संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : हिंदुस्तानी न्यायपालिका प्रमुख की विधायिका को खरी-खरी...
18-Aug-2021 4:51 PM (124)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  हिंदुस्तानी न्यायपालिका प्रमुख की विधायिका को खरी-खरी...

सुप्रीम कोर्ट में आज़ादी की सालगिरह के मौके पर देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एन वी रमना ने संसद की कार्यवाही पर नाराजगी जताई। संसद में हुए हंगामों का जिक्र करते हुए उन्होंने संसदीय बहसों पर चिंता जताई और कहा कि संसद में अब बहस नहीं होती। उन्होंने कहा कि संसद से ऐसे कई कानून पास हुए हैं, जिनमें काफी कमियां थीं। पहले के समय से इसकी तुलना करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि तब संसद के दोनों सदन वकीलों से भरे हुए थे, मगर अब मौजूदा स्थिति अलग है। उन्होंने कानूनी बिरादरी के लोगों से भी सार्वजनिक सेवा के लिए अपना समय देने के लिए कहा। सीजेआई ने कहा कि अब बिना उचित बहस के कानून पास हो रहे हैं। अगर आप उन दिनों सदनों में होने वाली बहसों को देखें, तो वे बहुत बौद्धिक, रचनात्मक हुआ करते थे और वे जो भी कानून बनाया करते थे, उस पर बहस करते थे...मगर अब खेदजनक स्थिति है। हम कानून देखते हैं तो पता चलता है कि कानून बनाने में कई खामियां हैं और बहुत अस्पष्टता है। उन्होंने आगे कहा कि अभी के कानूनों में कोई स्पष्टता नहीं है। हम नहीं जानते कि कानून किस उद्देश्य से बनाए गए हैं। इससे बहुत सारी मुकदमेबाजी हो रही है, साथ ही जनता को भी असुविधा और नुकसान हो रहा है। अगर सदनों में बुद्धिजीवी और वकील जैसे पेशेवर न हों, तो ऐसा ही होता है। उन्होंने कहा, ‘आज की स्थिति देख कर दुख होता है। क़ानूनों में बहुत अस्पष्टता है। हमें नहीं पता कि किस कारण से ये बने थे। लेकिन इसकी वजह से कोर्ट के सामने अधिक मामले हैं और लोगों और कोर्ट को असुविधा हो रही है।’ चीफ़ जस्टिस ने कहा ‘आज़ादी की लड़ाई में वकीलों ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और स्वतंत्र भारत के पहले नेता भी बने थे। उन्होंने कहा कि आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता वकील थे। उन्होंने न केवल अपने काम की आहुति दी बल्कि आज़ादी की लड़ाई में अपना परिवार और संपत्ति का भी त्याग किया। उस दौर में संसद में सकारात्मक बहस होती थी। क़ानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा होती थी उन पर बहस होती थी। लेकिन वक्त के साथ आप देख सकते हैं कि संसद में क्या हो रहा है। बहस की गुणवत्ता खऱाब हुई है और कोर्ट अब नए क़ानूनों का मकसद और उद्देश्य समझ पाने में असमर्थ है।’ उन्होंने अपील की कि वकील अपने काम को अपने घर या कोर्ट तक सीमित की बजाय सार्वजनिक हितों के काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेकर संसद में बुद्धिजीवियों की कमी को पूरा कर सकते हैं।

