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200 और 2,000 के खराब नोट न तो बैंकों में जमा होंगे और न ही बदले जाएंगे

Posted Date : 14-May-2018



जोएल रेबेलो/दीपशिखा सिकरवार
मुंबई, 14 मई। आरबीआई के 200 रुपये और 2000 रुपये के नए नोट जारी किए हुए डेढ़ साल हो चुके हैं, लेकिन अगर किसी वजह से गंदे हो जाएं तो इन्हें न तो बैंकों में जमा किया जा सकता है और न ही वहां इन्हें बदला जा सकेगा। इसकी वजह यह है कि करंसी नोटों के एक्सचेंज से जुड़े नियमों के दायरे में इन नए नोटों को रखा ही नहीं गया है। 
कटे-फटे या गंदे नोटों के एक्सचेंज का मामला आरबीआई (नोट रिफंड) रूल्स के तहत आता है, जो आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन 28 का हिस्सा है। इस ऐक्ट में 5, 10, 50, 100, 500, 1,000, 5,000 और 10,000 रुपये के करंसी नोटों का जिक्र है, लेकिन 200 और 2,000 रुपये के नोटों को इसमें जगह नहीं दी गई है। इसकी वजह यह है कि सरकार और आरबीआई ने इनके एक्सचेंज पर लागू होनेवाले प्रावधानों में बदलाव नहीं किए हैं। 
2,000 रुपये का नोट 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी के ऐलान के बाद जारी किया गया था जबकि 200 रुपये का नोट अगस्त 2017 में जारी किया गया था। अभी 2,000 रुपये के करीब 6.70 लाख करोड़ रुपये मूल्य के नोट सर्कुलेशन में हैं और आरबीआई ने अब 2,000 रुपये के नोट छापना बंद कर दिया है। यह बात 17 अप्रैल को इकनॉमिक अफेयर्स सेक्रटरी सुभाष सी गर्ग ने बताई थी। हमारे दिमाग हमेशा एक सवाल आता है कि सरकार पैसों की कमी होने पर लोन लेने की जगह नोट क्यों नहीं छाप लेती? अगर सरकार के पास ही नोट छापने की पावर है तो ज्यादा नोट छापने में क्या दिक्कत है? हम समझाते हैं आपको इसके पीछे की पूरी कहानी...

