संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो, बात डरावनी है, पर जरूरी भी है
29-May-2021 5:23 PM (245)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो, बात डरावनी है, पर जरूरी भी है

पिछले करीब 12 हजार बरस से इंसान पशुओं को पालतू बनाकर अपने साथ रखते आए हैं। इंसानों का इतिहास यही बताता है कि उसके पहले वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे लेकिन धीरे-धीरे वे उनमें से कुछ काम के जानवरों को खेती के लिए या चौकीदारी के लिए, या शिकार में मदद करने के लिए, अपने साथ रखने लगे। इंसान इन पशुओं को गोश्त के लिए, दूध के लिए, और उनकी खाल से अपने लिए गर्म कपड़े बनाने के लिए भी, पालने लगे थे। अब आधुनिक दुनिया में ऐसी किसी जरूरत के बिना भी लोग अपने शौक से अधिकतर कुत्ते-बिल्लियां पालते हैं, बहुत से लोग तरह-तरह के पंछी और मछलियां पालते हैं, और जिन देशों में कुछ और नस्लों के जंगली जानवरों को पालने की इजाजत है वहां पर लोग और खतरनाक समझे जाने वाले जानवरों को भी पालते हैं। अब चीन से जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तो ऐसा माना गया कि वहां के एक शहर का जो पशु बाजार है जहां बड़ी संख्या में अलग-अलग बहुत सी प्रजातियां के पशु-पक्षी बेचे जाते हैं वहां से यह बीमारी फैली और एक मान्यता यह है कि वह चमगादड़ों से इंसानों में आई। अब यह भी जांच का मुद्दा है, और यह बात पूरी तरह से साबित नहीं हुई है, लेकिन पशु-पक्षियों को लेकर इंसान थोड़े से चौकन्ने तो हुए हैं। ऐसे में जब एक खबर एक पुरानी जांच रिपोर्ट पर अभी आती है कि मलेशिया में बहुत से ऐसे इंसान ऐसे भी मिले थे जिन्हें कोरोना वायरस कुत्तों से मिला था, तो यह लोगों को चौंकाने और हड़बड़वाने वाली बात है। हालाँकि ये मामले तीन चार बरस पहले के हैं और उसके बाद से ऐसे मामले कहीं सामने नहीं आए और ना ही यह साबित हुआ कि इंसानों में कुत्तों से आने वाले कोरोना वायरस की वजह से ही किसी की मौत हुई। लेकिन आज जब चारों तरफ सावधानी बरतने की बात हो रही है, जब लोग यह देख रहे हैं कि कोरोना वायरस के कितने और दौर आ सकते हैं और उनके लिए क्या-क्या सावधानी बरती जानी चाहिए, तब यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि क्या किसी दिन ऐसी नौबत आ सकती है कि पालतू या कारोबारी जानवरों से इंसानों में कोई दूसरा वायरस आने लगे, और वैसे में क्या होगा?

हर कुछ वर्षों में यह देखने मिलता है कि कहीं गायों में, तो कहीं मुर्गियों में, और कहीं पालतू सूअर में कोई संक्रामक बीमारी फैल जाती है, और किसी देश-प्रदेश में या किसी शहर में उन्हें बड़ी संख्या में मारना पड़ता है, और मारकर एक साथ जलाना भी पड़ता है ताकि उनसे संक्रमण दूसरे जानवरों तक ना पहुंचे, और इंसानों तक ना पहुंचे। अब ऐसी नौबत की कल्पना आज थोड़ी सी मुश्किल हो सकती है कि अगर हिंदुस्तान जैसे देश में करोड़ों गाय हैं, इसमें ऐसी कोई बीमारी फैल जाए तो क्या होगा? क्योंकि बहुत सी जगहों पर लोग घरों में ही 1-2 गाय भैंस पाल लेते हैं जिनसे उनकी रोजी-रोटी भी चलती है और बच्चों को दूध भी मिलता है। अब अगर इनके बीच कोई बड़ी बीमारी फैल जाए तो क्या होगा? हिंदुस्तान जैसे देश में आज मुर्गीपालन एक बड़ा संगठित कारोबार हो गया है और अगर बीच-बीच में जिस तरह के संक्रामक रोग पोल्ट्री उद्योग झेलता है वह अगर अधिक भयानक हो गया तो क्या होगा? सूअर और भेड़-बकरियां भी अलग-अलग इलाकों में पाले जाते हैं और इंसान इनके गोश्त का कारोबार के लिए भी इस्तेमाल करते हैं और अपने घर के लिए भी, इनके बारे में भी ऐसी सावधानी की बात तो सोचने की जरूरत है। 

