  • प्रधानमंत्री की पहल पर देश के 115 पिछड़े जिलों के विकास के लिए एक नई योजना बनाई गई है। केन्द्र सरकार के वरिष्ठ अफसरों को इनमें से एक-एक जिले का प्रभारी बनाया गया है जो कि इन पिछड़े जिलों में जाकर वहां कलेक्टरों की बैठक लेकर उनके विकास की योजनाएं बनाएंगे। और उन जिलों की तस्वीर तेजी से बदलने की कोशिश करेंगे। केन्द्र सरकार के ये अफसर संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव स्तर के हैं, जो कि जिला कलेक्टरों से खासे सीनियर होंगे, और कलेक्टरों को इनकी बात ध्यान से सुननी और माननी होगी। 
    लेकिन केन्द्र सरकार की इस पहल के खिलाफ दिल्ली से एक जानकार वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह कैसा सहकारी-संघवाद है? पीएम कोऑपरेटिव फेडरलिज्म की बात करते हैं, लेकिन किसी प्रदेश के कलेक्टरों का उन्हें केन्द्र के अफसरों को इस तरह से थोपने का क्या हक है? कल को अगर ममता बैनर्जी जैसे मिजाज वाले मुख्यमंत्री ने साफ-साफ मना कर दिया कि उनके कलेक्टर ऐसी कोई बैठक नहीं रखेंगे, तो केन्द्र सरकार क्या कर लेगी? 
    छत्तीसगढ़ को एक आईएएस अधिकारी ने भारी गुस्से के साथ कहा कि कलेक्टरों को अब देश भर में प्रायमरी स्कूल के शिक्षकों जैसा बना दिया गया है जिनके जिम्मे जनगणना से लेकर मतगणना तक सौ किस्म के काम लाद दिए जाते हैं। अब कलेक्टर दारू भी बेचें, कानून व्यवस्था भी सम्हालें, और आधा दर्जन अलग-अलग लोगों के प्रति जवाबदेह भी रहें। हर कलेक्टर के सिर पर एक संभागायुक्त तो है ही, उस जिले से बने हुए मंत्री भी काबू रखते हैं। इसके बाद हर जिले के लिए राज्य शासन ने एक प्रभारी सचिव बनाया है जो कि कलेक्टर से खासे वरिष्ठ अफसर होते हैं, और उनकी बात कलेक्टरों को सुननी-माननी होती है। इसके बाद हर जिले के एक-एक प्रभारी मंत्री भी हैं, जो कि जिलों में जाकर अपने तेवर दिखाते रहते हैं। इनसे परे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, जनजाति आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, जैसे बहुत से राष्ट्रीय संवैधानिक संस्थान हैं जिनके प्रति कलेक्टर कुछ बातों के लिए जवाबदेह रहते हैं। इसके बाद राज्य के भी ऐसे आयोगों के नोटिस का जवाब देना कलेक्टर का जिम्मा होता है। अब केन्द्र सरकार कलेक्टरों के सिर पर और एक-एक अफसर बिठा रही है। एक कलेक्टर ने कल इस खबर के बाद पूछने पर कहा कि वे बांस की बड़ी टोकरी बनवा रहे हैं क्योंकि अब सिर पर बैठने वाले इतने अधिक हो गए हैं कि कंधे और सिर कम पडऩे लगे हैं। 
    इस सड़क को कई और नोटिस चाहिए
    पर्यावरण विभाग ने कल रायपुर से बिलासपुर के बीच बन रही फोरलेन सड़क को लेकर प्रदूषण का नोटिस जारी किया है क्योंकि तकरीबन पूरे ही रास्ते धूल के बादल उठे रहते हैं, और लोगों का आना-जाना हराम हो चुका है। लेकिन इस सड़क की हालत देखें तो प्रदूषण निवारण मंडल के अलावा इसके लिए ठेकेदार को मानवाधिकार आयोग से भी नोटिस जाना चाहिए क्योंकि आसपास के गांवों का जीना हराम हो चुका है, और सड़क पर चलने वाले मुसाफिरों की सेहत दिल्ली के स्मॉग के मुकाबले कम खतरे में नहीं है। इसे देखकर हैरानी होती है कि राजधानी को हाईकोर्ट से जोडऩे वाली सड़क का ऐसा बुरा हाल हो सकता है कि अब जज और मंत्री सड़क के रास्ते आना-जाना बंद कर चुके हैं, और ट्रेन से आते-जाते हैं। इस सड़क के कुछ हिस्सों में फोरलेन की पूरी चौड़ाई पर काम हो रहा है, कुछ हिस्सों में टूलेन पर चल रहा है, और कुछ हिस्से में काम शुरू ही नहीं हुआ है। इसी तरह पुल और पुलिया का काम किसी किनारे नहीं पहुंचा है। राज्य के विकास की सारी कल्पना सवा सौ किलोमीटर से कम के रायपुर-बिलासपुर के सफर में खत्म हो जाती है। शायद यही वजह है कि अब हाईकोर्ट के जज सरकार को कटघरे में खड़ा करके यह पूछ रहे हैं कि बिलासपुर से विमान सेवा शुरू करने में देर क्यों है? लेकिन नर्क सरीखे इस सफर की तकलीफ बिलासपुर शहर में रहने वालों को बहुत कम होती है क्योंकि वहां शहर के भीतर 10- 15 बरस से ऐसा ही हाल बना हुआ है। 
    छाया वर्मा को मकान क्यों नहीं?
    छत्तीसगढ़ से कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य श्रीमती छाया वर्मा संसद जाने के बाद से लगातार राजधानी रायपुर में सरकारी मकान पाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन उन्हें अब तक कामयाबी नहीं मिली है। ऐसे में वे मंत्रालय-सचिवालय के हर संबंधित टेबिल पर जाकर आ गईं तो उन्हें पता लगा कि उनकी फाईल पर किसी ने यह लिखा है कि उन्हें रायपुर में मकान की क्या पात्रता है यह स्पष्ट किया जाए। ऐसा लिखने वाले अफसरों से उन्होंने पूछा कि छत्तीसगढ़ के किस सांसद को अब तक मकान आबंटित नहीं हुआ है, तो उन्हें पता लगा कि अभिषेक सिंह अकेले हैं जिन्हें सांसद होते हुए भी रायपुर में मकान अलग से नहीं दिया गया है। अब अभिषेक सिंह तो राजधानी में मुख्यमंत्री निवास में रहते हैं, और अपने संसदीय क्षेत्र राजनांदगांव में भी वे वहां के विधायक और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को आबंटित घर-दफ्तर से काम करते हैं। ऐसे में थक-हारकर छाया वर्मा ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलकर यह पूछा कि क्या उन्हें मकान इसलिए नहीं दिया जा रहा कि वे कांग्रेस की सांसद हैं? इस पर मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से मकान आबंटन करने कहा, तो उन्हें एक ऐसा मकान दिखाया गया जो कि किसी अफसर के कब्जे में है, और वे उसे अगले तीन महीने खाली नहीं करने वाले हैं। 
    नोटबंदी और नक्सली
    नोटबंदी से नक्सलियों और आतंकियों के नोट बेकार हो जाने का दावा पहले दिन के भाषण में किया गया था, और अभी कुछ दिन पहले ही सरकार की तरफ से एक अफसर ने यह कहा कि नक्सलियों के नोट बदल नहीं पाए, और वे बेकार भी हुए। इसके बाद जल्द ही बस्तर में तैनात एक और बड़े पुलिस अफसर का बयान आया कि नक्सलियों ने ठेकेदारों, व्यापारियों, और स्थानीय लोगों को देकर अपने पुराने नोट बदलवा लिए। अब नोटबंदी के फायदे गिनाने के लिए चाहे कोई यह कह दे कि नक्सलियों के पास अब नोटों की कमी हो गई है। हकीकत यह है कि उनको जब जितने नोटों की जरूरत रहती है, तब उतने नोट मिल जाते हैं। और जंगल में उनका काम बिना नोटों भी चल जाता है। नोटबंदी से इतना ही हुआ कि बस्तर के बहुत से लोगों को अपनी जान बचाने के लिए नक्सलियों के नोट बदलने पड़े। 
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Posted Date : 25-Nov-2017
  • चुनाव से पहले सरकार के मंत्रियों को रिचार्ज करने की कोशिश हो रही है। उन्हें एक-एक कर विदेश यात्राओं पर भेजा जा रहा है। हर के साथ अफसरों की टीम जा रही है। पहले राजेश मूणत, अजय चंद्राकर और बृजमोहन अग्रवाल होकर आए हैं। अभी नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल स्पेन की यात्रा पर हैं। महेश गागड़ा अलग अफसरों की टीम के साथ परदेश हो जाए हैं। अमर के लौटने के बाद सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल की बारी है। वे दक्षिण अफ्रीका दौरे पर जाएंगे। उनके साथ राजनांदगांव के अलावा एक और जिले के कलेक्टर भी होंगे। बघेल के आने के बाद स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप जापान जाएंगे। विदेश यात्राओं को अध्ययन दौरा नाम दिया गया है। सुनते हंै कि विदेश यात्रा पर प्रति व्यक्ति 15 से 20 लाख रुपये सरकार पर बोझ पड़ता है। सरकार को इससे कितना फायदा हो रहा है, इसका अंदाजा बिलासपुर के हालात से लगाया जा सकता है। अमर अग्रवाल बिलासपुर को स्मार्ट सिटी बनाना चाहते हैं और हाल यह है कि यह शहर गंदगी से बजबजा रहा है। कुछ दिन पहले वहां एक मासूम की नाले में डूबकर मृत्यु भी हो गई। शहर की दुर्दशा देखकर यह कहा जाने लगा कि बिलासपुर अब पुराने गांव वाली अवस्था की तरफ जा रहा है। शहर बनने से पहले हालत अच्छी थी, कम से कम आज की तरह गंदगी नहीं थी। यह सब तब हो रहा है जब देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है और शहरों में अभियान की बागडोर खुद विभागीय मंत्री होने के नाते अमर अग्रवाल के पास हैं। लेकिन बाकी विभागों के मंत्रियों और अफसरों का कामकाज अधिक अलग नहीं है, और मजे की बात यह है कि जिन देशों में जाकर यह काम देखा जा रहा है, वहां के हालात से छत्तीसगढ़ की कोई तुलना नहीं है।

