राजपथ - जनपथ

Posted Date : 16-Nov-2017
  • हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की दौड़ में पीसीसीएफ (वाईल्ड लाईफ) डॉ. आरके सिंह सबसे आगे बताए जा रहे हैं। हालांकि उनसे वरिष्ठ 82 बैच के अफसर शिरीष अग्रवाल हैं। लेकिन उनका कैरियर रिकॉर्ड कोई अच्छा नहीं रहा। शिरीष को पीसीसीएफ बनने के लिए ही लंबी कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ी और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही प्रमोशन हो पाया। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले सुर्खियों में रहे हैं। इससे परे 84 बैच के  अफसर पीसीसीएफ मुदित कुमार सिंह भी हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स  की दौड़ में हैं और वे अपने अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। मुदित कुमार सिंह का नाम पहले डीजी देहरादून वन प्रबंधन संस्थान के लिए तय हो गया था। केन्द्रीय कैबिनेट सब कमेटी ने उनके नाम पर मुहर लगाकर पीएमओ को फाईल भेज दी थी। लेकिन आखिरी क्षणों में मुदित सिंह डीजी बनते-बनते रह गए। यहां कुछ समय पदोन्नति के बाद पीसीसीएफ के ऑर्डर निकलने में विलम्ब सिर्फ इसलिए हुआ कि वे लैंड मैनेजमेंट का पद नहीं छोडऩा चाह रहे थे। उनके पास सबसे ज्यादा लंबे समय तक लैंड मैनेजमेंट का प्रभार रहा है। सरकार में उनके पैरोकारों की कमी नहीं है। कई लोग उन्हें चुनावी साल के लिए फिट अफसर मानते हैं। ऐसे समय में यदि सरकार चुनाव को ध्यान में रखकर कोई फैसला लेती है तो मुदित कुमार सिंह सबको चौंका सकते हैं। 

    अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए
    नई राजधानी में सभी विभागों के डायरेक्ट्रेट हैं, और इस इमारत का दर्जा मंत्रालय से जरा ही कम रहता है। इसके ग्राउंड फ्लोर पर पशु स्वास्थ्य संचालनालय के ठीक सामने सरकार ने दिव्यांगों के लिए शौचालय बनवाया है। लेकिन इसकी तख्ती पर हक्का-बक्का करने वाली गलती हुई है। हिन्दी में दिव्यांग को पहले विकलांग कहा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे उस शब्द को अपमानजनक मानकर उसकी जगह दिव्यांग शब्द का चलन बढ़ गया है। ऐसे में इस तख्ती पर विकलांग तो लिखा हुआ है ही, इसके नीचे की अंग्रेजी भी माशाअल्ला है। अंग्रेजी में दिव्यांग की तरह का अपमानमुक्त शब्द बनाया गया है, डिफरेंटली एबल्ड पर्सन, यानी अलग किस्म की क्षमताओं वाले लोग। इस तख्ती पर डिफरेंटली के हिज्जे तो गलत हैं ही, एबल्ड को डिसएबल्ड भी कर दिया गया है। मतलब यह हुआ कि अलग किस्म की क्षमताओं वाले लोगों को अलग किस्म की अक्षमताओं वाले लोग बना दिया गया। अब इस प्रदेश में अंग्रेजी को विदेशी भाषा मानकर उसके सीखने को गैरजरूरी मान लिया जाता है, इसलिए ऐसा तो होना ही था। यह तस्वीर छत्तीसगढ़ के एक जाने-माने फोटो जर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पांडेय ने खींची और इस अखबार को छपने भेजी। साथ-साथ उन्होंने इसे अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया, तो मंत्रालय की इमारत में काम करने वालों ने तुरंत उस पर लिखा कि मंत्रालय के शौचालयों पर लगे बोर्ड भी ऐसे ही हैं, उनकी अंग्रेजी का हाल भी यही है।


    गुजरात के नतीजों पर नजर
    गुजरात चुनाव के नतीजे न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि राज्य की राजनीति को भी प्रभावित करेंगे। छत्तीसगढ़ में अगले साल विधानसभा के चुनाव होंगे, ऐसे में जल्द ही यहां दल-बदल का खेल शुरू होने के आसार नजर आ रहे हैं। अगर गुजरात चुनाव के नतीजे भाजपा के खिलाफ रहते हैं तो यहां भी भाजपा में असंतुष्ट गतिविधियां तेज हो सकती हैं। यदि  चुनाव नतीजे कांग्रेस के पक्ष में नहीं आए, तो कांग्रेस छोड़कर जाने वालों की बाढ़ आ सकती है। कहा तो यह भी जा रहा है कि कुछ विधायक भी पार्टी छोड़ सकते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से जुड़े लोगों ने डेढ़ सौ नेताओं की सूची तैयार की है, जो उनके साथ जुड़ सकते हैं। इनमें कांग्रेस के नेताओं की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन कांग्रेस के पक्ष में चुनाव नतीजे आने पर सबसे ज्यादा भगदड़ जोगी की पार्टी में ही मचेगी। कुल मिलाकर गुजरात चुनाव के नतीजे छत्तीसगढ़ में दल-बदल के लिए तैयार बैठे नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य तय करने में  मददगार साबित होंगे। 


    राजनीति में आगे की चार चाल सोचकर...
    राजनीति में बड़ी दूर का सोचकर कुछ करना पड़ता है। एक नेता अपनी पार्टी में लगातार विधानसभा का टिकट मांगते रहे, दबाव डालते रहे, और एक गंभीर-संभावित प्रत्याशी की तरह मेहनत करते रहे। नतीजा कुछ नहीं निकला, क्योंकि उनको टिकट नहीं मिली। लेकिन नतीजा सब कुछ निकला क्योंकि उन्हें एक ओहदा मिल गया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि विधानसभा की उम्मीदवारी न मिलने पर भी उन्होंने पार्टी का काम किया। ऐसा सभी बड़ी पार्टियों में होता है। 
    दूसरी तरफ राजनीति में यह भी होता है कि एक चुनाव के बाद के अगले किसी चुनाव को ध्यान में रखकर अभी से मेहनत की जाए। ऐसे में कुछ लोग ऐसी नजर रखते हैं, जैसी नजरों के लिए गिद्धों को बदनाम किया जाता है। अगले चुनाव में किसकी टिकट कटने वाली है, या कि कौन चुनाव नहीं लडऩे वाले हैं, इसे ध्यान में रखकर भी कई लोग लंबी मंजिल का सफर शुरू कर देते हैं। भाजपा में इन दिनों यह माना जा रहा है कि रायपुर के सांसद रमेश बैस को शायद अगली बार टिकट न मिले। फिर ऐसी नौबत में लोकसभा का उम्मीदवार कौन रहेगा, इसका हिसाब लगाकर लोग सोचते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल के मजबूत कंधों पर यह जिम्मेदारी आएगी। ऐसे में विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में लड़कर बृजमोहन आसानी से सांसद बन जाएंगे, और उनकी विधानसभा सीट खाली हो जाएगी। वैसे में परिवार से भी कोई दावेदार हो सकता है, लेकिन पार्टी किसी और को भी टिकट दे सकती है। इसलिए विधानसभा चुनाव के बाद के लोकसभा चुनाव के बाद के संभावित विधानसभा उपचुनाव को ध्यान में रखकर भी कुछ लोग बृजमोहन की सीट पर अभी से सतह के नीचे जनसंपर्क करते चल रहे हैं। और यही ध्यान में रखकर कांग्रेस के लोग भी विधानसभा की टिकट मांगने वाले हैं कि विधानसभा चुनाव में न जीतें, उपचुनाव में जीतने की संभावना बनी रहेगी। 

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Posted Date : 15-Nov-2017
  • छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष डॉ. सुरेन्द्र दुबे में एक बार फिर विधानसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जागृत हो गई है। पिछले चुनाव में भी उन्होंने बेमेतरा से भाजपा की टिकट के लिए प्रयास किया था। कुछ कवियों को लेकर वे सीएम से भी मिले थे। लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाई। डॉ. दुबे छत्तीसगढ़ी के लोकप्रिय कवि हैं और वे गांव-गांव में सुने जाते हैं। लेकिन पार्टी के कुछ नेता उनकी निष्ठा पर शक जताते हैं। डॉ. रमन सिंह के पहले वे अजीत जोगी के सीएम रहते उनके ओएसडी रह चुके हैं। भाजपा सरकार बनने के बाद वे आयोग के अध्यक्ष का पद पा गए। जोड़-तोड़ में माहिर डॉ. दुबे को इस साल पंडित सुंदरलाल शर्मा सम्मान भी हासिल हो गया। वे अपनी निष्ठा जताने पार्टी के कई कार्यक्रमों में दिखने लगे हैं। वे यूपी के सीएम आदित्यनाथ के अभिनंदन समारोह में भी नजर आए। इन सबके बावजूद उन्हें टिकट मिलेगी, इसकी संभावना कम ही दिख रही है। पार्टी और सरकार के कुछ लोग मानते हैं कि सरकार बदलते ही उनकी निष्ठा बदल जाती है। जोगी के करीब रहने के बावजूद सरकार ने इतना कुछ दे दिया है कि अब आगे और कोई गुंजाइश नहीं नहीं बनती है। लेकिन लोग यह चर्चा भी करते हैं कि जोगी के एसपी रहते हुए जिस मुकेश गुप्ता की पुलिस ने नंदकुमार साय का पैर तोड़ा था, और जिस मुकेश गुप्ता को हटाने और उस पर कार्रवाई करने के लिए भाजपा के प्रतिनिधिमंडलों ने राजभवन जाने की सिल्वर जुबली पूरी कर ली थी, वही मुकेश गुप्ता रमन सरकार में इतने ताकतवर अफसर रहे कि प्रदेश के इतिहास में और कोई वैसी ताकत वाला पुलिस अफसर नहीं बन पाया। 

    पदोन्नति तो हो गई, वरिष्ठता बाकी
    छत्तीसगढ़ में कल तीन आईएएस अफसर प्रमुख सचिव से पदोन्नति पाकर अतिरिक्त मुख्य सचिव हो गए। मुख्य सचिव से बस एक दर्जा नीचे तक पहुंचना छोटी बात नहीं होती है। लेकिन एक ही बैच के इन तीन अफसरों में वरिष्ठता क्रम का झगड़ा चल रहा है। कुछ लोगों को उम्मीद थी कि पदोन्नति के पहले वरिष्ठता का यह मामला निपट जाएगा, और पदोन्नति की सूची में बीवीआर सुब्रमण्यम का नाम पहले नंबर से नीचे आकर तीसरे नंबर पर पहुंच जाएगा, और मूलत: मप्र-छत्तीसगढ़ काडर के खेतान और मंडल ऊपर चले जाएंगे। लेकिन वैसा हो नहीं पाया, और प्रमोशन लिस्ट जारी हो गई। फिर भी ऐसा पता लगा है कि सीके खेतान की अर्जी पर अब जल्द ही यह फैसला हो सकता है कि सुब्रमण्यम को इन तीनों में सबसे नीचे रखा जाए क्योंकि वे दूसरे प्रदेश से मप्र-छत्तीसगढ़ काडर में आए थे। इस बीच मंडल मानो कमंडल थामे संन्यास भाव से बैठे हुए हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि खेतान की अर्जी पर अनुकूल फैसला हुआ, तो वे खेतान के साथ-साथ ऊपर हो जाएंगे, और इसके लिए वे अलग से कोई मेहनत नहीं कर रहे। 

    एक और डोम हादसा टला
    पड़ोसी नए छोटे जिले में एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में नया रायपुर की तरह डोम हादसे की पुनरावृत्ति होते-होते बच गया। दरअसल, कार्यक्रम के जिस स्थल का चयन किया गया था, वह पथरीला है। जिले के आला अफसर ने पीडब्ल्यूडी और अन्य विभागों के अफसरों  से रायशुमारी किए बिना स्थल का चयन कर लिया। काम भी अंतिम चरणों में था, तभी सरकार ने वरिष्ठ और अनुभवी अफसरों को कार्यक्रम की तैयारी का जायजा लेने भेजा। ये सभी वहां पहुंचकर डोम निर्माण में लापरवाही बरते जाने पर हक्का-बक्का रह गए। इसके बाद सबों ने कैम्प कर ड्रिल मशीन मंगवाकर डोम निर्माण को ठीक कराया। जानकार मानते हैं कि यदि समय रहते निर्माण कार्य को ठीक नहीं कराया होता, तो यहां भी नया रायपुर की तरह डोम हादसा हो सकता था, जिसके किसी कुसूरवार पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। 

    सड़कों पर खतरा
    कुछ समय पहले एक पश्चिमी देश में उपग्रह से किए गए एक सर्वे में यह साबित हुआ था कि सड़कों पर दारू पीकर गाड़ी चलाने वालों से अधिक खतरनाक और आड़ी-तिरछी गाड़ी वे लोग चलाते हैं जो कि मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते रहते हैं। छत्तीसगढ़ की सड़कों पर एक और खतरनाक अंदाज इन दिनों देखने मिल रहा है। दुपहिए पर अगर किसी लड़के के पीछे लदी हुई सी लिपटी कोई लड़की बैठी है, तो सिर घुमाकर बात करने वाला लड़का सामने की दुनिया से बिल्कुल ही बेखबर होता है। अपने खुद के भले के लिए ऐसी किसी गाड़ी के दाएं-बाएं, आगे-पीछे, कहीं भी न चलें। 

    योगी की रैली से पुलिस कमा सकती थी
    उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रायपुर आने पर उनका जैसा स्वागत हुआ, वैसा और किसी भाजपाई मुख्यमंत्री का रायपुर में नहीं होता है। उसकी एक वजह यह है कि सरकार से परे, भाजपा से भी परे, हिन्दू संगठन योगी के आने पर भारी प्रसन्न थे क्योंकि योगी आदित्यनाथ के उत्तरप्रदेश में बनाए गए संगठन हिन्दू वाहिनी के समर्थकों ने रायपुर में भी यह संगठन खड़ा कर रखा है। इसलिए एयरपोर्ट और सड़कों पर सरकार और भाजपा के अलावा हिन्दू कार्यकर्ता भी थे। और भाजपा के लोगों को यह मालूम भी था कि वे सक्रिय हों या न हों, योगी का स्वागत तो जोरों से होगा, इसलिए वे भी साथ हो लिए। अब रायपुर की जो पुलिस रिपोर्ट लिखाने के कुछ घंटे के भीतर दिल्ली में छापेमारी करते दिखती है, और जो रायपुर की गली-गली में गरीबों से हेलमेट-जुर्माने के पांच-पांच सौ रूपए वसूलती है, उसने अगर कल योगी समर्थकों की रैली का चालान किया होता, तो पांच-दस लाख रूपए मिल गए होते। वैसे दो दिन पहले ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को बताया था कि चारपहिया गाड़ी से ज्यादा प्रदूषण दोपहिया गाडिय़ां करती हैं, इसलिए उन पर बराबरी से रोक लगनी चाहिए। लेकिन जब राम का नाम लेने वाले की रैली हो, तो फिर प्रदूषण तो राम वैसे ही घटा देंगे।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • मंत्रियों और अफसरों को ऐसे बड़े-बड़े बंगले दिए जाते हैं जो कि अंग्रेजों के समय में अंग्रेज बहादुरों के लिए तो ठीक थे, लेकिन आज जब छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश में जनता के पैसों पर ये बंगले चलते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि इस प्रदेश की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और दो वक्त का इसलिए खा पाती है क्योंकि उसे रियायती चावल एक रूपए किलो दिया जा रहा है। अब ऐसे में जिन अफसरों को जितने बड़े बंगले मिलते हैं, उतना ही अधिक सरकारी खर्च उन पर होता है। मंत्री हों, या अफसर, उनके विभागों के दर्जनों कर्मचारी बंगलों पर तैनात रहते हैं, और बंगलों के रख-रखाव पर, उनके बड़े-बड़े अहातों में कभी कमरे बनते दिखते हैं, तो कभी लॉन लगते दिखता है, उन सब पर सरकार का ही खर्च अघोषित रूप से होता है जो कि जनता के नाम से किसी और योजना से निकाला जाता है। ऐसे में एक जिले की एक दिलचस्प कहानी सामने आई है जहां पर एक एसपी के बंगले में खूब दूध देने वाली एक गाय तैनात है। तैनात इसलिए कि एसपी बदल गए, गाय वहीं तैनात रही। पिछले एसपी ने गाय को प्रदेश के एक बड़े डेयरी वाले से वसूला था, और आज भी वही डेयरी वाला उस गाय का खाना भिजवाता है। गाय करीब दस लीटर दूध देती है, और इसे पिछले एसपी और वर्तमान एसपी दोनों पूरी ईमानदारी से बांट लेते हैं। पुलिस की गाड़ी दूध पहुंचाने जाती है, पुलिस कर्मचारी गाय के रख-रखाव में लगे रहते हैं। बहुत से दूसरे ऐसे बंगलों में सरकारी अमला कई और किस्म काम करता है जिनमें कुत्तों को घुमाने से लेकर बच्चों को धुलवाने तक का काम शामिल है। अब देश की सबसे बड़ी अदालत भी मंत्रियों और अफसरों के खर्च इसलिए सीमित नहीं कर सकती कि उसके जज भी सामंती अंदाज में इसी तरह बड़े-बड़े बंगलों में रहते हैं, और सायरन वाली पायलट गाडिय़ों में चलते हैं। 


    पहारे के दिन नहीं फिर रहे...
    आईएएस अफसर हेमंत पहारे का सब कुछ ठीक चलता नहीं दिख रहा है।  वे कुछ दिन पहले सचिव के पद पर पदोन्नत हुए हैं, लेकिन उनके पास मनमाफिक कोई काम नहीं है। उन्हें संसदीय कार्य के साथ-साथ जन शिकायत निवारण विभाग का दायित्व सौंपा गया है जहां गिनती की ही फाईलें आती हंै। कहा जा रहा है कि इस स्थिति के लिए खुद पहारे जिम्मेदार हैं। जोगी सरकार में उप सचिव के पद पर रहते उनकी हैसियत प्रमुख सचिव स्तर के अफसर से ज्यादा रही है। 
    सरकार बदलने के बाद भी नगरीय प्रशासन, पीएचई व अन्य विभागों में काम कर चुके हैं। वे गरियाबंद कलेक्टर रह चुके हैं। एक शिकायत के बाद उन्हें हटाया गया था। हेमंत बिलासपुर के प्रभावशाली कांग्रेस नेता बसंत पहारे के छोटे भाई हैं। वे मध्यप्रदेश की पूर्व मंत्री कांगे्रस की सुश्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधो के नजदीकी रिश्तेदार भी हैं। पहारे को पहले पीएससी में भेजा गया था। वहां चेयरमैन केआर पिस्दा से नहीं जमी। इसके बाद मंत्रालय में विशेष सचिव पर्यटन-संस्कृति का दायित्व सौंपा गया। यहां भी परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं रही। यही वजह है कि शिकवा-शिकायतों के चलते उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी नहीं दी गई।  