लेकिन इन सबसे परे जो सच में घरेलू जानवर माने जाते हैं, और कुत्ते-बिल्लियों को जिस तरह लोग अपने घर में, अपने कमरों के भीतर रखते हैं, उनके बारे में यह सोचने की जरूरत है कि अगर उनके बीच कोई बीमारी फैली और उनसे इंसानों तक बीमारी फैलने का खतरा हो, तो इंसान क्या करेंगे? और क्या ऐसी किसी नौबत के खतरे की तैयारी के हिसाब से लोगों को अब पालतू जानवर रखना कम कर देना चाहिए? हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बहुत से लोगों के लिए यह सवाल भी बहुत तकलीफदेह रहेगा और लोग हैरान होंगे कि कोई ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं। लेकिन जब कोरोना से संक्रामक रोग के चलते आज हिंदुस्तान में जगह-जगह यह नौबत आई है कि लोगों ने अपने परिवार के लोगों की लाशों को जलाने और दफनाने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें खुद को संक्रमण का खतरा था, और समाज सेवकों या सरकारी कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में अंतिम संस्कार किए हैं, जब अपने मां-बाप, अपने भाई-बहन के अंतिम संस्कार, उन्हें आखिरी बार देखने से भी लोग कतराने लगे हैं, तो ऐसे में किसी जानवर से संक्रमण होने पर उस जानवर का क्या किया जाएगा? और दुनिया में आज कोरोना कहां से आया, कैसे फैला, किस पशु-पक्षी से आया, इनमें से किसी बात के पुख्ता सुबूत वैज्ञानिकों को नहीं मिल पाए हैं, ऐसे में यह एक खुला खतरा है कि वायरस कहीं से भी आया हुआ हो सकता है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह किसी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों का बनाया हुआ वायरस भी हो सकता है जो कि किसी प्रयोग की तरह या किसी हमले की शक्ल में, या दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, और वैक्सीन के बाजार को दुहने के लिए फैलाया गया हो। अभी क्योंकि कोरोना वायरस की कुछ भी जानकारी नहीं है कि वह कहां से शुरू हुआ, इसलिए अगले ऐसे किसी खतरे के बारे में सोचना भी मुमकिन नहीं है जो कि कारोबारी या फालतू या घरेलू जानवरों के बीच फैल सकते हैं, फैलाये जा सकते हैं, और वहां से इंसानों के बीच आ सकते हैं। लेकिन कुछ विज्ञान कथाओं को पढक़र लोगों को भविष्य में झांकने का एक मौका मिलता है और आज वर्तमान की तमाम चीजें ऐसी हैं जिनको भूतकाल में किसी न किसी विज्ञान लेखक ने किसी शक्ल में सोचा हुआ था। इसलिए आज यह जरूरी है कि लोग जानवरों से इंसानों में ऐसी बीमारी फैलने के खतरे के बारे में सोचें और यह भी सोचें कि ऐसी नौबत आने पर वह क्या करेंगे? 

आज जिन लोगों को पालतू जानवर परिवार के सदस्यों की तरह लगते हैं वह यह भी देख लें कि इंसानी परिवारों के सदस्यों को आखिरी के कई दिन केवल डॉक्टर-नर्स को देखते हुए गुजारने पड़े और उसके बाद सीधे पुलिस के कर्मचारियों ने या समाज सेवकों ने उनका अंतिम संस्कार किया, घरवाले बहुत से मामलों में तो आखरी के कई दिन भी अपने सदस्य को नहीं देख पाए, आखरी बार चेहरा भी नहीं देख पाए, और खुद अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए। ऐसी इंसानी बेबसी के बारे में सोचते हुए लोगों को पालतू जानवरों का भी सोचना चाहिए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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