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भारत में आज ही के दिन चुना गया था राष्ट्रीय ध्वज, ये हुए थे बदलाव
22-Jul-2021 8:41 AM (58)
भारत में आज ही के दिन चुना गया था राष्ट्रीय ध्वज, ये हुए थे बदलाव

भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली थी. लेकिन उससे पहले ही देश की संविधान सभा ने काम करना शुरू कर दिया था और देश के लिए बहुत अहम फैसले लिए थे. आजादी मिलने से 23 दिन पहले संविधान सभा ने देश के आधिकारिक झंडे को अंगीकार किया था. तिरंगे का हमारी आजादी के इतिहास में बहुत महत्व है. उसे ही देश के आधिकारिक झंडे के रूप में अपनाया गया था. लेकिन आज हम जो तिरंगा फहराते हैं उसे अपनाने से पहले कई बदालव किए थे.

पहले ही पसंद कर लिया गया था तिरंगा
आजादी से काफी पहले ही देश के नेताओं ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार करने का मन बना लिया था. वह तिरंगा देश की आन बान और शान बन चुका है और उसे  कई आंदोलनों में व्यापक तौर पर उपयोग में लाया गया था. लेकिन यह भी सच है कि उस समय के पहले भारत का कोई राष्ट्रीय आधिकारिक ध्वज नहीं था और अंग्रेजों का यूनियन जैक ही प्रमुख मौकों पर उपयोग में लाया जाता था.

उससे पहले नहीं था कोई राष्ट्रीय ध्वज
भारत के हजारों साल पुराने इतिहास में ऐसे झंडे का कभी उपयोग नहीं किया गया जो पूरे देश के लिए हो. यहां तक कि जब 2300 साल पहले मौर्य साम्राज्य का लगभग पूरे भारत पर अधिकार हो गया था, तब भी भारत का कोई राष्ट्रीय ध्वज नहीं था. वहीं  17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य ने भी भारत के अधिकांश हिस्से पर अपना अधिकार कर लिया था. तब भी देश का कोई एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं था. आजादी से पहले भारत में 562 से ज्यादा रियासतें थीं, लेकिन इन सभी रियासतों के भी अलग-अलग झंडे थे.

किसने डिजाइन किया था झंडा
भारत के राष्ट्रीय ध्वज को डिज़ाइन करने में स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया का बहुत अहम योगदान था. पिंगली वेंकैया ने सन 1916 से लेकर सन 1921 तक 30 देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर गहराई से शोध किया. 1921 में कांग्रेस के सम्मेलन में उन्होंने अपना डिजाइन किया हुआ राष्ट्रीय ध्वज पेश किया. उस डिजाइन में मुख्य रुप से लाल और हरा रंग था. इसमें लाल रंग हिंदू और हरा रंग मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करता था.

गांधी जी की भूमिका
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के झंडे की डिजाइन में महात्मा गांधी की भी भूमिका थी. पिंगली वेंकैया की डिजाइन में सफेद रंग और चरखा गांधी जी के सुझाव पर ही शामिल किया गया था. बापू का कहना था कि सफेद रंग बाकी समुदायों को प्रदर्शित करेगा जबकि चरखा उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का प्रतीक था. इस तरह वह झंडा तिरंगा बन गया. कांग्रेस ने अगस्त 1931 को अपने वार्षिक सम्मेलन में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने का प्रस्ताव पारित किया.

आजादी से पहले हुए बदालव
आजादी से पहले यानि 22 जुलाई 1947 को जो तिरंगा देश के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया वह 1931 का तिरंगा नहीं था. उसे अपनाने से पहले कुछ बदलाव भी हुए थे. अब देश के झंडे में लाल रंग की जगह केसरिया रंग हो गया. हिंदू धर्म में केसरिया रंग को साहस, त्याग, बलिदान और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा तिरंगे की जगह अशोक चक्र रखा गया.

गांधी जी की क्या थी इन बदलावों पर प्रतिक्रिया
गांधी इन बदालवों से बहुत खुश नहीं थे. बल्कि वे चरखे को हटाए जाने से निराश थे. लेकिन चरखेको रखे जाने पर बहुत से लोगों को आपत्ति थी जिनमें कई कांग्रेसी भी शामिल थे. बापू का कहना था कि चरखा 30 सालों से आजादी की लड़ाई का प्रतीक था. विरोधियों का तर्क था कि झंडे के केंद्रीय स्थान पर कोई शोर्य का प्रतीक चिह्न लगाया जाना चाहिए. कुछ ने तो यह भी कहा कि गांधी जी के खिलौने को झंडे में रखने का क्या मतलब  है.

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तिरंगे के बीच में चक्र सम्राट अशोक की विजय का प्रतीक माना जाता है. यह नीले रंग का चक्र धर्म चक्र भी कहा जाता है. इसे भारत की विशाल सीमाओं का प्रतीक माना गया. अशोक सामाज्य अफगानिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक फैला हुआ था. लेकिन आज लोग पिंगली वैंकया को भुला चुके हैं जिन्होंने तिरंगे को डिजाइन किया था. (news18.com)

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