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बाबा की हसरत थी उनका एक मोबाइल थियेटर हो! मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर से एक मुलाकात
09-May-2021 2:59 PM (37)
बाबा की हसरत थी उनका एक मोबाइल थियेटर हो! मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर से एक मुलाकात

 

रंगमंच और संगीत में अपनी गहरी अभिरूचि और सक्रियता के चलते देश-देशांतर में पहचान और प्रसिद्धि के नए शिखर तय करने वाली नगीन तनवीर के लिए अभिनय तथा गायन अभिव्यक्ति का प्रमुख जरिया रहे हैं. अपने रंगकर्मी पिता हबीब तनवीर और माँ मोनिका मिश्र तनवीर से कला के बुनियादी संस्कार उन्होंने हासिल किए और बाद में संगीत विदुषी शर्वरी मुखर्जी, दीपाली नाग, सुलोचना बृहस्पति और ध्रुपद गायक गुंदेचा बंधुओं से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विभिन्न गान-शैलियों का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया. छत्तीसगढ़ी लोक शैली से जुड़े ’नया थिएटर’ की सैकड़ों नाट्य प्रस्तुतियों के रंग संगीत ने नगीन को लोक और जनजातीय परंपरा के गायन से परिचित कराया.

नगीन के पास प्रकृति से मिले कंठ की अलग खनक और माधुर्य तो है ही, सिद्ध गुरुओं से अर्जित तालीम तथा अभ्यास की पूंजी भी है जो उनके संगीत-संज्ञान को समृद्धि करती है. पंजाब विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर नगीन को कोलकाता के रंग समूह रन’ द्वारा निर्मित डांस थिएटर पीस क्रासिंग’ में उनके संगीत संयोजन के लिए बेस्ट इनोवेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया. नगीन के पास माँ-पिता की समृद्ध विरासत है और खुद की दिलचस्पी और तालीम के चलते उनका मन संगीत में रमता है. हबीबजी के निधन के बाद दोहरी जिम्मेदारी ने नगीन को नया थिएटर’ और खुद के कलात्मक वजूद को लेकर नए सिरे से सोचने पर विवश किया है.

विनय उपाध्याय : हबीबजी के खानदान में जब आप पैदा हुईं, जाहिर है कि तब तक हबीब जी अपनी यात्रा के बहुत सारे कदम नाप चुके थे. नया थियेटर’ का स्वप्न आकार ले चुका था, उनकी अपनी ख्याति सारी देश-दुनिया में फैल ही चुकी थी. आपने जब अपनी समझ की आँखें खोलीं, तो आपको कैसा परिवेश दिखाई दिया, क्या महसूस किया आपने.

नगीन तनवीर : तब मैं बहुत छोटी थी और मुझे लगा कि जिन्दगी बहुत अच्छी है. संगीत, हँसी और मजा यही जिन्दगी है. ये पहला इम्प्रेशन पड़ा. एक बच्चे के जेहन में जो इम्प्रेशन होता है वो इम्प्रेशन. बहुत स्ट्रांग इम्प्रेशन पड़ा. वो यह था कि संगीत ही जिन्दगी है. इसमें बड़ा मजा है.
विनय : नृत्य और संगीत आपके जीवन में तब आया, जब इनकी ठीक से समझ भी नहीं थी, लेकिन ये भीतर का आनन्द था. ये पता लगना कि ये जो कुछ भी है आपके भीतर भी है आसपास भी है. इसको लेकर कहीं बहुत दूर तक जाने का और लगातार इसमें बने रहने का भी कहीं न कहीं एक सिलसिला आपके साथ बनेगा. हबीब जी और मोनिका जी की बेटी होने के नाते बहुत सारे कलाकार जो आपके घर आवाजाही बनाये रहे. ये जो थियेटर के साथ रिश्ता बनाने का संयोग आया वह बड़ा ही रोचक होगा.

नगीन : ऐसा कॉन्शस्ली इंसान सोचता नहीं है कि इसका भविष्य क्या होगा और ये कहाँ तक लेकर जायेगा, लेकिन इस रंगयात्रा में बहुत अच्छा माहौल था. घर में थियेटर का माहौल था. पहले तो छत पर रिहर्सल होती थी. हमारे छत्तीसगढ़ी कलाकार छत पर खाना-वाना पकाते थे. फिर साउथ एवेन्यु गये, जब हबीब साहब मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट हुए तो ड्राइंग-रूम में रिहर्सल होती थी. इस तरह का पढ़ने-लिखने का, संगीत और थियेटर का वातावरण था. इस तरह से नहीं सोचा कि इसका आगे तक गहरा रिश्ता बनेगा, बस, मजा आता था.

विनय : जैसे एक छोटी उमंग होती है कि मैं मैदान में कुछ खेलने चली जाऊँ, मैं छोटी-सी गुड़िया बनाऊँ, लेकिन मसरूफ माँ-बाप हैं, जो पूरी तरह से रंगमंच को समर्पित हैं. इन सारी चीजों के बीच आपका बचपन बीता और उस ने क्या अपने लिए अर्जित किया.

नगीन : माँ-बाप मुझे लेकर रिहर्सल में जाते थे और कभी-कभी घर पर भी छोड़ देते थे. आया थी घर में. म्यूजिकल कान्सर्ट होता था वहाँ लेकर जाते थे तो क्लासिकल आर्टिस्टों को मैंने सुना. बेगम अख्तर को मैंने पर्सनली स्टेज पर सुना. कुमार गन्धर्व जब कम उमड्ड के थे तब उनको मैंने सुना. जब माता-पिता ने देखा कि इसको म्यूजिक में इन्ट्रेस्ट है तो वो उस तरह से फिर मुझे प्रोत्साहित करते रहे और फिर मैंने तालीम भी लेना शुरू की. आठ साल की उमड्ड में ख्याल की तालीम. इस तरह से कला का सिलसिला शुरू हुआ. जब आदिवासी कलाकार आते थे. वहाँ भी पिताजी मुझे लेकर जाते थे. मैं उन्हें बाबा’ कहती थी। वेस्टर्न म्यूजिक, दिल्ली में सुना. पहले हर साल गर्मियों में रशियन बैले आता था- सोनलेक बैले’वो दिखाने ले जाते थे. इस तरह से मुझे एक्सपोजर मिला.

