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आजकल : एकदम खरी हिन्दी की जिद क्षेत्रीयता खत्म न कर देगी?
16-Aug-2020 3:17 PM 215
आजकल : एकदम खरी हिन्दी की जिद क्षेत्रीयता खत्म न कर देगी?

अखबारनवीसी में बहुत से पुराने लोग बड़े कट्टर होते हैं। आजकल कुछ अखबारों में जिस तरह हिंग्लिश छपती है, उसे देखकर वे कब्र या पंचतत्व में भी बेचैनी से करवटें बदलते होंगे। बहुत से लोग खालिस हिन्दी को लेकर, बहुत से लोग व्याकरण को लेकर इतने कट्टर रहते हैं कि अंग्रेजी में उनके लिए एक बड़ा माकूल शब्द किसी ने काफी पहले से उछाला हुआ है- ग्रामर नाज़ी। जिस तरह हिटलर और उसकी नाज़ी सेना जर्मन आर्य रक्तशुद्धि पर अड़े रहते थे, कुछ उसी तरह लोग व्याकरण या ग्रामर को लेकर भी अड़े रहते हैं। एक-एक हिज्जे को लेकर, एक-एक उच्चारण को लेकर बड़ी लंबी बहस होती है, और अखबारी जुबान की बखिया उधेड़ दी जाती है। 

ये सारी बातें कम से कम हिन्दी में एक उस खड़ी बोली के व्याकरण के मुताबिक की जाती हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रीय लोकभाषाओं, और बोलियों से निकलकर बनी है, और जिसका व्याकरण एक फौलादी ढांचा बना दिया गया है। हिन्दी जिन क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों से निकली है, उन्हें अगर देखें तो अलग-अलग प्रदेशों के अखबारों में उसकी झलक दिखती है। बहुत से लोग एकदम खरी और सही हिन्दी बोलते हैं, लिखते हैं, लेकिन बहुत से लोग जो कि क्षेत्रीय भाषाओं से उठकर अखबारनवीसी में पहुंचे हैं, उनकी भाषा में खड़ी बोली के ग्रामर के पैमाने पर काफी गलतियां निकाली जा सकती हैं। 

मेरा निजी तौर पर यह मानना रहा है कि लोग अगर सही व्याकरण लिख सकते हैं, तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन आसपास के तमाम लोग सही व्याकरण लिखें, ऐसा आग्रह उन्हीं जगहों पर करना ठीक है जो कि भाषा और व्याकरण पढ़ाने की जगहें हैं। क्लासरूम की पढ़ाई में शिक्षक का व्याकरण ठीक हो, यह बात तो ठीक है, लेकिन साधारण जानकारी के लिए जो अखबार पढ़े जाते हैं, उनमें लिखने वाले लोग अगर व्याकरण की कुछ गलतियां भी करते हैं तो उन्हें इस बात के साथ जोडक़र ही देखना चाहिए कि अखबारनवीसी की बाकी खूबियां उनमें कैसी हैं? 

सौ फीसदी खरी हिन्दी लिखने वाले लोग अगर सामाजिक सरोकारों में कमजोर हों, अगर उनकी राजनीतिक चेतना कमजोर हो, तो फिर उनकी खरी हिन्दी अखबारनवीसी में कोई बड़ी खूबी नहीं है। बड़ी खूबी तो सरोकार और चेतना, समझ और इंसाफ की फिक्र होनी चाहिए, और इसके साथ-साथ भाषा ठीक हो तो ठीक है, कुछ मामूली गलतियां हों, तो कोई मायने नहीं रखतीं। 

दरअसल एकदम खालिस जुबान की अगर बात करें, तो हिन्दुस्तान में हिन्दी अखबार और बाकी मीडिया में काम करने वाले बहुत से लोग किनारे लग जाएंगे। अखबारी पाठक खुद भी बहुत सी बातों को समझ लेते हैं, और उनको अगर कुछ गलतियां खुद भी सुधारकर पढऩा पड़े, तो उनका जानकार दिमाग ऐसा करते रहता है। यह बात सांस लेने की तरह है जो कि अच्छी और बुरी गंध के बीच भी अपना काम करना जानती है। 

एकदम ही शुद्ध जुबान कुछ शास्त्रीय संगीत की तरह होती है जिसमें एक-एक स्वर को लेकर एक ठोस ढांचा रहता है। अलग-अलग रागों में अलग-अलग स्वर की बड़ी कट्टर बारीकियां रहती हैं। और व्याकरण की कक्षा में, व्याकरण की किताब में तो भाषा की ऐसी कट्टर बारीकी जरूरी है, लेकिन असल जिंदगी की दौड़-भाग के बीच आपाधापी में तैयार अखबार या खबर ऐसी कट्टरता के साथ चले यह जरूरी नहीं है। 

