संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 जून : आलोचना छोड़, प्रचार के तरीके तो कोई भाजपा से सीखे...

Posted Date : 12-Jun-2018



भारतीय जनता पार्टी ने देश भर में एक अनोखा अभियान छेड़ा है। केंद्र की मोदी सरकार के चार बरस पूरे हुए हैं, और सरकार की कामयाबी की पुस्तक या पुस्तिका छपवाकर पार्टी के बड़े नेता देश भर में चुनिंदा लोगों तक जा रहे हैं, और उन्हें अपने योगदान के बारे में बता रहे हैं। हर दिन पार्टी के अलग-अलग स्तर के नेता अलग-अलग लोगों के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, और अखबारों और टीवी पर छा भी रहे हैं। इनमें से कोई तस्वीर नेता की वजह से समाचार-महत्व की हो जाती है, तो कोई तस्वीर उन लोगों की वजह से अहमियत रखती है जिनसे अमित शाह, या राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री जाकर मिलते हैं। इस अभियान का नाम संपर्क फॉर समर्थन रखा गया तो कुछ लोगों को हैरानी भी हुई कि इस एक अंगे्रजी शब्द का कोई हिंदी विकल्प नहीं मिल सकता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण तो सारे ही वक्त अंगे्रजी के शब्दों और अक्षरों से भरे रहते हैं, और उससे कोई परहेज दिखता नहीं है। दूसरी बात यह कि किस तरह एक राजनीतिक दल बिना किसी मौके के इस तरह तकरीबन हर दिन तस्वीरों सहित मीडिया में जगह पा रहा है, वह भी हैरान करता है। इसलिए नहीं कि मीडिया का तमाम हिस्सा भाजपा का खरीदा हुआ है, बल्कि इसलिए कि किस तरह एक राजनीतिक दल अपने को खबरों में बनाए रखने की मौलिक और अनोखी तरकीब ढूंढ लेता है। अब अगर अमित शाह किसी रिटायर्ड सेना प्रमुख से उसके घर जाकर मिल रहे हैं, या माधुरी दीक्षित से उनके घर जाकर मिल रहे हैं, तो यह बात तस्वीर सहित खबर तो बनती है।
जो लोग नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और भाजपा को ब्रांड और मार्केटिंग के बल पर कामयाब बताते हैं, उन्हें यह बात भी समझना चाहिए कि भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में यह कोई बुरी बात तो है नहीं। गांधी के जाने के आधी-पौन सदी बाद भी कांगे्रस पार्टी गांधी के नाम पर वोट तो मांगती ही थी। अब अगर भाजपा मार्केटिंग के जानकार लोगों को साथ रखकर ऐसी तरकीबें निकालती है, तो यह लोकतांत्रिक तरीका भी है, और वक्त की नब्ज को समझने का सुबूत भी है। चाहे सोशल मीडिया हो, चाहे मीडिया हो, चाहे मोदी के कपड़े हों, चाहे उनका हर विश्व नेता के गले लग जाना हो, चाहे कहीं ढोल, और कहीं मंजीरा बजाना हो, अगर खबरों में बने रहने के तरीके पहले से सोचे हुए भी हो, तो उसमें गड़बड़ या गलत क्या है? भाजपा की खूबी तो तब समझ आई जब कर्नाटक में चुनाव प्रचार का वक्त खत्म हो जाने के बाद अगले दो दिन  मोदी नेपाल में मंदिर-मंदिर घूमते रहे, और सीता की नगरी से राम की नगरी तक बस शुरू करते रहे, कीर्तन का झांझर बताते रहे, और पूरे ही वक्त कर्नाटक के टीवी पर भी दिखते रहे। चुनाव आयोग के नियमों को तोड़े बिना मतदान तक एक प्रचार जारी रखने का जरिया अगर भाजपा ने ढूंढ निकाला, तो यह उसकी खामी नहीं, उसकी खूबी है। अब संपर्क फॉर समर्थन के नाम पर भाजपा रोजाना कई प्रमुख लोगों के साथ अपनी तस्वीरें मीडिया में मुफ्त में पा रही है, और हो सकता है कि जिन लोगों से वह मिल रही है उनमें से कुछ लोग सचमुच ही उसकी बातों से प्रभावित हो जाएं। भारत के राजनीतिक दलों को भाजपा से यह सीखने और समझने की जरूरत है कि बदलते वक्त के साथ प्रचार के तरीके कैसे बदले जाते हैं, और कल्पनाशीलता किस तरह राजनीतिक नफा दिलवा सकती है।
- सुनील कुमार 




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