 कई लोगों को यह भ्रम है कि देश की करंसी गोल्ड रिजर्व पर निर्भर करती है। ऐसा नहीं है कोई भी देश जितना चाहे उतने नोट छाप सकता है, इससे फर्क नहीं पड़ता कि देश के पास गोल्ड रिजर्व कितना है। किसी भी अर्थव्यवस्था में सीमित नोट छापने के पीछे सबसे बड़ा कारण है महंगाई।
 इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि कैसे किसी प्रॉडक्ट की मांग उसकी कीमत से जुड़ी है। इसे एक उदारहण के जरिए समझते हैं। मान लिजिए कि देश में किसी किताब की 1 हजार प्रतियां हैं, हर किताब की कीमत 100 रुपये है और सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था में सप्लाई किया गया पैसा 1 लाख है।
अगर सरकार 1 लाख की जगह दोगुना पैसा सप्लाई कर दे तो किताबें उतनी ही हैं लेकिन लोगों के पास ज्यादा पैसे हैं और वे किताब खरीदने के लिए ज्यादा कीमत देने में भी नहीं रुकेंगे। मांग बढऩे पर कंपनी किताबों की कीमत बढ़ा देगी और यह प्रक्रिया जारी रहेगी। इसीलिए जीडीपी का केवल साइज बढऩे से आम आदमी की जिंदगी पर बहुत मामूली फर्क पड़ता है।
 सरकार प्राइवेट सेक्टर को बॉन्ड्स बेच कर पैसा लेती है। बॉन्ड्स में निवेश एक तरह की सेविंग ही होती है। लोग सरकारी बॉन्ड्स को सुरक्षित निवेश मानते हैं। अगर सरकार राष्ट्रीय कर्जे को चुकाने के लिए ज्यादा नोट छापती है तो महंगाई बढ़ेगी और महंगाई बढऩे से बॉन्ड्स की कीमत गिरेगी। ऐसे में सरकार के लिए बॉन्ड्स बेच कर कर्ज लेना और भी मुश्किल हो जाएगा।
दुनिया को 20वीं सदी के दूसरे दशक में जकडऩे वाली महामंदी के दौरान हालत कुछ ऐसे थे नोटों की कोई कीमत नहीं बची थी। एक ब्रेड खरीदने के लिए भी नोटों की गड्डी ले जानी पड़ती थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं और कई तरह के जुर्माने भी। उसे भरने के लिए जर्मनी ने ज्यादा नोट छापने शुरू कर दिए जिससे 1922-23 में जर्मनी मंदी का शिकार हुआ।
बैंकरों ने कहा कि नई सीरीज में कटे-फटे या गंदे नोटों के बेहद कम मामले सामने आए हैं, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि अगर प्रावधान में जल्द बदलाव नहीं किया गया तो दिक्कतें शुरू हो सकती हैं। 
आरबीआई का दावा है कि उसने 2017 में ही बदलाव की जरूरत के बारे में वित्त मंत्रालय को पत्र भेजा था। मामले की जानकारी रखनेवाले एक सूत्र ने बताया कि आरबीआई को अभी सरकार से कोई जवाब नहीं मिला है। बदलाव ऐक्ट के सेक्शन 28 में करने होंगे, जिसका संबंध खो गए, चोरी हुए, कटे-फटे या अशुद्ध नोटों की रिकवरी से है। 
साल 1923 में कर्ज के भारी बोझ तले दबा जमर्नी जब प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) की आपदा से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रहा था, तभी वहां के बैंक नोट (मार्क) की लगभग कोई कीमत ही नहीं रही। देखते ही देखते एक ब्रेड की कीमत अरबों मार्क की हो गई। जर्मनी में आई इस आपदा को दुनिया वाइमर रिपब्लिक का 1923 का संकट के नाम से जानती है। आगे की स्लाइड्स पर जाएंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे कि क्या नोटों की ऐसी भी दुर्दशा हो सकती है...
इस तस्वीर में एक महिला नोटों का पोशाक पहनी है जबकि एक अन्य महिला नोट जलाकर भोजन बना रही है।
दिसंबर 1922 में एक डॉलर का मूल्य 2,000 जर्मन मार्क्स के बराबर था जो मई 1923 में 20,000 माक्र्स और अगस्त में 10 लाख से भी ज्यादा माक्र्स के बराबर का हो गया।
हालात इतने बिगड़ गए कि जनवरी 1923 में जो ब्रेड बन 250 माक्र्स  में मिलता था, वह नवंबर आते-आते 2 खरब माक्र्स  का हो गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जर्मनी में जन्मदर घट गई और मृत्यदर में इजाफा हो गया। तब शिशु मृत्यु दर में 21 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। जर्मनी में कैश वजन करके बिकने लगे।
लोगों को अपने वेतन की रकम सूटकेसेज में लाने पड़ते थे। एक व्यक्ति ने नोटों से भरा सूटकेस यूं ही छोड़ दिया। चोर नोट छोड़कर सूटकेस ले गया। तस्वीर में नोट ढोते लोग। एक लड़के को दो ब्रेड बन खरीदने के लिए भेजा गया। दुकान के रास्ते में उसे बच्चे फुटबॉल खेलते दिख गए। बच्च वहीं फुटबॉल खेलने लगा। थोड़ी देर बाद वह दुकान पर पहुंचा तो बन का दाम इतना बढ़ चुका था कि वह दो क्या एक भी बन नहीं खरीद पाया।
एक व्यक्ति जूते खरीदने बर्लिन शहर के लिए निकला। लेकिन जब तक बर्लिन पहुंचा, उसके पास पड़े नोटों का मूल्य इतना घट गया कि एक कप कॉफी पीने के बाद उसके पास घर लौटने के लिए बस का किराया ही बचा। तस्वीर 100 अरब मार्क की कीमत के नोट की है।
एक महिला ने गुजारे के लिए अपना घर बेच दिया। लेकिन एक हफ्ते बाद उसके पास पड़े पैसे का मूल्य इतना गिर गया कि वह एक ब्रेड भी नहीं खरीद सकी। तस्वीर में नोट जलाती महिला। दरअसल, नोटों की वैल्यु इतनी कम हो गई कि इंधन की जगह नोट जलाना सस्ता पड़ रहा था।
1923 में जर्मनी में नोटों की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बच्चे नोटों का घरौंदा बनाकर खेलने लगे थे। यूं तो नोटों की दुर्दशा की अनेक कहानियां हैं। इस तस्वीर को ही देख लीजिए। बच्चे नोटों की पतंग बनाकर उड़ा रहे हैं। (इकॉनॉमिक टाईम्स)




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