संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हिंदुस्तान में बड़े ओहदों की गैरजिम्मेदारी के दो मामले !
29-Jun-2021 5:12 PM (340)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हिंदुस्तान में बड़े ओहदों की गैरजिम्मेदारी के दो मामले !

जब बड़े जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग कोई लापरवाह बात कहते हैं तो अटपटा लगता है। आमतौर पर अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी या जमानत जैसे देश के सबसे ज्वलंत मामले में ही मुंह खोलने वाले भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभी अपने गांव जाकर वहां एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से जब यह कहा कि उन्हें 5 लाख रूपये तनख्वाह मिलती है, लेकिन उनमें से पौने तीन लाख तो इनकम टैक्स कट जाता है, और एक शिक्षक की तनख्वाह उनसे ज्यादा बचती है, तो लोगों को बात अटपटी लगी। अटपटी कई मायनों में लगी, एक तो इस हिसाब से कि लोगों का सामान्य ज्ञान और कानून की सामान्य जानकारी यह कहती है कि राष्ट्रपति की तनख्वाह इन्कम टैक्स से मुक्त रखी गई है। दूसरी बात यह कि इन 3 दिनों में हिंदुस्तान के मीडिया में से किसी भरोसेमंद मीडिया ने, या कि राष्ट्रपति भवन ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि नियमों में चली आ रही टैक्स छूट की व्यवस्था अगर खत्म हो चुकी है तो कब खत्म हुई है, और कब से राष्ट्रपति को टैक्स देना पड़ रहा है? और तीसरी बात यह कि क्या हिंदुस्तान का राष्ट्रपति देश के सबसे बड़े रिहायशी मकान में रहते हुए, तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर रहते हुए, देश का प्रथम नागरिक बने हुए, क्या अपनी तनख्वाह और उस पर कटने वाले टैक्स पर मलाल जाहिर करते हुए गरिमापूर्ण लग रहा है? यह पूरा सिलसिला अटपटा था और बदमज़ा था, जिन लोगों ने रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद से अब तक उनकी आलोचना की कोई बात नहीं पाई थी, उनको भी लगा कि क्या राष्ट्रपति टैक्स को लेकर ऐसी बात करते हुए अच्छे लग रहे हैं? और दूसरी बात यह कि लोगों के पास उनकी बात पर भरोसा करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि देश में टैक्स की अधिकतम सीमा इतनी नहीं है कि पांच लाख की तनख्वाह पर पौने तीन लाख टैक्स लग जाए। सच जो भी होगा, कभी ना कभी सामने आएगा। 

इसी किस्म की दूसरी बात कल सामने आई जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने प्रदेश के राज्यपाल जगदीप धनखड़ पर यह आरोप लगाया कि 1996 के जैन हवाला कांड की चार्जशीट में उनका नाम आया था, वह एक भ्रष्ट आदमी हैं, और केंद्र सरकार को उन्हें हटाना चाहिए। ममता ने यह भी कहा कि अगर केंद्र सरकार को इस बात की जानकारी नहीं है कि आरोपपत्र में राज्यपाल का नाम है, तो मैं उन्हें बतला रही हूं और केंद्र सरकार इसका पता लगा ले। राज्यपाल ने इस बात को पूरी तरह बेबुनियाद बताया और कहा कि यह बात कुछ इस तरह की है कि उनके बारे में कहा जाए कि वह चांद पर गए थे।