    सूखा भी चाहिए, और धान के दाम भी!
    राज्य के कई इलाकों में सूखा है। सूखे के कारण बीमा राशि लेने के लिए सूखाग्रस्त गांवों से लगे कई इलाके के ग्रामीणों ने अपने गांवों को सूखाग्रस्त घोषित करवा दिया है। इन गांवों में फसल भरपूर हुई है, सूखाग्रस्त घोषित होने के कारण वे धान की बिक्री भी उस अनुपात में नहीं कर पा रहे हैं। अब इसका फायदा अन्य वे बड़े किसान उठाने लगे हैं जिनकी जमीनें सिंचित हैं। वे बड़े किसान इन किसानों का धान खरीदकर अपने खाते से बिक्री कर रहे हैं। सूखाग्रस्त घोषित कर ये किसान बुरी तरह फंसे हैं। क्विंटल भर में उन्हें तीन सौ से चार सौ रूपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। वैसे जो किसान उनसे खरीद रहा है, वह बोनस की राशि का भी बंटवारा उन्हें देता है, तो थोड़ी-बहुत भरपाई हो रही है। 


    सरकार के कार्यकाल के बाद तक एक्सटेंशन
    आखिरकार देवेंद्र वर्मा ने दम दिखा ही दिया। कैबिनेट ने तमाम कयासों पर विराम लगाते हुए वर्मा को विधानसभा प्रमुख सचिव के पद पर 16 महीने का एक्सटेंशन मंजूर कर लिया। वर्मा 30 तारीख को ही रिटायर होने वाले थे। लेकिन यह सब आसानी से नहीं हुआ। सरकार उन्हें एक्सटेंशन तो देना चाहती थी, लेकिन अधिकतम एक साल का। चर्चा है कि बैठक से पहले कैबिनेट के नोट की जानकारी वर्माजी को मिल गई थी। वे सात समंदर पार से कैबिनेट की बैठक पर निगाह रखे हुए थे और अपने पैरोकारों के संपर्क में थे। बैठक में इस विषय पर चर्चा शुरू हुई, तो सरकार के मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय, बृजमोहन अग्रवाल व अजय चंद्राकर एक सुर में अगले साल नवंबर में विधानसभा चुनाव का हवाला देकर समयावधि और बढ़ाने पर जोर दिया। सीएम भी इसके लिए सहमत हो गए और एक्सटेंशन 31 मार्च 2019 तक के लिए मिल गया। हालांकि विधानसभा की स्थापना शाखा ने विधानसभा अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवा नियमों में संशोधन के लिए अध्यादेश का प्रारूप तैयार कर भेजा था।  इसमें प्रमुख सचिव के रिटायरमेंट की आयु 65 साल रखने का प्रस्ताव था। लेकिन सरकार ने कानूनी पेचीदगियों से बचने बीच का रास्ता निकाला और वर्माजी की इच्छा पूरी कर दी। इस एक्सटेंशन में एक अनोखी बात यह भी है कि इस सरकार ने अपने खुद के कार्यकाल के कई महीने बाद तक का एक्सटेंशन दे दिया है।

    वनभैंसे की वंशवृद्धि में सहयोग कैसे करें?
    वन विभाग में शहर के कुछ हिस्सों में दीवार पर बड़ी-बड़ी पेंटिंग बनवाई है जिनमें वनभैंसे को बचाने के लिए अपील की गई है। वनभैंसे की तस्वीर के साथ लिखा गया है- छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वनभैंसे के संरक्षण एवं संवर्धन में सहयोग करें। 
    अब इसे देखकर छत्तीसगढ़ के एक वन्य प्राणी प्रेमी नितिन सिंघवी ने यह पूछा है कि संरक्षण तो ठीक है, लेकिन संवर्धन का मतलब तो ब्रीडिंग होता है, यानी वंश बढ़ोत्तरी। अब शहर के लोग जंगल में रहने वाले वनभैंसों की ब्रीडिंग में क्या मदद कर सकते हैं? उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया है कि कुछ बरस पहले तक वन विभाग बताते रहा कि उदंती वन्य प्राणी अभ्यारण्य में 57 वनभैंसे हैं। इसके बाद अचानक बताया गया कि मादा सिर्फ एक ही है, और उसका नाम रख दिया गया आशा। जाहिर है कि वंश वृद्धि की आशा जिस पर टिकी हो, उसका नाम आशा रखना ही सबसे जायज है। फिर आशा के जो बच्चे हुए, वे सभी नर बच्चे हुए। उसकी क्लोनिंग कराई गई, तो भी उससे नर बच्चे ही हुए। अब ऐसी हालत में आम नागरिक वनभैंसों के संवर्धन में क्या सहयोग कर सकते हैं? 
    इस तस्वीर में वनभैंसे की पीठ पर मैना बैठाई गई है। दरअसल 14 नवंबर 2017 को राज्य वनजीव बोर्ड की दसवीं बैठक हुई, तो उसमें प्रदेश के इन दो दुर्लभ होते प्राणियों की इस तस्वीर को वन विभाग का शुभंकर माना गया, और इन्हें नाम दिया गया श्यामू-राधे। नाम तो धार्मिक भावना के हिसाब से ठीक है, लेकिन श्यामू और राधे के वंश संवर्धन में लोग क्या मदद करें? 


    सत्ता के लिए निगरानी जरूरी

    लोग पीठ पीछे कैसी बातें करते हैं इसे जानने की उत्सुकता बहुत लोगों में रहती है। जो लोग सत्ता में रहते हैं, एक ऐसी ताकत भोगते रहते हैं जो कि हो सकता है पूरी जिंदगी न रहे, वे लोग इसकी जरूरत भी समझते हैं। सरकार के कुछ लोग लोगों के टेलीफोन टैप करके यह पता लगाते रहते हैं कि सरकार के खिलाफ कौन बातें करते हैं। लेकिन इससे परे भी बहुत से लोग अपना-अपना एक जरिया बना रखते हैं। छत्तीसगढ़ में एक मंत्री से मिलने वाले लोगों की खासी भीड़ रहती है। उन्होंने दो-तीन अलग-अलग हिस्सों में लोगों के बैठने का इंतजाम कर रखा है। इन तमाम जगहों पर कैमरे भी लगे हैं, और माइक्रोफोन भी। भीतर कहीं किसी कमरे में बैठकर यह देखा और सुना जा सकता है कि मिलने आए लोग क्या बात कर रहे हैं। इसके बाद जब लोग निकलते होते हैं, तो सारे लोग जूते-चप्पल की जगह पर कुछ पल तो थमते ही हैं। वहां पर फिर लोगों की बातचीत सुनने का एक मौका रहता है कि मुलाकात के बाद लोग क्या कहते हुए निकल रहे हैं। अब यह नैतिक है या अनैतिक, यह तो पता नहीं, लेकिन राजनैतिक जरूर है, और उसमें कोई बात नैतिक-अनैतिक होती नहीं है। कुछ लोगों का यह मानना है कि देश की हर राजधानी में इस तरह की कुछ तरकीबें इस्तेमाल होती हैं, और कुछ जगहों पर लोगों को दिए गए समय के बाद इतनी देर से मुलाकात शुरू होती है कि बैठे हुए लोग कोई न कोई बात करेंगे ही करेंगे। तांक-झांक सत्ता का एक हिस्सा हमेशा से रहते आया है, आज भी जारी है। कुछ नेता ऐसे जरूर हो सकते हैं जो कि इससे परे हों। 

    आतिथ्य सत्कार 
     प्रदेश अधिकांश हिस्सा अकाल की चपेट में है। सरकार ने 96 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। प्रस्ताव से केंद्र सहमत नहीं था और काफी दिनों तक सवाल-जवाब का दौर चलता रहा। लेकिन जब राज्य में सूखे का जायजा लेने केंद्रीय टीम यहां पहुंची, तो वह राज्य के प्रस्ताव से पूरी तरह सहमत नजर आई। केंद्रीय टीम कई जिलों के दौरे पर गई थी। महानदी भवन से जिले के अफसरों को स्पष्ट निर्देश था कि केंद्रीय टीम की पूरी खातिरदारी की जाए। 
    किसी तरह की खामियों पर नाराजगी का अंदेशा था। सो, जिला प्रशासन ने इसमें पूरी ताकत झोंक दी। टीम के रूकने के लिए सर्किट हाउस पूरी तरह खाली करा दिए गए। खाने-पीने की हर तरह की व्यवस्था की गई थी। केंद्रीय टीम के सदस्य पहले से बुलाए गए किसानों से मिले। हालात का जायजा लिया। वे आतिथ्य सत्कार से इतने खुश हुए कि उन्हें उम्मीद से ज्यादा सूखा नजर आया। अब राज्य को उम्मीद से ज्यादा मदद मिलने का भरोसा हो गया है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 24-Nov-2017
  • छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों को पार्टी संगठन ने कहा है कि वे अपने प्रभार के जिलों का दौरा करें, और जिलों या विधानसभा क्षेत्रों में रात गुजारें। चूंकि यह बात खबर में आ गई, इसलिए मंत्रियों से मीडिया यह सवाल भी करने लगा है कि उन्होंने अब तक कितनी रातें क्षेत्र में गुजारी हैं। मंत्रियों से यह उम्मीद भी की जा रही है कि वे कार्यकर्ताओं के घरों पर ठहरें, न कि किसी होटल या सरकारी विश्रामगृह में। ऐसे में जब मध्यप्रदेश से यह खबर आई कि चित्रकूट विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा निपट गई, तो लोगों ने तुरंत यह भी देखना शुरू किया कि उस गांव में क्या हुआ जहां पर शिवराज सिंह ने एक आदिवासी घर में रात गुजारी थी, और अगली सुबह भाजपा के कार्यकर्ता बाकी सामानों के साथ-साथ शौचालय की प्लाईबोर्ड की दीवारें तक उखाड़कर ले गए थे। उस गांव में भी बीजेपी हार गई। ऐसे में छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक नेता ने बंद कमरे की एक बातचीत में कहा कि क्षेत्र में जाकर रात गुजारने से हो सकता है कि नफे से ज्यादा नुकसान होने लगे। कुछ मंत्रियों का बर्ताव चारों तरफ नाराजगी छोड़कर आता है, और कुछ के साथ यह खतरा भी हो सकता है कि मोबाइल-कैमरों के इस जमाने में वे वहां पर कुछ अप्रिय वीडियो क्लिप भी छोड़ आएं। क्षेत्र में रात गुजारना एक भावनात्मक मुद्दा तो हो सकता है, लेकिन उससे खतरे बहुत हैं। फिर अभी तक किसी पार्टी को ऐसे रात गुजारने से, या किसी गरीब के घर खाने से कोई फायदा होते दिखाई नहीं पड़ा है। राहुल गांधी से लेकर अमित शाह तक, कई लोगों के ऐसे गरीब या आदिवासी पर्यटन के बाद यह विवाद उठते ही रहा है कि उन्हें खिलाने के लिए खाना कहां से आया था। 