भाषा तो महज एक औजार है, एक की बातों को दूसरे तक पहुंचाने का औजार, या एक की बातों को कई तक पहुंचाने का औजार। दुनिया में ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जिनमें लोग किसी भाषा को ठीक से जाने बिना भी अपना काम चला लेते हैं। मैं किसी भी कोने से यह नहीं सुझा रहा हूं कि अखबारों की कोई जुबान ही नहीं होना चाहिए, लेकिन यह जरूर सुझा रहा हूं कि क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के असर वाली जो हिन्दी है, उसे कला में लोककला की तरह ही मंजूर करना चाहिए। उसे खारिज करने का मतलब बहुत से लोगों को ही खारिज करना हो जाएगा जो कि शास्त्रीय हिन्दी में महारत हासिल नहीं कर पाते। 

एक वेबसाईट पर अभी ऐसी कई दर्जन बड़ी दिलचस्प और मजेदार मिसालें पोस्ट हुई हैं जिनमें लोग किसी भाषा को जाने बिना किस तरह अपना काम चलाते हैं। अलग-अलग लोगों ने अपने तजुर्बे सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हैं। एक ने लिखा है कि उसके फ्रेंच दोस्त को ढक्कन शब्द का अंग्रेजी याद नहीं रहा, उसने अपना काम चला लिया यह कहकर- इसका हैट कहां है? 

अंग्रेजी में डिग्री पाई एक महिला मशाल के लिए अंग्रेजी शब्द भूल गई थी, उसने इंटरनेट पर यह लिखकर उसे ढूंढ लिया- एक डंडे पर आग। 

इसी तरह किसी के स्विस बॉयफ्रेंड को बछड़े या बछिया के लिए अंग्रेजी शब्द काफ याद नहीं पड़ा तो उसने पपी-काऊ कहकर काम चला लिया, यानी गाय का पिल्ला।
एक किसी ने अपने खुद के बारे में लिखा है कि उसे गिनने के लिए अंग्रेजी शब्द काऊंटिंग याद नहीं पड़ रहा था, तो उसने-डू द नंबर अल्फाबेट, कहकर काम चला लिया। 

एक और मजेदार मिसाल है कि एक आदमी मुर्गी का अंग्रेजी शब्द भूल गया, तो दुकानदार से उसने अंडे की तरफ इशारा करके पूछा कि इसकी मदर किधर है? 

एक महिला माचिस के लिए फ्रेंच शब्द भूल गई, तो उसने दुकानदार से कहा- लकड़ी की छोटी डंडियां जिससे आग लगती है। और दुकानदार जान गया कि वह माचिस चाहती है। 

किसी को रात शब्द का अंग्रेजी याद नहीं पड़ा तो उसने डार्क टाईम कहकर काम चला लिया, किसी को अंग्रेजी का सैंडविच नहीं सूझा तो उसने डबलरोटी पर खाना, और ऊपर डबलरोटी कहकर अपनी बात समझा दी। 

एक गैरइटैलियन को दूध का इटैलियन शब्द याद नहीं पड़ा, तो उसने काऊ-जूस कहकर काम निकाल लिया, सामने वाले को समझ आ गया कि उसे दूध चाहिए। 
एक को जब यह याद नहीं पड़ा कि आधी रात को मिडनाईट कहा जाता है तो उसने नाईटनून कहकर काम चला लिया। 

इन मिसालों का सीधे-सीधे अखबारनवीसी से कोई लेना-देना नहीं है, सिवाय यह बताने के कि भाषा कभी रोड़ा नहीं होती, भाषा तो बस अपनी बात पहुंचाने के लिए एक गाड़ी की तरह होती है, जो लडख़ड़ाकर भी चल सकती है।

फिर हिन्दुस्तान जैसे दर्जनों भाषाओं और सैकड़ों बोलियों वाले देश में यह भी याद रखने की जरूरत है कि स्थानीय बोलियों का व्याकरण कहीं हावी रहेगा, और कहीं उन बोलियों के शब्द भी। इनकी सीमाएं भी न तो सूबों की सीमाओं की तरह नक्शों पर दर्ज हैं, और न ही अखबार इन सरहदों तक सीमित रहते हैं। किसी एक बोली के इलाके के अखबारनवीस हिन्दी के अखबार में छपकर किसी दूसरी बोली के इलाके तक भी जाते ही हैं। इसलिए भाषा की शुद्धता का मतलब लोगों को उनकी स्थानीयता से काटकर, व्याकरण की अग्निपरीक्षा से गुजारकर एक खास कैरेट के सोने की तरह बनाना हो जाएगा। जिस तरह हिन्दुस्तानी जुबान का इस्तेमाल किसी भी एक भाषा के मुकाबले अधिक असरदार और बेहतर है, उसी तरह स्थानीयता का असर भाषा में खोट नहीं है, वह खूबी है, और उसे खूबी की तरह ही लेना चाहिए। अखबार की जुबान का इतना बेरहम होना जरूरी नहीं है कि क्षेत्रीय अखबारों के अधिकतर काम करने वाले कमजोर साबित होने लगें। जिस तरह किसी मछली को पेड़ पर चढऩे का काम देकर उसे बड़ी आसानी से नालायक और नाकामयाब साबित किया जा सकता है, उसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों को एकदम खरी खड़ी बोली वाली हिन्दी के लिए कहना उन्हें अखबारनवीसी में नाकामयाब करना होगा। महारत वाली जुबान रखने वाले लोगों को ग्रामर-नाजि़यों की तरह बेरहम नहीं होना चाहिए।

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