विशेष रिपोर्ट

ईंट भट्ठा गए तंदुरुस्त, लौट रहे बीमार होकर

Posted Date : 08-Jun-2018



रजिंदर खनुजा

पिथौरा, 8 जून (छत्तीसगढ़)। 7 से 8 माह तक ईंट भ_ों में कमरतोड़ मेहनत के बाद अब मजदूर  अपने घरों को लौटने लगे है। स्थानीय बस स्टैंड में सैकड़ों मजदूर उतर रहे हंै।  वहीं यहां से तंदुरुस्त गए मजदूर वापसी में किसी बीमार की तरह नजर आ रहेे हंै।
नगर के विभिन्न स्थानों पर ये मजदूर कुछ खरीदी करते नजर आ जाते हैं। कुछ मजदूरों से चर्चा के बाद ये बात सामने आई है कि मजदूर 7 माह की मेहनत के रूप में 2000 से 30000 तक बचा कर लाये हैं। इसके अलावा कुछ मजदूर नगद लेकर तो आये है साथ में कर्ज भी लाये हंै। लिहाजा उनका आगामी दशहरे के समय पुन: भट्टा जाना तय है। 
मजदूरों के अनुसार उन्हें अलग अलग ईंट भ_ों में 400 से 500 रुपये तक प्रति हजार ईंट बनाने का दिया जाता है। वही सूत्रों के अनुसार वर्तमान में उत्तर प्रदेश के ईंट भ_ों में प्रति हजार 1000 रुपये की मजदूरी दी जाती है। इनमें मजदूरों को दी गयी मजदूरी 400 से 500 के बाद शेश राशि भ_ा दलालों को मिलती है। क्षेत्र से प्रति वर्ष कोई 20000 से अधिक मजदूर  काम करने जाते हंै। ये मजदूर दिन रात मेहनत कर करोड़ो ईंट का निर्माण करते है।इन मजदूरों द्वारा बनाई गई ईंटो पर भ_ा दलालों को घर बैठे लाखों रुपये का कमीशन मिलता है।
न जीएसटी न ही कोई और टेक्स 
जीएसटी से परेशान व्यवसायी भी अब मजदूरों को भेजकर  मुनाफा कमा रहे हंै। एक  भ_ा दलाल ने बताया कि अब मजदूरों को भेजना बहुत आसान हो गया है। मजदूरों को पहले रायपुर तक का किराया देकर रास्ते में छोड़ दिया जाता है । जहाँ से वे सवारी बसों में किस्तों में रायपुर पहुंच जाते हंै। रायपुर से रात की ट्रेनों में जनरल टिकट मजदूरों को देकर उन्हें  भेजा जाता है। इनकी निगरानी के लिए दलालों के एक दो आदमी रिजर्वेशन डब्बे में बैठ जाते है। मजदूरों के साथ चलने वाले ठेकेदार के लोगों को रास्ते की सेटिंग का पता होता है। जिसे वे एक व्यवहार की तरह निपटाते आगे बढ़ते है। गंतव्य स्टेशन पर बाहर निकल कर मिलते हैं  और संबंधित भ_े के मालिक उन्हें अपनी वाहन से ले जाते हंै। मजदूरों की बस एवम ट्रेन  यात्रा के दौरान न तो उनका बीमा कराया जाता है और ना ही उनके खाने का कोई प्रबन्ध ही किया जाता है।  
बीमारों की संख्या बढ़ी
इधर स्वास्थ्य विभाग के सूत्रोंं के अनुसार भ_ा से मजदूरों की बच्चों के साथ वापसी के बाद ग्रामों में बीमारों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। सूत्र बताते है कि अन्य प्रांतों में गए मजदूरों का मालिकों द्वारा समय समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाना चाहिए परन्तु कार्य के दौरान बीमार पडऩे वाले मजदूरी को साधारण दवाई ही दी जाती है। किसी मजदूर की ज्यादा तबियत खराब होने पर उसे अस्पताल ले जाया जाता है। जिसका खर्च बीमार परिवार की मजदूरी से काटा जाता है। बहरहाल वापस आये मजदूर अपने दलाल का नाम बताने से भी डरते हैं।




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