    पीएन सिंह जो कहे वही सही...
    राज्य विद्युत नियामक आयोग में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। कुछ समय पहले तक वन मैन आर्मी रहे पीएन सिंह को अब हर चीज का जवाब देना पड़ रहा है। सिंह अभियंता संघ के अध्यक्ष रहे हैं। उद्योगपति से लेकर राजनेताओं तक उनकी स्वभाविक जान-पहचान हैं। बिजली की दर तय करने में उनकी अहम भूमिका रहती है। आयोग के अध्यक्ष नारायण सिंह को ज्यादा लेना-देना नहीं होता है। उनके लिए पीएन सिंह जो कहे वही सही।  लेकिन आयोग में सदस्य के रूप में अरूण कुमार शर्मा के आने के बाद आयोग में पीएन सिंह का एकाधिकार एक तरह से खत्म हो गया है। शर्मा एनटीपीसी के ईडी के पद से रिटायर होकर आए हैं और लोकल भी हैं।
    कुछ समय पहले बिजली की दरों में विसंगति को लेकर किसान जब आयोग के दफ्तर का घेराव करने पहुंचे तो सचिव पीएन सिंह ने मिलने से मना कर दिया। ऐसे में शर्मा खुद बाहर निकले और किसान नेताओं के साथ अपने कक्ष में ले जाकर उनकी समस्याओं को लेकर लंबी चर्चा की। किसान उनसे चर्चा कर संतुष्ट होकर लौटे। बिजली सब स्टेशन के निर्माण की अनुमति मामले में ऐसा पेंच लगाया कि पीएन सिंह को जवाब देने में पसीना छूट गया। इसी तरह बिजली की दरों को लेकर भी वे सख्त रहे हैं। वे शांत और मिलनसार स्वभाव के हैं, लेकिन सवाल इतने पैने होते हैं कि जवाब देना आसान नहीं होता है। ऐसे में पीएन सिंह को दिक्कत होना स्वाभाविक है। 

    धान नहीं रूकता, दारू क्या रूकेगी !
    छत्तीसगढ़ में जो लोग शराबबंदी की वकालत करते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि यह राज्य चारों तरफ से आधा दर्जन दूसरे राज्यों से घिरा हुआ है। झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, और उत्तरप्रदेश, इतने राज्यों से घिरे हुए छत्तीसगढ़ में चारों तरफ से शराब की तस्करी इतनी आसान होगी कि उसे रोकने के लिए राज्य की पूरी पुलिस भी कम पड़ जाएगी। सत्ताईस में से सत्रह जिले सरहदी हैं, और दूसरे राज्य से लगे हुए हैं। जिन लोगों को तस्करी के इस खतरे का अंदाज नहीं लग रहा, वे यह देख लें कि इस राज्य में धान खरीदी के मौके पर पड़ोसी राज्यों से ट्रक भर-भरकर धान रात-दिन चारों तरफ से आता है, और सरहदी जिलों में उत्पादन से बहुत अधिक धान मंडी में पहुंच जाता है। जब ट्रकों में धान इस तरह से आकर बिकता है, तो दारू तो फटफटी पर भी लाई जा सकती है, उसे कौन रोक लेगा? लेकिन दूसरे राज्यों से छत्तीसगढ़ में धान की तस्करी से एक बात साबित होती है कि यहां पर धान की बिक्री अच्छी तरह हो जाती है, और अच्छे दाम मिल जाते हैं। रही बात खेतों के कागजात की, तो मंडियों के दलाल स्थानीय किसानों के कागज तैयार रखते हैं, जिनके सहारे बाहर का धान बिक जाता है। अब जब धान बोनस मिला, तो ऐसे किसानों को उनके कागजों पर ही बोनस मिल गया, क्योंकि दूसरे प्रदेशों के किसान तो दावा कर नहीं सकते थे। यह एक किस्म से छत्तीसगढ़ सरकार के लिए सर्टिफिकेट है कि दूसरे राज्य के किसान भी यहां आकर धान बेचना चाहते हैं। लगे हाथों सरकार का यह फायदा भी होता है कि केन्द्र सरकार के धान उत्पादकता बढऩे के सम्मान उसे मिलते चलते हैं। 

    शिक्षाकर्मी हड़ताल से निपटने
    शिक्षाकर्मियों की हड़ताल से निपटने के लिए राज्य सरकार ने तेजी से कार्रवाई की है, और सभी पंचायतों को यह आदेश भेजा है कि स्कूलों में पढ़ाने के लिए अपने इलाके के बारहवीं पास नौजवानों को आमंत्रित किया जाए। यह भी कहा गया है कि जिन स्थानीय युवाओं द्वारा प्राथमिक शालाओं में पढ़ाया जाएगा, उन्हें संबंधित जिला पंचायत के सीईओ द्वारा अनुभव प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा जो कि भविष्य में ग्रामीण क्षेत्र की सेवाओं में नियुक्ति के समय अनुभव प्रमाणपत्र के रूप में प्रभावशील होगा। 
    अब कुछ दिन पढ़ाने के एवज में अगर ऐसा अनुभव प्रमाणपत्र मिल सकता है तो भला कौन ऐसे बारहवीं पास हंै जो कि इसे हासिल करना नहीं चाहेंगे? ऐसे में स्कूलों में पढ़ाई जल्द ही वापिस हो सकती है। अब भला कौन यह कहेगा कि अफसरों ने परेशानी में फंसने के बाद बच निकलने की हिकमत नहीं होती है? 
    प्रदेश के स्कूलों में काम करने वाले हजारों गुरुजी हड़ताल पर चल रहे हैं और वहां बच्चों की पढ़ाई लगभग ठप पड़ गई है। कहीं घरेलू महिलाएं, कहीं बेरोजगार तो कहीं पुलिस और पत्रकार स्कूलों तक जाकर उन्हें थाम रहे हैं। वे उनकी पढ़ाई को जैसे-तैसे आगे बढ़ा रहे हैं। उन्हें छमाही परीक्षा की तैयारी भी करा रहे हैं, ताकि उनका भविष्य खराब न हो। दूसरी ओर बच्चे उनसे सवालों की झड़ी लगाते हुए पूछ रहे हैं कि उनके असली मास्टरजी कब आएंगे। उन्हें उन सभी को पढ़ाने में क्या दिक्कत आ रही है। निजी स्कूलों के बच्चों की तुलना में कहीं वे कमजोर तो नहीं हैं। बच्चों के इस तरह के सवालों से नए गुरुजी हैरान हैं और वे उन्हें किसी भी तरह से संतुष्ट करने में लगे हैं। 

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Posted Date : 23-Nov-2017
  • प्रदेश में शिक्षाकर्मियों की हड़ताल से स्कूलों में पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। सरकार ने शिक्षाकर्मियों को हड़ताल पर जाने से रोकने के लिए हरसंभव कोशिश की, पर सफलता नहीं मिल पाई। इस पूरी कोशिश में सरकार की तरफ से रणनीतिक चूक भी सामने आई है, जिससे तजुर्बेकार अफसर हक्के-बक्के हैं। शिक्षाकर्मियों की हड़ताल पहले भी हुई है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब सीएम के टेबल पर कोई बातचीत टूटी है। आमतौर पर पहले समझौता हो जाता था और अंत में सीएम की मौजूदगी में इसकी घोषणा कर औपचारिकता निभाई जाती रही है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसके लिए कुछ हद तक सरकार के प्रतिनिधियों को जिम्मेदार माना जा रहा है। 
    हुआ यूं कि रविवार को न्यू सर्किट हाऊस में एसीएस एमके राउत और प्रमुख सचिव विकासशील ने शिक्षाकर्मी संघ के नेताओं से करीब 4 घंटे चर्चा की। संविलियन को छोड़कर सारी मांगें मान ली गई थी। कुछ देर तो ऐसा लगा कि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो गई है और आनन-फानन में शिक्षाकर्मियों के प्रतिनिधियों को सीएम हाउस ले जाया गया। बिना किसी पुख्ता समझौते के शिक्षाकर्मियों के प्रतिनिधियों को सीएम के टेबल पर चर्चा के लिए लाया गया। वहां भी शिक्षाकर्मियों के प्रतिनिधि संविलियन को लेकर अड़े रहे और सीएम के टेबल पर वार्ता टूट गई। समझौता टूटने से हड़बड़ाए सरकार के प्रतिनिधियों ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की और देर शाम तक सरकारी प्रेस नोट में यह बताया गया कि शिक्षाकर्मियों के सात संगठन हड़ताल से अलग हो गए हैं और वे काम पर लौट आए हैं। अंदर की बात यह है कि प्रदेशभर में पौने दो लाख शिक्षाकर्मी हैं और इन सात संगठनों से मात्र 10 फीसदी से भी कम शिक्षाकर्मी जुड़े हैं। वे पहले से ही हड़ताल से अलग हो चुके थे। सरकारी दावे के बावजूद 90 फीसदी शिक्षाकर्मी हड़ताल पर हैं और स्कूलों में तालाबंदी की नौबत आ खड़ी हो गई है। कुछ भी हो, इस चूक से सरकार की काफी किरकिरी हो रही है। 

