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इंसान, और जानवर की मिसालें
18-Jul-2021 1:42 PM (99)
इंसान, और जानवर की मिसालें

सोशल मीडिया पर हर दिन कई समझदार दिखते लोगों का लिखा हुआ पढऩे मिलता है जिसमें इंसान की घटिया हरकतों, इंसान के तरह-तरह के जुर्म में इनको कोसने के लिए जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है। कहीं भेड़ की खाल ओढ़े हुए भेडि़ए का जिक्र होता है, तो कहीं आस्तीन के सांप का, तो कहीं रंगे सियार की बात होती है, तो कहीं घडिय़ाल के आंसुओं की। जानवरों के बारे में बड़ी मामूली सी जानकारी रखने वाले भी इस बात को जानते हैं कि इंसान अपनी खुद की कमीनगी को जानवरों की कुछ एक काल्पनिक खामियों के साथ जोडक़र मानो अपने पर लगी तोहमत को घटाना चाहते हैं।

अब इंसानों के किए हुए कामों को देखें तो लगता है कि जानवरों में भला कौन हैं जो ऐसे काम करते हैं? एक भी मिसाल जानवरों में ऐसी नहीं मिल सकती जो इंसानों की कमीनगी का मुकाबला कर सके। अब आज की एक खबर है कि उत्तर भारत के किसी एक गांव में एक बाप-बेटी खुले खेत में सेक्स कर रहे थे और लोगों ने घेरकर उनका वीडियो बनाया, उन्हें वहां से भगाया तो वह लोगों पर पथराव करने लगे। अब उनकी हिफाजत के लिए गांव में उनके घर के बाहर पुलिस तैनात की गई है वरना यह खतरा है कि गांव के लोग उन पर हमला कर सकते हैं। कल या परसों एक दूसरी खबर थी कि एक बेटे ने अपनी मां को मारकर उसकी किडनी और अंतडिय़ाँ बाहर निकाल लीं। अखबार में बैठे हुए यह भी समझ नहीं पड़ता कि इस तरह की हिंसा या इस तरह के जुर्म की कितनी खबरें छापी जाएं, उन खबरों में कितना खुलासा किया जाए। क्या उससे समाज को सावधान होने का मौका मिलेगा या इन खबरों का ही समाज पर बुरा असर पड़ेगा, यह तय करने में मुश्किल होने लगती है। जानवरों में कौन से ऐसे हैं जिनमें इस तरह की मिसालें मिल सकें?

इंसान कैसा-कैसा करते हैं, इसकी एक मिसाल कुछ सौ बरस पहले की अभी पढऩे मिली जब कोरोना से बचाव के लिए टीकों की खबर के साथ-साथ वैक्सीन के इतिहास पर भी छपा, और पढऩे मिला। इतिहास का ऐसा ही एक पन्ना 1803 के बरस का है जब दुनिया भर में स्मॉलपॉक्स बहुत बुरी तरह फैला हुआ था, और वह लोगों को बड़ी संख्या में मार भी रहा था, साथ-साथ उनके बदन पर गहरे दाग छोड़ रहा था, कई लोगों की आंखें खराब कर दे रहा था। वैसे में 1796 के आसपास एक ब्रिटिश डॉक्टर ने स्मालपॉक्स के संक्रमण से बचाव की एक तरकीब ढूंढी, और उसने यह पाया कि एक दूसरा संक्रमण कॉउपॉक्स ऐसा है जिससे संक्रमित लोगों को स्मालपॉक्स नहीं हो रहा था। उसने लोगों को स्मालपॉक्स संक्रमण से बचाने के लिए कॉउपॉक्स के वायरस देने शुरू किए, और ऐसे दुनिया की पहली वैक्सीन सामने आई।

इसका तरीका भी बड़ा आसान था, जिन लोगों को कॉउपॉक्स से संक्रमित किया जाता था, उनके बदन पर 9-10 दिनों में कुछ फोड़े हो जाते थे, और दूसरे लोगों के बदन में खरोंच लगाकर उन फोड़ों का पानी निकाल कर उन्हें छुआ दिया जाता था, तो वे लोग भी कॉउपॉक्स से संक्रमित हो जाते थे, लेकिन स्मालपॉक्स के संक्रमण से बच जाते थे जो कि जानलेवा और बहुत अधिक खतरनाक संक्रमण था।

अब इसमें दिक्कत यह आ रही थी कि संक्रमित लोगों के फोड़ों से निकलने वाला पानी बहुत दूर तक नहीं ले जाया जा सकता था। उसे कुछ सौ किलोमीटर ले जाते हुए भी उसका असर खत्म हो जाता था। ऐसे में यूरोप से अमेरिका अगर यह संक्रमण ले जाना हो ताकि अमेरिका में बुरी तरह फैले हुए स्मालपॉक्स का संक्रमण रोका जा सके, तो उसकी कोई तरकीब नहीं निकल रही थी। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है विज्ञान का एक तकनीक से रिश्ता होता है इंसानियत से नहीं, इसलिए स्पेन के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने एक तरीका निकाल लिया। यह अनोखा प्रयोग था लेकिन उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया।