    हेलीकॉप्टर आदतन चला गया
    अभी केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल रायपुर से भिलाई एक कार्यक्रम में गए तो सरकारी हेलीकॉप्टर इसके लिए निर्धारित जगह पर नहीं उतरा, और वह जाकर पुलिस बटालियन के उस मैदान में उतरा जहां कि वह मुख्यमंत्री को लेकर हर बार उतरते आया है। अब यह पता लगा है कि पायलट को गलती से उतरने के लिए यही पता दे दिया गया था, और उसका इंतजार किसी दूसरे मैदान पर होते रहा। उतरते-उतरते जब दिखा कि स्वागत करने को कोई भी नहीं है, तो हेलीकॉप्टर से ही फोन लगाया गया, तो गलती मालूम हुई। इसके बाद दुबारा उड़ान भरकर हेलीकॉप्टर सही मैदान पर गया। अब रोज-रोज जहां उतरने की आदत पड़ी रहती है, हेलीकॉप्टर पायलट की मर्जी के बिना भी हो सकता है वहीं जाकर उतर गया हो। 

    केडिया पर छापे के बाद?
    छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शराब कारखाने, केडिया डिस्टिलरी पर आयकर का छापा पड़ा। इसके मालिक का प्रदेश के आबकारी विभाग से इतना घरेलू रिश्ता है कि विभाग के सबसे बड़े लोगों का केडिया के दिल्ली ठिकाने पर रूकना भी बताया जाता है। आबकारी विभाग के सचिव अशोक अग्रवाल का राज्य सूचना आयुक्त पद पर दो महीने पहले  मनोनयन घोषित हो चुका है, लेकिन बोतल है कि हाथ से छूटती नहीं। इसलिए वे अभी तक आबकारी सचिव भी बने हुए हैं। लेकिन अब केडिया पर आईटी छापे के बाद लगता है कि वे हड़बड़ाकर यह कुर्सी छोड़ेंगे, और सूचना आयोग जाकर एक लंबे पुनर्वास का आनंद प्राप्त करेंगे। आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल विदेश प्रवास पर हैं, लेकिन फोन तो सभी जगह मौजूद हैं ही। अमर अग्रवाल के केडिया से भी करीबी संबंध है, और केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली से भी, जिनके विभाग ने यह छापा डाला है।
    कई बरस पहले जब भोपाल की सोम डिस्टिलरी पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तो कई बड़े नाम डायरी में निकले थे। अब लोग इस बार भी जानकारी का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि राज्य की नई आबकारी नीति से प्रदेश की दो डिस्टिलरियों की किस्मत एकदम से चमक गई हैं। 


    सेक्स-सीडी की हिमायती या विरोधी?
    गुजरात में हार्दिक पटेल के नाम को जोड़कर चलाई जा रही एक सेक्स-सीडी को लेकर अब यह समझना मुश्किल हो रहा है कि भाजपा सेक्स-सीडी की राजनीति की हिमायती है, या कि विरोधी है? अभी-अभी दो हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक मंत्री पर एक सेक्स-सीडी को लेकर तोहमत लगी, तो भाजपा ने खुलकर उसका विरोध किया, और इसे बिलो दि बेल्ट राजनीति कहा, यानी कमर के नीचे की राजनीति। अब भाजपा के एक मंत्री के साथियों ने गुजरात में हार्दिक पटेल की सेक्स-सीडी जारी की है, तो वहां पर यह राजनीति कमर के ऊपर की हो गई? भाजपा को यह तय करना होगा कि वह ऐसी वीडियो-राजनीति को सही मानती है, या गलत? और फिर उसे अपने मंत्री के साथियों पर कार्रवाई भी करनी होगी अगर वह ऐसी राजनीति नहीं चाहती है तो।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 13-Nov-2017
  • मशहूर शायर मुनव्वर राणा का केन्द्रीय मंत्रियों को लेकर यह बयान  आया है कि नरेंद्र मोदी की बदकिस्मती है कि वह तो अच्छे इंसान हैं लेकिन उनके पास एक भी रत्न नहीं हैं। किसी भी राजा के लिए यह बेहद अफसोस की बात है। राणा की टिप्पणी से भाजपा के लोग असहमत हो सकते हैं लेकिन प्रदेश के उद्योग और व्यापार जगत के जानकार लोग इसे सही मानते हैं। वे इस संदर्भ में केन्द्रीय रेल और कोयला मंत्री पीयूष गोयल के कामकाज को गिनाते हैं और बताते हैं कि राज्य को कैसे एनडीए के सर्वाधिक पढ़े-लिखे मंत्रियों में से एक पीयूष गोयल के  फैसले से नुकसान हुआ है। 
    श्री गोयल दो साल पहले प्रदेश दौरे पर आए थे और चुनिंदा उद्योगपतियों से भी रूबरू हुए थे। बताते हैं कि एक बड़े उद्योगपति ने उन्हें बताया कि कोयला विदेशों से आयात करना पड़ रहा है। इस पर श्री गोयल ने आश्चर्य जाहिर करते हुए कहा कि प्रदेश में भारी मात्रा में कोयले का उत्पादन हो रहा है और उन्हें विदेश से आयात की नौबत आ रही है,  यह व्यवस्था तुरंत बदली जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जरूरतों के मुताबिक कोयला उपलब्ध कराएंगे। 
    गोयल ने कोयले के आयात पर तत्काल रोक लगा दी। पहले जो उद्योगपति गोयल के फैसले से खुश थे, वे अब बेहद मायूस हैं। हाल यह है कि एसईसीएल उन्हें पर्याप्त कोयला उपलब्ध नहीं करा पा रहा है और केन्द्र ने आयात पर रोक लगा रखी है। इससे भारी नुकसान हो चुका है। न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी बिजलीघरों को कोयले की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। हाल यह है कि सरकार को अब तक सौ करोड़ से अधिक की चपत लग चुकी है। मुख्यमंत्री और कुछ समय पहले तक एसीएस रहे एन बैजेन्द्र कुमार इसको लेकर कई बार पत्र लिख चुके थे और गोयल से बात भी हो चुकी है। लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है।
    भ्रष्टाचार थमेगा कैसे?
    सरकार ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए सत्यनिष्ठा संधि लागू कर रखा है। इसमें निर्माण विभागों में यह लिखित में देना होता है कि वे रिश्वत लेंगे न देंगे। इसमें अफसर के साथ-साथ ठेकेदार के भी हस्ताक्षर होते हैं। लेकिन सत्यनिष्ठा संधि लागू होने के बाद भ्रष्टाचार पर काबू पाना तो दूर, इसमें बढ़ोत्तरी हुई है। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने निर्माण विभाग से जुड़े अफसर-ठेकेदारों के खिलाफ ही सबसे ज्यादा प्रकरण दर्ज किए हैं। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में विशेषकर जिले के आला अफसर की भूमिका सबसे ज्यादा है। रायपुर संभाग के एक नए और छोटे जिले में तो आला अफसर से मातहत परेशान है। वजह यह है कि अफसर खुद को गांव-गरीब, हितैषी होने का दिखावा करने नित नए हथकंडे अपनाते हैं और इसकी गाज निर्माण अफसरों ठेकेदारों पर गिरती है। दीवाली पार्टी में गरीब बच्चों को घर में भोजन कराना हो या फिर बच्चे की जन्मदिन पार्टी, इसका बिल मातहतों को ही भरना होता है। सुनते हैं कि अगर एक बड़े कार्यक्रम में अनुभवी और वरिष्ठ अफसरों की ड्यूटी नहीं लगाई जाती, साख का भ_ा बैठ जाता।
    चेक राजदूत, और शौचालय
    छत्तीसगढ़ के आबकारी, टैक्स, और म्युनिसिपल मामले देखने वाले मंत्री अमर अग्रवाल स्पेन जाते हुए दिल्ली में रूके। उन्हीं के एक पे्रसनोट के मुताबिक चेक रिपब्लिक के राजदूत उनसे मिले, और उन्होंने बाकी बातों के साथ इस बात पर भी खुशी जाहिर की कि छत्तीसगढ़ खुले में शौचमुक्त करने के लिए सकारात्मक पहल कर रहा है। अब योरप के एक देश के राजदूत की छत्तीसगढ़ में शौचालय बनने में दिलचस्पी हैरान करने वाली है। इसके तुरंत बाद पे्रसनोट कहते हैं कि अमर अग्रवाल ने चेक राजदूत और उनकी टीम को छत्तीसगढ़ आने का न्यौता दिया जिस पर राजदूत ने तुरंत सहमति दी। ऐसा लगता है कि चेक राजदूत को अब तक यह गलतफहमी थी कि छत्तीसगढ़ आने पर उन्हें शौचालय नहीं मिलेगा, और खुले में जाना होगा। 
    सूखे पर चिट्ठियां जारी
    केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से भी सरकार के लोग निराश बताए जा रहे हैं। प्रदेश की 97 तहसील सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। केन्द्र सरकार से करीब 3 हजार करोड़ रूपए राहत राशि की मदद मांगी गई है। 
    श्री तोमर भी पिछले दिनों प्रदेश दौरे पर आए थे और उन्होंने प्रस्ताव मिलने की पुष्टि की थी और कहा था कि इसका परीक्षण चल रहा है। जल्द ही मदद का भरोसा दिलाया था। अब हाल यह है कि मदद तो दूर, प्रस्ताव में कमीबेशी निकालकर अभी तक राज्य से पत्र व्यवहार ही हो रहा है। यह स्थिति तब है जब केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है। इससे पहले केन्द्र में यूपीए की सरकार होने के बावजूद राज्य को उदारतापूर्वक मदद की जाती थी।

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • सरकार के मंत्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय ने खुद को फिट रखने के लिए अपना वजन भले ही 15 किलो कम लिया है लेकिन पार्टी और सरकार में उनका वजन लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में जब ज्यादातर मंत्री आरोपों के घेरे में हैं, पाण्डेय सरकार और पार्टी में संकटमोचक की भूमिका निभा रहे हैं। सेक्स-सीडी कांड हो या जलकी प्रकरण, पाण्डेय ने ही आगे बढ़कर सरकार का पक्ष दमदारी से रखा। वरिष्ठता के साथ-साथ संसदीय-नियम कानून के जानकार होने के कारण भी पार्टी और सरकार में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। दो दिन पहले देशभर के ऊर्जा मंत्रियों के सम्मेलन में सीएम ने अपनी जगह पाण्डेय को ही पटना भेजा था। ये बात अलग है कि वहां पहुंचने के बाद ही उन्हें सम्मेलन के स्थगित होने जानकारी मिली। इससे पहले तक सीएम किसी कार्यक्रम में न जा पाने पर, राजेश मूणत या अजय चंद्राकर अथवा अमर अग्रवाल को भेज दिया करते थे। सोमवार को उप्र के सीएम योगी आदित्यनाथ के रायपुर में अभिनंदन कार्यक्रम का भी प्रभारी उन्हें बनाया गया है जबकि उनके विधानसभा क्षेत्र में उसी दिन केन्द्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल का कार्यक्रम है लेकिन उन्हें योगी के साथ ही रहने के लिए कहा गया है। राज्योत्सव समापन के मौके पर विधानसभा अध्यक्ष के बगल की कुर्सी देकर अघोषित रूप से मंत्रिमंडल में नंबर दो का दर्जा दे दिया गया है जबकि यह कुर्सी अब तक बृजमोहन अग्रवाल संभालते थे। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि पाण्डेय के विभागों में तुलनात्मक रूप से बेहतर काम होने के कारण से भी सरकार में उनका कद बढ़ा है। राजस्व विभाग में कई बेहतर काम हुए हैं जिसके कारण सरकार की छवि भी बनी है। वैसे भी उनके विभागों में भ्रष्टाचार निर्माण विभाग के मुकाबले कम है। ऐसे में उनका महत्व बढऩा ही था। 
    फोटोग्राफरों को आसानी
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कल सुबह फोटोग्राफी होनी थी। फिर उसे परिवार में जन्म होने की संभावना को देखते हुए आज पर टाला गया। लेकिन उसका एक फायदा यह हुआ कि दादा बनने की खुशी उनके चेहरे पर इस तरह लिखी हुई थी कि फोटोग्राफरों को उन्हें मुस्कुराने के लिए कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। उनके बेटे-बहू को कन्या रत्न प्राप्ति के साथ ही घर में जो खुशियां आई हैं, वे फोटो-सेशन के लिए एकदम सही वक्त साबित हुईं। आज सुबह से दोपहर तक अलग-अलग फोटोग्राफरों को समय दिया गया, और सभी बड़े संतुष्ट और खुश होकर वहां से निकले। 
    वन दफ्तर की दूरी से परेशानी
    वन विभाग का दफ्तर रायपुर शहर के बीच से उठकर नया रायपुर चले गया है। इससे और लोगों को जितनी दिक्कत हुई हो, उसके अलावा आरटीआई एक्टिविस्ट भी परेशान हैं। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी लेने के लिए वे अब तक तो जंगल दफ्तर जाकर कागज लगा देते थे। लेकिन अब इस काम के लिए 25 किलोमीटर दूर नया रायपुर जाना पड़ेगा। दूसरी दिक्कत यह है कि दफ्तर में भी आरटीआई की अर्जी लेने में कर्मचारी टाल-मटोल करते हैं ताकि लोग थककर लौट जाएं। अब शहर के बीच के दफ्तर में तो ठीक था, 25 किलोमीटर दूर से खाली हाथ लौटना पड़ा तो बड़ा महंगा पड़ेगा। एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने यह काम की जानकारी दी कि पोस्ट ऑफिस में कई बार 10 रुपये का पोस्टल ऑर्डर उपलब्ध नहीं रहता, और 20 रुपये का पोस्ट ऑर्डर लगाकर सूचना पाने अर्जी लगाई जाए, तो विभाग यह घोषणापत्र मांगता है कि बचे दस रुपये का कोई दावा बाद में नहीं किया जाएगा। यह घोषणापत्र न लगा, तो अर्जी वापिस भेज दी जाती है।
    सज्जनता से निपटने की चुनौती
    सरगुजा में भाजपा के नेता अलग-अलग लड़ते हुए भी, और मिलकर एक होकर भी कांग्रेस के नेता, विधायक, और प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। इसकी एक वजह यह है कि बाबा साहब कहे जाने वाले सिंहदेव में सज्जनता बड़े गहरे तक बैठी हुई है। वे जनता के खिलाफ कोई बात नहीं करते, और न ही विरोधियों को नुकसान पहुंचाने का कोई अभियान चलाते। अभी उनके बारे में यह सुनाई पड़ा कि उनके नाम के खेतों की फसल पर उन्हें लाखों रूपए धान बोनस मिला। लेकिन वे जितने खेत लोगों को रेग पर देते हैं, उन खेतों का धान बोनस भी वे उन्हीं मजदूर-किसानों को दे देते हैं, खुद नहीं रखते। राजनीतिक रूप से उनके मुकाबले ऐसी सज्जनता सरगुजा में न कांग्रेस में दिखती न भाजपा में। और ऐसे में भाजपा के लिए सरगुजा में अपनी सीटें बढ़ाना एक बड़ी चुनौती रहेगा। कुछ लोगों का मानना है कि वहां की 14 सीटों में से कांग्रेस और भाजपा के पास अभी 7-7 सीटें हैं, और अगर यही परफॉर्मेंस रिपीट हो जाए, तो भी भाजपा के लिए एक बड़ी बात होगी। लेकिन भाजपा का अपना गणित सरगुजा में सीटें बढ़ाए बिना जम नहीं रहा है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • सरकारी कामकाज में कामयाबी की कहानियों को अपनी निजी कामयाबी बताते हुए अफसरों को देख-देखकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह थक गए हैं। बताया जाता है कि उन्होंने अपने करीबी लोगों से कहा है कि ऐसे सभी प्रचारप्रेमी अफसरों से अगले राज्यसभा चुनाव के पहले इस्तीफा ले लिया जाए कि उन्हें टिकट मिलने की संभावना है। और उसके बाद जब विधानसभा चुनाव निपट जाएं, तो इन्हें म्युनिसिपल चुनावों में एक-एक वार्ड का टिकट दिया जाए ताकि वे प्रचार की अपनी हसरत पूरी कर सकें। ऐसा पता चला है कि ऐसे अफसरी-प्रचार की कतरनों की फाईलें बनाने के लिए जनसंपर्क विभाग में एक कर्मचारी को लगाया गया है। 
    सीएम सरकारी अस्पताल में दादा बने
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सांसद बेटे अभिषेक सिंह की पत्नी ऐश्वर्या सिंह को राजधानी के अंबेडकर सरकारी अस्पताल में कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। जब प्रदेश के मुखिया सरकारी अस्पताल जाए तो बाकी लोगों का भरोसा भी सरकारी इलाज पर हो सकता है। वैसे तो अपने-अपने वक्त गवर्नर शेखर दत्त भी इलाज के लिए इस अस्पताल गए थे, और मौजूदा गवर्नर बलरामजी दास टंडन भी कुछ समय पहले इलाज के लिए यहां गए हैं। मुख्य सचिव विवेक ढांड भी यहां इलाज करवा चुके हैं। और अब मुख्यमंत्री-सांसद के परिवार की अगली पीढ़ी का जन्म यहां होना अस्पताल पर भरोसा बढ़ाता है। 
    चेंबर चुनाव में जातिगत राजनीति 
     देश-प्रदेश में राजनीतिक चुनाव में खास तौर पर जातिगत समीकरण हावी रहता है। सवर्ण, दलित, पिछड़ा, सिंधी, गुजराती, मराठी के आधार पर अक्सर टिकट का बंटवारा होता है। वोट को लेकर भी इसी तरह की बात सामने आती है। राजनीति में यह दांव-पेंच चलता रहता है। अब यही समीकरण छत्तीसगढ़ के चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनाव में बनने लगा है। जाति के आधार पर प्रत्याशी खड़े किए जा रहे हंै। जिस वर्ग के व्यापारी ज्यादा हैं, वहां से अधिक प्रत्याशी चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। चेंबर चुनाव में इस तरह की राजनीति पहली बार देखने में आ रही है। माना जा रहा है कि चेंबर की राजनीति अब वोटों के आधार पर चलेगी, क्योंकि आगे विधानसभा चुनाव है।
    सीएम के गृहनगर में परेशानियां
    मुख्यमंत्री के गृहनगर कवर्धा में जाहिर है कि उनकी पसंद का जिला कलेक्टर भेजा गया। लेकिन कल के दो हादसे ऐसे रहे जिनसे मुख्यमंत्री का परेशान होना स्वाभाविक है, और जरूरी भी है। एक सफाई कर्मचारी ने अपने पालिका अध्यक्ष पर पैसे लेने और न लौटाने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की, और उसे लाकर अब राजधानी रायपुर में बुरी तरह जली हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया है। कहा जाता है कि उसने सारे अफसरों को पहले इस बारे में लिखकर दिया हुआ था। दूसरी घटना हुई है कवर्धा जिले में ही एक जनपद पंचायत में अध्यक्ष सहित 22 जनपद सदस्यों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया, उनका आरोप है कि जनपद सीईओ (सरकारी अफसर) उनकी बात नहीं सुनती हैं, और वे यह बात पहले कलेक्टर को बता चुके हैं। प्रदेश में कई कलेक्टर बस्तर से नाम कमाकर निकलते हैं, लेकिन मैदानी इलाकों में आकर उन्हें ऐसी जनता का सामना करना पड़ता है जिसके मुंह में जुबान है, और जिन इलाकों के नेता भी चुप नहीं रहते हैं। ऐसे में कवर्धा सहित कई जिले अचानक प्रशासनिक चुनौती झेल रहे हैं। एक तीसरी बात राजनीतिक है, जो कि कलेक्टर से सीधी जुड़ी हुई नहीं है, लेकिन फिर भी प्रशासन के हाल का एक संकेत जरूर है। वहां से परास्त कांग्रेस प्रत्याशी मो. अकबर ने अपने अकेले के दम पर पार्टी की एक सभा वहां रखवाई। जनाधिकार रैली नाम के इस कार्यक्रम में जैसी भारी भीड़ जुटी, उसे देखकर भाजपा तो भाजपा, खुद कांग्रेस हक्का-बक्का रह गई। अब कवर्धा न सिर्फ मुख्यमंत्री का गृहनगर है, बल्कि वह उनके सांसद बेटे अभिषेक सिंह की संसदीय सीट का हिस्सा भी है। 
    साफ छुपती भी नहीं...
    आज कांग्रेस की विधायक डॉ. रेणु जोगी कल किधर जाएंगी इस बारे में लोगों को अधिक असमंजस नहीं है, लेकिन फिर भी जब कभी उनके अपने पति और पुत्र की पार्टी, जोगी कांग्रेस में जाने की बात उठती है तो वे एक मंजी हुई डिप्लोमैट की तरह यह कहकर चुप हो जाती हैं कि वे कल भी कांग्रेस में थीं, और आज भी कांग्रेस में हैं। वे कल कहां रहेंगी इसके बारे में कुछ कहती नहीं है। नतीजा यह है कि कांग्रेस पार्टी ठीक से कोई कार्रवाई भी नहीं कर पा रही है, और अनदेखा भी नहीं कर पा रही है। उनके बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है- साफ छुपती भी नहीं, सामने आती भी नहीं। 
    वहां अंडरग्राऊंड,  यहां ओवरग्राऊंड
    बिलासपुर और रायपुर के जो लोग एक-दूसरे के शहर में आना-जाना करते हैं, वे तकलीफ भरी हँसी के साथ यह बात बांटते हैं कि बिलासपुर को अंडरग्राऊंड ने तबाह कर दिया, और रायपुर को ओवरग्राऊंड ने। बिलासपुर शहर की खुदाई उस वक्त से चल रही है जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदाई शुरू हुई थी। वहां तो हजारों बरस पुरानी एक सभ्यता का पता लगा था, बिलासपुर में खुदाई तब से चल रही है जब वहां के ताकतवर मंत्री और सरकार के अकेले नुमाइंदे अमर अग्रवाल बच्चे थे, और गड्ढे में गिर गए थे। रायपुर में ओवरग्राऊंड स्काईवॉक का काम ऐसा लंबा खिंच रहा है, और थम गया है कि लोग डर रहे हैं कि यह भी बिलासपुर न बन जाए। अखबारों की खबरें हमेशा नुकसान पहुंचाने नहीं होतीं, उनसे सबक लिया जाए, तो वे हार बचाने वाली भी हो सकती हैं।

