संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : फसलों पर अनुदान से खत्म नहीं हो जाती दिक्कतें, बल्कि शुरू होती हैं, देखें एक नजर
15-Sep-2021 5:08 PM (159)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  फसलों पर अनुदान से खत्म नहीं हो जाती दिक्कतें, बल्कि शुरू होती हैं, देखें एक नजर

संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों ने अभी दुनिया में खेती पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट इस मायने में दिलचस्प है कि इसका अंदाज कहता है कि 80 फीसदी से ज्यादा सरकारी अनुदान या तो फसल की कीमतों को प्रभावित करते हैं, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, या दुनिया में किसानों के बीच गैर बराबरी को बढ़ाते हैं। यह अंदाज कम खतरनाक नहीं है क्योंकि वैसे भी दुनिया के गैर किसान लोगों के बीच में, टैक्स देने वाले संपन्न लोगों के बीच में, खेती पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर हमेशा से एक नाराजगी चली आती है कि इस सब्सिडी की वजह से किसान मेहनत करने के बजाए बैठे हुए सरकारी मदद पा जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट की एक बात यह भी है कि यह सब्सिडी को बंद करने के लिए नहीं कह रही है, यह रिपोर्ट कह रही है कि सब्सिडी किन लोगों को किस तरह से दी जा रही है, इसे सरकारों को दोबारा तय करना चाहिए।

आज मोटे तौर पर दुनिया में जगह-जगह किसानों को उनकी उपज अधिक दाम पर खरीदकर सरकारें सब्सिडी देती हैं या उन्हें खाद रियायती दर पर देती हैं, या उन्हें खेती के लिए कर्ज बाजार के भाव से कम ब्याज पर देती है. कई जगहों पर जिनमें हिंदुस्तान के छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी शामिल हैं वहां किसानों के खेती के कर्ज माफ कर दिए गए हैं, यह भी अलग-अलग राज्यों में कुछ जगहों पर कुछ मौकों पर हुआ है, और जाहिर है कि यह पूरा का पूरा खर्च सरकार के उसी खजाने से होता है जिससे विकास के दूसरे काम होते हैं, जिससे समाज के दूसरे तबकों को किसी तरह की सब्सिडी दी जाती है. तो यह पैसा कहीं अलग से नहीं आता है, किसान को किसी भी तरह से मिलने वाली सब्सिडी या कर्जमाफी सरकार की एक ही जेब से निकलती है, जिस जेब से दूसरे विकास काम होते हैं। तो यह बात ठीक है कि सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए कि उस सब्सिडी की वजह से समाज में कोई गैरबराबरी तो नहीं बढ़ रही है, एक दूसरी बात यह कि उस से पर्यावरण को कोई नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है।