देश के मुख्य न्यायाधीश के आजादी के सालगिरह पर दिए गए इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत है क्योंकि अभी कुछ ही दिन पहले संसद के मानसून सत्र में जिस तरह सरकार ने अपने संसदीय बाहुबल से कानून बनवा लिए हैं, और विपक्ष केवल विरोध करते रह गया, वह नौबत मुख्य न्यायाधीश के इस बयान में खुलकर रखी गई है। इसके पहले भी यह देखा गया कि किसान कानूनों को बनवाते समय भी मोदी सरकार संसद में बहस से कतराती रही और नतीजा यह निकला है कि अपने ही बनवाए हुए कानून के खिलाफ महीनों से चले आ रहे आंदोलन में सरकार उलझी हुई है, और उसे कोई रास्ता समझ नहीं पड़ रहा है। यह सिलसिला ठीक नहीं है। लेकिन यह सिलसिला केवल मोदी सरकार के आने के बाद खराब हुआ हो ऐसा भी नहीं है। पिछली यूपीए सरकार के वक्त इस देश में सूचना के अधिकार का कानून बना और अटल सरकार के वक्त सूचना प्रौद्योगिकी कानून आईटी एक्ट बना। इन दोनों की गंभीरता को संसद में ना तो पार्टियां समझ पाई थीं, और ना ही सांसद समझ पाए थे। संसद के बाहर के लोगों ने मिलकर विधेयक तैयार किए थे, कानून की बारीकियां लिखी थीं, और उन पर न तो पर्याप्त चर्चा हुई थी, और न ही सांसदों ने उन्हें ठीक से समझा था, और उन्हें बहुमत से पारित कर दिया गया था। नतीजा यह निकला कि इन दोनों ही कानूनों में बार-बार कई तरह के फेरबदल की बात होती है, और इनसे कई तरह के खतरे भी सामने आ रहे हैं। अब तो संसद में मोदी सरकार का बहुमत इतना बड़ा है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगह अधिकतर कानूनों के लिए सरकार को विपक्ष की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है, और सरकार अपनी उसी सोच के साथ वहां कानून बनवाते चल रही है।

भारतीय संसद में किसी प्रस्तावित कानून पर चर्चा को पिछली सरकार या इस सरकार जैसी बातों पर आंकना ठीक नहीं होगा। यह समझने की जरूरत है कि संसद में दलबदल विरोधी कानून के नाम पर वैचारिक विविधता को जिस तरह से खत्म कर दिया गया है, और किसी पार्टी के सचेतक अपनी पार्टी के सारे सांसदों को किसी एक वोट देने के मौके पर पूरी तरह से बेबस करके पार्टी की मर्जी का वोट डलवा सकते हैं। उसके भी पहले उस पर अगर कोई चर्चा होती है तो उस चर्चा में पार्टी की घोषित नीति से परे जाकर कोई सांसद कुछ नहीं बोल सकते, तो कुल मिलाकर जिस संसद में एक वक्त अलग-अलग बहुत से जागरूक और विद्वान वकीलों, और दूसरे बुद्धिजीवियों की चर्चा भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अभी की है, उन सांसदों में जो वैचारिक विविधता बहस में सामने आती थी, और तरह-तरह की बातों पर विचार होता था, वह सिलसिला अब खत्म हो चुका है। अब कोई पार्टी या कोई गठबंधन एक गिरोह की तरह बर्ताव करते हैं, और किसी भी तरह की ईमानदार चर्चा की गुंजाइश अब खत्म सरीखी हो गई है। नतीजा यह है कि अलग-अलग सांसदों की निजी सोच, उनके निजी तजुर्बे के आधार पर प्रस्तावित कानूनों पर जो चर्चा होती थी, वह निजी हैसियत अब पूरी तरह खत्म हो गई है। अब तमाम लोग अपनी पार्टी की मशीन के पुर्जे की तरह बर्ताव करते हैं, पार्टियां ही अपने सांसदों को बताती हैं कि उन्हें किन-किन मुद्दों पर बोलना है, और क्या-क्या बोलना है। इसलिए आज भारतीय संसद किसी भी प्रस्तावित कानून पर चर्चा करते हुए वहां मौजूद प्रतिभाओं का पूरा इस्तेमाल करने की हालत में भी नहीं रह गई है, यह एक अलग बात है कि आज भारतीय संसद में प्रतिभाएं घटकर हाशिए पर चली गई हैं, और धर्म या जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता के नाम पर, या गुटबाजी के नाम पर, वहां पर प्रतिभाहीन लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बड़े हौसले का काम किया है जो उन्होंने संसद में मौजूद लोगों और संसद में चल रही बहस, इन दोनों के बारे में बहुत खुलकर कड़ी आलोचना की है। इसके बारे में देश के दूसरे तबकों को भी बोलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश अकेले ही पूरे देश का प्रवक्ता बन जाए यह भी ठीक नहीं है, लोकतंत्र में बाकी तबकों को अपनी जिम्मेदारी भूल नहीं जाना चाहिए।
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