    चुनावी सर्वे शुरू
    विधानसभा चुनाव करीब एक बरस बाकी है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा इन दोनों में ही हो सकता है कि आधे चेहरे नए हों। नतीजा यह हुआ है कि जो लोग इन दोनों बड़ी पार्टियों में से किसी की टिकट चाहते हैं, वे एक से अधिक सीटों पर नजर लगाकर वहां अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। जो लोग खर्च करने की ताकत रखते हैं, वे कुछ एजेंसियों के मार्फत चुनिंदा सीटों पर वोटरों का रूझान भी पता लगवा रहे हैं। धर्म और जाति, पार्टी के भीतर के गुट, और अगल-बगल की सीटों को मिलाकर देखने पर जाति का समीकरण भी आंका जा रहा है। जहां एक जिले में किसी पार्टी के एक जाति के कुछ विधायक हैं, वहां पर उस जिले के उस जाति के लोग अपनी संभावनाएं नहीं देख रहे हैं। ऐसे में वोटर लिस्ट को कम्प्यूटरों पर डालकर वोटरों की जाति के आधार पर विश्लेषण करने वालों का कारोबार खासा चल रहा है। समझदार लोग पहले से कुछ सीटों पर खर्च करके अपना दावा पुख्ता कर रहे हैं। इस दीवाली नोटबंदी और जीएसटी की वजह से तोहफे कम बंटे थे, अब अगली दीवाली तक हो सकता है कि वोट पड़ चुके रहें, इसलिए दीवाली के पहले ही तोहफे बंट जाएंगे। किस विधानसभा सीट पर किस दर्जे के कितने कार्यकर्ता या असरदार लोग रहेंगे, इसकी भी लिस्ट बनना शुरू हो गई है। 

    कुर्सी दौड़ के अगले कुछ हफ्ते

    अगले कुछ हफ्तों के भीतर छत्तीसगढ़ में कलेक्टर और एसपी की कुर्सियों पर केवल वही अफसर बचेंगे जो कि चुनाव के दिन तीन बरस पूरे न कर रहे हों। उनका अब तक का कार्यकाल कितना हो चुका है इसे देखते हुए नई लिस्ट बनना शुरू हो गई हैं। अभी कागजों पर न सही, लेकिन दिमाग में जिलों के नाम और हटने या हटाए जाने वाले अफसरों के नाम तय होते चल रहे हैं। जिन अफसरों को यह मालूम है कि चुनाव आयोग के नियम देखते हुए उनका हटना तय है, वे अभी से नई कुर्सियों को छांटकर उनके लिए कोशिशें करने में लग गए हैं। लेकिन आईपीएस अफसरों का एक प्रमोशन अभी बाकी है, और पांच या छह जिलों के एसपी इसमें डीआईजी बनने जा रहे हैं। ऐसे में इन सभी को अपने जिलों से बाहर निकलना होगा, अब या तो सरकार इन्हें बड़े जिलों में एसएसपी बनाएं, या फिर फील्ड में डीआईजी बनाकर एक पुरानी व्यवस्था फिर से कायम करे। इन सबके बीच में एक आईजी दुर्ग या रायपुर पहुंचने के लिए इतने सक्रिय हो गए हैं कि उन्होंने पीएचक्यू में बैठना तकरीबन बंद ही कर दिया है। 


    सेक्स-सीडी, फोकस अब मीडिया पर
    सेक्स-सीडी को लेकर पढ़-पढ़कर जो लोग थक न चुके हों, उनको यह बात दिलचस्पी की लग सकती है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच की लड़ाई से परे हटकर छत्तीसगढ़ में यह लड़ाई अब मीडिया के लोगों के बीच होती चल रही है। कुछ हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ में सामने आई सेक्स-सीडी के फर्जी साबित हो जाने से किसी नेता के चाल-चलन पर तो कुछ साबित नहीं हुआ, इस पूरे सिलसिले में मीडिया का अपना चाल-चलन जरूर साबित हो गया। अब लोग इसमें कौन नेता है, कौन नहीं, इस चर्चा से हटकर इस पर आ गए हैं कि इस मामले में मीडिया में किसका क्या रूख रहा, क्यों रहा, और अब क्या रहेगा? मतलब यह कि नेता तो कोई भी नंगा न हुआ, मीडिया जरूर नंगा हो चला है। एक वक्त था जब महज अखबार निकलते थे, और समाचार पत्रों में काम करने वाले लोग पत्रकार कहलाते थे, उनकी पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत होते थे। अब सिर्फ अखबार नहीं रहे, इसलिए यह कारोबार मीडिया हो गया, और इसमें काम करने वाले लोग पता नहीं अपने को अब पत्रकार कहते या मानते हैं, या नहीं? 


    नामकरण से ताकत?
    अमरीका से छत्तीसगढ़ आए एक व्यक्ति ने जब नया रायपुर में कैपिटॉल लिखा हुआ बोर्ड देखा तो वे हैरान रह गए। कैपिटॉल हिल अमरीका के वाशिंगटन में उस इलाके का नाम है जहां पर संसद है, और संसद के आसपास के लोग बसते हैं। यह अमरीकी सत्ता का प्रतीक भी है। लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी नया रायपुर में राजधानी के लिए अंग्रेजी का साधारण शब्द, कैपिटल, इस्तेमाल न करते हुए उसे अंग्रेजी हिज्जों में वाशिंगटन के कैपिटॉल की तरह लिखा गया है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के प्रतीक की तरह के हिज्जे अपनाने से सब लोगों को ताकत तो लगती ही होगी!   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 22-Nov-2017
  • विधानसभा के प्रमुख सचिव देवेंद्र वर्मा की गिनती बेहद पावरफुल अफसरों में होती है। उनकी सेवा अवधि 30 तारीख को खत्म हो रही हंै। उन्हें दो बार एक्सटेंशन दिया जा चुका है। अब फिर उनका कार्यकाल बढ़ाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर लॉबिंग हो रही है। लेकिन इसमें कई तरह के पेंच हैं। वर्मा को यथावत पद पर रखने के लिए विधानसभा के अधिकारियों-कर्मचारियों के सेवा नियमों में संशोधन करना होगा या फिर उन्हें संविदा पर रखना होगा। सुनते हैं कि संविदा पर नौकरी करने के लिए वर्माजी तैयार नहीं है। वे सेवा नियमों में संशोधन चाह रहे हैं और इसका तोड़ भी निकाल लिया है। पूर्वोत्तर के राज्यों में से एक-दो जगहों पर विधानसभा के प्रमुख सचिव के रिटायरमेंट की आयु 65 साल है। अब सरकार चाहे तो अध्यादेश लाकर विधानसभा के अधिकारियों-कर्मचारियों के सेवा नियमों में संशोधन कर सकती हैं। क्योंकि विधानसभा का शीतकालीन सत्र अभी दूर है। 
    सरकार के रूख पर विधानसभा के अफसरों की निगाहें टिकीं हुई है। सरकार में वर्मा के पैरोकारों की कमी नहीं है। केंद्र से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार के कई मंत्रियों से उनकी नजदीकियां जगजाहिर है। इन सबके बावजूद कोई हलचल नहीं होने से उनके ठीक नीचे के अफसर उम्मीद से नजर आ रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि हलचल इसलिए नहीं दिख रही है क्योंकि वर्मा विधानसभा अध्यक्ष के साथ 5 देशों की यात्रा पर गए हैं। वे गुरुवार को लौटेंगे। वे आएंगे तो सर्विस नियमों में संशोधन को लेकर हलचल तेज होगी ही। 

