विशेष रिपोर्ट

2005 से नहीं हैंडपंप, ग्रामीण पेड़ के तने से बुझा रहे प्यास

Posted Date : 08-Jun-2018



जगरगुंडा  का कामरगुंडा गांव, 8 माह से सचिव नदारत

अमन सिंह भदौरिया

दोरनापाल, 8 जून (छत्तीसगढ़)। सुकमा जिले के सुदुर अंचल जगरगुंडा से 5 किमी दूर कामरगुंडा का 40 परिवार सरकार की योजनाओं से कोसों दूर एकमात्र साधन पेड़ के तने से निकलने वाले पानी के सहारे इंसान और मवेशी दोनों ही प्यास बुझा रहे है क्योंकि विभाग ने 15 साल से न तो हैंडपंप की मरम्मत की और न नया हैंडपंप लगाया। कामरगुंडा आदिवासियों के 4 पीढ़ी पहले के पूर्वजों का बसाया गांव है मगर आज भी गांव की स्थिति ऐसी है कि इस गांव को सुकमा के नक्शे में भी नहीं ढूंढा जा सकता। 2006 से इस गांव के लोग शासन की योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते क्योंकि इस गांव में न गांव में हैण्डपंप है न तो स्कूल है न आंगनबाड़ी, न शौंचालय,  न बिजली, न सड़क, न राशन की दूकान न पेंशन न आधारकार्ड न अस्पताल न बैंक पासबुक । यहां तक कि गांव एक कच्चे रास्तों को पार करने के बाद मिलती है। इसी कच्चे रास्तों को पार कर  छत्तीसगढ़ की टीम कमारगुड़ा पहुंची और ग्रामीणों से गांव का जायजा लिया ।
  गौरतलब है कि सरकार की योजनाओं को गांव तक पहुंचाने का जिम्मा पंचायत सचिव की होती पर 7 माह से सचिव ने भी गांव में शकल नही दिखाई। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार हम आदिवासियों के नाम पर सैकड़ों योजनाओं का बखान करती है पर हम तक किसी योजना का लाभ नहीं उठा पाते। 
 इस गांव में एक पेड़ का तना 40 परिवार लगभग 180 लोगों के लिए वरदान साबित हुआ । 2005 में दोनों हेंड पंप खराब होने के बाद पेड़ का तना प्यास बुझाने का एक मात्र जरिया है। इसमें से इतना पानी निकलता है कि 40 परिवार की प्यास बुझाने से लेकर घरेलू उपयोग तक की पूर्ति कर लेता है। ग्रामीणों ने बताया कि इस गांव को उनके पूर्वजों ने 4 पीढ़ी पहले बसाया था और 3 पीढ़ी से वे इस तने से निकलने वाले पानी को पीते आ रहे हैं। यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक पेड़ का तना जो कभी पूरा पेड़ हुआ करता था तब से आज तक जलस्त्रोत का साधन बना हुआ है इसके आस पास न तो पहाड़ है और न कोई नदी फिर भी पर्याप्त पानी तने से मिल रही है। विडम्बना है कि पेड़ के तने के जिस तने से आदिवासी पानी पीने को मजबूर है उसी तने से जानवर और मवेशी भी पानी पीते हैं। 
शिक्षा से भी वंचित बच्चे
कमारगुड़ा गांव के लगभग 40 बच्चे शिक्षा से वंचित है । शिक्षा से न जुड़ पाने की वजह से ये बच्चे परिवार का काम में हाथ बटाते हैं, बच्चे शिकार पर जाते हैं, वनोपज के लिए जाते हैं, लकड़ी लेने जाते है, मछली पकडऩे जाते है, गाय चराने जाते है, खेतों में जाते हैं पर स्कूल नहीं जा पाते। क्योंकि इनके गांव में स्कूल नहीं है और दूसरे गांव में स्कूल है भी तो वो 5 किलोमीटर दूर है। इस वजह से बच्चे शिक्षा से वंचित हंै। जगरगुंडा में स्कूल तो है मगर आश्रम दोरनापाल में संचालित है इस वजह से परिजन बच्चों को आश्रम भी नहीं भेज पाये। रामें पति देवा ने  'छत्तीसगढ़Ó को बताया कि वो अशिक्षित है मगर अपनी दोनों बच्चियों को पढ़ाना चाहती है पर सुविधाएं नही मिल रही। जगरगुंडा में आश्रम भी होता तो भर्ती कर देती । किसी से मार्गदर्शन भी नहीं दिया इस बारे में। कई गांवों में स्कूल पंचायत के माध्यम से भी झोपडिय़ों में संचालित है पर इस गांव को इतना भी नसीब नहीं क्योंकि इस गांव का पंचायत सचिव उदय भास्कर जिला मुख्यालय में ही रहता है और अक्टूबर के बाद से गांव अब तक नहीं आया ।
पहचान के लिए तरसते हैं ग्रामीण
गौरतलब है कि कई गांवों की तरह इस गांव में भी कई ग्रामीण अपनी ही पहचान को तरसते हैं क्योंकि गांव में किसी के पास आधार कार्ड तक नहीं है। इलाका संवेदनशील है और आये दिन ग्रामीणों को पुलिस और सुरक्षाबलों की पूछताछ का हिस्सा बनना पड़ता है और इलाके में एक नाम के कई लोग होने व माओवादी और ग्रामीणों के समान नाम होने से मुश्किलें बढ़ जाती हैं, ऐसे में उनकी पहचान का सरकारी प्रमाण आधारकार्ड  ही है पर अब तक ग्रामीणों को नही मिल पाया।  ग्रामीणों द्वारा मांग के बाद सचिव ने एक कागज में सरपंच सचिव के हस्ताक्षर वाला पहचान पत्र बनाया जिसमें उक्त ग्रामीणों को कई वर्षों से जानने बात लिखीं थी। ग्रामीणों के अनुसार अक्टूबर 2018 में सचिव ये कागज पहचान पत्र बनाकर दिया था वहीं आधार कार्ड के लिए जानकारी लिया था पर आज भी आधारकार्ड नहीं बन पाया।