अब हम बातचीत की शुरुआत छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी से करते हैं क्योंकि इस राज्य में धान की कीमत पूरे देश में सबसे अधिक दी जा रही है। जाहिर है कि इससे धान उगाने वाला यह इलाका और अधिक धान उगाने की तरफ बढ़ता है, और सरकार की और अधिक रकम इस अनुदान पर खर्च होती है। अब इस सब्सिडी को सरकार अलग-अलग न्याय योजना, या किसी और नाम से लोगों तक देती है, और मौजूदा कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणापत्र में कर्ज माफी की बात कही थी और सरकार बनने के बाद पहले ही दिन कर्ज माफी का यह फैसला लिया था और कुछ दिनों में ही बैंकों तक किसानों के कर्ज का पैसा पहुंच गया था जिसके लिए राज्य सरकार ने हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। ऐसी बात नहीं है कि छत्तीसगढ़ में पहले से इस बात पर चर्चा न हुई हो कि इस अनुदान की वजह से, अधिक दाम पर धान की खरीदी की वजह से, धान की वह फसल अधिक से अधिक उगाई जा रही है जो अधिक से अधिक पानी भी मांगती है। जबसे यह राज्य बना तबसे एक दूसरा मुद्दा जो चर्चा में था वह था फसल चक्र परिवर्तन का। इसमें यह कोशिश हो रही थी कि धान के बजाय कुछ दूसरी फसलों को कैसे लिया जा सकता है जिससे किसान को उसकी बुनियादी लागत तो थोड़ी सी अधिक लगेगी, मेहनत थोड़ी अधिक करनी पड़ेगी, कुछ नए बीज और नई तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ेगा, लेकिन उसे फसल का धान के मुकाबले अधिक दाम मिलेगा। परंपरागत धान की फसल के साथ जुड़ी हुई किसान की सहूलियत ने उसे किसी दूसरी फसल की तरफ मुडक़र देखने नहीं दिया। और नमूने के तौर पर किसी एक जिले में किसी एक दूसरी फसल की बात को अगर छोड़ दें, तो मोटे तौर पर प्रदेश के तकरीबन तमाम किसान धान पर ही आश्रित हो गए हैं, और उसकी सरकारी खरीद के ही मोहताज हैं। अब इसका पर्यावरण पर असर यह पड़ रहा है कि खूब पानी लग रहा है और जो विविधता होनी चाहिए वह फसलों से खत्म होती चली गई है। फिर छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए 5 हॉर्स पॉवर तक के पंप के लिए मुफ्त बिजली देना तय किया था, जो कि जारी है, और ऐसे पंप तमाम भूजल खींचकर खेतों में डाल देते हैं, और छत्तीसगढ़ में जमीन के नीचे पानी का स्तर हर बरस गिरते चले जा रहा है। पूरी दुनिया में अब किसी भी नई फसल को लेकर पहली चर्चा यह होती है कि उसमें पानी कितना लगेगा। तो धान उगाने वाले इलाके हमेशा अधिक पानी की खपत करते हैं, और धान का अंधाधुंध रकबा बढ़ते चले जाना पर्यावरण पर एक दबाव भी डालता है। लेकिन यह हमने केवल छत्तीसगढ़ की, हमारे सामने की खड़ी हुई बातों का जिक्र किया है, अलग-अलग राज्यों में ऐसे अलग-अलग बहुत से मामले हैं जिन पर स्थानीय स्तर पर भी विचार होना चाहिए और राष्ट्रीय स्तर पर भी, जिस पर कोई नीति या कार्यक्रम बनना चाहिए।

लगे हाथों हम यहां पर एक दूसरी योजना की बात करना चाहते हैं जो भारत सरकार ने अभी-अभी घोषित की है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने भारत में पाम ऑयल की खेती बढ़ाने के लिए एक बहुत बड़ी योजना की घोषणा की है जिसके तहत उत्तर-पूर्व के राज्यों और अंडमान जैसे राज्य में दूसरी खेती की बजाए, दूसरे पेड़ों के जंगल के बजाय, पाम ऑयल के बीज वाले पेड़ लगाने के लिए बहुत बड़ा अनुदान देना तय किया है, जिसके तहत शुरू के कुछ सालों में किसानों की आर्थिक मदद भी की जाएगी, जब तक उसकी फसल ना आने लगे, और किसानों को उसके लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य देना भी तय किया गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव होने से भारत के जो किसान पाम ऑयल की खेती करेंगे वह एकदम से नुकसान में ना चले जाएं। इसके कई मायने हैं, एक तो यह यह सब्सिडी क्या भारत में तेल के दूसरे बीज उगाने वाले परंपरागत किसानों को भी हासिल है, या एक विदेशी फसल को हिंदुस्तान में बढ़ावा देने की सरकार की इस योजना के लिए केवल पाम ऑयल के पेड़ लगाने वाले लोगों को ही इसका फायदा मिलेगा? एक दूसरा मामला यह है कि परंपरागत दूसरे तेल बीज की फसल के लिए चल रहे उद्योगों का क्या हाल होगा? ऐसे बहुत से मुद्दे हैं लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा यह भी जुड़ा हुआ है कि भारी सरकारी अनुदान के साथ शुरू होने वाली इस फसल में बहुत सारा पानी भी लगेगा जो कि पर्यावरण को प्रभावित करेगा, और एक बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर पाम ऑयल के पौधे लगाए जाने पर जैव विविधता खत्म होगी जिससे जंगलों और खेतों दोनों का एक बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। पेड़ों के साथ-साथ बहुत से पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों की जिंदगी भी जुड़ी रहती है, वह किस तरह से नुकसान झेलेगी इसका भी कोई अंदाजा नहीं है। लेकिन यह बात सबको समझ आ रही है कि सरकार की यह अतिमहत्वाकांक्षी योजना पर्यावरण के लिए, अर्थव्यवस्था के लिए, कई किस्म की दिक्कतें खड़ी कर सकती है, और किसी एक खास फसल के लिए केंद्र सरकार की इतनी बड़ी अनुदान योजना क्या देश की बाकी मौजूदा फसलों के साथ एक संतुलन नहीं बिगाड़ेगी? ऐसे कई सवाल हैं।