    श्रीचंद चेंबरानी
    आखिरकार भाजपा विधायक श्रीचंद सुंदरानी चेंबर की राजनीति के चाणक्य साबित हुए हैं। चुनाव से पहले ही उन्होंने एक-एक कर अपने विरोधियों को धराशाही कर दिया। उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे और अपने करीबी जितेंद्र बरलोटा को अध्यक्ष का प्रत्याशी बनवाने में कामयाब रहे। इस पद के लिए मौजूदा अध्यक्ष अमर परवानी और सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई योगेश की तगड़ी दावेदारी थी। कुछ लोग यह भी मानते है कि जीत  की संभावना भी बरलोटा के मुकाबले बाकी दोनों की ज्यादा थी। श्रीचंद ने योगेश का रास्ता रोकने के लिए विहिप के नेता रमेश मोदी को आगे किया और उन्हें ही प्रत्याशी तय करने की जिम्मेदारी दिलवा दी। साथ ही साथ योगेश के भतीजे की दावेदारी को हवा दे दी। आखिरकार योगेश मनमसोस कर रह गए। इसी तरह परवानी को भी मोदी ने शांत करा दिया। सुनते हैं कि एक-दो दावेदारों की सेल्सटैक्स की फाइल भी तैयार थी, जो कि विपरीत परिस्थितियों में मीडिया के माध्यम से दबाव बनाने में काम आ सकती थी, लेकिन ऐसी नौबत नहीं आई और सब कुछ श्रीचंद के मनमाफिक हो गया। 
    एक अखबार की खबर दूसरे अखबार में
    मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री, रविशंकर शुक्ल का शुरू किया हुआ अखबार महाकौशल अब कई हाथों से होते हुए दो नौजवान हाथों तक पहुंचा है जो अगले दस बरस इसे प्रकाशित करेंगे। आमतौर पर अखबारों में दूसरे अखबारों या पत्रकारों की खबरें छपती नहीं हैं, लेकिन ऐसी खबरों में दिलचस्पी सबकी रहती है। कुछ बरस पहले एक संपादक ने अखबार की नौकरी छोड़ी, और अपना अखबार शुरू किया, तो पहचान के विदेशी दोस्तों ने पूछा कि शहर के बाकी अखबारों ने इस खबर को किस तरह छापा? और वे यह जानकार हैरान रह गए कि किसी अखबार की खबर कोई दूसरा अखबार छापता नहीं है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि अखबार अपनी ऐसी खबरों को छपवाना चाहते हैं जो कि उनकी अखबारनवीसी की नहीं रहती, जो महज उनकी मार्केटिंग की रहती है, ब्रांड प्रमोशन की रहती है। अब किसी एक के कारोबार को कोई दूसरे लोग क्यों बढ़ाएं? 
    गरीब पर गरीब की ही मार
    समाज में गरीब के साथ भेदभाव हमेशा से होता आया है, लेकिन खुद गरीब लोग भी दूसरे गरीबों के साथ भेदभाव बड़े उत्साह से करते हैं। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, रायपुर के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में सुबह हर मिनट दर्जनों मरीज और उनके रिश्तेदार भीतर घुसते हैं। दरवाजे पर ही जो लोग जाहिर तौर पर गरीब दिखते हैं, उनके जेब की तलाशी ली जाती है कि वे पान-गुटखा या बीड़ी-सिगरेट लेकर तो भीतर नहीं जा रहे हैं। दूसरी तरफ जो लोग संपन्न लोगों सरीखे कपड़े पहने रहते हैं, उनको रास्ता देने के लिए सुरक्षा कर्मचारी तुरंत किनारे हो जाते हैं। अब सुरक्षा कर्मचारी खुद भी मामूली तनख्वाह पाने वाले गरीब ही रहते हैं, और वे गरीबों की तलाशी ही लेते हैं। 
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Posted Date : 21-Nov-2017
  • रमन सरकार जनवरी से संचार क्रांति योजना की शुरूआत करने जा रही है। इस योजना के तहत गरीबों-विद्यार्थियों को मुफ्त में स्मार्टफोन दिया जाएगा। पहले चरण में 50 लाख से अधिक लोगों को स्मार्टफोन दिए जाएंगे। शहरों में राशन दूकान और गांवों में पंचायतों के जरिए स्मार्टफोन वितरित किया जाएगा। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि चुनावी साल में इस योजना से काफी फायदा होगा और चौथी बार सरकार बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन इस योजना से सरकार  और पार्टी के कई लोगों को बड़े फायदे की उम्मीद नहीं है। उनका मानना है कि चुनावी साल में इस योजना से नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। 
    सुनते हैं कि इस योजना को लेकर कैबिनेट में भी किचकिच हुई थी।  सबसे बड़ी समस्या नेटवर्किंग को लेकर है। यह तर्क दिया गया कि 15 सौ नए मोबाइल टावर लगाए जाएंगे। इससे सरकार और पार्टी के कई लोग असहमत हैं। उनका कहना है कि मोबाइल टावर लगाने से गांवों में विरोध शुरू हो सकता है। चुनावी साल में यह फैसला जोखिमभरा हो सकता है। योजना से असहमत लोगों का यह भी कहना है कि सरकार ने धान के पंजीयन के लिए किसानों का मोबाइल नंबर ले लिए हैं। यानी धान बेचने के लिए मोबाईल अनिवार्य पहले ही हो गया था। निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के पास मोबाईल है। ऐसे में इस योजना का कोई बड़ा फायदा नहीं मिलने वाला है। अलबत्ता, वितरण आदि में लापरवाही बरती गई, तो नुकसान ज्यादा हो सकता है। वैसे भी उत्तरप्रदेश में चुनाव से पहले स्मार्टफोन बांटे गए थे इसका वहां की सरकार को कोई फायदा नहीं मिला उल्टे सरकार ही चली गई। लेकिन सरकार के रणनीतिकारों को भरोसा है कि मुफ्त में स्मार्टफोन देने से फायदा ही मिलेगा। क्योंकि बिना कोई खर्च किए कुछ मिलने से लोगों को खुशी ही होती है। 

    एक सीट पर सिर्फ अफसर?
    अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित डौंडी लोहारा विधानसभा सीट से इस बार कई रिटायर्ड अफसर चुनावी समर में कूदने की तैयारी कर रहे हैं। रिटायर्ड आईपीएस अफसर रविन्द्र भेडिय़ा कांग्रेस टिकट से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। वर्तमान में उनकी पत्नी अनिला भेडिय़ा विधायक है। भेडिय़ा राजनीति में सक्रिय हो गए हैं और वे पीसीसी मेम्बर भी बन चुके हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि इस सीट से बाकी पार्टियां भी किसी रिटायर्ड अफसर को चुनाव मैदान में उतार सकती हैं। भाजपा की तरफ से रिटायर्ड जनसंपर्क अफसर सुखदेव कुरैटी काफी सक्रिय हैं और वे टिकट के लिए प्रयासरत भी हैं। पार्टी यहां से एक बार रिटायर्ड रजिस्ट्रार पीआर नाइक को टिकट भी दे भी चुकी है। लेकिन ठीक उसी समय उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला उजागर हो गया और वे प्रत्याशी बनने से वंचित रह गए। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी से भी एक सेवानिवृत्त वन अफसर का नाम सामने आ रहा है। कुल मिलाकर यहां सेवानिवृत्त अफसर आपस में टकराते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।  
     

    सड़क पर लोगों का बर्ताव उनके बचपन की मानसिकता बताता है। जो लोग हॉर्न अधिक बजाते हैं वे लोग बचपन में खिलौनों की हसरत रखते थे लेकिन उन्हें खिलौने मिले नहीं। इसलिए झुनझुनों की कमी को वे हॉर्न बजाकर पूरा करते हैं। दूसरी तरफ जो लोग जीवन में पर्याप्त महत्व नहीं पा पाते, वे लोग अपनी गाडिय़ों की नंबर प्लेट में छेडख़ानी करके बॉस बनने की कोशिश करते हैं। 

    तू डाल-डाल मैं पात-पात

    आरटीआई एक्टिविस्ट कई तरह की साख वाले रहते हैं, कुछ लोग बहुत ईमानदारी से सार्वजनिक मुद्दों के लिए काम करते हैं, और कुछ लोग वसूली-उगाही में लगे रहते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में अब बहुत से आरटीआई एक्टिविस्ट हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कामयाबी पा चुके हैं, और उनके नाम से सरकारी दफ्तरों में लोग सहमने लगे हैं। जंगल दफ्तर में बहुत सी अर्जियां लगाकर अनुभवी हो चुके एक आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि उनसे तो अर्जी ले ली जाती है, लेकिन कोई नए लोग अर्जी लेकर पहुंचे, तो उन्हें शुरू के कुछ महीने चक्कर खिलाने का इंतजाम अब सरकारी कर्मचारी सीख चुके हैं। सूचना के अधिकार का आवेदन बनाना भी एक हुनर है, और अगर सही तरीके से जानकारी न मांगी गई, तो उसी आधार पर 28 दिनों के बाद टका सा जवाब दे दिया जाता है। एक दिलचस्प तरीका यह भी है कि अर्जी के साथ लगने वाला पोस्टल ऑर्डर अगर 10 रुपये का नहीं मिला, और 20 रुपये का लगा दिया गया, तो भी सरकारी दफ्तर अर्जी लौटा देता है कि ऐसा घोषणापत्र दें कि अतिरिक्त 10 रुपये पर बाद में दावा नहीं किया जाएगा। सूचना कार्यकर्ता जितने रास्ते निकालकर जानकारी के लिए पहुंचते हैं, सरकारी कर्मचारी-अधिकारी उससे अधिक रास्ते निकालकर भाग निकलते हैं। 
    इस जज के फैसलों का क्या करें?
    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जज रह चुके एक जज के गिरफ्तार हो जाने के बाद अब लोग यह अटकल लगाने लगे हैं कि सवा दो साल के कार्यकाल में जस्टिस आईएम कुद्दुसी ने जितने फैसले दिए थे, क्या उन सबके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए? हालांकि कानून में ऐसा कोई इंतजाम नहीं है, फिर भी लोगों का यह मानना है कि जो जज ऐसा भयानक भ्रष्ट और मुजरिम पाया जा रहा है, उसने फैसले कैसे दिए होंगे? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह पहला ऐसा मामला रहा कि यहां रह चुके एक जज की ऐसी दुर्गति हो रही है, और इससे अदालत की साख को पूरे देश में ही खराब हुई है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 20-Nov-2017