कमारगुड़ा 4 पीढ़ी पहले बसाया गया गांव है।  2005 से गांव में हैंडपम्प खराब पड़ा है।  पेड़ से जो पानी निकलती है उसी से 40 परिवार का गुजारा हो रहा है। विकास क्या है हमें नहीं पता हमको पानी तक की सुविधा मुहैया नही कराई गई। सरकार की कोई योजना हम तक नहीं पहुंची बस राशन मिलता है उसके लिए भी 5 किमी दूर पैदल जाना होता है। हमारे पास अब तक आधार कार्ड नहीं है। सचिव अक्टूबर के बाद से गांव नहीं आया। 40 बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते।  
माड़वी जोगा,  ग्रामीण, कमारगुड़ा


'छत्तीसगढ़' के माध्यम से मुझे इसकी जानकारी मिल रही है कि कमारगुड़ा में हैण्डपम्प नहीं है, तो हम 14वें वित्त से गांव में हैंडपम्प लगवाएंगे। मैं पंचायत के सरपंच सचिव को बुलवाता हूं जिन योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल रहा है उन्हें दिलाया जाएगा। ग्रामीणों की नाराजगी जायज है मेरे द्वारा सचिवों को हिदायद दी गयी थी की सचिव पंचायतों में दौरा कर ग्रामीणों की समस्याओं को दूर करें। यदि सचिव 7 महीने से पंचायत नहीं पहुंचा तो उसे हिदायद दी जायेगी कार्य में लापरवाही पर कार्यवाही होगी ।
गजेंद्र ठाकुर, सीईओ, जिला पंचायत सुकमा


कमारगुड़ा ही नहीं 15 अन्य पंचायत हैं कोंटा ब्लॉक में जहां जल की समस्या है अधिकारियों के सुस्त रवैये की वजह से लोगों को बुनियादी समस्याएं झेलनी पड़ रही है।  मुख्यमंत्री ने कहा था कांग्रेसी मेरे साथ कोंटा तक चले मैं उनको विकास दुखाऊंगा मेरा उनसे निवेदन है कि वे मेरे साथ राष्ट्रीय राजमार्ग 30 से 5 किमी अंदर चलें मैं उनको दिखाऊंगा कहां है उनका विकास। जनता केवल कागजों में विकास नहीं चाहती। विकास यात्रा में 13वें, 14वें वित्त के मनमाना पैसे भीड़ जमा करने में फिजूल खर्च के बजाय ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतों में करते तो इस तरह के मामले सामने न आते।
 हरीश कवासी, अध्यक्ष, जिला पंचायत

एक नजर 
जिला मुख्यालय से दूरी      -95 किमी
गांव की आबादी               -180
परिवार                            - 40
वृद्ध-वृद्धा                        - 29
शिक्षा से वंचित बच्चे         - 40-45
जल का स्त्रोत                - पेड़ का तना




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