संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मौजूदा कानून के इस्तेमाल की जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय नए कानूनों में लगी सरकारें...
02-Sep-2021 5:06 PM (214)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  मौजूदा कानून के इस्तेमाल की जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय नए कानूनों में लगी सरकारें...

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया, वेब पोर्टल और निजी टीवी चैनलों के एक वर्ग में झूठी ख़बरों को चलाने, और उन्हें सांप्रदायिक लहज़े में पेश करने को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे देश का नाम खऱाब हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये कहा। इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना कर रहे थे। इन याचिकाओं में पिछले वर्ष निज़ामुद्दीन मरकज़ में हुई एक धार्मिक सभा को लेकर ‘फेक न्यूज’ के प्रसारण पर रोक लगाने के लिए केंद्र को निर्देश देने और इसके जि़म्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की माँग की गई है। सुनवाई करते हुए अदालत ने पूछा, ‘निजी समाचार चैनलों के एक वर्ग में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है। आखऱिकार इससे देश का नाम खराब होगा। आपने कभी इन निजी चैनलों के नियमन की कोशिश की है?’ उन्होंने कहा, ‘फेक न्यूज और वेब पोर्टल तथा यूट्यूब चैनलों पर लांछन लगाने को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो वहाँ देखेंगे कि किसी आसानी से फेक न्यूज को चलाया जा रहा है और कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई लिखित आदेश या फैसला नहीं आया है लेकिन भरोसेमंद मीडिया में जो खबरें आई हैं उनमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो और जजों की जुबानी टिप्पणियां लिखी गई हैं। अगर उन्होंने केवल इतना कहा है तो हमें इससे थोड़ी सी निराशा भी हो रही है क्योंकि सोशल मीडिया, वेबसाइट, और निजी टीवी चैनलों में जिस तरह से सांप्रदायिकता को भडक़ाया जा रहा है, उससे खतरा केवल दुनिया में देश का नाम खराब होने का नहीं है, इससे देश के भीतर लोगों के बीच माहौल खराब हो रहा है, बहुत हद तक हो चुका है। यह खतरा हिंदुस्तान की बदनामी का नहीं है, यह खतरा यहां की आबादी के बीच नफरत की एक खाई खुद जाने का है।

यह बात सही है कि आज बिना किसी काबू के इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी पोस्ट कर सकते हैं, फेक न्यूज़ फैला सकते हैं, यूट्यूब चैनल पर जो चाहे वह पोस्ट कर सकते हैं, और बाकी सोशल मीडिया का भी ऐसा ही इस्तेमाल चल रहा है। लेकिन आज जितना खतरा इससे है, उतने का उतना खतरा इस बात से भी है कि फेक न्यूज या नफरत को रोकने के नाम पर केंद्र सरकार उसे नापसंद सभी चीजों को रोकने का काम कर सकती है, और झूठ को रोकना तो नाम रह जाएगा, असल में कड़वे सच को रोकने का काम भी होने लगेगा। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी-कभी झूठ फैलाने के भी काम आती है, कभी कभी नफरत फैलाने के भी काम आती है, लेकिन इन वजहों से उस स्वतंत्रता को कम करना कोई इलाज नहीं है। और जहां तक सरकारों का बस चले, तो वे अपने को नापसंद तमाम चीजों को रोकने के लिए सोशल मीडिया, इंटरनेट, मैसेंजर सर्विसों, सभी पर एक कड़ा काबू बनाने की कोशिश में लगी ही रहती हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह बात सही है कि निजी समाचार चैनलों के एक तबके में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है और यह बात भी सच है कि केंद्र सरकार ने इन चैनलों को काबू में रखने के लिए, इनकी नफरत पर इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए, कुछ भी नहीं किया है। इसलिए महज टेक्नोलॉजी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिर पर तोहमत का घड़ा फोड़ देना ठीक नहीं होगा। जहां सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए वहां कार्रवाई न करके कानून को नाकाफी बताना, संचार कंपनियों पर काबू को बढ़ाने की बात करना, सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर अधिक पकड़ बनाने की बात करना, यह जायज नहीं है। देश में पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल न करके नए-नए कानून बनाना या नई-नई ताकत हासिल करना जरा भी न्याय संगत नहीं है।

हर युग में टेक्नोलॉजी आजादी की नई संभावनाएं लेकर आती है। जिस वक्त छपाई चालू हुई उस वक्त भी मौजूदा शासकों को अखबार नापसंद होने लगे क्योंकि उनके तेवर सरकार के हिमायती नहीं रहते थे, और उन में सत्तारूढ़ लोगों की आलोचना भी रहती थी। सरकार को यह लगता था कि यह टेक्नोलॉजी अराजक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल हो रहा है। दुनिया के वे देश जहां लोकतंत्र परिपच् था, और जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया जाता था, वहां तो काम चल गया था क्योंकि वहां सत्तारूढ़ लोगों को मालूम था कि इस स्वतंत्रता को अधिक कुचलना नामुमकिन नहीं है। लेकिन कई देशों में सरकारें ऐसी कोशिश कर रही हैं कि उसे नापसंद छापने या दिखाने वाले लोगों के खिलाफ तरह-तरह की कार्यवाही की जाए। यह सिलसिला लोकतंत्र को कमजोर और बेअसर बनाने की नीयत वाला है, और राजनीतिक ताकतें जब तक सत्ता पर नहीं पहुंचती हैं, तब तक तो वे आजादी की हिमायती रहती हैं, और सत्ता पर आते ही उन्हें वह आजादी अराजक लगने लगती है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई कर रहा है और कई राज्यों की हाईकोर्ट में इससे जुड़े हुए जो मामले चल रहे हैं, उन्हें भी एक साथ जोड़ रहा है। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने जहां-जहां अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं, वह भी अदालत के सामने आएगा, और अदालत के मार्फत देश के सामने साफ होगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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