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में नए डीजी के सुब्रमणियम के आने के बाद कामकाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। पीसीसीएफ स्तर के अफसर सुब्रमणियम की गिनती बेहद ईमानदार और काबिल अफसरों में होती है। वे मुख्यमंत्री के सचिव रह चुके हैं। खुद कई दफा उनके कामकाज की मुख्यमंत्री प्रशंसा कर चुके हैं। लेकिन चर्चा है कि परिषद में कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए सुब्रमणियम को काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। उनसे पहले डीजी की जिम्मेदारी एक प्रोफेसर संभाल रहे थे, जो अपनी धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा के चलते वहां पर लंबे समय तक काबिज रहे। 
     कहा जा रहा है कि उनके कार्यकाल में काफी अनाप-शनाप काम हुए। परिषद का मूल काम ही नहीं हो रहा था। यही नहीं, उन्होंने बिना विज्ञापन जारी किए 14 कर्मचारियों की भर्ती कर दी और निकल लिए। चर्चा है कि नए डीजी ने जब इन कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो रोकने के लिए भारी दबाव भी पडऩे लगे। बावजूद वे रूके नहीं और कार्रवाई कर दी। इसके खिलाफ कर्मचारी हाईकोर्ट चले गए। कोर्ट में परिषद की तरफ से पैरवी कर रहे सरकारी वकीलों ने डीजी और मातहत अधिकारियों को इसकी सूचना तक नहीं दी। इसके बाद न सिर्फ कार्रवाई रूक गई बल्कि  बकाया भुगतान भी करना पड़ा। सुनते हैं कि इस पूरे प्रकरण में कर्मचारियों को भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला। सरकारी वकीलों की हरकत से खफा सुब्रमणियम ने सरकार को कड़ी चिट्ठी लिखी है। अब नए सिरे से जवाब पेश करने की तैयारी हो रही है। अब इस पूरे प्रकरण को देखकर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि बाड़ ही खेत चरने लग जाए तो क्या किया जा सकता है....। 

    जो नौकरी में नहीं सुधार पाए, वे अब...
    छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सुधार की कोशिशें बहुत ही मजेदार है। राज्य बनने के बाद पहले मुख्य सचिव अरूण कुमार के बारे में यह हकीकत मध्यप्रदेश के वक्त से हर आईएएस बच्चे-बच्चे जानते थे कि एक बार फाईल उनके कमरे में गई, तो फिर उसके निकलने की संभावना नहीं रहती। लेकिन जब राज्य बना तब उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद नौकरशाही की गौरवशाली परंपरा के अनुरूप उन्होंने भी पुनर्वास के लिए जान लड़ा दी। उस वक्त मुख्यमंत्री के सचिव रहे सुनील कुमार का जीना हराम कर दिया कि उनके लिए कुछ करवाया जाए। ऐसे में महीनों की मजबूरी के बाद मुख्यमंत्री अजीत जोगी के दस्तखत से अरूण कुमार को एक बरस का पुनर्वास मिला, और उन्हें प्रशासनिक सुधार का काम दिया। जिसने जिंदगी भर खुद प्रशासन की सबसे खराब मिसाल पेश की, वह अब सरकारी सहूलियतों और वेतन-भत्तों पर प्रशासनिक सुधार करने चला। 
    आज इस वक्त राज्य में इसी तरह की एक और कोशिश हो रही है। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक राज्य प्रशासनिक सुधार आयोग बनाया है जिसके अध्यक्ष रिटायर्ड चीफ सेक्रेटरी एस.के. मिश्रा हैं। सुयोग्य मिश्रा एक अच्छे चीफ सेक्रेटरी रह चुके हैं, लेकिन उनके मातहत प्रशासन का जो हाल था, उसमें वे शायद ही कोई सुधार कर पाए, बस अपनी मेज पर आने वाले कागज जरूर वे ठीक से देख लेते थे। उनकी अगुवाई में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के साथ मिलकर आज रायपुर में प्रशासनिक सुधार के उपायों पर गंभीर विचार-मंथन रखा गया है। इसमें प्रदेश के मौजूदा और रिटायर्ड कई आईएएस अफसर शामिल होने जा रहे हैं जिनमें से कुछ आईएएस से रिटायर होने के बाद राज्य सरकार के मनोनीत कुछ पदों पर बैठे हैं, और कुछ मनोनयन के इंतजार की कतार में हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिन्होंने अपनी पूरी नौकरी में सुधार नहीं किया, वे आज कौन सा करिश्मा कर दिखाएंगे? प्रशासनिक सुधार के लिए तो आम जनता से सलाह लेनी चाहिए जिसकी पूरी जिंदगी सरकारी दफ्तरों के धक्के खाते, रिश्वत देते, हताश होकर लौटते गुजरती है, जैसे कि टीवी के एक सीरियल में मुसद्दीलाल के साथ होता है। अब अफसरों और रिटायर्ड अफसरों का हाल यह है कि वे लुटी-पिटी जनता से प्रशासनिक सुधार पर सलाह का हक भी छीन चुके हैं, और अपनी नाकामी की बुनियाद पर वे आज अपने पुनर्वास-रोजगार की इमारत खड़ी कर चुके हैं।  

    ऐसे आदर्श वाला कॉलेज कैसा होगा?
    दुर्ग के एक बड़े नामी-गिरामी कॉलेज के इश्तहारों में एक मृतक की फोटो छप रही है, क्योंकि वह कॉलेज के संचालक का बेटा है। अब उसकी हत्या का जो मुकदमा चल रहा है, उसमें हत्यारे की बीवी का वह लंबा-चौड़ा बयान पुलिस और अदालत में दर्ज है कि मृतक किस तरह अपनी इस कर्मचारी रह चुकी महिला का सेक्स-शोषण करना चाहता था, इसके लिए लगातार उस पर दबाव बनाया हुआ था। संचालक अपने बेटे की स्मृति में विज्ञापनों में या कॉलेज में उसकी तस्वीरों का जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल करें, लेकिन लोग इस बात पर हैरान हैं कि कर्मचारी के सेक्स-शोषण और जबरिया देह संबंध बनाने के कानूनी बयान के बाद भी ऐसे व्यक्ति की तस्वीरें वाले इश्तहारों से कॉलेज की किस तरह की साख बनेगी? 

    जहां चाहे जा सकते हैं दुर्ग एसपी
    दुर्ग एसपी अमरेश मिश्रा की सीबीआई में पोस्टिंग तय है, लेकिन गृह विभाग ने अब तक एनओसी नहीं दी है। सुनते हैं कि सरकार और मिश्रा, दोनों को ही इसकी हड़बड़ी नहीं है। अमरेश का अब तक का कैरियर बेहतर रहा है और वे आईबी में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर काम कर चुके हैं। वे प्रशासनिक और राजनीतिक पकड़ के मामले में भी भारी पड़ते हैं। पुलिस महकमे में यह माना जाता है कि दुर्ग के आईजी दीपांशु काबरा के अधिकार क्षेत्र में बाकी जिले तो आते हैं, दुर्ग जिला नहीं आता। अमरेश मिश्रा को डीजीपी ए.एन. उपाध्याय की सीधी पसंद भी माना जाता है, और इसीलिए उनके खिलाफ दुर्ग जिले से उठने वाली बहुत सी शिकायतों का कोई असर कहीं नहीं होता। यह बात दुर्ग में जगजाहिर है कि किस तरह उन्होंने अपने दफ्तर में आई भाजपा की एक वकील के साथ कैसा सुलूक किया, और उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा। संघ से लेकर कांग्रेस और भाजपा के कई बड़े नेताओं से उनके संपर्क रहे हैं। ऐसे में वे जब चाहे, जहां जाना चाहते हैं वे जा सकते हैं। 

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Posted Date : 09-Nov-2017
  • पूर्व मंत्री हेमचंद यादव गंभीर बीमारी से उबर रहे हैं। पिछले छह महीने उनके लिए काफी तकलीफदेह रहे। उन्हें रायपुर से लेकर मुंबई तक बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े। वे सरकार में 10 साल मंत्री रहे, लेकिन इलाज के लिए पैसे जुटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अलावा सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और अजय चंद्राकर ने उदारता पूर्वक मदद की और अभी भी सहयोग कर रहे हैं। हेमचंद सरकार में मलाईदार जल संसाधन, ग्रामीण विकास, उच्च शिक्षा, खाद्य और परिवहन मंत्रालय संभाल चुके हैं। उनके मंत्री रहते करीबियों ने जमकर मौज की, लेकिन हेमचंद खुद फक्कड़ के फक्कड़ बने रहे।  उन्होंने अपने नजदीकी मित्रों का भरपूर ख्याल रखा। मसलन, अजय चंद्राकर के चुनाव हारने के बाद उन्हें मंत्री न रहने की कमी नहीं महसूस होने दी। हेमचंद का अपने विभाग प्रमुखों को अलिखित आदेश था कि अजय के आदेशों का हर हाल में पालन किया जाए। सिंचाई ठेकों में बृजमोहन की भी सिफारिश सुनते थे। हालांकि अजय और बृजमोहन व प्रेमप्रकाश अभी भी उनका पूरा ख्याल रखते हैं। लेकिन उनके नजदीकी लोग उस नेता को याद कर रहे हैं जो कि हेमचंद के परिवहन मंत्री रहते अघोषित तौर पर विभाग चलाया करते थे। हमेशा बोरियों में भरकर माल ले जाते थे और अपना कारोबार नांदगांव से लेकर रायपुर तक फैलाया। राजधानी रायपुर में उसी काली कमाई से एक बड़ा सा अस्पताल तक खोल लिया, लेकिन हेमचंद की बीमारी की खबर पाने के बाद मिलना तो दूर एक फोन तक नहीं किया। कहते हैं कि बुरे वक्त में अपने-पराए की पहचान हो जाती है। शायद हेमचंद को हो गई है...। 

    बाफना से पिटा अफसर नशे में नहीं था...
    कवर्धा के बगल ही साजा विधानसभा क्षेत्र है जहां पर भाजपा विधायक लाभचंद बाफना ने पिछले चुनाव में नदियां बहाकर वोटरों को रविन्द्र चौबे तक पहुंचने से किसी तरह रोक लिया था, और इसके बाद नदी और बांध सबका खर्च निकालने के लिए उनकी तरह-तरह की चर्चा सामने आते रहती हैं। कुछ हफ्ते पहले उनके भाई ने अपने ट्रांसपोर्ट के धंधे को लेकर आरटीओ के अफसर को बुरी तरह पीटा। और उस पर नशे में होने का आरोप भी लगा दिया। जख्मी अफसर थाने में घंटों बैठे रहा, लेकिन गृहमंत्री से संबद्ध संसदीय सचिव लाभचंद बाफना के भाई पर जुर्म कायम करना पुलिस के बस का था नहीं, इसलिए कोई रिपोर्ट नहीं हुई, यह जरूरी हुआ कि उस अफसर को ही अटैच कर दिया गया। अब उस अफसर की मेडिकल जांच रिपोर्ट आ गई है, और उसमें उसका नशे में न होना पाया गया है। अब देखना है कि उस अफसर को सजा देने का और कौन सा तरीका ढूंढा जाता है, और जहां तक संसदीय सचिव के भाई का सवाल है, वह अफसरों को तो पीट सकता है, लेकिन अगले चुनाव में अगर लाभचंद के वोटर उसे वोट देने से इंकार करेंगे, तो उनमें से यह भाई कितने लोगों को पीट सकेगा? 


