संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अफगानिस्तान में अमरीकी फ़ौज तालिबान के रहम पर जिन्दा है !
29-Aug-2021 5:01 PM (182)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  अफगानिस्तान में अमरीकी फ़ौज तालिबान के रहम पर जिन्दा है !

अफगानिस्तान के ताजा हालात देखें तो अमेरिका पर तरस आता है। बीस बरस जिन तालिबान पर अमेरिका बम बरसाते रहा, जिनके खिलाफ उसने अपने सहयोगी देशों की भी फौज लेकर अफगानिस्तान पर कब्जा करके रखा, अपनी पिट्ठू सरकारों को वहां लाद कर रखा, आज उन्हीं तालिबान के रहमोकरम पर अमेरिका काबुल में जिंदा है। हालत यह है कि काबुल एयरपोर्ट के भीतर तालिबानी इजाजत से अमेरिकी फौजों का काबू है, और 31 अगस्त तक है। लेकिन इसी एयरपोर्ट के पास हुए बम धमाके में अभी 4 दिन पहले 1 दर्जन से अधिक अमेरिकी फौजियों सहित करीब डेढ़ सौ मौतें हुई हैं, और उसके बाद अमेरिकी फौज तालिबान की हिफाजत में वहां से लोगों को निकालने का काम कर रही है। एयरपोर्ट का नियंत्रण अमेरिका के हाथ है लेकिन एयरपोर्ट के बाहर सुरक्षा घेरा तालिबान का है।

किसने ऐसे दिन की कल्पना की होगी कि दुनिया का सबसे ताकतवर देश होने का दावा करने वाला अमेरिका आज अपनी फौज को अफगानिस्तान से निकालने के लिए तालिबान का मोहताज है। आज अमेरिका के सामने यह बहुत बड़ा खतरा है कि अगले तीन-चार दिनों में वह जैसे-जैसे अपनी फौज वहां से रवाना करेगा, वैसे-वैसे एयरपोर्ट पर मौजूद घटती चली जाने वाली अमेरिकी फौज पर खतरा बढ़ते चले जाएगा, क्योंकि किसी हमले से जूझने के लिए वहां अमेरिकी फौज कम संख्या में रह जाएगी। इस बारे में हमने इसी जगह लिखा भी था कि जिस तरह महाभारत में अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो मां के पेट से सीखने मिल गया था, लेकिन चक्रव्यूह को तोडक़र निकलना वह नहीं सीख पाया था, कुछ वैसी ही हालत काबुल में अमेरिका की हो रही है। दुनिया के बड़े-बड़े देश इस बात को लेकर अमेरिका से खफा हैं कि उसने 20 बरस के फौजी कब्जे में तो अगुवाई की, लेकिन आज अफगानिस्तान छोडऩे की नौबत आने पर दसियों हजार अफगान सहयोगियों को छोडक़र वहां से निकल रहा है, जिन्होंने इतने बरस राज्य चलाने के लिए अमेरिका के लिए काम किया था। अमेरिका इस नौबत को लेकर इस कदर हिला हुआ है कि पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तालिबान के साथ किए गए समझौते पर अमल करते हुए भी मौजूदा राष्ट्रपति जो बाईडन के काबू में नौबत नहीं रह गई है, और अपने फौजियों के मरे जाने के बाद वे मीडिया से बात करते हुए थम गए थे। लंबे समय के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की इस तरह एक हमले में मौत हुई है, और इतनी बड़ी संख्या में हुई है।

अगले दो-तीन दिन अफगानिस्तान से किस तरह अमेरिकी फौज और अमेरिकी नागरिक खुद निकल पाते हैं इस पर दुनिया की नजरें हैं। दुनिया की नजरें इस पर भी हैं कि जितना अमरीकी फौजी सामान अफगानिस्तान में आज है, उसमें से कितना वह निकाल सकेगा। काबुल की जो खबरें हैं वे ये हैं कि एयरपोर्ट पर अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत भी चल रही है, अमेरिका मदद भी मांग रहा है, तालिबान बेरुखी से कुछ मदद कर भी रहा है, और उसी के तहत आईएस के आतंकी हमले के बाद अब ताजा हिफाजत तालिबान मुहैया करा रहा है जिसने कि एयरपोर्ट के पूरे इलाके को घेरकर रखा है, अपने कब्जे में रखा है। आज अमेरिकी फौजियों की हिफाजत उस एयरपोर्ट पर तालिबानियों की वजह से है और तालिबान के हाथ है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश अफगानिस्तान को जैसी बदहाली में छोडक़र निकल रहे हैं उसका ब्यौरा संयुक्त राष्ट्र के पास है जिसने कहा है कि अफगानिस्तान की जनता एक बहुत विशाल और विकराल मानवीय त्रासदी पेश कर रही है और दुनिया को इसके बारे में तुरंत सोचना पड़ेगा। लगे हुए पाकिस्तान और ईरान में लाखों की संख्या में अफगान शरणार्थी सरहद खटखटाते खड़े हैं, और उनके पास न खाना है इलाज का ठिकाना है। पाकिस्तान पहले ही अपने हाथ खड़े कर चुका है कि उसकी जमीन पर पहले से जो 15 लाख अफगान शरणार्थी मौजूद हैं, वह उनका ख्याल रखने की ताकत भी नहीं रखता है, और जो नया सैलाब अफगानिस्तान से अब पाकिस्तान सरहद पर पहुंचा हुआ है उसे जगह देने की ताकत पाकिस्तान में नहीं बची है। अब हैरानी इस बात को लेकर भी होती है कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमेरिकी सरकार और उसकी फौज अफगानिस्तान में 20 बरस की अपनी मौजूदगी के बावजूद इस दिन की कल्पना नहीं कर पाई थी कि उसके बाहर निकलने पर अफगान जनता का क्या होगा। खैर, जिसे खुद के निकलने का तरीका नहीं पता, उससे अफग़़ान जनता का अंदाज लगाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
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