विनय : पढ़ाई के बारे में बताइये. आपकी शिक्षा….

नगीन : पढ़ाई चलती रही. शोज में नहीं जाती थी. टूर में नहीं जाती थी. हमारी माँ रुकती थी हमारे साथ पढ़ाने के लिए. हम दोनों टूर में नहीं जाते थे. पढ़ाई में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी. बहुत बोर लगता था.

विनय : मैं एक सवाल और करूँगा आपसे इसी बचपन के सिलसिले में. आदिवासी कलाकारों की बात आपने कही, जिनके नाम हम सितारों की तरह लेते हैं. मैं अगर गोविन्दराम निर्मलकर भुलवा की बात करूँ, देवीलाल, फिदाबाई, मालाबाई की बात करूँ तो ये सारे वो लोग हैं जिनको सितारा शख्यिसत के रूप में हमारा रंगमंच का संसार देखता रहा. ये सभी आपके आसपास थे, बल्कि मैं तो शायद यह कह सकता हूँ कि इनकी गोद में आप बड़ी हुई हैं. थोड़ा-सा उस माहौल के बारे में भी बताइये.

नगीन : वो माहौल तो बहुत ही अच्छा था. पूरे घर में प्रेम का माहौल था. गोविन्द खाना खिलाते थे, माला-फिदा चोटी- वोटी बनाती थीं, तो बहुत ही अच्छा माहौल था. ऐसा कुछ महसूस ही नहीं हुआ कि ये लोग अलग हैं. हम लोग अलग हैं और चूँकि गाँव के लोग थे तो वो बहुत स्नेही थे और सिम्पल थे, सादगी थी. ये माहौल था. माँ डाँटती थी मुझे तो ये लोग बचाते थे. असल में लोगों के मन में नया थियेटर को लेकर ये भ्रान्तियाँ हैं कि ये फोक थियेटर है. विच इज राँग... ये फोक थियेटर नहीं है. आर्टिस्ट फोक रहे हैं. लोक कलाकार रहे हैं, लेकिन ये कन्टम्परेरी थियेटर है इसलिए कि संस्कृत क्लासिक्स भी किये और फिर उनको एक नया रूप-रंग दिया, छत्तीसगढ़ी में किये. जो छत्तीसगढ़ी में नाटक किये. उसका बड़ा कारण यह था कि हिन्दी में ये लोग असहज महसूस करते थे तो ये उस बेबाक और निश्छलता से अभिनय नहीं कर पाते थे और जैसे छत्तीसगढ़ी में बहुत दिनों के बाद, एक-दो सालों के बाद. काफी महीनों के बाद हबीब साहब को यह एहसास हुआ कि मैं इनसे हिन्दी में बुलवा रहा हूँ. मैंने इनका नाचा स्टेज पर देखा छत्तीसगढ़ में. वहाँ बिल्कुल बेबाक. बगैर झिझक वो एक्टिंग करते थे. वो इंग्लैण्ड से सब सीखकर आये थे, तो उनको जो सीखकर आये थे वो सब भुलाना पड़ा और फिर उन्होंने ऐसी कोशिश की कि- अच्छा,  ये फलाना डायलाग जो हिन्दी में बोल रहे थे. इसको छत्तीसगढ़ी में बोलो.’ तो बिल्कुल स्वाभाविक तौर से उन्होंने बोला. फिर उनको एहसास हुआ कि मैं हिन्दी में जबर्दस्ती बुलवा रहा हूँ. तो क्यों न छत्तीसगढ़ी में नाटक हों। इसलिए ऐसा सिलसिला शुरू हुआ.

विनय : नया थियेटर पर चूँकि बात फोकस हो ही गयी है तो मैं वहाँ से शुरू होता हूँ. हबीब जी वैसे तो हमेशा ही फ्रीलांस रहे, लेकिन नया थियेटर से बँधने से पहले की बात करूँ, तो इप्टा से जुड़े रहे और इप्टा से जुड़कर उन्होंने उस वक्त के बहुत ही आला दरजे के जो कलाकार थे, विभिन्न विधाओं के, उनके साथ जुड़कर काम करना शुरू किया. आखिर हबीब तनवीर को नया थियेटर पर एकाग्र होने की जरूरत क्यों महसूस हुई, वो शायर भी हो सकते थे, वो सिर्फ एक लेखक भी हो सकते थे, केवल एक क्रिटिक भी हो सकते थे, लेकिन इतने सारे कलर्स को अपनी शख्सियत में रखने के बावजूद उन्होंने अन्ततः थिएटर रास्ता अपने लिए स्थायी रूप से चुना.

नगीन : ये इप्टा से शुरू होता है. वे एक्टर ही रहना चाहते थे. एक्टिंग ही करना चाहता थे. फिर इप्टा मूवमेन्ट चला. बहुत से लोग जेल भी गये. फिर इनको डायरेक्टर बना दिया गया इप्टा ग्रुप का. ये इस तरह से थोप दिया गया तो वो डायरेक्टर हो गये और शुरुआत उर्दू शायरी से की थी. मुशायरों में. रायपुर में मुशायरे होते थे तो फर्स्ट प्राइज मिलता था. नया थियेटर सन् 1959 में शुरू हुआ. फिल्म रिव्यूज भी लिखते थे. उन्होंने जब दिल्ली में थियेटर का माहौल देखा तो एक प्रोफेशनल थियेटर बनाने की इच्छा उनके अन्दर पैदा हुई. इप्टा से निकलने के बाद पहले अंग्रेजी थियेटर करते थे. अंग्रेजी प्लेज- टेमिंग ऑफ द शूज’ सर्वेण्ट ऑफ टू मास्टर्स’. फिर उर्दू में ड्रामे करते थे- सात पैसे जालीदार पर्दे’. उसके बाद फिर ये छत्तीसगढ़ी का सिलसिला सन् 1070 में जाकर पूरा हुआ. पूरी फुल फ्लैज्ड मण्डली थी छत्तीसगिढ़यों की. 1958 में छः लोग आये थे और सन् 1962 में गोविन्दराम आये, फिर चले गये.