  • रिटायरमेंट के बाद पद की चाह रखने वाले अफसरों से सरकार के रणनीतिकार परेशान हैं। तकरीबन रोज देश-प्रदेश के प्रभावशाली लोगों की सिफारिशें पहुंच रही है। कई तो ऐसी हैं, जिन्हें इंकार करना मुश्किल हो रहा है। उन अफसरों के लिए ज्यादा सिफारिशें आ रही है, जिनकी छवि अच्छी नहीं रही है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की काफी शिकायतें रही हैं। सुनते हंै कि किसी को पद दिलाने के लिए सरकार के मंत्री ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, तो किसी के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तक पैरवी कर रहे हैं। सेवा अवधि में इन अफसरों की जीवन शैली, शान-शौकत से भरी रही है और आखिरी दिनों तक अपने मातहतों को निचोडऩे में कोई कसर बाकी नहीं रखी।  एक अफसर ने तो रिटायर होने के बाद भी सीआर तब तक नहीं लिखा, जब तक मातहत ने उनके घर के इंटीरियर का काम पूरा नहीं करवा दिया। ऐसे लोगों के बीच में एक-दो ने अपनी कार्यशैली से शासन-प्रशासन में मिसाल भी कायम की है। ऐसे अफसर आज भी लोगों को याद आते हैं। इन्हीं में एक पीसीसीएफ (वाईल्ड लाईफ) के पद से रिटायर हुए एनके भगत भी रहे हैं, जिनका वन विभाग में काफी सम्मान से नाम लिया जाता है। 
    भगत वर्ष-07 में रिटायर हुए। वे अविवाहित रहे और यह माना जाता है कि ईमानदारी के जितने भी मापदण्ड हैं, उनमें वे एकदम फिट थे। उन पर कभी पक्षपात के आरोप नहीं लगे और गांधीवादी शैली में जीवन गुजारा। रिटायर होने के बाद वन विभाग के छोटे-बड़े अफसर चाहते थे कि वे यहां किसी न किसी के रूप में सेवा दें। कुछेक अफसर इसके लिए सीएम से मिलने के लिए तैयार भी बैठे थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ तौर पर मना कर दिया। और तो और उन्होंने आईएफएस एसोसिएशन द्वारा उनके सम्मान में दी जा रही विदाई पार्टी में भी आने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया कि पार्टी के बिल के लिए किसी डीएफओ या रेंजर को बलि का बकरा बनाया जाएगा। वे रिटायर होने के बाद डोंगरगढ़ मंदिर दर्शन के लिए चले गए और फिर अगली सुबह अपने गृह प्रदेश हरियाणा के लिए रवाना हो गए। अब हाल यह है कि अफसरों के रिटायर होने से 15 दिन पहले और बाद तक पार्टी होने लगी है और छोटे अफसर-ठेकेदार बलि का बकरा बनाए जाने लगे हैं।
    मूत्रालयों को उद्घाटन का इंतजार
    कल 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरूष दिवस भी था, और अंतरराष्ट्रीय शौचालय दिवस भी था। अब पुरूषों का शौचालयों से कुछ खास लेना-देना रहता नहीं है। वे खुले आसमान तले जीने में यकीन रखते हैं, और शौचालय तो कैद करके रख देता है। इसलिए अमिताभ बच्चन के इश्तहारों में खुले में जाते आदमियों पर ही निशाना लगाया जाता है। भारत के तकरीबन सारे ही हिस्से में आदमियों को किसी तरह का भी एक कोना मिल जाए, तो फिर शौचालय की जरूरत रहती नहीं है। ऐसे लोगों को एक बार ईरान भेज दिया जाए, तो उनका जेल जाना तय रहेगा। वहां पर लंबे सड़क सफर में भी शौचालय या मूत्रालय या तो बस स्टॉप पर रहते हैं, या फिर किसी मस्जिद के बाहर। बसें भी इन दो जगहों के अलावा कहीं थमती नहीं हैं। ऐसे में मर्जी से बस रोककर फारिग होने वाले हिंदुस्तानियों की अक्ल ठिकाने आ जाएगी। रायपुर शहर में म्युनिसिपल ने जगह-जगह सड़क किनारे मूत्रालय बनाकर ताला डालकर रख दिए हैं, और पूछने पर जवाब मिला है कि पूरे शहर के मूत्रालय एक साथ शुरू किए जाएंगे। तब तक लोग खुले में काम चला रहे हैं, और हो सकता है कि म्युनिसिपल पुराने लतीफे की तरह सचमुच ही किसी बड़े नेता को ढूंढ रहा हो जिससे कि मूत्रालयों का उद्घाटन कराया जा सके।
    सीडी शुरू हो ही जाती है...
    चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया पार्टी में एकजुटता लाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। उनकी कोशिश कुछ हद तक कामयाब भी दिख रही है। सभी बड़े नेता एक मंच पर दिख भी रहे हैं। लेकिन कार्यक्रमों के बीच कुछ छोटा-मोटा ऐसा हो जा रहा है जिससे यह संकेत मिल रहा है कि एकता के लिए काफी कुछ करना बाकी है। सेक्स-सीडी कांड को लेकर प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल जिस तरह मुखर हैं, वह बाकियों को रास नहीं आ रहा है। नेताओं ने प्रदेश प्रभारी को मना लिया था कि सीडी कांड से पार्टी दूर रहेगी। लेकिन बघेल खुले तौर पर पार्टी कार्यक्रमों में एक-दो बार सीडी का जिक्र छेड़ दे रहे हैं। जनाधिकार सभा में बघेल ने जैसे ही सीडी कांड को लेकर सरकार पर निशाना साधा, तुरंत एक नेता ने फुसफुसा दिया, फिर सीडी शुरू हो गई...।
    आयोग का काम जलसा!
    छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग ने अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा कार्यक्रम किया, रानी लक्ष्मी बाई की जयंती मनाने का। कार्यक्रम की तस्वीरें देखकर यह जाहिर है कि उस पर लाखों का खर्च भी हुआ, और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष भी उसमें शामिल हुईं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में महिलाओं पर ज्यादती के मामलों को करीब से देखने वाले लोगों का कहना है कि आयोग अगर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करता होता तो राज्य में महिलाओं पर जुल्म घट गए होते। लेकिन अपने रोजाना के काम को ठीक से करने में वह वाहवाही तो नहीं मिलती जो कि बच्चियों को लक्ष्मी बाई बनाकर सजाकर, घोड़ों पर बिठाकर कार्यक्रम करने से मिलती है। आयोग रोज का काम ठीक से करता तो सत्ता नाराज होती क्योंकि बहुत से फैसले सत्ता के खिलाफ रहते। ऐसे में सामने खड़े विधानसभा चुनाव को देखते हुए आयोग की अध्यक्ष हर्षिता पाण्डेय को कुछ गिनीचुनी महिलाओं को इंसाफ देने के बजाय जलसा करवाना बेहतर लगा। महिला आयोग से निकलने के बाद विभा राव भी विधानसभा चुनाव लडऩा चाहती हैं, और इस पर अभी काबिज हर्षिता पाण्डेय भी। दोनों के परिवार के लोग राजनीति में रहे हैं, और भाजपा की चौथी पारी में विधायक बनने का मतलब सब लोग अच्छी तरह जानते हैं।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 19-Nov-2017
  • मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से जो लोग उनके दफ्तर में जाकर मिलते हैं, वे टेबिल पर सामने रखी एक तख्ती को पढ़े बिना नहीं रह पाते, जिस पर लिखा रहता है-आप मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। जो लोग सचमुच ही बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते हैं, लेकिन जिन्हें मुख्यमंत्री से मिलने का समय और मौका मिलता है, उनका यह तजुर्बा है कि मुख्यमंत्री सचमुच ही लोगों को महत्व देकर उनकी बात ध्यान से सुनते हैं। इससे परे जिन लोगों को उनसे उनके दफ्तर में मिलने का मौका नहीं मिलता लेकिन उनके निवास पर होने वाले जनदर्शन की कतार में खड़े रहकर मिलने की बारी आती है, वे भी जानते हैं कि उनके शिकायती लहजे पर भी मुख्यमंत्री शांत रहकर सारी बातें सुनते हैं, और कई लोगों की उन्हीं बातों को एक से अधिक बार सुनकर भी शांत रहते हैं। अब प्रदेश के अफसरों को देखें, जो कि सारे के सारे मुख्यमंत्री के मातहत ही हैं, तो उनके जैसी विनम्रता और उनके जितना बर्दाश्त शायद ही किसी अफसर में हो। उन्हें करीब से देखने वाले एक गैर-अफसर ने कहा कि डॉ. रमन सिंह को मुलाकातियों के अलावा अपनी सरकार के अफसरों से भी हाथ मिलाना शुरू कर देना चाहिए, हो सकता है कि उनकी विनम्रता और उनकी सहनशीलता कुछ हद तक अफसरों में भी आ जाए, और सरकारी दफ्तरों में पहुंचने वाली जनता थोड़ा बेहतर बर्ताव पाए। 
    काफी सुधार हुआ है
    केन्द्र सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा लगातार बड़े पैमाने पर करवाए जा रहे फर्जी नक्सल-आत्मसमर्पण के मामले में कुछ कड़ा रूख अपनाते हुए एक चि_ी भेजी है कि जो सचमुच ही नक्सली हों, सिर्फ उन्हीं का समर्पण करवाया जाए। केन्द्र में भाजपा की सरकार, और राज्य में भी, इसलिए चि_ी की जुबान कुछ नर्म है, और सीधे-सीधे यह तोहमत नहीं लगी है कि अभी हो रहे सरेंडर फर्जी हैं, लेकिन फिर भी बात घुमा-फिराकर वही कही गई है। ऐसे फर्जी सरेंडर के इशारे को अधिक नुकसानदेह न मानते हुए एक आला पुलिस अफसर ने कहा, चि_ी तो आती ही रहती है। लेकिन पहले के मुकाबले नौबत अब बहुत अच्छी है, पहले फर्जी मुठभेड़-हत्या की तोहमत लगती थी, अब फर्जी-सरेंडर की अहिंसक तोहमत लग रही है। हिंसा से अहिंसा तक का यह सुधार कम नहीं है। 
    पंचायत मंत्री और परंपरा
    सरकारों में कुछ ऐसे संयोग या दुर्योग रहते हैं कि उनकी आशंका कई लोगों पर मंडराती रहती है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से एक परंपरा सी चली आ रही है कि पंचायत मंत्री अगला चुनाव हार जाते हैं। अर्जुन सिंह के बेटे राहुल सिंह, या अजय सिंह पंचायत मंत्री थे, और अगला चुनाव हार गए। छत्तीसगढ़ बना तो पहले पंचायत मंत्री अमितेष शुक्ला अगला चुनाव हार गए। इसके बाद भाजपा की पहली सरकार बनी, तो पंचायत मंत्री बने अजय चंद्राकर चुनाव हार गए। फिर रामविचार नेताम और हेमचंद यादव पंचायत मंत्री रहे, तो वे भी चुनाव हार गए। अब फिर अजय चंद्राकर पंचायत मंत्री हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे अगला चुनाव हार ही जाएं, क्योंकि ऐसे सिलसिले कभी न कभी टूटते भी हैं। कुछ विधायकों-मंत्रियों के साथ ऐसा भी रहता है कि वे एक चुनाव जीतते हैं, और एक चुनाव हार जाते हैं, लेकिन फिर भी कभी-कभी इससे उबर भी जाते हैं। 