    मीडिया को दुश्मन समझते कलेक्टर
    बिलासपुर कलेक्टर पी. दयानंद की कल वहां के मीडिया के लोगों से झड़प हो गई। कलेक्टर के जनदर्शन से एक फोटोग्राफर को उन्होंने अपने गनमैन से बाहर निकलवा दिया, तो मीडिया स्थानीय मंत्री अमर अग्रवाल तक पहुंचा। मीडिया के साथ ऐसा सुलूक करने वाले वे अकेले कलेक्टर नहीं हैं। प्रदेश में कई और कलेक्टर ऐसे हैं जो कि मीडिया को हिकारत से देखते हैं, और उनसे बात करना जरूरी नहीं समझते। इस प्रदेश में सुनील कुमार और विवेक ढांड जैसे कलेक्टर रहे, जो कि मुख्य सचिव बनने तक लगातार मीडिया से अच्छे संबंधों के लिए जाने जाते रहे, और यह संबंध उनकी खुद की जानकारी का एक बहुत ही संपन्न श्रोत रहा। उन्हें मीडिया से अपने जिले, या अपने विभाग से लेकर, अपने पूरे प्रदेश-प्रशासन तक की जानकारी मिलती रही। और ये दोनों ही मुख्य सचिव बनने के बाद भी अपने व्यस्त समय में से रोजाना कुछ समय मीडिया के लिए निकालते रहे, और उससे उनका अपना कामकाज अच्छा चलता रहा। इन दोनों की शुरूआत छत्तीसगढ़ के ऐसे जिलों से हुई जो कि उस वक्त केवल जिले थे। आज तो यह प्रदेश छोटा हो गया है, जिले और छोटे-छोटे हो गए हैं, उस समय एसडीएम जितनी जगह प्रशासन करते थे, आज कलेक्टरों को बस उतना ही इलाका मिलता है, लेकिन फिर भी उनके तेवर जिलों में रहते हुए मुख्य सचिवों से भी ऊपर हो गए हैं। कई जिले हो गए हैं जहां कलेक्टर मीडिया के लोगों से बात करना पसंद नहीं करते। राज्य सरकार को कलेक्टरों के ऐसे तेवर से कितना नुकसान हो रहा है यह बात सत्तारूढ़ पार्टी के लोग लगातार सत्ता में कुछ जगहों पर बताते आए हैं, और पता नहीं उसका असर पहले होता है, या कि विधानसभा के चुनाव पहले होते हैं। हैरानी यह है कि रमन सिंह से लेकर अमन सिंह तक मीडिया से अच्छे संबंध रखने में भरोसा रखते हैं, और ऐसे संबंध रखते भी हैं। वे वीडियो कांफ्रेंस से लेकर कलेक्टर कांफ्रेंस तक मीडिया से बर्ताव के बारे में कह भी चुके हैं, लेकिन जिला कलेक्टरी की कुर्सी कई लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। एक केन्द्रीय मंत्री के निजी सहायक ने अभी एक कलेक्टर के बारे में कहा कि उनके दरबार में नेताओं के अलावा बाकी सबकी बात सुनी जाती है। 

    आईएफएस की ऑपरेशन घरवापिसी
    राज्य में जितने आईएएस अफसर नए-नए सचिव बने हैं, और जिस तरह कुछ विशेष सचिवों को भी विभागों का स्वतंत्र जिम्मा दिया गया है, उसके हिसाब से राज्य में विभाग कम पडऩे वाले हैं। इसी महीने किसी समय दो और सचिव स्तर के अफसर, मनिंदर कौर द्विवेदी और गौरव द्विवेदी भी सात साल राज्य के बाहर रहकर अब लौट रहे हैं, और उन्हें भी कोई न कोई विभाग या उस स्तर का जिम्मा दिया जाएगा। ऐसे में इसका सबसे पहला शिकार आईएफएस अफसर होंगे जो कि इस प्रदेश में शुरू से ही बड़ी जिम्मेदारी के सचिव बने हुए हैं, और मंत्रालय के बाहर भी जिनके पास बड़े महत्वपूर्ण ओहदे चले आ रहे हैं। वन विभाग में अभी कुछ हफ्ते पहले तक बैठने को कमरे नहीं बचे थे, लेकिन अब ऐसे परदेशियों के लिए विभाग का नया महलनुमा दफ्तर तैयार है जिसमें सभी को जगह मिल सकती है। पूरे देश में छत्तीसगढ़ जितना महत्व आईएफएस अधिकारियों को और कहीं नहीं मिला। और यह भी बड़ा अजीब विरोधाभास रहा कि राज्य के जंगलों में लंबे समय से नक्सलियों का राज रहा, और जंगल अफसर मंत्रालय संभालते रहे। 
    मुख्य सचिव विवेक ढांढ की पहली पसंद आईएफएस बताए जाते थे, और उनके कार्यकाल के अंत के पहले ही यह ऑपरेशन घरवापिसी तय मानी जा रही है। हालांकि खुद विवेक ढांढ मुख्य सचिव की कुर्सी से उठकर किस दिन रेरा प्रमुख की कुर्सी पर बैठ जाएंगे, या मुख्य सूचना आयुक्त बन जाएंगे, इसकी अटकल लगते-लगते अब बुरी तरह थक चुकी है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 08-Nov-2017
  • सेक्स-सीडी कांड को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल को सेक्स-सीडी कांड का सूत्रधार करार दिया। उन्होंने सीडी को नकली बताते हुए यह भी कहा कि कांग्रेसी कितना भी छाती पीटे नकली माल नकली ही दिखेगा। पुराने कांग्रेसी सुंदरानी के बयान को काफी गंभीरता से ले रहे हैं। वे मानते हैं कि सीडी असली है या नकली, सुंदरानी से बेहतर कोई नहीं बता सकता। सीडी के पुराने कारोबारी रहे हैं और असली-नकली खूब अच्छे से जानते हैं। जानकार लोग यह भी कहते हैं कि सुंदरानीजी इतने पारखी हैं कि सीडी को देखकर यह बता सकते हैं कि यह कहां फिल्माई गई है, पात्र कौन है? फिलहाल, लोग दोनों पार्टी के नेताओं की बयानबाजी को देख सुन रहे हैं और जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। भूपेश बघेल को इस मामले में फंसते देखना जितना भाजपाई चाहते हैं, उतना ही बहुत से कांगे्रसी भी चाहते हैं।

    भविष्य ही बेहतर हो सकता है
    जीएस मिश्रा के विदाई पार्टी की प्रशासनिक हल्कों में जमकर चर्चा है। महानदी भवन में हुई पार्टी में मिश्राजी को विदाई दी गई। अपर मुख्य सचिव अजय सिंह ने पहले से तैयार एक नोट पढ़ा और उनके स्वस्थ व बेहतर भविष्य की कामना की। हालांकि विभाग में ज्यादा कुछ कहने के लिए था क्योंकि उनके विभाग में सबसे ज्यादा गड़बड़-घोटाले हुए हैं। उनके बेहतर भविष्य की कामना बहुत ही जरूरी थी। सिंचाई अफसरों ने भव्य तौर तरीकों से अपने साहब को विदाई दी। यह पार्टी एक आलीशान होटल में रखी गई थी। कहा जा रहा हैै कि होटल का बिल उन ठेकेदारों के मत्थे चढ़ गया, जो बेचारे पहले से ईओडब्ल्यू-एसीबी के चक्कर काट रहे हैं। बिल देना मजबूरी भी थी, क्योंकि साहब को लेकर यह हल्ला उड़ा है कि उन्हें जल्द ही कोई अहम जिम्मेदारी मिलेगी और वे फिर काम आ सकते हैं। 

    महिला की आह बुरी होती है
    राज्योत्सव के राज्य स्तरीय सम्मान बंट गए। एक आदमी को कोई सम्मान नहीं मिल पाया, और उसकी हसरत काफी थी। पुराने लोगों ने याद किया कि अपने साथ काम करने वाली एक महिला की तस्वीरों को लेकर यह आदमी अखबारों के दफ्तर में घूमा था कि वे तस्वीरें आपत्तिजनक हैं, और उन्हें छापा जाय। किसी महिला के खिलाफ ऐसी हरकत करने का नतीजा इतना खराब होता है, यह बात बाकी लोगों को भी जान और मान लेनी चाहिए।
     

    सम्मान में कमीबेसी
    राज्योत्सव के समापन मौके पर जिला प्रशासन की कोशिशों के बाद किसी तरह भीड़ जुट पाई। समापन समारोह में कई परम्पराएं टूटती दिखीं। मसलन, प्रदेश में भाजपा सरकार के बनने के बाद से राज्योत्सव में सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अहम किरदार में होते थे। लेकिन इस बार वे छिटक गए। पहले वे विधानसभा अध्यक्ष के बगल की कुर्सी में विराजमान होते रहे हैं। वे सम्मान प्राप्त नागरिकों से पहले मिलते थे और फिर मुख्य अतिथि से मिलाते थे। लेकिन इस बार उनकी कुर्सी प्रेमप्रकाश पाण्डेय को आबंटित कर दी गई। सो, बृजमोहनजी सम्मान प्राप्त लोगों से आखिरी में ही मिल पाए। मंच पर सरकार के मंत्रियों के अलावा नेता प्रतिपक्ष के लिए भी कुर्सी रखी जाती रही है। नेता प्रतिपक्ष कार्यक्रम में नहीं आए। मंत्रियों के अलावा भाजपा के पदाधिकारियों को भी मंच पर बिठाया गया था। लेकिन इन सबसे खास बात यह रही कि कार्यक्रम से पहले मंचस्थ अतिथियों का हमेशा सम्मान होता आया है। लेकिन इस बार मुख्य अतिथि के तौर पर राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री का ही सम्मान किया गया। बाकी का सम्मान करना संस्कृति अफसर भूल गए, अब शराब का विभाग और संस्कृति का विभाग एक ही अफसर को दिया जाएगा, तो शाम के जलसों में कुछ तो भूल होगी ही...।

    राजधानी पर सैकड़ों करोड़...
    राजधानी रायपुर में चार विधानसभा सीटों पर प्रदेश सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए से इतना काम हुआ है कि लोग हैरान हैं। बड़ी-बड़ी, नई-नई सड़कें, नए-नए पुल, प्रदेश का सबसे बड़ा सभागृह, और भी कई बड़े प्रोजेक्ट इस शहर में बन रहे हैं। लेकिन राज्य सरकार किसी एक शहर पर इतना खर्च कैसे कर सकती है, इसके जवाब में एक जिम्मेदार और जानकार अधिकारी ने यह कहा कि किसी भी राजधानी की तरह रायपुर में भी पूरे प्रदेश से लोगों की आवाजाही आबादी जितनी ही रहती है। रोज यहां लाखों लोग आते हैं, और न सिर्फ उनकी नजरों में छवि बनाने के लिए, बल्कि उनको सुविधाएं देने के लिए भी राजधानी का ढांचा बाकी शहरों के मुकाबले बेहतर और अधिक क्षमता का रहना जरूरी है। ऐसे में म्युनिसिपल की क्षमता से परे राज्य सरकार को भी इस पर खर्च करना पड़ता है क्योंकि राज्य स्तर के बहुत से काम इसी शहर में होते हैं। यह एक अलग बात है कि राजधानी की विधानसभा सीटों को लेकर कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इतने काम का मुकाबला वे कैसे करेंगे? 


    अखबारनवीस पर नई तोहमत
    प्रदेश के एक अखबारनवीस के खिलाफ उपभोक्ता फोरम के जज ने पुलिस में शिकायत की है कि वह एक खास पक्ष में फैसला देने के लिए दबाव डाल रहा है। यह अपने किस्म का पहला मामला है। आम तौर पर मनचाहा फैसला पाने के लिए असरदार अखबारनवीस अपील जरूर कर लेते हैं, लेकिन ऐसा दबाव डालने की नौबत आम तौर पर नहीं आती है कि उसकी पुलिस में शिकायत तक हो जाए। अब इस मामले में पत्रकार संगठन क्या करें, और अखबार मैनेजमेंट क्या करे, इसका नया-नया तजुर्बा होगा।   rajpathjanpath@gmail.com

     

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Posted Date : 07-Nov-2017
  • करीब साल भर पहले आवास पर्यावरण मंत्री के साथ नया रायपुर के सीईओ रजत कुमार, संजय शुक्ला, सलिल श्रीवास्तव सहित बहुत से अफसर पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत के साथ स्मार्ट सिटी की मिसाल देखने स्पेन के शहर बार्सिलोना गए थे। इसे स्पेन शहर का दूसरा सबसे घना म्युनिसिपल कहा गया है, और छोटे से दायरे में 16 लाख की आबादी रहती है। यह शहर स्पेन के कैटालोनिया प्रांत में पड़ता है जिसने कि अभी-अभी अपने-आपको स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया है, और स्पेन में इस अलगाव को मानने से इंकार करते हुए इसे अपना हिस्सा मानना जारी रखा है। लेकिन आज इस चर्चा का मकसद स्पेन के इतिहास, वर्तमान, और भविष्य की चर्चा नहीं है, छत्तीसगढ़ के शहरों की चर्चा है जिन्हें कि स्मार्ट बनाने के लिए यहां के मंत्री और अफसर दुनिया भर घूम रहे हैं। 
    उस वक्त नया रायपुर के प्रभारी मंत्री अपने अफसरों के साथ बार्सिलोना हो आए, और अब नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल अपने कई अफसरों के साथ उसी शहर को देखने जा रहे हैं। उनकी टीम में उनके अपने शहर बिलासपुर के म्युनिसिपल कमिश्नर सौमिल चौबे, रायपुर के म्युनिसिपल कमिश्नर रजत बंसल, के अलावा नया रायपुर के नए सीईओ मुकेश बंसल भी शामिल हैं। हो सकता है कि इस जिज्ञासु टीम के पहुंचने के पहले कैटालोनिया एक नया राष्ट्र बन जाए, और यह टीम एक नया देश घूमना बता सके, लेकिन उस वक्त की टीम, और इस बार की टीम के दौरों के बीच बिलासपुर और रायपुर के बहुत से घूरों से कचरा भी नहीं उठा है, और बार्सिलोना में साल भर पहले का कचरा उठाने का कोई तजुर्बा स्पेनिश लोग बांट भी नहीं पाएंगे। इस दौरान डॉलर का रेट जरूर बदला होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ के शहरों में कचरे का हाल तो जरा भी नहीं बदला है। और जहां तक नया रायपुर का सवाल है, तो वहां तो कचरा पैदा करने वाली आबादी है नहीं, और इसलिए कचरा भी नहीं है। अब पिछले तजुर्बे से इस बार के तजुर्बे तक क्या फर्क पड़ेगा, यह अंदाज लगाना हमारे लिए तो आसान नहीं है। छत्तीसगढ़ की सरकारी टीमें अपने साथ यहां का घूरा भी ले जातीं, तो कचरा कुछ घट सकता था। एक-दो टीम और चली जाएं तो बार्सिलोना में लोग छत्तीसगढ़ी बोलने लगेंगे। और वहां के होटल के कारोबारी कहने लगेंगे- छत्तिसगढिय़ा सबले बढिय़ा।

    बैस के सितारे गर्दिश में
    पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस के सितारे गर्दिश में हैं। वे भाजपा के चुनिंदा सांसदों में है जो सबसे ज्यादा बार चुनाव जीते हैं। अटल सरकार में मंत्री रहे बैस को तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई। पार्टी के कुछ नेता इसके लिए बैस को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। वे पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में मोदी विरोधी खेमा यानी सुषमा स्वराज के नजदीकी रहे हैं। सुनते हैं कि पहली बार उनके लिए ठीक से लाबिंग नहीं हो पाई थी। सुषमाजी अपने लिए विदेश मंत्रालय चाह रही थी और उन्हें इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। 
    पार्टी सुषमाजी को विदेश के बजाय मानव संसाधन मंत्रालय देना चाह रही थी। ऐसे खींचतान के बीच वे अपने नजदीकी बैस और राजीव प्रताप रूडी के लिए ठीक से प्रयास नहीं कर पाई। दोनों को जगह नहीं मिल पाई। इसके बाद भी रूडी तो पार्टी लाईन में चलते रहे लेकिन बैस थोड़े भटक गए। चर्चा है कि उन्होंने कोल ब्लॉक आबंटन-घोटाले से जुड़े 4 सवाल पूछ लिए। इसके बाद केन्द्रीय नेतृत्व की  भौंहें तन गई। बाकी काम राज्य संगठन ने पूरा कर दिया। संगठन के प्रमुख पदाधिकारी ने हाईकमान को बताया कि कैसे विधानसभा चुनाव के वक्त बैसजी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी करते हैं। छत्तीसगढ़ अकेले गुजराती विधायक, और भाजपा के तेज-तर्रार नेता देवजी पटेल रमेश बैस के इलाके से, उनकी जाति के अधिक वोट वाले इलाके से बैस की 'वजह से' नहीं जीतते, बल्कि उनके 'बावजूद' जीतते हैं।
    यह भी बताया गया कि बैस सिर्फ अपने परिवार और दूरदराज के रिश्तेदारों के लिए ही पद चाहते रहे हैं। बस फिर क्या था, उन्हें मंत्री बनाना तो दूर कोर ग्रुप से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि बैसजी को आगामी टिकट के भी लाले पडेंग़े। क्योंकि इसी तरह के तौर-तरीकों के चलते अहमदाबाद के लगातार आठ बार के सांसद हिरेन पाठक की एक झटके में टिकट काट दी गई थी। उनकी टिकट के लिए पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज आखिरी तक कोशिश करते रहे लेकिन उन्हें टिकट दिला पाना संभव नहीं हो पाया।

    मेहनती और निकम्मों का फर्क
    सरकार कई बार ईमानदार नीयत से भी संवैधानिक संस्थाओं में लोगों को नियुक्त करती है, और वे अपने मिजाज के मुताबिक काम अच्छा करते हैं, और नहीं भी करते हैं। अब जैसे बिलासपुर के उपभोक्ता फोरम में एक वक्त दो-दो महीने बाद की पेशी दी जा रही थी, तीन-तीन बरस  फैसले नहीं हो रहे थे, हजार के करीब मामले कतार में खड़े थे। वहां कुर्सियों पर लोग बदले, नए किस्म के दिल-दिमाग आए, तो काम रफ्तार से चल निकला और निपटारा होने लगा, लोगों को इंसाफ मिलने लगा। राजधानी रायपुर में कई ऐसे आयोग हैं जिनकी कुर्सियों पर बैठे लोग यह तय कर लेते हैं कि उन्हें कोई काम नहीं करना है। और वे इसके लिए बड़े ही मौलिक तरीके भी ढूंढ लेते हैं, कभी वे बाकी सदस्य नहीं बनने देते, कभी वे कर्मचारियों की कुर्सी खाली रखवाते हैं ताकि उस बहाने से काम न करें। इसलिए राज्य सरकार को लोगों पर मेहरबानी करने की नीयत से उनकी नियुक्ति के बजाय ऐसे ईमानदार और मेहनती लोगों को ही संवैधानिक कुर्सियों पर बिठाना चाहिए जो इतना काम करें, ऐसा काम करें, कि फिर चाहे उससे राज्य सरकार को दिक्कत होने की नौबत आए, तो आए। सरकार की ताकत को यह भी समझना चाहिए कि अगर उसकी गलतियों को पकड़कर सही राह दिखाने वाले संवैधानिक आयोग सारे वक्त अच्छी तरह काम करेंगे, तो सरकार उतनी बुरी हो भी नहीं सकेगी कि वह अगला चुनाव हार जाए।