विनय : जब नया थियेटर की परिकल्पना उन्होंने की] ये जरूरी क्यों समझा कि मैं इसमें लोक कलाकारों को शामिल करूँ। क्या वजह थी क्या इसलिए कि रायपुर सरजमीं रही] वहाँ पैदा हुए इसलिए आखिर एक व्यक्ति जो इतना माडर्न टाइम में आता है दुनिया से हाथ मिलाता है और जब अभिव्यक्ति का रास्ता चुनता है तो उसमें लोक को शामिल करता है] ट्राइब्स को शामिल करता है। ये जिद क्या थी ये आग्रह क्या था

नगीन : मैं यह कहूँगी कि इसका पहला बीज तो उनके जो गुरु थे इंग्लैण्ड में] डंकनदास] ओल्ड ग्रीक थियेटर में। उन्होंने कहा कि तुम वापस अपनी जड़ों के पास जाओ। पहले तो इप्टा] वगैरह सब हो गया। हाँ] बेगम जैदी के जमाने में हिन्दुस्तानी थियेटर में छः कलाकारों को लेकर आ गये। इंग्लैण्ड में इनको एक साल के लिए फोर्ड फाउण्डेशन की ग्राण्ट मिली थी] ये तीन साल रुक गये। फिर ये छः लोगों को लेकर आये] छत्तीसगढ़ी मतलब काले-कलूटे] बिल्कुल साँवले रंग के। लालूराम] उनकी तिरपट आँख थी और भुलवाराम। तो बेगम जैदी ने कहा कि ’ये कैसे लोगों को ले आये हो तुम] हबीब उन्होंने कहा कि- अरे आप इनका फन देखिये।’ बहरहाल उसको लेकर उनकी अनबन बेगम जैदी से हो गयी। उन्होंने नाचा बचपन से देखा था। रात-रात भर नाचा चलता था] वो देखा था। उन्होंने कोशिश की मिट्टी की गाड़ी’ बाहर करने की। कई प्रोडक्शन देखे एक भी पसन्द नहीं आया और हमेशा कहानी के बहाव में रुकावट आ जाती थी और डंकनदास ने कहा था कि एक चीज हमेशा याद रखना- कहानी का कह जाना। बिल्कुल नदी जैसी बहनी चाहिए कहानी] यहाँ से वहाँ] उसमें किसी भी चीज की रुकावट आये तो उसको निकाल बाहर करना चाहिए।’ अब ये बात इन्होंने गाँठ बाँध ली। जो भी प्रोडक्शन देखा ’मिट्टी की गाड़ी’ का- जर्मन प्रोडक्शन] फ्रेंच प्रोडक्शन- उनको रास नहीं आया। फिर उस नतीजे पर पहुँचे कि एक गोल चबूतरा बनाता हूँ। जैसे ही एक्टरों को मूव करना शुरू किया] देखा कि कहानी तो पद्दलो कर रही है। वेस्टर्न ड्रामैटोलाजी फिलासफी में टाइम] स्पेस] एक्शन होता है- काल] स्थान और क्रियाबाबा ये नाट्यशास्त्र में भंग हो जाता है। रस थ्योरी है। उन्होंने नाट्यशास्त्र कभी पढ़ा नहीं था] लेकिन वे अपने नतीजे पर खुद पहुँचे कि रस को कायम रहना चाहिए] टाईम] स्पेस] एक्शन भले ही भंग हो जाये। तो मिट्टी की गाड़ी’पहली मिसाल है। फिर वो बेगम जैदी से अलग हो गये। तब तक मोनिका मिश्रा से उन्होंने एक-दो ड्रामा करवाये थे। बेगम जैदी ने फिर उनको निकाल दिया। वो समझी कि हबीब साहब आ रहे हैं] हबीब तनवीर ने मुझे नौकरी से निकाल दिया। वहाँ से फिर शुरू हुआ। फिर हमारी माँ की वजह से उनको प्रोत्साहन मिला कि इन्हीं लोगों के साथ ही थियेटर करना चाहिए। और पहला संग-ए-मील तो आगरा बाजार’ था] 1954 में। तो उर्दू बोलने वाले ओखला के बाजार वालों से काम करवाया] एक्टिंग करवायी और सन् 1958 में फिर वो छत्तीसगढ़ी हो गया। वो एक नैचुरल प्रोसेस था।

विनय : छत्तीसगढ़ी कलाकार कभी किसी गुरुकुल में नहीं गये उन्हांने कोइे प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया] परम्परा ही उनकी गुरु रही] लेकिन जब हम रंगमंच की चौखट पर जाकर काम करना शुरू करते हैं तो निश्चित रूप से कुछ नियम] कायदे] कुछ मर्यादाएँ होती हैं। इनमें इन कलाकारों को बाँधना ही बहुत मुश्किल है] क्योंकि ये खुले आसमान के नीचे और फैली हुई जमीन पर रात भर नाचा करने वाले कलाकार थे। निश्चित रूप से ये चुनौती किसी भी भारतीय रंगकर्मी के लिए उस समय बहुत बड़ी चुनौती थी। आप बताइये कि क्या प्रोसेस थी हबीब जी ने इन कलाकारों को अपने साथ इस तरह से कैसे साधा और कैसे इनको ढाला