    मन्नत बंधी रहती है
    मुख्यमंत्री निवास पर हर कुछ दिनों में होने वाले जनदर्शन के दिन बाहर जाकर देखें तो सीएम बंगले के बाहर की सड़क के डिवाइडर पर रेलिंग से लोगों के गमछे और दुपट्टे बंधे रहते हैं। हिफाजत के लिहाज से पुलिस थैले और दुपट्टे-गमछे बाहर रखवा लेती है। प्रदेश भर से अपनी अर्जी लेकर आने वाले लोग रेलिंग में अपने इन कपड़ों को ठीक उसी तरह बांध देते हैं जिस तरह अर्जी लेकर जाने पर किसी मंदिर या दरगाह में बांधते हैं। यह एक अलग बात है कि किसी-किसी दिन मुख्यमंत्री निवास के बाहर किसी एक की बांधी अर्जी को कोई और खोलकर ले जाते हैं, और फिर वैसे में दूर-दूर से आए हुए जरूरतमंद लोग पुलिस से भिड़ते रहते हैं। कवर्धा में सीएम निवास के बाहर आत्मदाह की एक कोशिश, और उसके बाद उसकी मौत को लेकर कवर्धा और राजनांदगांव से लेकर रायपुर तक पुलिस में सनसनी है। रायपुर में पहले भी पुलिस मुख्यमंत्री निवास के बाहर जनदर्शन के दौरान आत्मदाह की कोशिश झेल चुकी है, और जहां सैकड़ों-हजारों निराश लोग उम्मीद लेकर पहुंचते हों, वहां पर कुछ लोगों का आपा खो बैठने का खतरा हमेशा ही बना रहेगा। 
    गिने-चुने तजुर्बे का नुकसान
    अतिरिक्त मुख्य सचिव बनने के बाद चित्तरंजन खेतान, आर.पी. मंडल, और बी.वी.आर. सुब्रमण्यम मुख्य सचिव बनने से बस एक दर्जा नीचे हैं। वैसे उनके ऊपर अभी चार अफसर और हैं, लेकिन अगले कुछ महीनों, या कुछ हफ्तों में इनमें से दो हट जाएंगे, और ये बस एक कदम की दूरी पर रहेंगे। ऐसे में यह बात बहुत मायने रखती है कि किन अफसरों को केन्द्र और राज्य सरकार दोनों का तजुर्बा हासिल है, किन अफसरों ने अलग-अलग कई किस्म के विभागों का काम सम्हाला है, ताकि मुख्य सचिव बनने पर उनके पास हर किस्म का तजुर्बा रहे। लेकिन कुछ अधिकारी और कुछ मंत्री एक-दूसरे के साथ अधिक सहूलियत महसूस करते हैं, इसलिए पंचायत विभाग में पहले भी बरसों काम कर चुके आर.पी. मंडल एक बार फिर पंचायत विभाग का काम देखने जा रहे हैं, और जिस मंत्री, अजय चंद्राकर, के साथ उन्होंने काम किया था, उन्हीं के साथ एक बार फिर वही विभाग देखेंगे। यह नौबत मंत्री और अफसर की सहूलियत की तो रहती है, लेकिन राज्य के हित की नहीं रहती। जिन लोगों को मुख्य सचिव बनना है, उनको शासन के बहुत से विभागों का अनुभव रहना चाहिए, तभी वे उन विभागों के सचिवों के काम की निगरानी रख सकते हैं। लेकिन असल जिंदगी में ऐसा होता नहीं है, और गैरशासकीय प्राथमिकताएं और पसंद हावी हो जाती हैं। 
    इधर कुआं, उधर खाई
    बस्तर में अभी कुछ ऐसे बैनर सामने आए हैं जो कि नक्सलियों की तरफ से लिखकर टांगे गए दिखते हैं। इनमें पुलिस, नेता, और मीडिया सबको धमकी है। मीडिया के जो लोग झूठी रिपोर्ट करते होंगे, उन्हीं को जान से मारने की धमकी दी गई है, यह एक अलग बात है कि रिपोर्ट सच्ची है या झूठी इसको तय करने का काम नक्सली ही करेंगे। जिस तरह वे जनसुनवाई करके यह तय करते हैं कि कौन पुलिस के मुखबिर हैं, और फिर उनका गला काट देते हैं, कुछ उसी तरह का यह फैसला भी हो सकता है। बस्तर के इलाके के एक थके हुए अखबारनवीस ने कहा- झूठा लिखेंगे तो नक्सली मार देंगे, सच्चा लिखेंगे तो पुलिस मार देगी। बस्तर में न लिखना ही ठीक है, और इसीलिए आदिवासियों ने बहुत समय तक पढऩा-लिखना नहीं सीखा था, और सुरक्षित थे।  rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • रियल स्टेट कारोबार पर नियंत्रण रखने वाले, संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग, रेरा, का गठन बहुत दूर नहीं दिख रहा है। जानकारों का मानना है कि ऐसे दूसरे किसी आयोग के गठन में जब देरी होती है, तो हाईकोर्ट सरकार से जवाब-तलब भी करता है। अब हाईकोर्ट के जज ही रेरा की चयन समिति के मुखिया हैं, और रेरा के अध्यक्ष पद के लिए लोगों की अर्जियां भी आ चुकी हैं, तो फिर अब इसमें होने वाली देर के लिए हाईकोर्ट किसे नोटिस जारी करेगा? मतलब यह कि अब यह चुनाव अधिक दूर नहीं दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ राज्य सरकार के सर्वोच्च प्रशासनिक स्तर पर और भी फेरबदल होने तय दिखते हैं, और ठीक ऐसे मौके पर अभी-अभी एनएमडीसी गए एन. बैजेंद्र कुमार की कुछ दिनों की रायपुर यात्रा ने कुछ लोगों में बेचैनी खड़ी कर दी है। उधर रेरा में जाने के उत्सुक एम.के. राउत पर इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट की नोटिस पकी फसल पर ओलों की मार जैसी साबित हो रही है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में कोशिश तो की जा रही है, लेकिन इसी हाईकोर्ट के जज रेरा की चयन समिति में हैं, और अखबार तो पढ़ते ही होंगे। कब का किया कब जाकर आड़े आता है, यह लोग समय रहते सोच भी नहीं पाते।