    मरीन ड्राइव पर बोफोर्स तोप लगी 
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तालाब के किनारे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट ने बीस लाख से अधिक की लागत से मोर रायपुर का लोगो खड़ा किया है ताकि उसके सामने खड़े होकर लोग तस्वीर खिंचवा सकें, और सेल्फी ले सकें। लेकिन पहले इसकी लागत सामने नहीं आई थी। अब जब 20 लाख से अधिक की लागत सामने आई है, तो लोग इसे बोफोर्स तोप मानकर इसके सामने तस्वीर ले रहे हैं। जिन नए लोगों को, यानी पिछले 20 बरस में होश संभालने वाले लोगों को यह याद नहीं होगा कि बोफोर्स का इस लोगो से क्या लेना-देना है, उन्हें बता देना ठीक होगा कि एक वक्त जब राजीव गांधी की सरकार में बोफोर्स तोप खरीदी में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था, तो बरसों तक बोफोर्स शब्द भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बन गया था। उस वक्त छत्तीसगढ़ के गांव के एक किसान ने शहर आकर कलेक्टर से शिकायत की थी, तो कहा था- हमर गांव पंचायत में बोफोर्स हो गे हे साहब...।
    एक लोगो की इतनी बड़ी, 20 लाख 60 हजार की लागत ने उसे तोप बना दिया है। अब खोजी लोग पता लगा सकते हैं कि इस बोफोर्स में किसको-किसको क्या मिला है? और यह पता लगाना तो आसान है कि इसकी लागत कितनी होगी क्योंकि यह तो खुले में खड़ा ढांचा है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 06-Nov-2017
  • सेक्स-सीडी कांड से कांग्रेस पल्ला जरूर झाड़ रही है, लेकिन पार्टी के अंदरखाने में यह चर्चा है कि कुछ राष्ट्रीय नेताओं को इसकी भनक पहले से थी। सुनते हैं कि करीब चार माह पहले तत्कालीन प्रदेश प्रभारी के समक्ष यह मामला आया था। लेकिन वे बिना जांच पड़ताल के किसी नेता के निजी मामले को उजागर करने के खिलाफ थे। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। चर्चा यह है कि उनके बदलने के बाद कुछ लोगों ने नए प्रभारी को भी इससे अवगत कराया। वे भी इसे उजागर करने के तौर तरीके से सहमत नहीं रहे हैं, लेकिन मामले का पर्दाफाश होने के बाद उन्होंने मदद जरूर की। चर्चा है कि सुबह 4 बजे उन्हें पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई। वे तुरंत बिना समय गंवाए दो वकील गाजियाबाद थाने भेजे, साथ ही अपने समर्थकों को भी पत्रकार की गिरफ्तारी के खिलाफ आगे किया। देखते ही देखते सौ-डेढ़ सौ लोग वहां पहुंच गए। लेकिन केंद्र और राज्य के नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने यह पार्टी लाइन तय की, कि सीडी कांड को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाएगा।

    सावधानी में ही समझदारी
    नए-नए मोबाइल फोन बदलने का शौक रखने वाले लोगों को कुछ सावधानी भी बरतनी चाहिए। उसमें कहां कौन सी फोटो या मैसेज बिना डिलीट किए बच गए हैं इसका ध्यान कई लोग नहीं रख पाते। ऐसे में लोग रायपुर का एक चर्चित किस्सा बताते हैं कि किस तरह एक प्रमुख व्यक्ति नए फोन में सिम लगाकर, पुराना हैंडसेट घर छोड़कर चले गए, और जब बीवी ने उसमें अपना सिम लगाया, तो पति के अलग-अलग लोगों से आए गए मैसेज देखे, और फिर किस तरह दो महिलाओं में बंगले के बाहर कुश्ती की नौबत आई। तबसे अब तक फोन के फीचर भी बहुत बढ़ गए हैं, और अब तो हैंडसेट और मैसेंजर सर्विस ऐसी हो गई हैं कि उन्हें किसी दूसरे फोन या कम्प्यूटर पर भी देखा जा सकता है। इसलिए सावधानी में ही समझदारी है।

    योगीराज किस तरफ जाएंगे?
    कवर्धा राजघराने के मुखिया पूर्व विधायक योगीराज सिंह कांग्रेस से बाहर हैं। पिछले दिनों वे प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से मिलने गए, तो काफी सुर्खियां बटोरी। यह कहा जाने लगा कि वे फिर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। जबकि जोगी कांग्रेस से जुड़े लोग अपना बताकर कवर्धा से प्रत्याशी के रूप में प्रचारित कर रहे थे। लेकिन दो दिन बाद वे मुख्यमंत्री से मिलने पहुंच गए। अब लोग पूछ रहे हैं कि  आखिर वे किसके साथ हैं? कांग्रेस में उनका भविष्य नहीं हैं। वजह यह है कि पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर को वहां से दोबारा टिकट मिलना तय है। वे मामूली वोटों से हारे थे। मौजूदा विधायक की टिकट काट भाजपा भी अपने साथ जोडऩे का जोखिम नहीं उठा सकती है। अब चूंकि वे दोनों जगह हो आए हैं इसलिए जनता कांग्रेस भी उन्हें प्रत्याशी बनाएगी, इसमें संदेह है। 


    रविशंकर पहले स्वागत विहार आएं
    देश के एक स्वघोषित अतिरिक्त सम्मान वाले श्रीश्री रविशंकर ने अभी अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए मुस्लिम और हिन्दू समुदायों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की है। लेकिन दोनों ही तबकों ने उनकी दखल खारिज कर दी है, क्योंकि सबको मालूम है कि जो अपने कार्यक्रम के लिए यमुना के तट को बर्बाद करके जा सकता है, और फिर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का जुर्माना पटाने से मना कर सकता है, वह अयोध्या में क्या करके निकलेगा। इस बीच छत्तीसगढ़ में लोगों का यह सोचना है कि उनकी मध्यस्थता की इतनी ही ताकत और हसरत है तो वे रायपुर के स्वागत विहार में आकर वहां अपने भक्तों द्वारा लोगों को लूटने के मामले में मध्यस्थता करके दिखा दें। यहां पर रविशंकर के नाम की दुकान चलाने वाले लोगों ने ही स्वागत विहार में सैकड़ों लोगों को सैकड़ों करोड़ का चूना लगाया है, और सरकारी जमीन पर भी कब्जा किया है। रविशंकर को यहां आना चाहिए, और सरकार, अपने भूमाफिया भक्तों, और लुटे हुए लोगों के बीच मध्यस्थता करनी चाहिए, और ऐसा करने के बाद हो सकता है कि उनकी इतनी साख बन जाए कि लोग उन्हें अयोध्या में भी मंजूर कर लें। स्वागत विहार के लुटे हुए लोगों को भी चाहिए कि रविशंकर को खबर भेजें कि उनके नाम पर की गई धोखाधड़ी और जालसाजी को निपटाने के लिए पहले रायपुर आएं।


    फिर प्रेतनी-बाधा?
    दामाद को बचाने के लिए करोड़ों रूपए खर्च करके प्रेतनी-बाधा खत्म करवाने वाले ससुर अब फिर परेशान हैं क्योंकि फिर प्रेतनी-बाधा की खबरें आ रही हैं, और हर कुछ बरस में वे कब तक यह खर्च करते रहेंगे? 


    अति किसी भी काम की बुरी
    अफसरों के आत्मप्रचार को देख-देखकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह बड़े खफा हैं। अभी एक बड़े अफसर पर उन्होंने एक मेहरबानी की, और इसका नतीजा यह निकला कि कई दिनों तक वह अफसर अखबारों में मुख्यमंत्री से अधिक जगह पाते रहा, और हकीकत मुख्यमंत्री को अच्छी तरह मालूम थी। जानकार लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री और उनके आसपास के लोग यह जानते हैं कि इस तरह का प्रचार किन मकसदों से किया जाता है। और राज्य के भीतर तो ऐसा मकसद इस प्रचार से गड़बड़ा ही गया है, पद्मश्री की तैयारी में भी इससे गड़बड़ी हो सकती है। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि किसी भी काम में अति नुकसानदेह होती है। सार्वजनिक जीवन में प्रचार की जरूरत और उसका हक नेताओं को ही रहना चाहिए, न कि अफसरों को।

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Posted Date : 05-Nov-2017
  • प्रदेश के व्यापारियों की सबसे बड़ी संस्था चेम्बर ऑफ कॉमर्स के चुनाव को लेकर गहमा-गहमी तेज हो गई है। चुनाव पर राजनीतिक दलों की निगाहें लगी हुई हैं। विधानसभा चुनाव में साल भर से कम समय बाकी रह गया है। ऐसे में माना जा रहा है कि चेम्बर चुनाव के नतीजे व्यापारियों के रुझान प्रदर्शित करेंगे, जो कि नोटबंदी और फिर जीएसटी के चलते नाराज चल रहे हैं। चेम्बर में व्यापारी एकता पैनल का दबदबा रहा है। पैनल के प्रमुख रायपुर उत्तर के विधायक श्रीचंद सुंदरानी हैं। सरकार के रणनीतिकारों ने चेम्बर चुनाव सुंदरानी के भरोसे छोड़ दिया है। व्यापारियों पर सुंदरानी की पकड़ सबसे ज्यादा है। लेकिन सुंदरानी अपने विधानसभा चुनाव को देख कर गोटी फिट कर रहे हैं। मौजूदा अध्यक्ष अमर परवानी अध्यक्ष का चुनाव लडऩा चाहते हैं, वे सुंदरानी के समर्थक रहे हैं, लेकिन चेम्बर अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली है। सिंधी व्यापारी पूरी तरह परवानी के पक्ष में दिख रहे हैं। 
    सुनते हैं कि सुंदरानी, परवानी को प्रत्याशी नहीं बनाना चाहते हैं। कहा जा रहा है परवानी भाजपा से रायपुर उत्तर से विधानसभा टिकट के दावेदार हो सकते हैं। यही वजह है कि सुंदरानी ने परवानी के बजाए जितेंद्र बरलोटा का नाम आगे बढ़ाया है। बरलोटा ने सुंदरानी की हरी झंडी मिलते ही प्रचार भी शुरू कर दिया है। उन्हें सरकार के मंत्री राजेश मूणत का भी समर्थन मिल रहा है। परवानी नाराज न हो, इसलिए उन्हें संरक्षक का पद दिया जा सकता है। बृजमोहन अग्रवाल के भाई, दूसरे बड़े दावेदार, योगेश अग्रवाल को किनारा करने के लिए उन्होंने नई चाल चली है। चर्चा है कि सुंदरानी ने योगेश के चचेरे भाई पूरनलाल अग्रवाल को साध लिया है और उनके बेटे प्रकाश को कोषाध्यक्ष का चुनाव लड़ाने के लिए तैयार कर लिया है। पूरनलाल के लिए चेम्बर में चेयरमैन का पद रखा गया है। कुल मिलाकर योगेश का टूटना भी तय माना जा रहा है। सुंदरानी की तिरछी चाल से एकता पैनल के व्यापारी नेता हक्के-बक्के हैं। वे अपने मकसद में कितने कामयाब हो पाते हैं, यह 19 दिसंबर को चुनाव नतीजे ही बता पाएंगे। 
    फोन रिकॉर्डिंग की दहशत
    छत्तीसगढ़ में यह पहला मौका था जब भ्रष्टाचार के मामले में नान की निगरानी करते एसीबी ने वहां के अफसरों और कर्मचारियों के फोन कॉल्स की रिकॉर्डिंग की थी। एसीबी के मुखिया, एडीजी मुकेश गुप्ता इंटेलिजेंस के एडीजी भी थे, और उन्हें फोन इंटरसेप्ट करने के कानून का इस्तेमाल कुछ अधिक मालूम था इसलिए नान का केस एक सीमा तक ऐसी कॉल रिकॉर्डिंग पर भी टिका हुआ है। अब सीडी कांड के बाद राजनीति, और मीडिया के लोग कुछ दहशत में आ गए हैं। आज बाजार में चर्चा है कि बहुत से लोगों की कॉल रिकॉर्ड हो रही है जो कि कानूनी भी हो सकती है, और बिना कानूनी इजाजत भी हो सकती है। सरकार में बैठे बड़े-बड़े अफसर तब तक गैरकानूनी कॉल रिकॉर्डिंग से परहेज नहीं करते, जब तक कि उस रिकॉर्डिंग को अदालत में पेश न करना हो। ऐसे में अभी कुछ पत्रकारों को आशंका है कि गिरफ्तार विनोद वर्मा के साथ उनकी बातचीत का बेजा इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही कई ऐसे नेता भी हैं जो कि अब वॉट्सऐप कॉल करने लगे हैं, और सिग्नल नाम के एक नये एप्लीकेशन का इस्तेमाल करने लगे हैं जिसमें आने-जाने वाले संदेश कुछ सेकंड बाद अपने आप मिट जाने की सेटिंग की जा सकती है। सिग्नल पर हो रही बातचीत का स्क्रीनशॉट भी नहीं लिया जा सकता। जब-जब लोगों में आशंका बढ़ती है, तब-तब लोग ऐसे नए और अधिक सुरक्षित मैसेंजर ढूंढने लगते हैं। 
    राज्योत्सव की दूरी से जनता दूर हुई
    नया रायपुर में चल रहे, और आज शाम खत्म होने वाले राज्योत्सव में लोगों की मौजूदगी कम होने की एक वजह यह भी है कि अपनी गाडिय़ों से आने वाले लोगों के लिए पार्किंग का इंतजाम एक-डेढ़ किलोमीटर दूर है, और धूल भरे इस रास्ते पर चलकर पहुंचना थका देता है। एक साधारण सी समझबूझ से लोगों को पार्किंग से कार्यक्रम स्थल तक ले जाने के लिए बसों या छोटी गाडिय़ों का इंतजाम हो सकता था, लेकिन वह किया नहीं गया। नतीजा यह हुआ कि उद्घाटन से लेकर बीती शाम तक बड़ी कम संख्या में लोग पहुंचे, और कुर्सियां निराशा में रोते-रोते मिट्टी गीली करती रहीं। लोगों का यह मानना है कि नया रायपुर बसने में बरसों लगना तय है, और तब तक शहर के बीच ही अगर राज्योत्सव होता, तो उसका कोई मतलब होता। नया रायपुर के इलाके में भी शहर से 25 किलोमीटर दूर का राज्योत्सव बहुत कम लोगों के काम का है। अगर राज्योत्सव नया रायपुर के ही शहर से लगे हिस्से में होता तो भी कोई बात होती। आज नया रायपुर का हाल यह है कि वहां की गिनी-चुनी आबादी में बच्चा पैदा हो तो बधाई मांगने, नाचने-गाने, किन्नर भी नहीं पहुंचते, और अगर कोई गुजर जाए, तो कफन का कपड़ा लेने भी पुराने रायपुर शहर आना पड़ता है। सरकार राजधानी की जगह तय करने, उसे बनाने का फैसला तो ले सकती है, लेकिन वहां रहने जाना या वहां कारोबार करना तो जनता की मर्जी का फैसला होता है।    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 04-Nov-2017
  • हल्ला है कि सरकार और भाजपा के रणनीतिकारों ने मंत्री की कथित सेक्स-सीडी के 7 सूत्रधारों को चिन्हित कर लिया है। कहा जा रहा है कि इनमें विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के लोग भी हैं। पार्टी से जुड़े लोगों को लेकर चर्चा यह है कि सत्ता पक्ष के लोगों ने सीडी भले ही न बनवाई हो, लेकिन बिना जांच-पड़ताल के मुंहमांगी कीमत पर सीडी खरीद लिया। बाद में सीडी वायरल भी हो गई। इस प्रकरण को लेकर पार्टी के एक नेता विशेष तौर पर निशाने पर है। सुनते हैं कि यह नेता पिछले कई सालों से पार्टी और सरकार में पद पाने के लिए भागदौड़ करते रहा है। नेताजी की शिकायत यह रही कि पार्टी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और उनसे जूनियर कई नेताओं को ऊंचा पद दे दिया। हल्ला है कि करीब सालभर पहले नेताजी ने एक  प्रमुख नेता के बंगले में कुछ लोगों को अपने संगठन के एक पदाधिकारी के अंतरंग क्षणों की सीडी दिखाई थी। बाद में संगठन पदाधिकारी तक बात पहुंच गई और इसको लेकर संगठन पदाधिकारी काफी परेशान रहे। बाद में किसी तरह मामले को मैनेज किया गया। अब जब मंत्री का कथित सेक्स-सीडी उजागर हो गई है, इस नेता को सबक सिखाने की बात भी चल रही है।  लेकिन सत्ता के तीर कब किसी नेता के सीने में लगेंगे, इसकी राह कई लोग देख रहे हैं, लेकिन इससे भी अधिक लोग सीडी कांड से जुड़ा एक बयान देख रहे हैं कि इस सीडी कांड के पीछे भाजपा के दो मंत्रियों का हाथ है, और यह भी चर्चा कर रहे हैं कि इससे जुड़ा हुआ कौन आदमी दिल्ली के अस्पताल में भर्ती हो गया है।

    मनी, मीडिया और माफिया 
    विधानसभा चुनाव में साल भर बाकी रह गया है। चुनाव में कौन से मुद्दे असरदार रहेंगे, यह अभी साफ नहीं है, लेकिन जानकार मानते हैं कि मनी, मीडिया और माफिया, जरूर प्रभावी रहेंगे। राज्य बनने के पहले विधानसभा चुनाव में सीपत से भाजपा प्रत्याशी रहे पं. रामनारायण शास्त्री ने इन तीनों मुद्दों को अपनी हार की वजह बताई थी। पं. शास्त्री अब दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी टिप्पणी अभी भी पुराने भाजपाइयों को याद है। विधानसभा चुनाव परिणाम की समीक्षा बैठक में उन्होंने बताया कि माहौल उनके पक्ष में रहते हुए भी वे कैसे हार गए। शास्त्रीजी ने बताया कि चुनाव प्रचार शुरू होते ही पैसे कम पड़ गए। पार्टी ने जो पैसा उपलब्ध कराया था वह प्रचार सामग्री में ही खत्म हो गया। पैसा नहीं होने के कारण अधिकांश कार्यकर्ता घर बैठ गए। इसके बाद मीडिया पीछे पड़ गया। बिना पैसे के विज्ञप्ति भी छापने के लिए तैयार नहीं थे। चूंकि पैसे नहीं थे इसलिए मीडिया के जरिए प्रचार-प्रसार नहीं कर सके। अंतिम दिनों में शराब बंटवाने के लिए उन पर दबाव पडऩे लगा। शराब ठेकेदारों ने उन्हें कम पैसे में शराब उपलब्ध कराने का ऑफर दिया। पं. शास्त्री ने यह कहकर ऐसा करने से मना कर दिया कि जीवन भर चरणामृत बांटते रहे हैं और अब चुनाव जीतने के लिए शराब कैसे बंटवाते। सो, चुनाव हार गए।
    कुछ ऐसा ही हाल चुनाव का जानकर 2008 के चुनाव में रामचंद्र सिंहदेव ने चुनाव लडऩे से इंकार कर दिया था कि वे बकरा-दारू नहीं बांट सकते, और न ही बांटना चाहते हैं। जो व्यक्ति राज्य के पहले 3 बरस आबकारी मंत्री रहा हो, उसकी कायदे से तो इतनी ताकत हो चुकी रहनी चाहिए कि वह एक करोड़ की दारू भी बंटवा दे, और ट्रकों से बकरे कटवा दे। लेकिन रामचंद्र सिंहदेव ईमानदारी की एक दुर्लभ मिसाल हैं, और किसी के घर एक कप चाय पीने के पहले भी 3 बार सोचते हैं। 
    पैसों की कमी से एक चुनाव दुर्ग में अरूण वोरा भी हार चुके हैं। वर्ष 2008 में मतदान के दो दिन पहले से उनके पैसे खत्म हो गए, पिता कांगे्रस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष थे, और देश में कांगे्रस की लीडरशिप वाली सरकार थी। वोराजी चाहते तो बेटे के लिए एक ट्रक पैसा भेज सकते थे, लेकिन एक लिफाफा भी पैसा नहीं पहुंचा, मतदान केंद्रों पर काम करने वाले कार्यकर्ता घर बैठ गए, या किसी रहस्यमय ताकत ने उन्हें बिठा दिया, और अरूण वोरा चुनाव हार गए। मनी, मीडिया, और माफिया के बिना चुनाव जीतना तब तक मुश्किल है जब तक कि उनके बिना जीत बहुत लंबी न हो। और इन तीन एम में मदिरा और जोड़ लेना ठीक है।