नगीन : छत्तीसगढ़ी कलाकारों के साथ काम करने का एक कारण यह था कि व्यंग्य का पहलू/सटायर इनके अन्दर था, जो और क्षेत्रों में] गड्डामीण क्षेत्रों में इन्होंने नहीं पाया। पहला कारण तो यह था। फिर इन्होंने देखा कि ये लोग दायाँ-बायाँ नहीं समझते] लेपद्दट-राइट] यहाँ से इण्ट्री] वहाँ से एक्जिट] कुछ भी समझ नहीं है। खूब डाँटते थे। जैसा कि मैंने जिक्र किया] पहले हिन्दी बुलवाई] फिर छत्तीसगढ़ी। फिर उन्होंने किताबें खरीदीं। जहाँ तक मेरी समझ है] इम्प्रोवाइजेशन पर किताबें विलायत से खरीदीं। उनको खूब पढ़ा] खूब अध्ययन किया] फिर और लोकनाट्य शैलियाँ देखीं और नाचा भी देखा। जब वह कोई प्रोडक्शन करते थे तो कहते थे कि- इस ड्रामे का ये थीम है] ये सीन है] ये विषय-वस्तु है। ये तुम क्रियेट करो] इम्प्रोवाइज करो।’ आशु रचना’ हमारी हिन्दुस्तानी कलाओं में है ही। उसके बगैर काम ही नहीं चलता। ये वेस्टर्न आर्ट तो है नहीं कि म्यूजिक भी लिखा हुआ रहता है स्टार नोटेशन में। अब ऐसा तो है नहीं। ये लोग बनाते थे] इम्प्रोवाइज करते थे] फिर उसमें से टेक्स्ट के लिए] स्क्रिप्ट के लिए डायलाग निकल जाते थे। ये एक तरीका था। बहुत मशक्कत और मेहनत करनी पड़ी। बहुत संघर्ष का समय था। खूब संघर्ष! खुद से भी जद्दोजहद करनी पड़ी] जो इंग्लैण्ड से सीखकर आये थे वो सब अनसीखा करना है और फिर से ए बी सी डी सीखना है। चूँकि वह स्वभाव से ही कर्मठ व्यक्ति थे तो ये सब कर पाये। खाली हालों में होता था। दस-पन्द्रह लोग बैठे हैं गाँधी मेमोरियल हाल में। हमारी माँ कहती थीं कि कोई नहीं आ रहा। तो कहते थे कि मैं अपना प्रोडक्शन खुद ही देख रहा हूँ] लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उनके अन्दर इतना दृढ़ संकल्प और दृढ़ निश्चय था कि मैं जो कर रहा हूँ वो कभी न कभी फलीभूत होकर रहेगा। ये जो विश्वास था] उसी के बिना पर वो चलते रहे। एक दिलचस्प बात यह है कि नया थियेटर गैराज में शुरू हुआ। कनाट प्लेस] दिल्ली में एक गैराज थी] वहाँ शुरू किया हमारे माता-पिता ने। गाँव का नाम ससुराल’ बन रहा था गौरी-गौरा पूजा होती थी वो एक्सपेरीमेंट का दौर था। एक जानकीबाई] फूलबाई थी] उनको देवी चढ़ती थी। मैं आठ-नौ साल की बच्ची थी] डर जाती थी। वो देखती थीं अचम्भा भरी आँखों से] इसलिए ड्रामेटिक लगता था। गाँधी दर्शन’ में रात-रात भर गाँजा पी रहे हैं और घर आ ही नहीं रहे हैं। सुबह चार बजे आ रहे हैं। तो रात भर गानों को लेकर मेहनत चलती थी कि ये धुन कैसे फलाँ सीन में फिट करें] इसको कितनी किफायत से इस्तेमाल करना चाहिए। इसलिए कि हबीब साहब हमेशा कहते थे- कला में किफायत बहुत जरूरी है। परम्परा को पूरा उड़ेल नहीं देना चाहिए। कितना उपयोग करना है] कहाँ पर करना है और किस तरह से करना है] तभी तो वो कला कहलायेगी वरना फिर तो वो उपदेशक चीज हो जायेगी। ये उनका पहला तजुर्बा रहाफ्र ’गाँव का नाम ससुराल ह’। भारतीय परम्परा में] नाट्य परम्परा में तो म्यूजिक है ही। इन्टीग्रल पार्ट है] चाहे वो पारसी थियेटर हो] चाहे वो मराठी थियेटर हो] वो म्यूजिकली ही होता था। चाहे कुडियाअट्टम हो] आप कोई भी शैली ले लीजिये। लीड रोल्स मैंने बाद में करना शुरू किये] सुधाबाई के बाद। सुधाबाई जब जल गयी थीं] उसके बाद मैंने शुरू किये। मतलब 1990 से मैंने शुरू किया और 1985 में हिरमा की अमर कहानी’ में पहली बार मैंने मदद की बाबा की म्यूजिक कम्पोजीशन में। वह कहते थे- फलाँ धुन सुनाओ] दुबारा सुनाओ] बार-बार सुनाओ।’ और फिर वो उसी धुन के मुताबिक छन्द लिख डालते थे। गुरु-माँ सुलोचना बृहस्पति कहती थी- जब तक घोंटोगे नहीं तब तक विद्या फलित नहीं होगी] वो निखर कर नहीं आयेगी। तो वो घोंटना पड़ता है। चाहे वो गायन विद्या हो या थियेटर की विद्या हो] कला बार-बार घिसाई माँगती है। जब तक उसको एनर्जी के साथ और सही सूझबूझ के साथ घिसेंगे नहीं] मतलब प्रेरणा अन्दर रहनी चाहिए] वो ही एनर्जी पैदा करेगी। वो ऐसी एनर्जी होगी] जो आपको थकायेगी नहीं।

विनय : नगीन जी] हबीब जी ने एक इण्टरव्यू में मुझे कहा था कि- नया थियेटर का इन कलाकारों के बगैर अधूरी हैं। ये न होते तो मेरा सिग्नेचर नहीं बन पाता। ये बात बहुत खुले मन से वो स्वीकार करते थे। लेकिन एक और शख्सियत है] जो कि हबीब जी के इस पूरे सपने में बैक बोन का काम करती रही] वो है- मोनिका जी। सुबह] दोपहर] शाम चारों प्रहर आपने अपनी माँ को अपने पिता के साथ देखा है। मोनिका जी का रोल इस पूरे नया थियेटर और हबीब जी की इस पूरी रंगयात्रा में किस तरह से आप देखती हैं

