संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 जून : इन दिनों झूठ पकडऩा आसान और उसके बाद बचना मुश्किल

Posted Date : 11-Jun-2018



कल मध्यप्रदेश के एक पुल की बताई गई तस्वीर को पोस्ट करके दिग्विजय सिंह आलोचना के शिकार हो गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पुल में दरार की तस्वीर डालते हुए भोपाल में घटिया निर्माण की बात लिखी। लेकिन इन दिनों गूगल की मेहरबानी से किसी तस्वीर पर क्लिक करके पल भर में यह ढूंढा जा सकता है कि वह तस्वीर हकीकत में कहां की है। दिग्विजय के आलोचकों ने अधिक देर नहीं लगाई और बता दिया कि यह पाकिस्तान की बरसों पुरानी तस्वीर है जिसे वे मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार का घटिया काम बताते हुए फैला रहे थे। खैर, जैसा कि किसी भी जिम्मेदार और समझदार को करना चाहिए, दिग्विजय ने अपनी इस गलती के लिए तुरंत ही माफी भी मांग ली। अब सवाल यह उठता है कि एक पत्रकार के पति रहते हुए और एक देश की राजनीति में लंबा वक्त गुजार चुके दिग्विजय सिंह भी अगर जांच किए बिना ऐसा कुछ पोस्ट करते हैं तो बाकी लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है? 
आज जब उंगलियां फोन के स्क्रीन पर होती हैं, या कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर होती हैं, तो लोग पहले लिखते और पोस्ट करते हैं, बाद में अक्ल का इस्तेमाल करते हैं। अच्छे खासे पढ़े-लिखे लोग, जो लोग अपने दायरे के बड़े जानकार लोग हैं, वे भी सनसनीखेज बातों को आगे बढ़ाने के लालच को छोड़ नहीं पाते। लोगों की मानसिकता समझने की जरूरत है कि वे अपने जानकार लोगों के बीच सनसनी फैलाने में बड़ी दिलचस्पी रखते हैं ताकि उन्हें वाहवाही मिल सके। बहुत से लोग कोई अश्लील लतीफा या वीडियो आगे बढ़ाकर यह भी कल्पना करते हैं कि उन्होंने जिसे भेजा है, उसके चेहरे पर इसे देखकर कैसी प्रतिक्रिया हो रही होगी। लोगों को याद होगा कि एक वक्त सार्वजनिक शौचालयों के दरवाजे के भीतर की ओर लोग खरोंचकर कुछ उत्तेजक बातें लिख देते थे, और फिर यह सोचते-सोचते मजा लेते थे कि बाकी लोग उन बातों को पढ़कर क्या सोच रहे होंगे। आज मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों को दरवाजे नहीं खुरचने पड़ते, अब पल भर में फोन पर मनचाही बात लिखकर, या पहले से आई हुई बात को छांटकर और आगे बढ़ाकर यह काम किया जा सकता है, किया जाता है। 
लेकिन इससे लोग तेजी से गैरजिम्मेदार भी होते चल रहे हैं, और कानूनी खतरे में भी पड़ रहे हैं। देश का आईटी एक्ट बाकी कानून के मुकाबले बहुत कड़ा है, और वहां पर लिखी गई कोई भड़काऊ, अपमानजनक, आपत्तिजनक, या देशविरोधी, धर्मविरोधी बात लोगों को तेजी से गिरफ्तारी तक ले जाती है। अखबार में छपी हुई बात पर सजा दिलवाने का कानून इसके मुकाबले बड़ा नर्म है, और लोगों को तेजी से सजा नहीं हो पाती। लेकिन जहां कम्प्यूटर-फोन या इंटरनेट-फोनलाईन का इस्तेमाल होता है, वहां पर सजा कड़ी है, और तेज रफ्तार भी है। सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उन्हें कई बार पुख्ता कर लेने के बाद ही किसी जानकारी को पोस्ट करना चाहिए। और यह पुख्ता करना आज बहुत आसान काम भी है, कुछ मिनटों से अधिक इसमें नहीं लगता है। 
इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी बात भी है कि पिछले दिनों कई नेताओं ने दूसरे नेताओं से अदालत के भीतर और बाहर क्षमायाचना की है कि उन्होंने उनके खिलाफ जो बयान दिए थे, वे सच पर आधारित नहीं थे, और वे उसके लिए माफी चाहते हैं। यह कोई बुरा सिलसिला नहीं है, क्योंकि देश में अदालतें भारी बोझ से दबी हुई हैं, और इस तरह के मामले अगर बाहर निपट जाएं तो बेहतर है। लेकिन इससे भी बेहतर नौबत यह रहती कि लोग आधारहीन बयान देने के पहले ही अपने को सम्हाल लेते, और आज माफी की नौबत में नहीं फंसते। लोगों को बयान देते हुए या कुछ पोस्ट करते हुए सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि ऐसी गलतियों से उनकी अपनी इज्जत और विश्वसनीयता भी चौपट होती हैं। 
- सुनील कुमार 




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