हम विचारों के इस कॉलम में आज उन पर बहुत विस्तार से टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि वह तकनीकी जानकारी के साथ और उनके विश्लेषण के साथ लिखे जाने वाले लंबे लेख के लायक मुद्दे हैं। लेकिन हम छत्तीसगढ़ में धान की जरूरत से अधिक फसल से लेकर उत्तर पूर्व में दूसरी फसलों और दूसरे पेड़ों के जंगलों की जगह लगाए जाने वाले पाम ऑयल के पेड़ों तक बहुत से मुद्दों के बारे में चर्चा करना चाहते हैं कि सरकारी अनुदान पर आधारित खेती के साथ पर्यावरण के जो मुद्दे जुड़े हुए हैं उन पर जरूर ध्यान देना चाहिए, जैव विविधता से जुड़े हुए जो मुद्दे हैं उनके बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि सरकारी अनुदान लोगों को उसका फायदा लेने उसका फायदा पाने की हकदार फसलों की तरफ बढ़ाता है और उस पर फिर सरकार का भी काबू नहीं रह जाता। सरकारें क्योंकि निर्वाचित रहती हैं इसलिए वे अनुदान को चुनावी फायदे से जोडक़र भी चलती हैं, इसलिए एक बार जब ऐसे अनुदान शुरू हो जाते हैं तो उनका खत्म होना मुश्किल या नामुमकिन हो जाता है। हम किसी भी अनुदान को बंद करने की सिफारिश नहीं कर रहे हैं लेकिन किसी भी अनुदान को शुरू करने के पहले केंद्र या राज्य सरकार को उस अनुदान के शुरू होने के बाद होने वाले पर्यावरण के फेरबदल के बारे में अध्ययन करने के लिए हम जरूर कह रहे हैं। यह जनता का पैसा है इसे जिन लोगों को मदद के लिए देना जरूरी लग रहा है उन्हें देना सरकार का हक है, लेकिन यह धरती का नुकसान करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। पर्यावरण का जो नुकसान सरकारों की नीतियां करती हैं उनमें धरती, पेड़, पानी, जंगल, जानवर, इनकी कोई आवाज इसलिए नहीं सुनी जाती कि इनके हाथ में कोई वोट नहीं होता है। लेकिन आने वाली पीढिय़ों को बहुत बुरी तरह नफा या नुकसान पहुंचाने वाली आज की चुनावी नीतियों के बारे में सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए। सरकारें शायद कोई कड़वे फैसले ले नहीं सकतीं और लुभावने फैसले लेने के लिए बेताब रहती हैं, इसलिए पर्यावरण के जानकार लोगों को, समाज के जागरूक लोगों को, इन मुद्दों को लगातार उठाना चाहिए और लोगों के सामने रखना चाहिए कि चुनावी घोषणा पत्र के लोकप्रिय मुद्दे या कि लाल किले से की गई घोषणाएं इन 5 वर्षों के बाद अगले सौ-पचास बरस तक इस धरती के पर्यावरण को कैसे प्रभावित करेंगी।
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