नगीन : वो तो उनकी ऊर्जा थीं। मैं तो कहूँगी- राइट हेण्ड थीं। वह तो अमरीका से तालीम लेकर आई थीं। उनको वहाँ नौकरी मिल रही थी। जो उनके गुरु थे कैम्प्टन वेल] उन्होंने कहा कि यहाँ तुम नहीं पनप पाओगी] तुम्हारा काम तुम्हारे मुल्क में है] तुम वापस जाओ अपने देश। देखिए] डंकन दास ने भी कहा कि आप अपनी जड़ों में वापस लौटो और इन्होंने भी कहा। बहुत समझ-बूझ वाले थे दोनों ही गुरु। वह पोइट्री भी लिखती थीं] अंग्रेजी में। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वह बाबा को आइडिया देती थीं। बाबा हर चीज में उनकी सलाह लेते थे। चाहे वो सेट हो] चाहे कास्ट्यूम हो] चाहे आर्च हो] प्रापर्टीज हो] डायरेक्शन हो] कुछ भी हो। मैं सन् 1964 में पैदा हुई। दो बार उनका मिस-कैरेज हुआ। मिस-कैरेज के तुरन्त बाद बाबा ने कहा कि- मोनिका चलो स्टेज पर] उन्होंने रोल किया। कमजोरी थी] लेकिन उन्होंने एक पादरी का रोल किया। पहले रोल करती थीं और डायरेक्ट भी करती थीं। मेरे पैदा होने के बाद उन्होंने डायरेक्शन भी बंद कर दिया। फिर उनको लगा] मुझे एक कदम पीछे हट जाना चाहिए। अगर एक कदम पीछे नहीं हटतीं तो ईगो क्लैश होता] फिर न थियेटर का काम चलता और न विवाह चलता।

विनय : यूँ तो हबीब जी का सिग्नेचर प्ले चरणदास चोर माना जाता है। एडिनबरा फेस्टीवल में वो सर्वश्रेष्ठ नाटक के रूप में चुना गया। निश्चित रूप से बड़ा अर्जुन था] बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन अगर मैं आपसे पूछूँ कि हबीब जी के आप ऐसे पाँच प्ले गिनाइये] जिनको आप मानकर चलती हैं कि हबीब जी शख्सियत को देखने के लिए ये पाँच ऐसी विण्डोज हैं कि जहाँ से हम झाँकें तो हबीब जी का पूरा का पूरा संसार हम ठीक-ठीक देख सकते हैं।

नगीन : एक तो यही चरणदास जो आपने बताया] फिर आगरा बाजार। आगरा बाजार को अक्सर लोग समझ नहीं पाये हैं] इसलिए कि उर्दू के बारे में बातचीत होती है] साहित्य के बारे में] उर्दू शायरी के बारे में और जो निर्धनता का समय था] गुरबत थी अठारहवीं सदी में नजीर अकबराबादी के समय में और नजीर अकबरावादी के बारे में है] उनको तवज्जो नहीं दी जाती थी और आगे चलकर उर्दू का क्या भविष्य है] ये दूरन्देशी है इस ड्रामे में। आगरा बाजार’ में नजीर कभी स्टेज पर मौजूद नहीं होते हैं] लेकिन उनका होना महसूस होता है……”दुनिया में बादशाह है सो है वो भी आदमी और मुफलिसो गदा है सो है वो भी आदमी/जरदार बेनवा है है वो भी आदमी/नेम्मत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी/टुकड़े जो मांगता है सो है वो भी आदमी/... और वो जो मर गया है सो वो भी आदमी।“

विनय : आगरा बाजार’ को लेकर बहुत सी बातें मन में हैं] क्योंकि मुझे याद है] हबीब जी ने मुझे पहला टिकिट दिखाया था] आगरा बाजार’ के पहले शो का। जब मैं उन पर ’कला समय’ का अंक निकाल रहा था- आपको शायद मालूम होगा! निश्चित रूप से आगरा’ ने बहुत इन्ट्रेट क्रियेट किया उसने हमारे पूरे भारतीय मानस पर] दर्शकों के भीतर। चलिए] उसके बाद की बात करें।