    अब बलात्कार का न्यौता नहीं
    बाजार में लड़कियों के लिए अब एक नई जींस आई है जिसका नाम ब्वॉयफ्रेंड जींस है। यह है तो लड़कियों के लिए, लेकिन इसकी फिटिंग उस किस्म की है जैसे कि लड़कों की जींस की रहती है, ढीली, चौड़ी, और बदन पर न चिपकने वाली। लड़कियों की जींस आमतौर पर इलास्टिक सरीखी होती है, और बदन के साथ ढल जाती है। लेकिन फैशन में कुछ नया होना चाहिए, वरना नया सामान बिके कैसे? इसलिए अब यह नई ढीली-ढाली जींस बाजार में आ गई है। इससे उन लोगों की शिकायत कुछ कम होगी जो कि लड़कियों के बदन पर चिपके कपड़ों को बलात्कार के लिए न्यौता मानते हैं। ऐसे लोगों को ऐसी ढीली जींस पर सब्सिडी देनी चाहिए। 

    राज्य का सूचना आयोग असंवैधानिक
    छत्तीसगढ़ सूचना आयोग 15 मार्च 2016 से बिना किसी संवैधानिक हक के काम कर रहा है। आरटीआई एक्ट को देखें तो उसमें साफ लिखा हुआ है कि इसके गठन के लिए मुख्य सूचना आयुक्त की जरूरत है, और उनके साथ-साथ सूचना आयुक्त भी। लेकिन एक्ट के शब्दों को देखें, और उसकी भावना भी, तो शब्दों से ही यह साफ है कि बिना मुख्य सूचना आयुक्त के यह आयोग गठित ही नहीं हो सकता। अब हाल यह है कि कुछ मौकों पर केन्द्र सरकार के सूचना आयोग ने भी बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम किया है, और कुछ राज्यों में भी सूचना आयोग कुछ-कुछ समय बिना मुख्य सूचना आयुक्त के रहे हैं। यही उदाहरण देकर छत्तीसगढ़ में डेढ़ बरस से अधिक समय से सूचना आयोग को बिना मुख्य सूचना आयुक्त धकेला जा रहा है। ऐसा भी नहीं कि इस ओहदे की जरूरत पूरी करने लायक कोई लोग राज्य में न हों, लेकिन इस कुर्सी पर मानो किसी का रूमाल धरा हुआ हो, और जो यह बोलकर गया हो कि बाद में आकर मैं इस पर बैठूंगा। फिलहाल संवैधानिक स्थिति यह है कि बिना अध्यक्ष के अकेले सदस्य या सदस्यों ने जितने भी आदेश दिए हैं, वे शून्य का दर्जा रखते हैं। सरकार जिसे भी इस कुर्सी पर बिठाना चाहती है, उसे जल्द बिठा दे। अभी दो दिन पहले ही राज्यों के महिला आयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी कड़ी टिप्पणी की है, और अदालत की भावना महज महिला आयोगों तक सीमित नहीं है, वह तमाम संवैधानिक आयोगों तक जाती है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 03-Nov-2017
  • खैरागढ़ राजघराने के मुखिया पूर्व सांसद देवव्रत सिंह का वैवाहिक जीवन तो पटरी पर लौट आया है, लेकिन राजनीतिक जीवन जस का तस है। यूं कहें तो देवव्रत की हालत पहले से भी बुरी हो गई है। कांग्रेस संगठन ने उन्हें हाशिए पर डाल दिया है। दो बार विधायक और एक बार सांसद रहे देवव्रत की हालत अब यह हो गई है कि वे पार्टी के सिर्फ प्राथमिक सदस्य बनकर रह गए हैं। कभी छत्तीसगढ़ के मामलों के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे देवव्रत से जुड़े लोग उनकी दुर्दशा के लिए प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह ऐसा पहली बार हुआ जब जिला तो दूर खैरागढ़ ब्लॉक अध्यक्ष के चयन में भी देवव्रत की नहीं चली। सुनते हैं कि सीडी कांड के बाद देवव्रत ने प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उनकी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय माकन और रणदीप सिंह सुरजेवाला से नजदीकियां है। वे केन्द्रीय नेतृत्व को यह समझाने में कामयाब रहे कि राष्ट्रीय स्तर पर मामला उठाने से पार्टी की फजीहत हो सकती है। क्योंकि सीडी की जांच के बिना ही प्रदेश के नेताओं ने मंत्री पर आक्षेप लगा दिए। मामले की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए गए हैं। जांच आगे बढ़ी तो पार्टी के कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। देवव्रत की बातों पर केन्द्रीय नेतृत्व को दम दिखा और सीडी कांड से एक तरह से किनारा कर लिया। 
    प्रकाश बजाज कौन है, कहां है?
    छत्तीसगढ़ में चल रहे सेक्स-सीडीकांड की शुरुआत हुई प्रकाश बजाज नाम के एक भाजपा पदाधिकारी की पुलिस रिपोर्ट से। रिपोर्ट का तरीका बड़ा अटपटा था, और अविश्वसनीय सा भी था क्योंकि उसमें जिस पर धमकाने का आरोप लगा था, उसके बाजार का नाम तो लिखा था लेकिन शहर का नाम ही नहीं लिखा था। रिपोर्ट लिखाने के बाद से यह पदाधिकारी गायब है, और भाजपा के जिलाध्यक्ष राजीव अग्रवाल सहित भाजपा के कई नेता इसे नाम से पहचान भी नहीं पा रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष धरम कौशिक जरूर इसे जानते हैं, और प्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी में इसे विशेष आमंत्रित सदस्य उन्होंने ही बनाया है, यह बात भाजपा के बहुत से नेता कहते हैं। लेकिन धरम कौशिक इस बात से अपने को अनजान जाहिर करते हैं कि प्रकाश बजाज पर पहले अपनी मर्जी से मुख्यमंत्री का सोशल मीडिया पेज बनाने का कोई आरोप लगा था, और उसी वजह से उसे भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ से हटाया गया था। फिलहाल पुलिस सीडी ढूंढ रही है, और कांग्रेसी प्रकाश बजाज को ढूंढ रहे हैं।
    महलनुमा सरकारी इमारतों से बनती सोच
    अभी नया रायपुर में वन विभाग की कुछ इमारतों का उद्घाटन हुआ। इसमें से अफसरों के ठहरने का मेस और सभागृह की इमारत देखें, तो राजस्थान की किसी महल की याद आती है। पूरे इमारत को शाही अंदाज में बनाया गया है, और यह उस राज्य के पैसे से हुआ है जहां पर गरीब इसलिए दो वक्त खा पाते हैं कि यहां उन्हें एक रूपए किलो चावल मिलता है। करीब चालीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और जिन जंगलों के लिए ये इमारतें बनी हैं, वहां हाल यह है कि तकरीबन हर दिन ऐसी तस्वीर छपती है कि जंगल और पहाड़ी में सड़क न होने पर मरीज को चारपाई या कांवर पर लादकर सड़क तक लाना पड़ा। दरअसल शाही डिजाइन की इमारतें उनमें काम करने वाले लोगों की सोच भी वैसी ही कर देती हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में म्युनिसिपल की इमारत एक महल सरीखी है, और भीतर घुसें तो गरीबी के किसी न किसी कार्ड के लिए सैकड़ों बुजुर्ग, कमजोर, बीमार, और गरीब महिलाएं कतार में दिखती हैं, जिनके बैठने तक का कोई इंतजाम नहीं है। पूरा शहर घूरा बना हुआ है, लेकिन म्युनिसिपल सफाई का अवार्ड पा रहा है। ऐसे काम के पीछे वह सोच भी जिम्मेदार है जो महलों सरीखी इमारत से और भी सामंती हो जाती है, लाल-नीली बत्ती की गाडिय़ां, बड़ी-बड़ी तख्तियां, इन सबसे लोग अपने आपको लोकतंत्र के भीतर भी राजा समझने लगते हैं। सरकारी कामकाज की इमारतों को महल जैसा बनाने में न सिर्फ पैसा अधिक लगता है, बल्कि उससे लोकतांत्रिक सोच भी खत्म होती है। राजभवन में सभागृह का नाम दरबार हॉल रखकर सामंती सोच को ही आगे बढ़ाया गया है। जरूरत से अधिक बड़ी इमारतों को एक नुकसान यह भी होता है कि बाद में उनका रख-रखाव गरीब जनता के पैसों से ही होता है। 
    उत्साह सनी लियोनी के लिए बचा रखा है
    राज्योत्सव के उद्घाटन में इस बार भीड़ कुछ कम दिखी तो लोग हैरान हुए क्योंकि उसी शाम एक लोकप्रिय गायक सुखविंदर का स्टेज परफार्मेंस भी नया रायपुर के राज्योत्सव में था। फिर किसी ने अटकल लगाई कि कुछ दिनों बाद मादक खूबसूरती वाली अभिनेत्री सनी लियोनी आने वाली है, तो लोग अपना उत्साह उसी के लिए बचाकर चल रहे हैं। फिलहाल शोहरत के शौकीन कुछ लोग रायपुर के प्रशासन को शिकायत कर रहे हैं कि सनी लियोनी का कार्यक्रम रायपुर में न होने दिया जाए। यह अभिनेत्री अपनी पूरा मादकता के साथ पूरे घर-परिवार के बीच टीवी से उतरकर नाचने-गाने के लिए तो आजाद है, लेकिन स्टेडियम में उसका प्रोग्राम होना भारतीय संस्कृति की भावनाओं को चोट पहुंचा जाएगा! मजे की बात यह है कि ऐसी संस्कृति के ऐसे अमूमन ठेकेदार इस बार के विरोध के पीछे नहीं है, इस बार कांग्रेस के कुछ लोग यह विरोध कर रहे हैं। अब लोग कमरे के भीतर निजी सेक्स करें, तो भी कांग्रेस को दिक्कत है, और टिकट खरीदकर जाकर सनी लियोनी का नाच-गाना देखें, तो भी कांग्रेस को दिक्कत है। यह और बात है कि एक बड़े कांग्रेस नेता के दो भतीजे अभी एक होटल-शराबखाने में जाकर दारू पीने के लिए पैसे मांगते हुए मारपीट करते हुए कैमरों में कैद हुए हैं। और बहुत सालों से कांग्रेस के कुछ दूसरे नेताओं के कई तरह के वीडियो उन्हें कांग्रेस भवन से हटाने के लिए इस्तेमाल होते रहे हैं, बस किसी ने उन्हें इतना महत्वपूर्ण नहीं माना कि उसकी सीडी बनवाकर बांटी जाए। 
    त्रेतायुग के प्रशासनिक आदेशों का मौसम आया
    तुलसी विवाह के बाद शादियों का मौसम शुरू हो गया है, और एक बार फिर पुलिस और प्रशासन अपने पिछले बरस के ताक पर धरे आदेशों को निकालेंगे, और उसे फिर से जारी कर देंगे कि होटलें और विवाह स्थल अपने अहाते के बाहर गाडिय़ां खड़ी नहीं होने देंगे। यह सिलसिला त्रेतायुग से शुरू हुआ था, और उस समय अफसर पत्तों पर लिखकर नोटिस भेजते थे, आज फर्क यही हुआ है कि यह नोटिस कम्प्यूटर-प्रिंटर से निकलकर चले जाते हैं। जो लोग शांति से रहना चाहते हैं, उनका जीना मुहाल रहेगा, सड़कों पर भी और जो लोग शादी की जगहों के आसपास बसे हैं, वहां भी। हिन्दुस्तान में बारात की भीड़ बड़ी तेजी से भीड़ की हिंसक मानसिकता पा लेती है, और सड़कों से लेकर रेल के डिब्बों तक बारात से उलझना सेहत के लिए नुकसानदेह होने की गारंटी रहती है। पैसा अधिक होने पर वह किस तरह बाकी लोगों की हेठी और हिंसा बन जाता है, यह देखना हो तो शादी के अधिक महूरत वाले दिनों पर रायपुर के एयरपोर्ट रोड और मंदिर हसौद रोड पर देखा जा सकता है। मजे की बात यह है कि शादी जरा भी सत्ता से या महत्व से जुड़ी हुई हो, तो ट्रैफिक पुलिस पार्किंग कर्मचारियों का काम भी करने लगती है। 
    कई नामों को छोड़, डीडी सिंह
    सरकार ने सूचना आयुक्त बनने के बाद अशोक अग्रवाल की जगह आबकारी सचिव का जिम्मा डीडी सिंह को दे दिया। हालांकि इस पद के लिए कई अफसर चक्कर काट रहे थे। अंगे्रजी की कहावत के हिसाब से कहें तो कई अफसर इस कुर्सी के लिए दायां हाथ देने को तैयार थे। विभागीय मंत्री की भी अपनी पसंद थी लेकिन इन सबों को दरकिनार कर सीएम ने डीडी सिंह पर भरोसा जताया। वे राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए हैं, वे जशपुर कलेक्टर रह चुके हैं। सामान्य प्रशासन और सहकारिता विभाग सहित कई विभागों में काम कर चुके हैं। शांत मिजाज के इस अफसर की साख अच्छी मानी जाती है। 98 बैच के अफसर डीडी सिंह उन चुनिंदा अफसरों में हैं, जो कि राज्य सेवा से आईएएस बनकर केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव के पद के लिए सूचीबद्ध हुए हैं। विधानसभा के चुनाव सालभर बाकी रह गए हैं। लिहाजा, सीएम इस पद के लिए ऐसे अफसर की तलाश  कर रहे थे जिसकी साख अच्छी हो, और छत्तीसगढ़ का माटीपुत्र भी हो। सो, यह डीडी सिंह पर जाकर खत्म हुई। अब चुनाव तक राज्य सेवा से अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल हुए अधिकारियों को मौका कुछ अधिक मिलेगा क्योंकि चुनावी मौसम में उनसे रियायत की कुछ उम्मीद की जाती है।

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Posted Date : 02-Nov-2017
  • हिन्दुस्तानियों का बिना पाखंड जीना मुश्किल होता है। ऐसी-ऐसी बातों को ढूंढकर जिंदगी पर लाद दिया जाता है जिससे कि यह दिखता चले कि लोग झूठ को कैसे सजाकर चलते हैं। अब देश भर में राजीव गांधी की शहादत के दिन,  20 अगस्त को, को सद्भावना दिवस की तरह मनाया जाता है, और उस दिन देश के हर सरकारी दफ्तर में दफ्तर के मुखिया बाकी लोगों के साथ यह शपथ लेते हैं कि वे देश के सभी तबकों के बीच एकता के लिए काम करेंगे और सभी मतभेदों को बिना हिंसा संवैधानिक तरीकों से सुलझाने की कोशिश करेंगे। अब इस बात की शपथ दिलाने की क्या जरूरत है क्योंकि यह तो भारत के हर नागरिक की संवैधानिक जिम्मेदारी ही है। जो ऐसा नहीं करेंगे और हिंसा करेंगे, वे जेल जाएंगे। इसी तरह कोई एक और दिन भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाता है, और उस दिन सरकारी अफसरों को रिश्वत न लेने, भ्रष्टाचार न करने की शपथ दिलाई जाती है। इसी तरह सरकारी टेंडर में जो लोग हिस्सा लेते हैं, उन्हें यह शपथ पत्र देना होता है कि वे किसी को रिश्वत नहीं देंगे। दुकानों और कारखानों के बाहर नोटिस लगाना जरूरी है कि वहां बाल मजदूर काम नहीं कर रहे हैं। ऐसे पाखंड को और भी आगे तक बढ़ाया जा सकता है कि लोग घर के बाहर तख्ती टांगकर रखें कि वहां ब्लू फिल्म की सीडी नहीं देखी जाती, पत्नी को नहीं पीटा जाता। इनमें से कोई भी बात मानी नहीं जाती, और हर बरस ऐसा कोई एक पाखंड सरकार के रास्ते दफ्तरों या स्कूल-कॉलेजों में बढ़ते चल रहा है।  
    राम मंदिर में लक्ष्मण नहीं...
    रायपुर शहर से एयरपोर्ट जाने वाली रोड पर रास्ते में बड़ा सा भव्य राम मंदिर बना है। इस मंदिर में राम के साथ सीता की प्रतिमा तो है, लेकिन लक्ष्मण की प्रतिमा नहीं है। इसे देखकर किसी ने सवाल किया, तो दूसरे भक्त ने कहा कि इसी सड़क पर आगे जाकर कुछ ऐसे भाईयों की सैकड़ों एकड़ जमीनें हैं जो कि एक वक्त एक थाली में खाना खाते थे, फिर बाद में वक्त बदला और जायदाद के लिए नीयत बदली, तो दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए, एक-दूसरे को जेल भेजने में लग गए। एक भाई को जेल हो ही गई, तो दूसरे ने जमानत नहीं होने दी। हो सकता है कि यह सब देखकर लक्ष्मण खुद ही वहां से चले गए हों। 
    महंत की बात का सच आंकड़े ही बताएंगे
    चरणदास महंत ने यह बयान दिया कि किसानों को धोन बोनस बांटने के ठीक पहले शराब दुकानों का बिक्री का समय बढ़ा दिया गया, और राज्य सरकार पूरा पैसा शराब की कमाई से वापिस अपने खजाने में ले आएगी। अब इस पर बड़ा बवाल मचा, और कांग्रेस पार्टी को लगा कि यह पूरी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाला बयान है। कांग्रेस के कुछ लोगों को लगा कि यह संगठन के नेताओं को फजीहत में डालने के लिए दिया गया ठीक वैसा ही बयान है जैसा कि विधानसभा के भीतर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए पहले कांग्रेस में रहे कुछ विधायक देते रहते थे। दूसरे कुछ लोगों का कहना है कि महंत का शराब कारोबारियों से अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से इतना घरोबा रहा है कि उनकी यह बात गलत नहीं हो सकती, वे अविभाजित मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग के मंत्री भी रहे हुए हैं, और बिलासपुर के शराब ठेकेदारों की निजी गाड़ी में वे मंत्री रहते हुए भी घूमते थे, ऐसा कांग्रेस के लोगों का कहना है। खैर, यह तो शराब बिक्री के अगले दो महीने के आंकड़ों से पता लग जाएगा कि धान बोनस का कितना पैसा शराब के खजाने में आता है। लेकिन यह किसानों के लिए एक बड़ी बेइज्जती की बात है कि कोई उनके पूरे के पूरे तबके को बेवड़ा कह दे। किसानों के संगठन कांग्रेस के नेताओं को भी गिना सकते हैं कि वे लोग क्या-क्या पीते हैं, कहां बैठकर पीते हैं, किसके साथ पीते हैं। महंत को तो खुद यह बात मालूम है कि जब वे प्रदेश अध्यक्ष थे, सोनिया गांधी से मिलकर उनके विरोधी लगातार यह शिकायत करते थे कि महंत दारू पीते हैं, और हर कुछ घंटे में कोई नशा करते हैं। महंत को यह समझाने में बड़ी दिक्कत हुई थी कि वे गुड़ाखू करते हैं जो कि तम्बाखू वाला मंजन भर होता है, और कोई नशा नहीं होता। लेकिन अब प्रदेश के पूरे किसान कैसे और किस-किसको समझाएं कि दारू पीने के अलावा भी उनकी और जरूरतें हैं।
    वोटों का गड्ढा पट जाता है इसलिए...
    रायपुर से बिलासपुर जाने वाले लोग यह नहीं तय कर पाते कि बीच का रास्ता अधिक खराब है, या बिलासपुर शहर? बिलासपुर शहर की बदहाली का हाल यह है कि केवल घोषित चुनावी पैमानों पर वहां चुनाव हो, तो सत्तारूढ़ पार्टी वार्ड से लेकर संसद तक, कोई भी चुनाव न जीत पाए। लेकिन चुनाव के वक्त शहर के गड्ढों को मतदान के पहले अघोषित तरीके से पाट दिया जाता है, और वोटों का गड्ढा पट जाता है। यह तरीका इतनी बार कारगर हो चुका है कि शहर के गड्ढों को पाटना अब जरूरी भी नहीं लगता। 

