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पेरियार के दर्शन-चिंतन : बहुजन मुक्ति का तत्वज्ञान
17-Sep-2021 1:06 PM (97)
पेरियार के दर्शन-चिंतन : बहुजन मुक्ति का तत्वज्ञान

   ई. वी. रामासामी पेरियार जयंती विशेष  

 

-डॉ. गोल्डी एम. जॉर्ज

ई. वी. रामासामी पेरियार (17 सितंबर, 1879 - 24 दिसंबर, 1973) भारत में दलित-बहुजन दर्शन व आंदोलन के प्रमुख नायकों में से एक हैं। जोतीराव फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ उनकी तिकड़ी ने बहुजन आंदोलन को सटीक बौधिक जमीन दी। इन तीनों नायकों में पेरियार, ब्राह्मणवाद के खिलाफ अपने अधिक तीखे विचारों के लिये जाने जाते हैं। ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म की कुरीतियों पर उन्होंने जिस तरह से तीखा प्रहार किया है, वैसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं। विचारों से बहुत क्रांतिकारी पेरियार ने अपने विवेक और तर्क से ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता को कटघरे में खड़ा किया। वे जाति व्यवस्था के घोर विरोधी थे। उन्होंने ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता युक्त संस्कृति की जगह दलित, बहुजन, द्रविड़ संस्कृति को पेश किया और वे राम की जगह रावण को अपना नायक मानते थे।

खेदजनक है कि आत्मसम्मान आंदोलन के जनित्र पेरियार का बड़ा प्रभाव दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु तक ही सीमित रहा गया और उन्हें पिछड़ों के रेता के रूप में समेत दिया। हिंदी पट्टी में आज भी बहुसंख्यक लोग उनके विचारों के विविध आयामों से अनजान हैं। पेरियार एक नए समाज की रचना करना चाहते थे, जिसमें समाज की जाति-धर्म भेदभाव और विसंगति से परे राजनीति, समतामूलक जनवादी सामाज, मेहनत और श्रम आधारित अर्थव्यवस्था, नए तौर-तरीके से ग्रामीण विकास, बुद्धिवाद आधारित शिक्षा और आर्य वर्चास्वा के विपरीत समाज बनाना चाहते थे।

1927 में एक महत्वपूर्ण घटना हुई। पेरियार और गांधी एक-दूसरे से  बंगलौर में मिले, जो उन दिनों मैसूर का हिस्सा था। बातचीत के दौरान पेरियार ने साफ शब्दों में कहा कि हिंदू धर्म को मिट जाना चाहिए। पेरियार के अनुसार हिंदू धर्म ब्राह्मणों द्वारा फैलाई गई केवल एक भ्रांति है। पेरियार गांधी को बताते है दूसरे धर्मों का इतिहास है, आदर्श हैं और कुछ सिद्धांत हैं, जिन्हें लोग स्वीकार करते हैं। पर इसमें कहने लायक क्या है? सिवाय जातीय भेदभाव और ऊंच-नीच जैसे ब्राह्मण, शूद्र और पंचम (अछूत) के उसकी कोई आचार संहिता नहीं है। न ही उसका कोई साक्ष्य है। इस जन्माधारित विभाजन में भी ब्राह्मणों को ऊंचा माना जाता है। जबकि शूद्र और पंचम को नीचा समझा जाता है। रोजमर्रा के जीवन में इंसानों के बीच केवल उंच-नीच का रिश्ता ही रह जाता है।

बुद्धिवाद से युक्त इस बहस में गांधी महज एक प्रतीक थे। उनकी जगह कोई धुरंधर धर्म-आचार्य भी होता तो लगभग उन्हीं तर्कों को देता। कारण है कि धर्म के पक्ष में कहने के लिए उसके समर्थकों के पास ‘आस्था’ और ‘विश्वास’ के अलावा और कोई तर्क होता ही नहीं है। इसलिए छोटे-से-छोटा तथा बड़े-से-बड़ा धर्माचार्य भी धर्म को अनुकरण का मामला बताकर, विमर्श की सभी संभावनाओं से बचते है। उनकी बातों पर विश्वास कर आस्था की डगर चलते हुए, भोले-भाले लोग कब अज्ञान की राह पर निकल पड़ते हैं : यह उन्हें पता ही नहीं चलता।

‘सच्ची रामायण’ पेरियार की बहुचर्चित और विवादित पुस्तक रही है। यह 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने रामायण की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाते हुये इसे काल्पनिक बताया है। दरअसल पेरियार मानते थे कि रामायण को धार्मिक नहीं बल्कि एक राजनीतिक किताब माना जाना चाहिए, जिसे उत्तर भारत के आर्यों ने दक्षिण के अनार्यों पर अपने तथाकथित जीत, विजय और प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए लिखा गया है। ‘सच्ची रामायण’ में एक तरह से रामायण की आलोचना पेश की गई है और इसमें राम सहित सभी अच्छे माने जाने वाले पात्रों के विचारों पर सवाल खड़ा करते हुये रावण को नायक के तौर पर स्थापित किया गया है।

‘सच्ची रामायण’ की वजह से काफी विवाद हुआ था। इसकी वजह यह कि इस किताब में राम सहित रामायण के कई पत्रों को खलनायक के रूप में पेश किया गया है। पेरियार ने राम को बेहद साधारण व्यक्ति माना है। इसमें उन्होंने राम के विचारों को लेकर सवाल खड़े किए थे और राम-रावण की तुलना पर भी उनके अलग विचार थे।