नगीन : बहादुर कलारिन’माँ और पुत्र के बीच में जिस्मी ताल्लुकात। उसमें छत्तीसगढ़ी फोक टेल है। इसको जब करने बैठे तो कलाकारों ने विरोध किया कि आप ऐसा ड्रामा कैसे कर सकते हैं। जो सरपंच हैं छत्तीसगढ़ में] मालगुजार] उन्होंने कहा] आप कैसे कर सकते हैं ये ड्रामा। फिर जैसे ही उन्होंने गाँववालों को कुरेदा तो सबके घर में इनसेस्ट की मिसालें निकलीं- चाचा] भानजी] मामा। जैसे हर ड्रामा में अध्ययनरिसर्च का पहलू है। सोरठ] चिरचाड़ी और गंगरेल- तीन गाँवों में ये गये और ऐस्केवेटेड थे पत्थर के] वो बहादुर कलारिन के गाँव थे। वो निकालकर लाये और कहा कि इस मोड़ पर बैठती थी बहादुर कलारिन। कलारिन’ यानी जो शराब बनाती हैं और बेचती हैं। उसका बहादुर नाम था और राजा से उसका प्रेम हुआ और एक बेटा पैदा हुआ] राजा छोड़कर अपने राज्य चला गया। सोलह साल तक नहीं लौटा। बेटा जवान हो गया तो उसकी मुठभेड़ अपने बाप से हुई और फिर कशमकश में वो अपने बाप को मार डालता है। ये नाटक बेहद मशहूर हुआ] इसे हम बाहर भी ले गये। कलकत्ता में ये लोगों को बहुत पसन्द आया] इसलिए कि फिदाबाई की जो अदाकारी इस ड्रामे में थी वो लाजबाब थी। और किसी रोल में उसने इतना अच्छा नहीं किया है। तीसरा- मिट्टी की गाड़ी’- मर्च्छिंकटिक- बिलकुल फोक स्टाइल में। उसमें समाज का हर तबका दिखाया गया। उसमें गणिका का रोल और फिर उसमें भूता जो चारुदत्त की पत्नी। बाद में वो भी इण्ट्रोड्यूज कर दिया था। 1984 में ये फ्रांस में हुआ। मिट्टी की गाड़ी’ बहुत सक्सेसफुल हुआ। उसमें छत्तीसगढ़ी धुनें इस्तेमाल हुईं] नियाज हैदर की] उनका साहित्य था। “देख रहे हैं नयन’। स्टीफन का... बहुत कर्मनिष्ठ। कर्म के बारे में गीता] फिलासफी] एक्शन] इनएक्शन। ये बिल्कुल अलग ही था। पोंगा पंडित’ हबीब साहब का बनाया हुआ नहीं है] ये तो गाँववालों का ही है] 1935 का] सीताराम सुखराम। ये इम्प्रोवाइज नाचा है। ये है नकल और ये तो उन्होंने दिखाया। हम सद्भावना यात्रा कर रहे थे मध्यप्रदेश में। छत्तीसगढ़ में भी किया। ग्वालियर में हमला हुआ] पत्थर पड़े] जहाँ शो हो रहा था] शो के दौरान। वो अनुभव बहुत डराने वाला] घबरा देने वाला था। गोविन्दराम बाबा से कहता था- अब साहब कामेडी कैसे करबो है ऐसे माहौल में जहाँ मन में डर है] घबराहट है तो हम कैसे हँसी वाला रोल करें। उनको ये नाटक बहुत पसन्द आया। गाँववालों का ही क्रियेशन है। उन्हीं का निर्माण है। आप ही सोचिये] ये ड्रामा कंट्रोवर्शियल था। फिर थम तो बीच में भी गयी थी रेलगाड़ी। वो एक दौर हर आर्टिस्ट के जीवन में आता है कि थम जाती है गाड़ी। फिर मेरे ख्याल से वो दौर होता है अध्ययन करने का] स्वचिन्तन करने का और फिर आगे बढ़ने का।

विनय : बीच में ये मौका तो आया कि अपने ही किये हुए का विरोध तो आपको झेलना था। विरोध कहाँ से आया] विरोध दरअसल उसी जनता के बीच से आया। ये कई बार बहुत क्रियेटेड भी होता है] कई बार स्वतःस्फूर्त भी होता है। ये प्रशंसा और आलोचना दोनों में एक रसायन काम करता है] मेरा ऐसा मानना है। होता भी है कि जब आप कुछ काम करने जाते हैं तो आपके मन में अभिव्यक्तियाँ भी अलग-अलग धरातल पर जाना चाहती हैं] नया आयाम ग्रहण करना चाहती हैं। हबीब जी जब इतना अच्छा सब कुछ कर रहे थे] मृच्छकटिकम्’ किया] देख रहे नयन’ की बात की] चरणदास चोर’ की बात की] तब पोंगा पंडित’ जैसे नाटकों की तरफ डायवर्ट होने की क्या वजह थी क्या सिर्फ किसी आइडियालाजी के कारण] कि चूँकि वह इप्टा से प्रेरित थे और वामपंथ उनके रग-रेशे में था] क्या इस वजह से ऐसा हुआ क्या मानती हैं आप

नगीन : स्पिक मैके के शोज होने लगे थे थियेटर के। पहले तो म्यूजिक और डांस के होते थे। सन् 1988 में स्पिक मैके के थियेटर के शोज शुरू हुए] वहाँ समय की सीमा हुआ करती थी। फिर उनको लगा कि पोंगा पंडित’ दिखाया जाये। असल बात ये है] यहाँ से शुरू हुआ। एक बड़ा कारण ये है और आप जो कारण कह रहे हैं] वो भी सही है।

विनय : ये भी है कि आइडियालाजी थी] जो भीतर रची-बसी थी। ऐसा लगता था कि एक्सप्रेशन का कहीं न कहीं एक पावर इसके साथ भी जुड़ना चाहिए। इस पर बहुत बात हो सकती है। अब हम थोड़ा-सा करवट लेते हैं देखिए] पिछले दिनों बात हुई थी तो यह उड़कर आया कि हम अक्सर अपने देश को अभिव्यक्त करने के लिए बहुत सारे रास्ते चुनते हैं। ऐसे में कई बार परायी तहजीब का भी आग्रह होता है] परायी भाषा का भी होता है] लेकिन हबीब जी ने जो वैश्विक पहचान गढ़ी वो दरअसल स्थानीय होते हुए गढ़ी। मतलब छत्तीसगढ़ी में भी आप जो हैं वो पहुँच सकते हैं दुनिया के मानचित्र पर एक अहम् उपस्थित बना सकते हैं। तो स्थानीय होकर] बोलियों के आसपास रहकर भी आप वैश्विक हो सकते हैं। आपने कहा] जड़ों की ओर जाकर काम करें। जड़ों की ओर लौटना तो बहुत आसान होता है] निजी तौर पर] लेकिन जड़ों की ओर लौटकर उसे पूरे आसमान तक ले जाना] कठिन काम था। लेकिन वो हबीब का कौनफ्रसा हुनर था कि जिसने ये कर दिखाया देखिए] हमारे समय में ये काम रतन थियम भी कर रहे हैं] पणिक्कर ने भी इस काम को किया। आप जानती हैं तो आप मुझे बताइये कि हबीब जी ने ये कैसे सम्भव किया