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Posted Date : 01-Nov-2017
  • नाम की बड़ी महिमा होती है, और किसी भी शुभ काम के लिए भारत की हिंदू संस्कृति में सबसे पहली पूजा गणेश की होती है। उसके बाद ही कोई और पूजा होती है। इसलिए छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में भी अभी कुछ ऐसा ही हुआ। सरकार ने गणेश शंकर मिश्रा को रिटायरमेंट के दिन प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नत कर एक बड़ा गिफ्ट दिया है। हालांकि जवाहर श्रीवास्तव और आर.एस विश्वकर्मा भी रिटायरमेंट के ठीक पहले प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नत हुए थे। लेकिन गणेश शंकर और उनके साथ पदोन्नत हुए सचिवों का मामला एकदम अलग है। इन सब अफसरों को सवा साल पहले पदोन्नति दे दी गई। ऐसा नहीं है कि सरकार पहली बार गणेश शंकर के लिए मेहरबान रही है। वर्ष-08 में जब उन्हें सचिव के पद पर पदोन्नति दी गई थी, तब भी सरकार को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। उनके खिलाफ विधानसभा की कमेटी ने चर्चित रेडियस वॉटर कांड में संलिप्तता के चलते अपराधिक प्रकरण दर्ज करने की अनुशंसा की थी। सुनते हैं कि तत्कालीन प्रशासनिक मुखिया उन्हें पदोन्नति देने के खिलाफ थे। लेकिन भारी राजनीतिक दबाव के बाद महाधिवक्ता से रायशुमारी कर पदोन्नति दी गई। पदोन्नति मामले में दिनेश श्रीवास्तव और दुर्गेश चंद्र मिश्रा, गणेश शंकर मिश्रा जैसे भाग्यशाली नहीं रहे। वे न सिर्फ प्रमुख सचिव बने बिना रिटायर हो गए बल्कि फेयरवेल भी तीन माह बाद मिल पाया। लेकिन विसर्जन के ठीक पहले गणेश शंकर को लड्डुओं का टोकरा मिल गया है। अब वक्त के पहले जिन आधा दर्जन लोगों को गणेश शंकर मिश्रा के कारण प्रमोशन मिल गया है, उन्हें मिलकर कोई अच्छा सा तोहफा गणेश शंकर को देना चाहिए।

    अब बाकी की बारी जल्दी?
    राज्य स्थापना दिवस के एक दिन पहले सचिव स्तर के अफसरों की पदोन्नति से न सिर्फ आईएएस बल्कि आईपीएस और आईएफएस अफसर भी चौंक गए। कुछ के पदोन्नति का समय निकट आ गया है लेकिन सरकार ने वर्ष-94 बैच के अफसरों जैसी मेहरबानी नहीं दिखाई। अभी आईएएस में वर्ष-2002 बैच के अफसर डॉ. रोहित यादव, कमलप्रीत सिंह, बृजेश चंद्र मिश्रा, अमृत खलको, दिलीप वासनिकर और हेमंत पहारे की पदोन्नति का समय निकट आ गया है। उनसे पहले  बैच के अफसरों को सितम्बर-अक्टूबर में ही पदोन्नत मिल जाती रही है लेकिन ये सभी अभी इंतजार ही कर रहे हंै। इन अफसरों में कानाफूसी की गूंज अब सीएम और सीएस तक पहुंची है। सो, अब जल्द ही इन सबों को पदोन्नति दी जा सकती है। यही हाल, आईपीएस अफसरों का भी है। आधा दर्जन आईपीएस अफसर भी इस माह के अंत तक डीआईजी बनने वाले हैं। 

    आनंद तिवारी का नया अवतार
    छत्तीसगढ़ पुलिस अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक होकर रिटायर हुए आनंद तिवारी का एक नया अवतार सामने आ रहा है। वे अब वकालत शुरू करने जा रहे हैं, और पुलिस विभाग का लंबा तजुर्बा उनके काम आएगा। फिलहाल वे हत्या के मामले में फंसे आरोपी से लेकर बैंक कर्ज में डूबी संपत्ति तक, सबको बचाने के लिए काम शुरू कर चुके हैं। हालांकि उनकी खासी मांग एसीबी और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में फंसे हुए अफसरों के बीच हो रही है क्योंकि ऐसे मामलों में बरसों तक आनंद तिवारी टेबल के दूसरी ओर छापा मारने वाले अफसर रहे हैं। छत्तीसगढ़ पीएससी के इतिहास में सबसे बड़ी खलबली मचाने वाले हाईकोर्ट ऑर्डर में भी आनंद तिवारी की जांच रिपोर्ट के पन्ने के पन्ने अदालती निष्कर्ष के रूप में दर्ज किए गए हैं, और वह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत थी। अब क्रिमिनल अदालत से लेकर लोन रिकवरी ट्रिब्यूनल तक वे मामले फाईल कर चुके हैं और नतीजे आने शुरू हो जाएंगे। 

    जोगी परिवार में चौथी उम्मीदवार...
    जाति के विवाद के चलते हुए आने वाले विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी और अमित जोगी किन सीटों से लड़ेंगे, और लड़ेंगे या नहीं। ऐसे में परिवार में दो उम्मीदवारों की संभावना बराबरी की या अधिक मजबूत दिखती है। 
    डॉ. रेणु जोगी अभी कांग्रेस की विधायक हैं, लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद अगले विधानसभा चुनाव में वे अपने पति और पुत्र की पार्टी से विधानसभा चुनाव लड़ेंगी। लेकिन उनके अलावा परिवार की बहू, ऋचा जोगी में भी बहुत से लोग एक अच्छे उम्मीदवार की संभावना देखते हैं। उनका कोई राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है, व्यक्तित्व बहुत मिलनसार है, और जहां वे जाती हैं, महिलाओं के बीच हिट साबित होती हैं। वोट मांगने बहू आई है, यह फार्मूला भी असरदार हो सकता है। 

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Posted Date : 31-Oct-2017
  • प्रेमप्रकाश का वजन घटा तो है लेकिन...
    राजस्व एवं उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं, इसलिए उनके ज्ञान का भंडार अपार है, और उनका हास्यबोध भी अच्छा-खासा है।  इन दिनों उन्होंने महीनों की खासी मेहनत से और खाने पर काबू करके अपना वजन आसमान से जमीन पर लाने में कामयाबी पाई है। लेकिन कोई मुलाकाती हैरान होकर यह कहे कि अरे आपका तो वजन बहुत कम हो गया है, तो वे तुरंत याद भी दिला देते हैं कि केवल शरीर का वजन कम हुआ है, बाकी वजन नहीं। उन्होंने खाने पर काबू करके और रोज रात घरेलू जिम पर घंटे भर पसीना बहाकर, सुबह योग करके बदन ऐसा कर लिया है कि कपड़े लगातार बेकार होते जा रहे हैं। साल भर पहले के कपड़े जब बेकार हो गए तो कुछ महीने पहले विधानसभा के किसी दौरे के लिए उन्हें फिर कपड़े सिलवाने पड़े। और अब हाल यह है कि दो-तीन महीने पहले के ये कपड़े फिर नाप बदलने दर्जी के यहां जा रहे हैं। अब वे कुछ डरे-सहमे भी हैं कि छरहरा हो जाने की साख इतनी फैल गई है कि अब उस साख की वजह से यह नया अवतार जारी रखना पड़ेगा, खासी मेहनत करके। वे इस सिलसिले में कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की इस बात को भी याद करते हैं कि वे पिछले कई दशक से 78 किलो के बने हुए हैं। 

    खेतान को वनवास
    केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से 7 बरस बाद छत्तीसगढ़ लौटे प्रमुख सचिव चित्तरंजन खेतान दोस्त और दुश्मन दोनों ही बड़ी तेजी से बना लेते हैं। अब राज्य में इन 30 दिनों में दो अफसर रिटायर हो रहे हैं, तो उनके काम किसी न किसी को तो मिलने ही थे। और इसी के इंतजार में खेतान को पिछले कुछ हफ्तों में कोई विभाग नहीं मिला था, और प्रशासनिक अकादमी में उन्हें रखा गया था। 
    अब वन विभाग मिला है तो विभाग की कुर्सी एक महीने बाद तब खाली होगी जब वर्तमान वन सचिव, खेतान के ही बैचमैट आरपी मंडल राऊत की खाली की हुई कुर्सी पर पंचायत लगाएंगे। फिलहाल खेतान की नई पोस्टिंग देखकर उनके एक जानकार के मुंह से अनायास निकला-सात बरस बाद लौटे, तो लौटते ही वनवास दे दिया गया।


    एक श्मशान की दीवार और दो मंत्री
    राजधानी रायपुर में एक पुराने श्मशान की दीवार को लेकर दो मंत्रियों के हुक्म के बीच छोटे अफसर फंस गए हैं। एक मंत्री की तरफ से यह हुक्म दिया गया कि इस दीवार को तीन दिन में तोड़ दिया जाए क्योंकि इससे पीछे एक निजी कारोबारी की निजी जमीन पर आना-जाना रूकता है। एक दूसरे मंत्री ने अपने इलाके के इस श्मशान का मामला होने से दखल देकर जब इसकी जांच करवाई तो पता लगा कि श्मशान की दीवार भी सही थी, और उससे किसी का रास्ता भी नहीं रूक रहा था। अब अधिकारी एक मंत्री के आदेश और दूसरे मंत्री की करवाई जांच-रिपोर्ट के बीच फंसे हुए हैं कि करें तो क्या करें? 

    खान-पान और शुक्ल बंधुओं की याद
    नेताओं के खाने-पीने और वजन से शुक्ल बंधु याद पड़ते हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश की राजनीति में श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल का अलग-अलग समय अलग-अलग वजहों से डंका बोलता था। दोनों ही भाई ऊंची कद-काठी के और छरहरे थे। दोनों ही खाने के खूब शौकीन, और जमकर खाने वाले थे, लेकिन बदन पर चर्बी कभी चढ़ी नहीं। आज श्यामाचरण के बेटे अमितेष शुक्ला अपने आपको पिता और चाचा दोनों का राजनीतिक वारिस कहते हैं, उन्हें उनकी बाकी कोई राजनीतिक बात मिली हो या न मिली हो, वह चर्बी जरूर मिल गई है जो कि पिता और चाचा के बदन पर कभी चढ़ी ही नहीं। अमितेष खाने के खानदानी शौकीन हैं, और दिक्कत उनकी यह है कि शरीर उन पर मेहरबान नहीं है, और वे शायद पिता के खानदान के सबसे वजनदार नेता हैं। विद्याचरण शुक्ल अपने समर्थकों के घर से आया खाना, और उनके घर जाकर खाना, दोनों के बड़े शौकीन थे। बहुत से सार्वजनिक भोज में भी विद्याचरण जब खाने बैठते थे, तो इत्मीनान से पजामे का नाड़ा ढीला कर लेते थे, ताकि खाने के बाद का पेट भी उसमें आसानी से समा सके। दूसरी तरफ श्यामाचरण शुक्ल सुबह से चाय के साथ पकौड़े और ऐसे दूसरे सामानों के साथ घंटों बातचीत के शगल में लगे रहते थे, और मुलाकातियों की खातिर में भी उनका भरोसा था, वे मिलने आने वाले लोगों के लिए अपने हाथ से टेबिल पर आई केतली से चाय बनाते थे, और बातचीत में उन्हें किसी गोपनीय चर्चा की जिक्र से भी परहेज नहीं रहता था। वे साफ दिल से तमाम बातें बताते हुए घंटों लगातार चाय पी सकते थे, और अचार के साथ पकौड़े खा सकते थे। 

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Posted Date : 30-Oct-2017
  • बात 45 साल पुरानी है। आईएएस ट्रेनिंग अकादमी मसूरी के डीजी रहे श्री भावे प्रशिक्षु आईएएस अफसरों को भ्रष्टाचार को लेकर सीख दिया करते थे। वे कहते थे कि रिश्वत लेना है तो जमकर लें और यह मानकर लें कि देर-सबेर यह लोगों को पता चल जाएगा। उनका कहना था कि रिश्वत लेने के बाद कोई अफसर ऐसा सोचता है कि यह किसी को पता नहीं चलेगा, तो बड़ी भूल है। जो आदमी रिश्वत देता है वह कितना भी भरोसेमंद हो, एक न एक जगह आपकी गाथा सुना ही देगा। इसके बाद भी रिश्वत लेने का साहस रखते हैं, तो उन्हें ऐसा करना चाहिए। उनकी सीख विशेषकर 73 बैच के तकरीबन सभी अफसरों को याद रही और वे पूरे कैरियर में ईमानदार बने रहे। इस बैच में मुख्यमंत्री के सलाहकार शिवराज सिंह, सत्यानंद मिश्रा और डीएस माथुर जैसे नामी-गिरामी अफसर रहे हैं। लेकिन समय के साथ-साथ अफसरों की सोच और काम के तरीकों में बदलाव आया है। मसूरी में किस तरह की सीख मिल रही है, यह तो पता नहीं है। लेकिन कई अफसर कैरियर के शुरूआत में ही ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैच के अंदाज में बैटिंग करने लग गए हैं। नए नवेले अफसर पैसा कमाने के नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। जिले के एक आला अफसर ने तो पैसा कमाने का नायाब तरीका निकाला है। वे पांच अलग-अलग विभागों में कागजों में किराए की गाड़ी दौड़ा रहे हैं, और पूरी राशि हजम कर रहे हैं। डीएमएफ के काम की स्वीकृति के एवज में उच्चाधिकारियों के कमीशन की रकम सुनकर तो मातहतों के भी पसीने छूट जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इनके कारनामों की जानकारी महानदी भवन तक नहीं पहुंचती है लेकिन अपने संपर्कों के चलते ज्यादातर मौकों पर कार्रवाई से बच भी जा रहे हैं।

    ऐसा सम्मान भी क्या सम्मान
    राज्योत्सव के मौके पर कम से कम एक सम्मान ऐसा भी है जिसे लेकर लेन-देन की चर्चा हवा में है। इसकी सच्चाई जरूरी नहीं है, लेकिन सार्वजनिक जीवन की नैतिकता यह कहती है कि जिस पर लेन-देन करके यह सम्मान हासिल करने की कोशिश का आरोप है, और जिन पर लेन-देन करके यह सम्मान देने का आरोप है, उन्हें अपने बारे में एक बार सोचना चाहिए। राज्योत्सव में दर्जन भर से अधिक सम्मान तय हो चुके हैं, और ऐसे में किसी ऐसे विवाद से घिरा हुआ सम्मान अपमान से अधिक कुछ नहीं हो सकता। यह एक अलग बात है कि सम्मान और अपमान की लोगों की परिभाषा अलग-अलग होती है। 