    तबके कमिश्नरों की बात ही और थी...
    अविभाजित मध्यप्रदेश में कमिश्नर का जलवा होता था। कुशल प्रशासक को ही कमिश्नर बनाया जाता था। बस्तर कमिश्नर को तो कुछ वित्तीय अधिकार भी प्राप्त थे। रायपुर, बिलासपुर और बस्तर में कमिश्नर रहे कई अफसर केन्द्र और राज्य सरकार में शीर्ष पद पर पहुंचे। इनमें बीएस बासवान, स्व. सुदीप बैनर्जी, शेखर दत्त, सत्यानंद मिश्रा जैसे कई नाम हैं। मौजूदा मुख्य सचिव विवेक ढांड राज्य के एकमात्र अफसर हैं, जो अविभाजित मध्यप्रदेश में बस्तर कमिश्नर के पद पर रहे। लेकिन राज्य गठन के बाद जोगी सरकार ने कमिश्नरी भंग कर दी। कमिश्नर के अधिकार कलेक्टरों को दे दिए गए। बाद में राजस्व और अन्य तरह की दिक्कतों के चलते रमन सरकार ने फिर कमिश्नरी व्यवस्था बहाल की। लेकिन कमिश्नरों का पुराना रूतबा लौटकर नहीं आया। कई साल तो कमिश्नरों को अपने अधिकारों के लिए ही संघर्ष करना पड़ा। हाल यह रहा कि सरकार के कई आदेश कमिश्नर दफ्तर तक नहीं पहुंचते रहे हैं। ढांड के मुख्य सचिव बनने के बाद अधिकारों में थोड़ा बहुत इजाफा हुआ। फिर भी कमिश्नर के पद को लूप लाईन माना जाने लगा है। 
    सरकार अविनाश चम्पावत की कार्यप्रणाली से नाराज थी, सो उन्हें सरगुजा कमिश्नर बना दिया गया। हालांकि बाकी संभागों में जो कमिश्नर है वे सभी मेहनती माने जाते हैं। लेकिन कई बार समस्या आने पर जिलों के कलेक्टर कमिश्नर के बजाए सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय को रिपोर्ट करना उचित समझते हैं। एक पूर्व कमिश्नर ने हास-परिहास में कमिश्नर के पद को सेठ का साला तक करार दिया। यानि भोजनालय में गल्ले पर बैठे सेठ ने अपने ठलहे साले के लिए काम निकाल लिया। बैरा भोजन परोसने-साफ सफाई में लगा है और पत्नी के ठलहे भाई के पास उन्हें देखने का ही काम रह गया है। पत्नी का भाई न भी मौजूद न हो तो भी काम चल सकता है। हाल यह है कि ज्यादातर अफसर सेठ की बीवी का भाई बनने से कतराते हैं। 
    एयर होस्टेस नीरजा जैसा मिजाज
    देखते ही देखते डॉ. रमन सिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में 14 साल पूरे कर लिए। इस दौरान कैसी भी राजनीतिक परिस्थिति हो, कितनी बड़ी समस्या हो, उनके माथे पर चिंता की लकीरें नहीं देखने को मिली। उन्होंने हर परिस्थिति का सामना हँसकर किया है। पार्टी के कुछ नेता उनकी तुलना एयर होस्टेस से करते हैं जो कि विपरीत हालात में भी यात्रियों की खातिरदारी करती हैं और किसी तरह की नाराजगी को भी हँसकर झेल लेती हैं। मुख्यमंत्री ने भी एयर होस्टेज की तरह ही काम किया है और बाढ़-अकाल या फिर किसी भी तरह की विषम परिस्थिति हो, मनोबल गिरने नहीं दिया, फिल्म नीरजा की बहादुर एयरहोस्टेस की तरह। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने पार्टी के भीतर देश में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, और पार्टी पर आई परेशानियों के वक्त भी मुस्कुराहट नहीं छोड़ी।
    मुन्नीबाई पर अभी नरमी
    बस्तर जाने पर ही कांग्रेस के नेताओं को वहां का मुन्नीबाई कांड याद आता है। बस्तर के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार के मंत्री केदार कश्यप से जुड़े कई विवादों में से यह सबसे खतरनाक है। केदार की पत्नी कोई इम्तिहान दे रही थीं, और उनकी जगह उनकी (पत्नी की) बहन परीक्षा देते बैठी थीं, जो कि खुद सरकारी कर्मचारी हैं। लोगों ने इसका पता चलने पर हंगामा कर दिया, लेकिन विश्वविद्यालय से लेकर कॉलेज तक ने जांच के नाम पर पीठ दिखा दी। आज तक न मुन्नीबाई (असली नाम नहीं, मुन्नाभाई फिल्म की तरह उछला हुआ नाम) का पता लगा, और न किसी पर कोई कार्रवाई हुई। कांग्रेस के बड़े नेता जब बस्तर जाते हैं, तब किसी पूजा-पाठ की तरह एक औपचारिकता यह भी पूरी कर लेते हैं। फिलहाल कांग्रेस पार्टी के लिए पर्दे के पीछे से तैयारी कर रहे कुछ लोगों ने इस मामले के इतने सुबूत जुटा लिए हैं कि अगले चुनाव में उससे केदार कश्यप को मौके पर ठोस नुकसान पहुंचा सकें। ये लोग चुनाव के पहले इस मुद्दे को ज्यादा छेडऩे के खिलाफ हैं कि जब लोहा गर्म हो तब चोट की जाए।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 17-Nov-2017
  • इन दिनों एक-एक वीडियो क्लिप, या एक-एक पुलिस रिपोर्ट की वजह से देश के बड़े-बड़े दिग्गज बाबा जेल में हैं। आसाराम पर लगे बलात्कार के आरोप पर अभी बयान भी पूरे दर्ज नहीं हुए हैं, और उन्हें जेल में बंद हुए चार बरस से अधिक हो गए। अब अगर बलात्कार की सजा भी होती है, तो भी इतने बरस उसमें से कम हो जाएंगे। एक दूसरा वक्त था जब बाबा या महंत, मठाधीश ऐसे जुर्म करके आसानी से बच जाते थे क्योंकि उनके खिलाफ न तो किसी में रिपोर्ट की हिम्मत रहती थी, और न ही कोई वीडियो सुबूत आज की तरह जुट पाते थे। उस वक्त सत्ता में बैठे लोग भी अदालत और जांच पर आज के मुकाबले अधिक कब्जा रखते थे। 
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़े मठ के महंत ने किसी महिला से अपने सेक्स-संबंधों के चलते, उससे हुए बेटे के एक झगड़े में अपने लठैतों से किसी का कत्ल करवा दिया था। इसका कत्ल में कुछ गवाह वगैरह भी जुट गए थे, लेकिन इसके पहले यह सब पुख्ता मामला बन पाता, उस वक्त के एक ब्राम्हण मुख्यमंत्री का ब्रम्हणत्व जाग गया, और उन्हें लगा कि उनके राज में एक महंत को फांसी हो जाए, यह शर्मनाक बात रहेगी। नतीजा यह निकला कि उस महंत से सार्वजनिक उपयोग का एक  बड़ा दान करवाया गया जो कि आज भी इस्तेमाल में है, और फिर वह मामला रफा-दफा करवाया गया। उन दिनों सार्वजनिक खुली जगह पर हत्या जैसे जुर्म को रिकॉर्ड करने के लिए कोई वीडियो-कैमरे तो थे नहीं, इसलिए मामला आसानी से दब भी गया। पुराने लोगों को यह मामला याद है, और उसमें से भी बहुत से धर्मालु लोगों को यह भला लगता है कि एक महंत फांसी से बच गया, उन्हें यह खास बात नहीं लगती कि मठ का महंत बाहर की एक औरत से ऐसा रिश्ता रखे, और फिर उसकी संतान के जमीन के झगड़े में अपने लठैतों से कत्ल करवा दे। 
    पढ़ो बहुत, कहो कम
    फोब्र्स मैगजीन के एक बड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन सिंह का भाषण राज्य और मुख्यमंत्री के बारे में कही गई हर बात का कोई न कोई दूसरा संदर्भ भी लिए हुए था। अंग्रेज राज से लेकर आज के दुनिया के सबसे बड़े पहली पीढ़ी के उद्यमियों की नीतियों और रणनीतियों की चर्चा से उन्होंने अपनी हर बात का वजन बढ़ाया। अब ऐसा कहने के पहले खासा पढऩा भी जरूरी होता है। शायद एक-एक पूरी किताब के निचोड़ से अपना गढ़ा हुआ एक-एक वाक्य। लेकिन आज सरकारी लोगों का पढऩा भी कम हो गया है, और लिखना या किसी बाहरी दायरे में बोलना तो और भी कम हो गया है। लेकिन महज सरकार के लोगों की बात क्यों करें, मीडिया के लोगों में भी पढऩा और लिखना दोनों घट गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया पर भी लोगों का मौलिक लिखना, किसी मौलिक बहस में शामिल होना कम हो गया है। शायद सरकार से लेकर मीडिया तक के कामकाज में मौलिक सोच, मौलिक समझबूझ, और अनोखे प्रयोगों की जगह घटते-घटते बहुत ही घट गई है।
    सीएम और सीएस साथ-साथ...
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और मुख्य सचिव विवेक ढांड ग्राम सुराज में आग बरसती गर्मी में लगातार महीने भर गांव-गांव का दौरा करते हैं। विवेक ढांड का कार्यकाल, और रमन सिंह का वर्तमान कार्यकाल भी आसपास ही खत्म होने वाला है। अगले बरस मार्च में सीएस रिटायर होंगे, और सात महीने के भीतर सीएम का यह कार्यकाल खत्म हो जाएगा। दोनों ही छत्तीसगढ़ में पैदा हुए, दोनों ही रायपुर में पढ़े, और यहां तक कि दोनों के कॉलेज भी अगल-बगल रहे, आयुर्वेदिक कॉलेज, और साईंस कॉलेज। आज दोनों के बंगले भी आधा किलोमीटर के भीतर ही हैं। मुख्य सचिव बनने के बाद विवेक ढांड स्थाई रूप से जैकेट पहनने लगे, ठीक रमन सिंह की तरह। अब मुख्यमंत्री के दादा बनने के हफ्ते भर के भीतर विवेक ढांड नाना बन गए। 
    चोर बदनाम है और डकैत की इज्जत
    आज का वक्त ऐसा आ गया है कि कई कर्मचारियों या अफसरों को लोग इस बात के लिए हिकारत से देखते हैं कि वे कुछ हजार रुपये की रिश्वत भी ले लेते हैं। उनके बारे में चर्चा करते हुए चेहरे पर नफरत सी आ जाती है। इस तर्क का दूसरा पहलू यह है कि अगर वही कर्मचारी या अफसर उसी काम का कई गुना अधिक लेते, तो वह मानो इज्जत की बात हो जाती। मतलब यह कि समाज में चोर बदनाम है और डकैत की इज्जत रहती है। इसी सिलसिले में यह भी दिखता है कि लोग उन विभागों, मंत्रियों, और अफसरों से संतुष्ट रहते हैं जिन्होंने तमाम चीजों के रेट तय कर रखे हैं, और उसके बाद काम की गारंटी रहती है। दूसरी तरफ न रिश्वत लें, न काम करें, उनके लिए गालियां रहती हैं।

    सद्गुरु के साथ मिलकर नदी किनारे पेड़
    देश अभी बाबाओं के कुकर्मों के किस्सों से उबल रहा है। लेकिन कुछ बाबा ऐसे हैं जो कम से कम अब तक तो अच्छा काम कर रहे हैं, और उनके इतिहास में चाहे कोई विवाद रहा हो, उनका वर्तमान तो साफ-सुथरा दिखता है। सरकार के लिए ऐसे बाबाओं से कोई वास्ता आगे चलकर खतरनाक हो सकता है, लेकिन ऐसे तो पूरी जिंदगी ही खतरों से भरी रहती ही है। अब छत्तीसगढ़ सरकार दक्षिण भारत के एक प्रमुख आध्यात्मिक गुरु, सद्गुरु के साथ एक एमओयू करने जा रही है। जग्गी वासुदेव नाम के सद्गुरु इन दिनों पूरे देश में नदियों को बचाने के अभियान में लगे हुए हैं, और वे देश के डेढ़ दर्जन राज्यों का सड़क के रास्ते सफर करके नदी किनारे वृक्षारोपण के लिए सभी मुख्यमंत्रियों से अपील कर रहे हैं, जनता से भी। सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन से राज्य सरकार एक एमओयू करने वाली है जिसमें फाउंडेशन सरकार के साथ मिलकर नदी किनारे वृक्षारोपण का अभियान चलाएगा। दोनों तरफ एक-एक किलोमीटर तक पेड़ लगाने से मिट्टी का नदी में जाना रूकेगा। यह अभियान बड़ा महत्वाकांक्षी है क्योंकि किसी भी राज्य में सारी नदियों के किनारे तो ऐसा हो भी नहीं सकेगा। फिलहाल इस महीने 29 तारीख को रायपुर में यह एमओयू होगा। 

    बिना मंदिर जान बचना मुश्किल
    चूंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान एक आक्रामक हिंदुत्ववादी की है, इसलिए जाहिर है कि उनका नागरिक अभिनंदन राम मंदिर के नारों और मुनादियों से भरा रहना था, और वैसा हुआ भी। कल रायपुर के स्टेडियम में ऐसा लगा कि अब मंदिर कुछ ही दिनों में बन जाएगा। हम भी ऐसा चाहते हैं कि मंदिर अयोध्या में बन जाए, और उपेक्षित और नाराज बैठे रामलला की नाराजगी दूर हो जाए, और योगी के उत्तरप्रदेश में बेकसूर बच्चों का थोक में बेवक्त मरना बंद हो जाए। अब यह जाहिर है कि वहां के बच्चों को भगवान ही बचा सकता है, इसलिए अस्पताल सुधारना छोड़कर मंदिर बनाना ही शुरू करना चाहिए।
    रमन का ज्योतिष पर भरोसा नहीं
    नेताओं के आसपास भविष्यवक्ताओं, तांत्रिकों, और बाकी किस्म के पाखंडिय़ों का जमघट लगे रहता है। इसकी एक वजह शायद यह भी है कि राजनीति इतनी अनिश्चितता भरी रहती है कि उसमें लोगों को राहत पाने के लिए कई किस्म के झूठों की जरूरत पड़ती है। झूठ से ही उनका वह अहंकार जिंदा रह पाता है, जो कि राजनीति में जिंदा रहने के लिए जरूरी होता है। ऐसे में जब किसी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से पूछा कि क्या वे ज्योतिष और महूरत जैसी चीजों पर भरोसा करते हैं, तो उन्होंने कहा कि अभी-अभी किसी ने एक ज्योतिषी को भेजा था, लेकिन वे इन चीजों में नहीं पड़ते। उन्होंने कहा कि सीता की शादी के लिए बड़े-बड़े राजज्योतिषियों ने महूरत निकाला होगा, और राम के परिवार की ओर से भी। लेकिन शादी के तुरंत बाद 14 बरस वनवास पर जाना पड़ा, और लौटते ही फिर सीता को घर छोड़कर जाना पड़ गया। कौन सा ज्योतिष काम आया? इसलिए वे इन चीजों पर भरोसा नहीं करते।

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