नगीन : यही] जो पहला गुर उनके गुरु ने दिया था] कहानी का कह जाना। भाषा आड़े ही नहीं आयी। हम जब चरणदास चोर’ लेकर गये] तो बावन राष्ट्रों में अव्वल दर्जा पाया ’चरणदास चोर’ ने। कलाकार बात कर रहे थे मेरी माँ से- क्या होगा मोनिका] क्या होगा ये सब फिरंगी बैठे हुए हैं। कैसे होगा और फिर कलाकारों पर छोड़ दिया। कलाकारों ने ऐसा रोल किया] ऐसा अभिनय किया] जैसे अपने गाँव के चौपाल में कर रहे हों। उन्होंने परवाह ही नहीं की] कि गोरे बैठे हुए हैं। नैचुरल। कहानी ब्रोशर में छपवायी। कहानी नहीं] सीन बाई सीन] सिनोपसिस भी था] गाने भी अनुवाद हुए। ये सब हुआ। तो उन चीजों ने भी मदद की आडियंस को और कहानी का कह जाना। भाषा एक बैरियर] दीवार नहीं बन रही थी] एक्टिंग पर ज्यादा जोर] एक्टर पूरी तरह से तैयार रहे और वो कैरेक्टर को लेकर इतना स्पष्ट तैयार हो कि सीधे वहाँ पहुँच जाये। परम्परा को वापस नयी क्वालिटी के रूप में] स्वरूप में उसको लौटाना। उनका शकुन्तला’ करने का इरादा था] लेकिन वो हो नहीं पाया। राजरक्त किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जो विसर्जन’ और ’राजर्षि’ उपन्यास हैं और जो नाटक हैं] दोनों का मिश्रण राजरक्त’ किया। आखिरी नाटक था। 2006 में। जब मेरा जन्म हुआ] उसके पहले ही जन्म हो गया था ’नया थियेटर’ का और हमारी कई एक्ट्रेसेज चली गयीं। फिदा-माला मर गयीं। फिर मैं वो रोल करने लगी और फिर अचानक ही हबीब साहब का स्वर्गवास भी हो गया। तो मेरे ऊपर जिम्मेदारी आ गयी नया थियेटर’ की। मुझे कोई रुचि नहीं थी इसको आगे ले जाने की। उन्होंने जीतेजी कोशिश भी की] पूछा भी था- तुम ड्रामा डायरेक्ट करो] मैं गाइड करूँगा।’ मैंने कोई रुचि नहीं दिखायी तो वह समझ गये] ये तो गाना ही करना चाहती है। मैं इत्तेफाक से नया थियेटर’ में हूँ। जब मेरा जन्म हुआ] उसके पहले ही जन्म हो गया था नया थियेटर का और हमारी एक्ट्रेसेज चली गयीं। फिदा-माला मर गयीं] फिर मैं वो रोल करने लगी और फिर अचानक ही हबीब साहब का स्वर्गवास हो गया] तो ये मेरे ऊपर आ गया। मुझे कोई रुचि नहीं थी इसको आगे ले जाने की। उन्होंने कोशिश भी की] पूछा भी था- तुम ड्रामा डायरेक्ट करो] मैं गाइड करूँगा।’ मैंने कोई रुचि नहीं दिखायी तो वह समझ गये] ये तो गाना ही करना चाहती है। अगर नया थियेटर नहीं होता तो अपना गाना ही करते।

विनय : हबीब जी के बाद नया थियेटर पर अगर हम बात करें] तो रंग संगीत को लेकर आपके मन में बहुत आग्रह रहा है। क्या आप हबीब जी के रंग-संगीत पर अपने आपको फोकस कर रही हैं और क्या आपको लगता है कि हबीब जी का रंग संगीत अपने आप में एक बहुत बड़े शोध का] आकर्षण का] जिज्ञासा का केन्द्र है और लोक रुचि का विषय भी बहुत है। उसको लेकर आपने कोई योजना विधिवत ढंग से बना रखी है

नगीन : बिल्कुल! होना ही चाहिए। रिकार्डिंग तो होना ही चाहिए।

विनय : उसको लेकर क्या कोशिश कर रही हैं आप.

नगीन : मैं चाहती हूँ कि रंग संगीत की रिकार्डिंग हो. अब तो वो कलाकर रहे नहीं जो पहले थे गाने वाले. ऐसा मैंने सोचा है कि अब भोपाल में खोजूँ जिनकी अच्छी आवाजें हैं. सांगीतिक और रिकार्डिंग करूँ. पहले बहुत पहले मैंने सोचा था. अब मैं करना चाह रही हूँ. गानों को लेकर एक संकलन है. 272 या 282 गाने हैं. उनकी स्वर-लिपि बनायी जाये और वो छपवायी जाये.

विनय : क्या बहुत अकादमिक ढंग से किसी काम को अंजाम देने का आपने सोचा है या अभी तक सिर्फ विचार के स्तर पर है.

नगीन : अभी विचार के स्तर पर है.

विनय : दूसरी बात मैं आपसे पूछता हूँ. मैंने देखा है. हमारे आगह पर भी और दूसरों के बुलावे पर भी आप गयीं और हबीब जी के रंग संगीत को प्रस्तुत किया है. क्या लगातार कान्सर्ट करके आप इस काम को जिंदा रखना चाहती हैं.

नगीन : सिर्फ ये तरीका नहीं है.

विनय : वो जो स्वर लिपियों की आप बात कर रही थीं हबीब जी के नहीं रहने के बाद. हबीब जी थे तो हबीब जी का एक मुख्य स्वप्नद्रष्टा होने के नाते नया थियेटर पर एक वर्चस्व था और उनकी भंगिमा को, उनके आदेश को, उनके इशारों को नया थियेटर’ के तमाम कलाकार समझते थे. हबीब जी के न रहने के बाद निश्चित रूप से ध्वस्त हो गया, लेकिन सारा जमाना अभी भी नया थियेटर के साथ कुछ अपेक्षाएँ बनाये हुए है. क्या आपको ऐसा लगता है कि किसी के काल कवलित होने के बाद लोगों की ये अपेक्षा बेमानी है या आपको ऐसा लगता है. आपके भीतर चूँकि उस तरह की क्षमताएँ नहीं हैं. इसको स्वीकार करना चाहिए. आपके भीतर एक अलग किस्म का आर्टिस्ट बैठा हुआ है, लेकिन संस्थान को चलाने के लिए कलाकार से अलग एक प्रभावी लगता ही है. क्या हम ये मान लें कि नया थियेटर अब नेपथ्य में जा चुका है.