    सरोज पाण्डेय का शक्ति प्रदर्शन
    कल दुर्ग में भाजपा की दिग्गज नेता ने छत्तीसगढ़ी पारंपरिक पोशाक में सजी महिलाओं का एक बड़ा जलसा किया। इतना बड़ा सुआ नृत्य किसी ने देखा-सुना नहीं होगा जिसमें दस हजार से अधिक महिलाएं शामिल हुईं। राज्य की पूरी सत्ता भी मंच पर मौजूद थी। लेकिन कम से कम एक टीवी चैनल पर जीवंत प्रसारण में एक खास महिला को नृत्य करते दिखाने का दृश्य घंटे भर छाया रहा। लोगों में उत्सुकता है कि यह महिला कौन थी? और उसका वीडियो देखने से यह बात साफ है कि वह इस बात से वाकिफ थी कि कैमरा उसी पर टिका हुआ है। लेकिन इस महिला से परे फिर सरोज पांडेय की बात करें तो यह दुर्ग विधानसभा सीट, दुर्ग लोकसभा सीट, और पूरे छत्तीसगढ़ को ध्यान में रखते हुए किया गया एक बड़ा जलसा था। पिछले आधे बरस में कम से कम दो बार सरोज पांडेय ने अगले विधानसभा चुनाव को लेकर मुखिया के लिए अपनी सोच बिना अधिक शब्दों में कहे उजागर कर दी थी, और इसके तुरंत बाद उनको अपनी बात का खंडन भी करना पड़ा था। अगला विधानसभा चुनाव किस मुखिया के चेहरे पर लड़ा जाएगा, उसे लेकर सरोज पांडेय बार-बार एक संदेश देने की कोशिश करती हैं, और कल का उनका कार्यक्रम सुआ पर कम और सत्ता पर अधिक केन्द्रित रहा। 

    करोगबाग के धंधे सरीखी सीडी
    छत्तीसगढ़ के मीडिया के सामने इन दिनों दो तरह की सीडी परोसी सी गई है। अब यह बहस चल रही है कि इसमें से असली कौन सी है, और नकली कौन सी है। लेकिन सेक्स-वीडियो के जानकार विशेषज्ञों का कहना है कि कोई तीसरी सीडी भी आ सकती है। अब यह पूरा बाजार दिल्ली के करोलबाग इलाके में चलने वाले ऑटो पाटर््स के मार्केट की याद दिलाता है जहां पर हर पाटर््स के असली और नकली के बाद और घटिया नकली भी मौजूद रहते हैं। कोई उसे फस्र्ट डुप्लीकेट कहते हैं, तो कोई उसके बाद का सेकंड डुप्लीकेट भी कहते हैं। फिलहाल इस पूरे सिलसिले से उन शरीफ लोगों को राजनीति से हिकारत करने और दूर रहने का एक और तर्क मिल गया है कि राजनीति ऐसी ही कुत्ती चीज है। (अब उन्हें कौन बताए कि कुत्ती एक वफादार प्राणी होती है, और न तो वह अपनी नस्ल के दूसरे लोगों की सीडी बनाती, और न ही बांटती है।)

    देवेन्द्र वर्मा की पारी जारी रहेगी?
    विधानसभा के प्रमुख सचिव देवेंद्र वर्मा की सेवा अवधि अगले महीने खत्म हो रही है। विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल न चाहते हुए भी उन्हें एक-एक साल के लिए दो बार सेवावृद्धि दे चुके हैं। विधानसभा सेवा नियमों के अनुसार अध्यक्ष को अधिकतम दो साल की सेवावृद्धि ही दे सकते हैं। यानी अब सेवावृद्धि का अधिकार कैबिनेट को ही है। चूंकि इस बार मामला थोड़ा अलग है चूंकि उनके ठीक नीचे चंद्रशेखर गंगराडे प्रमोट होकर सचिव बन चुके हैं। 
    लिहाजा, वर्माजी के सेवावृद्धि की बाध्यता नहीं है। लेकिन वर्माजी ठहरे हरफनमौला, कई बार सरकार और विधानसभा अध्यक्ष तक को झंझावातों से निकाल चुके हैं। सरकार के दो प्रभावशाली मंत्रियों से उनकी निकटता जगजाहिर है। सीएम सचिवालय के वे पसंदीदा माने जाते हैं। पिछले दिनों प्रदेश दौरे पर आए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी उनके घर गए थे। तमाम राजनीतिक परिस्थितियां भी उनके अनुकूल है। ऐसे में उनके मैदान से हटने की संभावना बेहद कम है। 

    जूते-चप्पल नए नहीं थे...
    भाजपा ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के घर पर हमला किया तो अहाते में जूते-चप्पल भर दिए गए, और बाद में पुलिस कर्मचारी उनको बीनते दिखे। हैरानी की बात यह है कि किसी घर के भीतर फेंके गए जूते-चप्पलों को उठाने से लेकर किसी नेता के जलते पुतले को पानी की बोतल खरीदकर भी बुझाने तक के काम पुलिस के मत्थे पड़ते हैं। एक ही दिन पहले यही पुलिस मंत्री राजेश मूणत के बंगले के बाहर नाम की तख्ती पर पोती गई कालिख पोंछते दिख रही थी। लेकिन भूपेश के बंगले में फेंके गए एक भी जूते-चप्पल नए नहीं थे, नहीं तो किसी काम भी आ जाते। सारे के सारे जूते-चप्पल कहीं से पुराने जुटाए गए थे, शायद किसी कबाड़ी से। राजनीतिक दल अगर अपने नेताओं के अच्छे जूतों के जोड़े फेंके तो सैकड़ों गरीबों का भला भी हो सकता है।    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 29-Oct-2017

  • कांग्रेस, भाजपा और मीडिया के पेशेवर लोगों के अलावा अब इस इलाके में स्टिंग ऑपरेशन और डिजिटल फेरबदल के माहिर लोगों में यह अटकलबाजी चल रही है कि यह पूरा सीडी कांड कहां से शुरू हुआ, किसने किया, किसको फंसाया, किसने कितना भुगतान किया, और अब आगे कौन-कौन इसमें कितना भुगतेंगे। यह बहस कुछ लंबी चलेगी क्योंकि मामला रिश्वत जैसा रूखा-सूखा नहीं है, और न ही पैसों का लेन-देन का है। सेक्स और सीडी, यह नाम कुछ अधिक आकर्षक है और इस नाम से पश्चिम में एक मशहूर म्यूजिक सीडी भी बनी हुई है। फिलहाल लोगों की साजिश की अटकलें खालिस भाजपा से लेकर खालिस कांग्रेस तक, और खालिस ब्लैकमेलरों तक, सभी तरफ दौड़ रही हैं। जैसे-जैसे धुंध थोड़ी सी छंटेगी, असली गुनहगार का बेहतर अंदाज लग सकेगा। फिलहाल लोग इस बात को लेकर फिर हैरान-परेशान हैं जो कि विनोद वर्मा ने कल आधी रात रायपुर पहुंचने के बाद कही है। एक खबर के मुताबिक उन्होंने अभी तक सामने आए विवाद पर कहा है यह तो अभी तैरते हिमखंड की सतह के ऊपर की नोंक भर है, यह महज एक झलक है...। अगर यह बयान सही आया है, तो इससे कल की भाजपा और सरकार की एक बैठक में उठी यह बात फिर गंभीर हो जाएगी कि आज अगर एक मंत्री पर लगे आरोपों पर बाकी मंत्री या संगठन साथ नहीं देंगे, तो जब उनकी बारी आएगी तो वे अकेले रह जाएंगे। विनोद वर्मा के एक लाईन के ताजा बयान से फिर खलबली मची हुई है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या...।

    ब्राम्हण से वैष्णव को मछली का ऑफर
    महापौर प्रमोद दुबे इन दिनों टेंशन में हैं। वजह यह है कि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के भतीजे राजीव वोरा को मछली खाने का ऑफर दे दिया। इसके बाद से राजीव, महापौर से बेहद नाराज बताए जा रहे हैं। हुआ यूं कि कुछ दिन पहले पूर्व पार्षद आनंद कुकरेजा के यहां रात्रिभोज का कार्यक्रम था। पार्टी में महापौर सहित कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेता आए थे। खाने में वेज-नॉनवेज, दोनों का इंतजाम था। एक ही टेबल में प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल, महापौर दुबे और राजीव के साथ अन्य नेता भोजन का लुफ्त उठा रहे थे। तभी वहां कुछ लोगों ने मछली खाने की फरमाइश कर दी। वेटर जैसे ही मछली लेकर आया, तभी हास परिहास के बीच प्रमोद  दुबे ने राजीव को देने का इशारा कर दिया। राजीव ठहरे पुष्टिमार्गी वैष्णव, सो महापौर पर भड़क गए। बात यही नहीं रूकी, महापौर ने उन्हें यह कह दिया कि घर में नहीं बाहर तो सब चलता है। इसके बाद राजीव ने महापौर को जमकर खरी-खोटी सुनाई। अब पार्टी संगठन में बदलाव होना है। राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्री वोरा अपने भतीजे की खूब सुनते हैं। ऐसे में महापौर का टेंशन में आना लाजिमी है। वे यहां रायपुर पश्चिम से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं और इसके लिए पसंद का जिला अध्यक्ष चाहते हैं। कुल मिलाकर वोराजी की मदद के बिना उनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकती। ऐसे में राजीव को मनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। लेकिन राजीव  हैं कि मान नहीं रहे हैं। 
    बैजेन्द्र के कमरे की चाह
    आईएएस बैजेन्द्र कुमार एनएमडीसी के मुखिया के पद पर चले गए तो उनका बड़ा सा दफ्तर खाली हो गया है। उनके दफ्तर को देखकर मुख्य सचिव का दफ्तर भी फीका लगता था, और यह दफ्तर मुख्यमंत्री के दफ्तर की टक्कर का है। यह दरअसल मुख्यमंत्री के लिए ही बना था, लेकिन फिर वास्तु की कुछ गड़बड़ी पता लगी, और मुख्यमंत्री को मंत्रालय में दूसरे कमरे में बिठाया गया। और यह आलीशान कमरा बैजेन्द्र कुमार को मिला। इस दफ्तर में एक निजी टैरेस गार्डन भी है और आराम करने का कमरा भी है। 
    चूंकि मुख्यमंत्री इसमें नहीं बैठे और उनके लिए वह कमरा ठीक माना गया जो कि मुख्यमंत्री सचिवालय में बैजेन्द्र कुमार के लिए सोचा गया था, इसलिए उसी मंजिल पर यह अदला-बदली हो गई। और यह इंतजाम दोनों के लिए अच्छा रहा, मुख्यमंत्री उस कमरे में कामयाब रहे, और बैजेन्द्र कुमार उस दूसरे कमरे से निकलकर देश के एक सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर के मुखिया होकर गए। अब खाली हो चुके इस कमरे में बैठना तो बहुत से अफसर चाहते हैं, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अफसर ने समझा दिया है कि अब समय किसी कमरे की लालच का नहीं रह गया है, काम करने का रह गया है, भिड़कर काम करें। नतीजा यह है कि अब किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही है कि इतनी शान-शौकत की फरमाईश करें। 

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Posted Date : 28-Oct-2017
  • सीडी में चेहरे अपनी महिलाओं के हों तो?

    एक सेक्स-सीडी बहुत सारे बवाल खड़े कर देती है। एक आदमी और एक औरत की ऐसी सीडी या वीडियो क्लिप सामने आ जाए जिसमें चेहरा पहचानना कुछ मुश्किल हो तो दुष्टात्माओं की बन आती है। वे ऐसी क्लिप के चेहरों या बदन के साथ तरह-तरह के नामों की अटकल लगाकर उसे फैलाना शुरू कर देते हैं। शुक्रवार की सुबह से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जो सेक्स सीडी चल निकली, उसमें आदमी का नाम तो तोहमतों में सुबह से चल ही रहा था, उसमें महिला कौन है इस बारे में दोपहर तक करीब आधा दर्जन नाम वॉट्सऐप पर इस अखबार को मिल चुके थे, और कुछ भले इंसानों ने नामों को तलाशने की दिक्कत घटाने के लिए उन नामों के फेसबुक पेज भी ढूंढकर, साथ में जोड़कर भेज दिए थे। माहौल ऐसा था कि जिसको जिस महिला से हिसाब चुकता करना था, उसने उसका नाम जोड़कर, उसकी दूसरी तस्वीरें लगाकर फैलाना शुरू कर दिया। ऐसे लोग बहुत ही ज्ञानी-विद्वानी रहे होंगे क्योंकि वीडियो में जिसका सिर्फ बदन दिख रहा है, और बाकी तस्वीरों में जिसका सिर्फ चेहरा दिख रहा है, उसका भी रिश्ता कायम करके लोगों ने अच्छा-खासा पुराना-पुराना हिसाब निपटा दिया। लोगों को यह समझ नहीं आया कि जिस रफ्तार से वे कई बेकसूर लोगों को बदनाम कर रहे हैं, उसी रफ्तार से अगर उनके घर की महिलाओं के नाम कोई फैलाए, तो क्या होगा?
    आदिवासी राज्य में संस्कृति के लिए आदिवासी नहीं!
    छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग को देखें तो लगता है कि यह किसी और राज्य का संस्कृति विभाग है। यह राज्य तो एक तिहाई आदिवासी आबादी वाला राज्य है। और जब कभी इस राज्य के बाहर यहां की संस्कृति पेश करनी होती है, तो सबसे पहले सरकार को केवल आदिवासी संस्कृति दिखती है, आदिवासी लोककला दिखती है। लेकिन जब संस्कृति विभाग के संचालक नियुक्त करने हों, तो इन 17 बरसों के दो मुख्यमंत्रियों की सरकारों के चलते एक भी आदिवासी अफसर नहीं मिल पाया है। करीब आधे से अधिक वक्त तो ब्राम्हण अफसर संचालक रहे, और बाकी का समय अनुसूचित जाति, या पिछड़े वर्ग के अधिकारियों को मिला। आदिवासी-संस्कृति-संपन्न राज्य में संस्कृति-संचालक रहे दर्जन भर अफसरों में से एक भी अफसर आदिवासी संस्कृति का न जानकार रहा न आदिवासी तबके से आया, और न किसी ने आदिवासी संस्कृति को बढ़ाने का ही काम किया। और तो और, राज्य में आदिवासी मुद्दों की राजनीति करने वाले लोगों को भी कभी इसकी कमी नहीं खली, चाहे वे अजीत जोगी हों, या फिर भाजपा के तीन दिग्गज आदिवासी मंत्री हों। 
    छोटा जुर्म, बड़ा अफसर
    राजधानी रायपुर के आईजी और एसपी को किसी प्रेस कांफे्रंस में देखें, तो मीडिया के कैमरों के सामने कब कौन बोले, और कब कौन चुप रहे, इसे पहले से तय करके आना चाहिए। आज की सबसे चर्चित सेक्स-सीडी वाली पे्रस कांफे्रंस में पुलिस ने क्या किया, क्यों किया, कैसे किया यह बताते हुए ये दोनों अलग-अलग सवालों पर कुछ अलग-अलग भी बोलते रहे, और कई बार एक साथ दोनों भी बोलते रहे। एक बहुत मामूली शिकायत पर बिजली की रफ्तार से हुई कार्रवाई में केवल अश्लील सीडी पकड़ाने के मामले की पे्रस कांफे्रंस में आईजी ने मौजूद रहकर उसका महत्व बढ़ा दिया, और सरकार की इस मामले में अधिक दिलचस्पी की चर्चा शुरू कर दी। यह कुछ वैसा ही हुआ कि मानो किसी थाने की पे्रस ब्रीफिंग में अखबार के प्रधान संपादक पहुंच जाएं, और उससे मामले में अखबार की अतिरिक्त दिलचस्पी दिखने लगे। बड़े अफसरों के छोटे मामलों से दूर रहना भी सीखना चाहिए, खासकर ऐसे मामलों से जिनमें सत्तारूढ़ लोगों के नाम जुड़े हुए हों। 
    सीडी इतनी बंटीं, कि हिसाब नहीं...
    सेक्स-सीडी पकड़ाई तो दिल्ली में, और वहां कॉपी तैयार करने वाले सीडी राईटर सेंटर ने यह कहा कि उससे हजार कॉपियां तैयार करवाई गई थीं, और उसमें से 5सौ सीडी दिल्ली में विनोद वर्मा के घर जब्त होना बताया गया। लेकिन जब यह खबर फूट ही गई, तो रायपुर में सुबह-सुबह से कांगे्रस के नेताओं ने जिस रफ्तार से और जिस बड़े पैमाने पर यह सीडी बांटना शुरू किया, तो उससे लगा कि बाकी 5सौ सीडी पहले ही रायपुर आ चुकी थी। दोपहर तक हाल यह था कि वॉट्सऐप टेक्नॉलॉजी ने कब्जा कर लिया था, और सीडी कोई लेने वाला नहीं था। वैसे भी अब कम्प्यूटरों में डीवीडी ड्राईव खत्म होते चले गए हैं, और सॉफ्टकॉपी के अलावा बाजार में और कुछ आगे नहीं बढ़ता। 
    मुसीबत में सब साथ...
    परेशानी के इस मौके पर छत्तीसगढ़ के रायपुर में मौजूद तमाम मंत्री, और प्रदेश भाजपा के सारे दिग्गज नेता एकजुट दिखे। सुबह तक सीडी में एक से अधिक लोगों के वीडियो होने की चर्चा थी, जो कि शाम तक चलती रही। इस एकजुटता को देखकर लोगों को लगा कि चुनाव तक पता नहीं और कितने किस्म की सीडी सामने आए, और ऐसे में आज से ही एकजुट होकर चलना ठीक है। भाजपा के एक नेता ने कहा कि यह तो कांगे्रस की सीडी का हाल है, अभी तो असली सीडी-पार्टी ने असली माल संभालकर रखा हुआ दिखता है, वह जब सामने आना शुरू होगा, तो उसके लिए पार्टी को तैयार रहना होगा।

    पहला विशुद्ध जोगीमुक्त सीडी कांड
    सेक्स-सीडी को लेकर कांगे्रस और भाजपा के बीच अलग-अलग किस्म के तनाव चल रहे हैं, और अलग-अलग खतरे हैं। लेकिन इसके बीच भी चुटकियां लेने वाले लोग शांत नहीं बैठ सकते। एक जानकार ने कहा- 'यह छत्तीसगढ़ का ऐसा पहला सीडी कांड है जिसमें जोगी परिवार कहीं से भी जुड़ा हुआ नहीं है।' बात सही भी है क्योंकि दिलीप सिंह जूदेव की सीडी से लेकर बलीराम कश्यप से विधायक खरीदने की सीडी तक, और अंतागढ़ में विधायक-प्रत्याशी बेचने तक की सीडी से, हर एक से जोगी परिवार का नाम जुड़े ही रहा। यह चर्चा चल ही रही थी कि एक जानकार ने नहले पे दहला जड़ा, और कहा- इन लोगों को न विधायक खरीदना आता है, न बेचना आता है। खरीदने जाते हैं तो पकड़ा जाते हैं, और बेचने जाते हैं, तो भी पकड़ा जाते हैं। 

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