अब यह दोनों बातें दो जिम्मेदार लोगों द्वारा कही गई हैं, एक भारत का राष्ट्रपति है, और एक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। कायदे से तो इन पदों पर बैठे हुए लोगों को कोई भी तथ्यविहीन या गलत तथ्यों वाली कोई बात नहीं करना चाहिए, लेकिन सच यह है कि राष्ट्रपति की सेवा शर्तों की जो जानकारी किताबों में दर्ज है, या तो वह गलत है या राष्ट्रपति की दी गई जानकारी गलत है। इसी तरह या तो ममता गलत हैं, या जगदीप धनखड़ गलत हैं। सही कौन है इसके फैसले में देश का बहुत बड़ा वक्त भी बर्बाद हो रहा है, मीडिया का एक गैर जरूरी ध्यान इस तरफ जा रहा है, सोशल मीडिया पर लोग इन बातों को लेकर काफी कुछ लिख रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली के जिस मीडिया की पहुंच राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति की जानकारी तक है, और जो भारत के टैक्स ढांचे के बारे में भी वित्त मंत्रालय से बात कर सकते हैं उनमें से किसी ने भी अब तक इस विवाद पर सच सामने रखा हो, ऐसा हमारे देखने में नहीं आया है। ममता बनर्जी के हाथ बड़े-बड़े वकील हैं, पूरी सरकार है, और जैन हवाला केस ऐसा नहीं था कि उसका कोई भी पहलू कानूनी दस्तावेजों में ना आया हो, सरकारी कागजात में ना आया हो, मीडिया में न आया हो। इसलिए राज्यपाल के बारे में भ्रष्टाचार के बयान के पहले ममता बनर्जी भी कागजात जुटा सकती थीं और फिर सामने रख सकती थी कि ऐसे व्यक्ति को बंगाल का राज्यपाल ना रखा जाए। 

इन दोनों ही मामलों में यह भी लगता है कि मीडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई है जिन्हें राष्ट्रपति भवन में एक पूर्णकालिक प्रेस सचिव रहते हुए उससे उसका पक्ष नहीं लिया कमा और राष्ट्रपति की बात को सही या गलत ठहराने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। इसी तरह ममता बनर्जी के आरोपों पर मीडिया ने उनसे यह नहीं कहा कि इसके तथ्य साबित करते हुए दस्तावेज कहां हैं? लोकतंत्र में यह सिलसिला अपने आपको चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया की गैरजिम्मेदारी का भी है और राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक के लापरवाह बयानों का भी है। जब देशभर के सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति की तनख्वाह को लेकर दिए गए उनके बयान पर विवाद खड़ा हो रहा है तो अगर राष्ट्रपति ने सही बात कही है तो राष्ट्रपति भवन के प्रेस सचिव को इस बारे में तुरंत एक बयान जारी करना चाहिए था, और अटकलबाजी को खत्म करना चाहिए था। हिंदुस्तान में मीडिया के साथ एक दिक्कत यह है कि वह अपना जिम्मा निभाने के बजाए एक हरकारे  की तरह काम करने लगता है, एक व्यक्ति के बयान को लेकर दूसरे व्यक्ति से उसका पक्ष ले लेता है, दूसरे के बयान को पहले के बयान के साथ जोडक़र दिखा देता है, लेकिन इतनी जहमत नहीं उठाता कि सच को तलाशने की अपनी जिम्मेदारी भी पूरी कर ले। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

जिस वक्त हिंदुस्तान में मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी, और महज प्रेस हुआ करता था उस वक्त अखबारनवीस अधिक जिम्मेदार हुआ करते थे लेकिन जैसे-जैसे अखबारों का एकाधिकार खत्म हुआ और टीवी का दाखिला हुआ, धीरे-धीरे डिजिटल मीडिया आया, और जिम्मेदारी बहुत हद तक खत्म हो गई। जहां मीडिया को बड़े तल्ख सवालों के साथ राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक से जवाब लेना था, वहां पर आज का मीडिया एक पहलू को ही एक खबर बनाकर लोगों के सामने पेश कर रहा है। जो बातें सरकारी अदालती कागजों में दर्ज हैं उनको भी नहीं देख रहा है। हिंदुस्तान की जनता नेताओं से लेकर मीडिया तक की ऐसी गैरजिम्मेदारी का नुकसान झेल रही है, और यह लोकतंत्र परिपक्व हो ही नहीं पा रहा है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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