नगीन : नहीं. इसको स्वीकार कर लेना चाहिए. अब मैं एक मिसाल देती हूँ. एक घोड़ा है आपके पास जो बूढ़ा हो गया है, उसकी टाँग टूट गयी है. आप क्या करेंगे, उसको नींद का इंजेक्शन दे देंगे, इस चीज को स्वीकार कर लेना चाहिए. मैंने अपने मन में स्वीकार कर लिया है. मैं साफ-साफ बता दूँ तो जनता को भी स्वीकार कर लेना चाहिए ...और ये अपेक्षा अब नहीं. इसलिए नहीं कि वो अपेक्षा झूठी अपेक्षा है. जो वास्तविक है वो अलग है. तो इसको स्वीकार कर लेना चाहिए खूबसूरती से. चुपचाप, बगैर किसी एनाउण्समेंट के, शोर के, नो पब्लिक एनाउण्समेंट, शान्तिपूर्वक वाइण्डअप कर देना चाहिए. ये तो हबीब साहब सोच रहे थे, जब हम शिपद्दट भी नहीं हुए थे भोपाल में कि मैं ड्रिफ्ट कर रहा हूँ. वह बार-बार कहते थे मेरी माँ से कि मैं ड्रिफ्ट कर रहा हूँ. मैं अपनी नज्में छपाना चाहता हूँ] मैं इतना सारा अपना दूसरा काम करना चाह रहा हूँ और मुझे टूर में जाना पड़ रहा है, तो अब टाइम आ गया है, दुकान बंद कर दी जाये.’ कब से कह रहे हैं, 1990 के दशक से, अब ये क्या है, एक ताना-बाना है- कपड़ा. अब वो सालों पुराना हो गया है, ताना-बाना कमजोर हो गया है, उस साड़ी को आप नहीं पहन सकते तो उसको फाड़ कर कोई दूसरे, छानने-बानने के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहिए, वैसा ही संस्था का भी है कि ताना-बाना जब कमजोर हो जाये! आप कब तक पैबन्द लगाते रहेंगे. कब तक आप अपने आपको झूठी तसल्ली देते रहेंगे, तो सत्य का सामना तो करना ही पड़ेगा और करना चाहिए.

विनय : जिन लोगों को हबीब जी अपना उत्तराधिकार सौंप गये थे] उन्होंने किस तरह की भूमिका निभायी क्या उनको इतना फ्रीडम नहीं मिला या उनमें उतनी क्षमताएँ नहीं हैं या उनका कोई अन्तर्विरोध है

नगीन : हाँ] क्षमताएँ कम हैं और अपनी सीमाओं को स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी और समझदारी है] ऐसा मैं समझती हूँ। अगर आपके अन्दर फलाँ क्षमता नहीं है तो ये मुझसे नहीं हो पायेगा। ये कमजोरी नहीं है। ये तो आपकी शक्ति है ये कहने की। इसको स्ट्रेन्थ माना जायेगा। इसको ताकत मानी जायेगी। सच का सामना करना और अपनी सीमाओं को स्वीकार कर लेना ही शक्ति है। इसको शिथिलता नहीं कहेंगे और इस भ्रान्ति में रहना कि हमसे ये भी हो जायेगा और वो भी हो जायेगा] ऐसा नहीं होता। या तो आपके अन्दर वो प्रतिभा हो] चिंगारी हो] फिर आपको गुरु तो मिला रास्ता दिखाने वाला] लेकिन पहली शर्त है कि आपको हुनर मिलना चाहिए ऊपरवाले से। आपको वो नहीं मिला और आप ये झूठे भ्रम और भ्रांति में जी रहे हैं। ये कब तक चलेगा ये ज्यादा दिन नहीं चल सकता!

विनय : नगीन जी से तो उम्मीदें हमारी बनी रहेंगी। एक सवाल मेरा] हबीब जी का अधूरा ख्वाब आप क्या मानती हैं बाबा जिन दिनों हास्पीटल में थे] तब भी कहीं न कहीं कुछ बातचीत में ऐसा जताया करते थे कि मुझे ये करना है] मुझे वो करना है। हबीब जी का आखिरी ख्वाब...

नगीन : बाबा के जेहन में तीन ड्रामे चल रहे थे। इटालियन राइटर इटालो केल्विनो की कहानी द क्लोवन आई काउण्ट और वो गुड और उसकी थीम ईविल के बारे में थी। फिर हमारी माँ डायरेक्ट करना चाहती थीं टेस आफ द ड्यूराविल्स] वो टामस हार्डी का नोबल है। बाबा शकुन्तला’ करना चाह रहे थे और उसमें मुख्य भूमिका में मुझे शकुन्तला बनाना चाह रहे थे। तो दो-तीन ड्रामे उनके जेहन में चल रहे थे। हाँ] एक ड्रामा का मैं जिक्र करना भूल गयी। ’सड़क’] छोटा-सा है] अटठाईस मिनट का। वो सुदीप बैनर्जी के आग्रह पर उन्होंने किया साक्षरता के ऊपर। तो ये सपना था और वो अधूरा रह गया] दो-तीन प्रोडक्शन उनके जेहन में थे। उन्होंने चालीस के दशक में फिल्मों में काम किया था। आर्ट फिल्मों में। उन्होंने फिल्म का माहौल देखा] उससे हटकर वो फिर थियेटर में इसलिए आये कि फिल्मों का माहौल अच्छा नहीं था तो वापस फिल्मों में जाने का सवाल ही पैदा नहीं था। ऐसा कभी सोचा नहीं। हाँ] मोबाइल थियेटर बनाने का जरूर सपना था मन में जहाँ फायर भी बन जायें] वहाँ कैफे भी हो और हम चलें गाड़ी में तो आडिटोरियम भी साथ चले हो। (news18.com)

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