1803 में स्पेन के राजा की इजाजत से वहां के दो दर्जन अनाथ बच्चों को छांटकर एक जहाज पर सवार किया गया। राजा की सोच जनकल्याणकारी थी इसलिए उसने इन बच्चों के खाने-पीने का और इनके रखरखाव का अच्छा इंतजाम किया। जहाज के रवाना होने के ठीक पहले डॉक्टरों ने इनमें से दो बच्चों के शरीर में कॉउपॉक्स का संक्रमण डाल दिया। समंदर में सफर के बीच नौ-दस दिनों में इन दो बच्चों की बाहों पर लगाए गए इस टीके के जख्म फोड़ों में तब्दील हो गए और जहाज पर तैनात डॉक्टरों ने इन्हें फोडक़र इसमें से पानी निकालकर दो दूसरे बच्चों की बाहों में खरोंच लगाकर उसमें इसका संक्रमण डाल दिया। अगले नौ-दस दिनों के बाद ये दो बच्चे अपने संक्रमित फोड़ों के साथ तैयार थे, और फिर यही सिलसिला तब तक चलते रहा जब तक जहाज अमेरिका नहीं पहुंच गया। अमेरिका पहुंचने पर सिर्फ आखिरी बच्चे की बाहों में एक फोड़े में पानी था, और डॉक्टरों ने जहाज से उतरते ही उससे संक्रमित पानी निकाल कर दूसरे बच्चों का टीकाकरण शुरू कर दिया जिन पर कि स्मालपॉक्स का खतरा दूसरी उम्र के लोगों के मुकाबले अधिक था। अब अगर देखा जाए कि ये अनाथ बच्चे बिना किसी की इजाजत के इस तरह से वैक्सीन खच्चर की तरह इस्तेमाल किए गए, और इनमें से कुछ बच्चे जहाज पर मर भी गए। तो आज वैक्सीन के कारखानों से निकलकर फ्रीजर जैसी गाडिय़ों में लदकर वैक्सीन दूर-दूर तक जाती है, और एक वक्त यह काम इन अनाथ बच्चों से करवाया गया जिन्होंने इन वैक्सीन को अपने बदन में ढोया, और अपनी जिंदगी की कुर्बानी दी।

जो लोग बात-बात पर इंसान की खामियों के लिए जानवरों की मिसालें ढूंढ लेते हैं, उन लोगों को चाहिए कि इंसान की इस कमीनगी के टक्कर की कोई मिसाल जानवरों में ढूंढकर बताएं। पंछी भी हजारों किलोमीटर उडक़र कई देश पार करके हर बरस किसी एक देश पहुंचते हैं, और मौसम बदलने पर फिर वापस अपने देश आ जाते हैं, लेकिन न वे इंसानों की तरह किसी दूसरे जानवर की पीठ पर सवार होकर आते हैं, और न ही आते जाते हुए किसी दूसरे का हक का खाते हैं। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि दुनिया के इतिहास में उसके हर दौर में इंसान जितने तरह के बुरे काम करते रहा है, उसकी कोई मिसाल इंसानों से परे कहीं देखने नहीं मिलेगी। दुनिया का इतिहास जुल्म से भरा हुआ है और हर जुल्म के लिए महज इंसान जिम्मेदार रहे हैं।

अपने आसपास के लोगों को कैदी बनाकर गुलाम बनाकर उन्हें बाजारों में नीलाम करना, उनसे जानवरों या मशीनों की तरह काम लेकर उन्हें खत्म कर देना, और उन्हें फेंक कर फिर से दूसरे गुलाम खरीद लेना ऐसे कितने ही काम बड़े आम तरीके से इंसान करते हैं।
 
अभी हाल के बरसों तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तक जापान ने कई दूसरे देशों में अपनी फौज के लोगों के लिए वहां की स्थानीय लड़कियों और महिलाओं को रखकर चकलाघर बना दिए थे, और उनका मनचाहा शोषण करने के बाद सैनिक अपने देश लौट आए वहां पर अपनी एक अगली पीढ़ी छोडक़र। ऐसा ही अमेरिकी फौजियों ने वियतनाम में किया था, ऐसा ही तालिबान आज अफगानिस्तान में कर रहे हैं जहां वे विधवाओं और लड़कियों की लिस्ट बनाकर विधवाओं को अपने सैनिकों के हवाले कर रहे हैं ताकि वे उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकें। खूब बढ़-चढक़र जानवरों के खिलाफ लिखने वाले इंसानों को जानवरों में ऐसी कोई मिसाल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए और नाकामयाब होने पर कम से कम आगे जानवरों के खिलाफ अपनी हैवानियत नहीं दिखानी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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