वैसे तो ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद 1968 में ही राम आधार ने अनुवाद किया जिसका प्रकाशन ललई सिंह यादव ने किया। परंतु, तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर 1969 में पाबंदी लगा दी थी। हालांकि बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस पाबंदी को हटा दिया था। आज पेरियार के दर्शन, चिंतन और कार्यों को जानने का एकमात्र मध्यम उनके आंदोलन, भाषण और लेख है।

1924 में उनके आंदोलन की तीव्रता का एक मिसाल वैक्यम सत्याग्रह में देखने को मिला। केरल में त्रावणकोर के राजा के मंदिर की ओर जाने वाले रस्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का विरोध हुआ था। इसका विरोध करने वाले नेताओं को राजा के आदेश से गिरफ्तार कर लिया गया और इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए कोई नेतृत्व नहीं था। तब, आंदोलन के नेताओं ने इस विरोध का नेतृत्व करने के लिए पेरियार को आमंत्रित किया। इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए पेरियार ने मद्रास राज्य काँग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया और त्रावणकोर गए। त्रावणकोर पहुंचने पर उनका राजकीय स्वागत हुआ क्योंकि वो राजा के दोस्त थे। लेकिन उन्होंने इस स्वागत को स्वीकार करने से मना कर दिया क्योंकि वो वहां राजा का विरोध करने पहुंचे थे। उन्होंने राजा की इच्छा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, अंतत: गिरफ्तार किए गए और महीनों के लिए जेल में बंद कर दिए गए। केरल के नेताओं के साथ भेदभाव के खिलाफ उनकी पत्नी नागमणि ने भी महिला विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया।

‘भविष्य की दुनिया’ शिर्षिक आलेख में उन्होंने बिना ईश्वर और धर्म के दुनिया की कल्पना की है। इसी प्रकार ‘सुनहरे बोल’ में विभिन्न विषयों पर पेरियार के प्रतिनिधि उद्धरणों के चयनित संकलन को पेश किया गया है। इससे पता चलता है कि पेरियार राजनीति, समाज, श्रमिकों, बुद्धिवाद को लेकर क्या सोचते थे और किस तरह का समाज बनाना चाहते थे।

‘बुद्धिवाद : पाखंड व अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग’ में वे तर्कवाद से पैदा हुये ज्ञान को ही असली ज्ञान मानते हुये लिखते हैं कि ‘हमारे देशवासियों की स्थिति इस ज्ञान का उपयोग न करने के कारण बेहद खराब हो रही है।’ ‘ब्राह्मणवादी धर्म-ग्रंथों में क्या है?’ में उन्होंने ब्राह्मणवादी साहित्य को अज्ञानता का साहित्य बताया है। ‘दर्शन-शास्त्र क्या है?’ शीर्षक लेख में उन्होंने ईश्वर और धर्म पर गहनता से अपने विचारों को प्रस्तुत किया है।

‘जाति का उन्मूलन’ अपेक्षाकृत छोटा लेख है, जिसमें वे सवाल करते हैं कि ‘यदि हमारे लोग जाति, धर्म, आदतों और रीति-रिवाजों में सुधार लाने को तैयार नहीं होते हैं, तो स्वतंत्रता, प्रगति और आत्म-सम्मान पाने की शुरूआत कैसे कर सकते हैं?’ वे आगे लिखते हैं कि ‘हर व्यक्ति स्वतंत्र और समान है इस स्थिति को पैदा करने के लिए जाति का उन्मूलन जरूरी है।’

पेरियार स्त्री-पुरुष समानता के प्रबल समर्थक थे। इस संबंधित में उनके दो लेख ‘महिलाओं के अधिकार’ और ‘पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के जीवनसाथी’ में पितृसत्ता से जुड़े बहुत एहम सवाल को उठाते है।

‘महिलाओं के अधिकार’ में वे सवाल उठाते हैं कि ‘अगर किसी महिला को संपत्ति का अधिकार और अपनी पसंद से किसी को चुनने तथा प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह पुरुष की स्वार्थ-सेवा करने वाली एक रबड़ की पुतली से ज़्यादा और क्या है?’ इसी लेख में वे इस सवाल का जवाब भी देते हैं कि ‘प्रत्येक महिला को एक उपयुक्त पेशा अपनाना चाहिए ताकि वह भी कमा सके। अगर वह कम से कम खुद के लिए आजीविका कमाने में सक्षम हो जाए, तो कोई भी पति उसे दासी नहीं मानेगा।’

‘पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के जीवनसाथी’ में वे पति और पत्नी जैसे उद्बोधनों पर ही सवाल उठाते हुए इस रिश्ते को ‘एक-दूसरे का साथी’ और ‘सहयोगी’ की नई परिभाषा देते हुये लिखते हैं कि ‘विवाहित दम्पत्तियों को एक-दूसरे के साथ मैत्री भाव से व्यवहार करना चाहिए। किसी भी मामले में, पुरुष को अपने पति होने का घमंड नहीं होना चाहिए, पत्नी को भी इस सोच के साथ व्यवहार करना चाहिए कि वह अपने पति की दासी या रसोइया नहीं है।’

इस तरह से देखा जाए तो एक नए समाज की रचना के लिए पेरियार अनेक क्रांतिकारी उपाय बताए है, जो वास्तव में दलित-बहुजन समाज के लिए मुक्ति का नया तत्वज्ञान है।

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